पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
जगदीश बृजवाल हिमालय की गोद में बसा हिमनगरी, जिसे ‘सारा संसार एक मुनस्यार’ भी कहते है। उत्तर में हिमालय के तलहटी के मिलम ग्लेश्यिर से उदगम गोरी नदी निचले घाटी के में उतरकर वार-पार के बीचों बीच बहते मवानी-दबानी तक तथा पश्चिम में हीरामणि ग्लेशियर निकलने वाली नदी रामगंगा सीमा रेखा बनाते नाचनी, नौलड़ा तक मुनस्यारी तहसील का सीमांकन क्षेत्र है। मुनस्यारी तहसील क्षेत्रफल की दृष्टि से कई जिलों से भी बड़ा है। जैसे जिला हरिद्वार। क्योंकि इस तहसील क्षेत्र की सीमा तिब्बत (चीन) तक जा लगती है। प्राचीन समय जोहार के शौका जनजाति तथा मुनस्यारी के मूल बरपटिया जनजाति के लोग जो यक्ष, किन्नर, किरात, नागवंशी तथा मंगोलियाड, मुख मुद्रा व तिब्बती बर्मी भाषा के समावेश से कुछ-न-कुछ सम्बन्ध अवश्य उनसे भी रहा है। जोहार के इतिहास में तीनों कालखण्डों का अनुशासित वर्णन दिखने को नहीं मिलता, ऐसे में पाठकों को कुछ भ्रम की आशंका बनी रहती है। जबकि जोहार का इतिहास तीन कालखण्ड में वर्गीकृत दिखाई स्पष्ट है- प्राचीन काल- हल्दु्वा-पिङंगलवा युग, मध्य काल पनज्वारी युग, आधुनिक युग धामू रावत का जोहार घाटी में प्रवेश व पंनज्वारियों का अवसान। तीन काल खण्ड जोहार के समग्र इतिहास की जानकारी देते हैं। इनमें आपस में रक्त सम्बन्ध भी स्थापित र्है अर्द यायावरी जनजाति मौसम के अनुसार अपने प्रवास बदलते रहते थे किन्तु सन 1962 में तिब्बत पर चीन का अधिपत्य हो जाने के कारण शौकाओं का व्यापार बन्द हो गया था, सभी लोग बेरोजगार हो गये। नए रोजगार की तलाश में अब एक स्थान पर स्थायी भी रहने लगे थे। शिक्षा, नौकरी, पद प्राप्त कर आज पुनः अच्छी स्थिति में देश के कौने कौने में बस गये हैं। यहाँ के लोगों का व्यापार समाप्ति के वाद धीरे-धीरे लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया था। वर्तमान में अब शौकाओं की जनसंख्या क्षेत्र में न्यून है, कुछ ही गाँव तक सीमित परिवार निवास करते हैं। व्यापारी जो सदैव अपनी व्यापार को उन्नत बनाने के लिए मृदु भाषा, व्यवहार कुशल, मिलनसार बनने का प्रयत्न करता है सुबह से शाम तक अपनी वाणी में संयम, भाषा की सौहार्दता का विशेष ध्यान रखते है जो बाद में उसकी आदत व्यवहार में अवश्य शुमार हो गया होगा। किसी भी घर, परिवार में कोई भी व्यक्ति जो घर के लिए आर्थिक योगदान देता है वह घर का मुख्य व्यक्ति हो सकता है इस कारण घर परिवार में उनकी बातों को हमेशा परिवार तबज्जू देता है, उनकी बातों को लोग अमल में भी लाते हैं। व्यक्ति की वाणी की सौम्यता, व्यवहार में मधुरता परिवार के लिए भी तथा व्यवसाय के लिए भी संजीवनी का काम करता है। शायद कोई अनुमान न लगा पाये, पर उनकी तहजीब सबके लिए जीवनोपयोगी सिद्ध हो चुका था। तहजीब, जिसे हम कहते हैं किसी भी संस्कृति, सभ्यता के अवयव आचरण, आचार-व्यवहार, सदभाव, प्रेम गुण-धर्म की सीख व्यक्ति को घर या समाज से ही मिलता है। परिवार बालक की सर्व प्रथम पाठशाला होता है जहाँ से बच्चा संस्कारवान बनकर बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है। आपकी सहिष्णुताता आपके कई कामों को आसान बना देती है। शौकाओं का अपना व्यापार करने के एवज में उसे कई लोगों के साथ अपनी अच्छे सम्बन्धों को बढ़ावा देना पड़ता होगा, जिस कारण घर के सदस्य के साथ हो या बाहर के, वाणी में मधुरता यथावत रखनी पड़ती होगी, व्यापारी की मजबूरी सदैव तहजीब को बनाये रखना ही है। अन्यथा व्यापार में अवरोध आने की आशंका बनी रहती थी जिस कारण शौका व्यापारी को दैनिक जीवन में भी अपने पशुओं से लेकर परिवार व बाहर के लोगों से भी अच्छे व्यवहार सम्बन्धों को बनाये रखना आवश्यक था। इस कारण उसने अपने पास-पड़ोस, अपने बन्धु-बान्धवो के साथ मैत्राीपूर्ण व्यवहार बनाकर अच्छे वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण योगदान अवश्य किया होगा। जोहार घाटी में अतीत में निवास करने वाले लोग सभी जोहारी कहलाये जाते थे। किसी भी जाति धर्म का क्यों न हो, जोहार में निवास करने के बाद जोहारी ही कहलाए, अपनी बुद्धि, क्षमता अनुसार कार्य कर आपसी सामंजस्यता प्रेम सदभाव से अपने कार्यों में मशगूल रहे, अनुमान/कल्पना तो आज के लोगों का कथन और सोचना है, उसी प्रकार तहजीब, संस्कार अग्रिम पीढ़ी को तथा पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार समाज को हस्तांतरण करते रहे हैं। मुनस्यारी क्षेत्र के लोगों की ईमानदारी, विश्वास, स्वाभिमानी होने का प्रमाण तो सिद्ध है, यहाँ के लोग जुवान व उसूल के पक्के होते थे। सच्चाई, ईमानदारी, विश्वास के लिए कभी समझौता नहीं करते थे। तिब्बत व्यापार हेतु जाने वाले मार्ग में एक स्थान बोगडियार पड़ाव है, उससे कुछ नीचे दक्षिण दिशा की तरपफ रारगारी नामक अति दुर्गम स्थल माना जाता है, सत्यता यह भी है कि शौका लोग व्यापार के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री जो अपने पशुओं के पीठ पर लादकर तिब्बत तक पहुँचाते थे यदा-कदा उन्हें इन स्थानों में कहीं सड़क किनारे, गुफा आदि स्थान पर सुरक्षित मोटे कपड़े से (तिरपाल) ढक कर रख देना पड़ता था। अगले वर्ष उसे सुरक्षित सामान मिल जाता था, जो उस समय के समाज की अच्छी स्थिति की जानकारी देता है कि झूठ, चोरी-चकारी, बईमानी, अविाश्वास को समाज में कोई भी स्थान नहीं दिया गया था। मुनस्यारी क्षेत्रा में रहने वाले सभी जाति विरादरी के बीच जो प्रेम, मित्राभाव अतीत में दिखाई देती देती है वो अब कहाँ! हमेशा आपस में एक दूसरे की प्रति अटूट विश्वास व सम्बन्ध बनाए रखना अपना परम कर्तव्य समझते थे तथा सम्बन्धों की प्रागढ़ता पीढ़ी दर पीढ़ी भी निरन्तर चलती रही। अतिथि सत्कार करना इस क्षेत्र के लोगों को कहीं से सीखने की आवश्यकता न थी। अपने गुण की पहिचान वह बखान अपने मुँह से कभी नहीं किया। आपसी सामंजस्यता, खाना-पीना, उठना-बैठना, बोलचाल जिसने आपसी समानता को बनाये रक्खा, क्षेत्रा में सभी जाति धर्म के लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य तहजीब-ए-मुनस्यार ने किया था तथा आपस में सदैव एक दूसरे का सहयोग कर काम आते रहे हैं, इस कारण मुनस्यारी क्षेत्रा की लोगों की वाणी ने लोगों को ध्यान आकर्षित कर अच्छी परम्परा की नींव रख दी। इस बात की समझ अनुमान/कल्पना आज करते हैं तो क्षेत्र में आने वाली बाहरी लोग जो सरकारी कार्मिक, अध्यापक गण नियुक्ति, पदोन्नति में आकर दूर दराज गाँव में लम्बे समय तक ठहराव करते हैं तो उन्हें यहाँ के लोगों का आचार-व्यवहार में अपनत्वता झलकता है तभी यहाँ से अन्यत्रा जाने के पर यदा-कदा जब उनके सन्देश मिलते तथा कभी मिलन हो जाने पर क्षेत्रा तथा वहाँ रहने वाले लोगों की प्रशंसा करते नहीं थकते हैं। तहजीब की आवश्यकता तथा बनाये रखना जो शौका समाज के अच्छे संस्कारों के गुण धर्म को विकसित करना था। विरासत में मिला तहजीब व प्रकृति का अमूल्य उपहार प्राप्त कर सदैव यहाँ के वाशिन्दे अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं।
देव सिंह बोरा अनुपम सौन्दर्यमयी मुनस्यारी तहसील का पुराना नाम जीवार उर्फ जोहार है। मिलम ग्लेश्यिर के जिस स्थान से गोरी नदी निकलती है, उसके दाहिने तरफ बरफ से ढके पहाड़ का नाम जावार है। इसी जीवार पर्वत के नाम से इस क्षेत्र का नाम कालान्तर में जोहार हो गया। माना जाता है कि गोरी नदी इसी जीवार पर्वत के एक भाग को तोड़ कर हरलिंग (हंसलिंग) पर्वत को छूते हुए मुनस्यारी को दो भागों में सींचती हुई मदकोट जौलजीवी को चली जाती है। हरलिंग इतना उष्मावान है कि उसमें वर्फ टिक नहीं सकता। हरलिंग अर्थात शिवलिंग को गौरी (पार्वती) का नदी रूप में स्पर्श कर बह जाना रहस्यमीय है। शिव पार्वती की विवाह स्थली और पार्वती की तप स्थली हिमालय ही तो है। पहले जोहार एक पगरना थाा। विकट बन्दोबस्त, जो वर्ष 1863 में अल्मोड़ा जिले से प्रारम्भ हुआ था, के दौरान जोहार परगना को तल्ला देश जोहार व मल्ला देश जोहार दो पट्टियों में विभक्त किया गया। बाद में एक पट्टी गोरीपफाट बनया गया। जोहार-मुनस्यारी का एक पुराना नाम भोट प्रदेश भी है। यह भोट शब्द तिब्बत के बोध् शब्द से बना है। तिब्बत देश को वहाँ की स्थानीय भाषा में बोध् कहा जाता है। कुमाउँ केशरी बी.डी.पाण्डे द्वारा लिखित कुमाउँ का इतिहास के अनुसार वर्ष 1790 तक मुनस्यारी में चंद वंश का शासन था। 1790 से 30 अप्रैल 1815 तक गोरखा राज (नेपालियों का) तथा 3 मई 1815 के बाद मुनस्यारी अंग्रेजों के अधीन हो गया। प्रसिद्ध चंदवंशी राजा बाज बहादुर चंद ने वर्ष 1670 में भोट के रास्ते चल कर तिब्बतियों पर आक्रमण किया और तिब्बतियों से ताकललाखाल जीत कर आदेश जारी किए कि भोटिए लोग जो टैक्स तिब्बती राजा को देते हैं न दें। बाद में तिब्बत राजा द्वारा निवेदन करने व भविष्य में जोहारियों को रास्ते, व्यापार, धर्म के विषय में परेशान न करने का वचन देने पर पुनः टैक्स देने की सहमति बनी। राजा बाज बहादुर चंद के गाइड के रूप में जोहार भादू बूढ़ा तथा लोरू बिल्ज्वाल तिब्बत गए थे। राजा ने इनाम के रूप में इनको कुछ गाँव (पांछू, बुर्फू, पातू, धपा, तेली) जागीर में दिए। लोरू बिल्ज्वाल को कोश्यारी बाड़ा मिला। मल्ला देश जोहार समुद्र तल से 330 मीटर से 4500 की उँचाई पर स्थित है। पहले इन दोनों पट्टियों के लोगों के रहन-सहन, खान-पान यहाँ तक कि वेशभूषा में भी अन्तर था। मल्लाजोहार का कुछ भाग 5 माह तक बर्फ से ढका रहता है शेष में शीत लहर का प्रकोप रहता है। लेकिन तल्लाजोहार घाटी में होने से मौसम के हिसाब से गरम रहता है। मुनस्यारी जो कि मल्लाजोहार व गोरी फाट पट्टियों का संयुक्त नाम था, अपने आप में विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों, मौसम, प्राकृतिक सौन्दर्य, नदी-झरनों, हिमाच्छादित पर्वतों, जाति, वर्ण, धर्म आदि की विविधताओं के लिए प्रसि( रहा है। जो इस कहावत से सि( होता है- आध संसार-एक मुनस्यार। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जोहार के लोग अपने क्षेत्र को बहुत बड़ा समझते थे। यानि जोहारी लोग यह मानते थे कि आधे भाग में तो ईश्वर ने मुनस्यारी-जोहार ग्राम बनाए हैं और आधे भाग में शेष संसार को। लेकिन इतिहासकारों की यह टिप्पणी या व्याख्या सही प्रतीत नहीं होती। इस उक्ति के भावार्थ को इस क्षेत्रा से सम्बन्ध्ति विविधताओं को जोड़ कर समझा जाना चाहिये। मुनस्यारी छोटा क्षेत्र होने के बावजूद संसार के अनेक प्राकृतिक संरचनाओं, जातियों, वंशों की अनेकता को अपने में समेटे हुए है। संसार के अन्य भागों में पायी जाने वाली जातियां मंगोल, शक, गोरखा नेपाली, आर्य, तिब्बती, हूण, नाग, किरात, खस, राजस्थानी, हिमाचली, गढ़वाली, गुजराती आदि जाति धर्म के लोग इस छोटे से क्षेत्रा में रहते हैं। पूर्व में जाति धर्म के अनुसार बोली, भाषा जैसे तिब्बती, गोरखाली, पहाड़ी, गढ़वाली, हिमाचली आदि बोली जाती थी और उसी के अनुरूप विविध् पहनावा भी लोग पहनते थे। वर्तमान में मुनस्यारी में चारों वर्णों के लोग निवास करते हैं। मुनस्यारी तहसील में ब्राह्मणों व ठाकुरों की ही करीब 82 जातियां रहती हैं। यहाँ के शौका व्यापार के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं। तिब्बत व नेपाल के अतिरिक्त माल के लिए देश के सभी प्रमुख शहरों तक उनका व्यापार पफैला था। वे भारत का सामान ल्हासा, ज्ञानिमा मण्डी आदि तक बकरियों, घोड़ों से पहँुचा कर तिब्बती सामान भारत लाते थे। विकट रास्तों से कबरियों द्वारा सामान ढुलान करना खतरे से खाली नहीं था। इसलिए एक बकरी-दस ढकरी की आवश्कता होती थी। इस वंश के सुनपति शौका बहुत बड़े व्यापारी माने जाते थे। मुनस्यारी में विश्वविख्यात मिलम ग्लेश्यिर एवं पंचाचूली, राजरम्भा, हरलिंग, छिपलाकेदार, नन्दादेवी, नन्दाकोट आदि हिमालय पर्वत श्रृंखलाएं हैं। उनकी उपत्यकाओं में वनोषधि अतीश, कटिक, निरविष, गुग्गल, मासी, हाथजड़ी और कस्तूरीमृग, डफिया मुनाल आदि दुर्लभ पशु-पक्षियां पाये जाते हैं। बुग्याल में अनुपम छटा बिखेरते अनेकानेक पुष्प तथा ब्रह्मकमल जैसे नन्दन वन की शोभा बढ़ाते हैं। देवदार, भोजपत्रा, थुनेर, ल्वेंट आदि अनेक ज्ञात अज्ञात पादप तथा जलचर, थलचर व नभचर पाए जाते हैं। मुनस्यारी रिषि मुनियों की तपोभूमि रही है। शान्ति के लिए रिषि मुनि यहाँ आते थे। प्रेम कथाओं में राजुला मालूशाही की प्रेम गाथा की गिनती- रोमियो-जुलियट, मालती-माध्व, हीर-रांझा की कोटि में होती है, जो इसी धरती से सम्बन्ध् रखते हैं। उपरोक्त प्राकृतिक व सामाजिक विविधताओं के छोटे से क्षेत्र में विद्यमान होने के कारण आध संसार-एक मुनस्यार का पुरातन कथ्य प्रचलन में आया होगा, ऐसा प्रतीत होता है।
डाॅ.पंकज उप्रेती 25 फरवरी 2023 की प्रातः सीमा का फोन आया- ‘ददा, पिता जी नहीं रहे। मैं सीमा बोल रही हूं कपिल जी की बेटी।’ सीमा (भुवन कपिल जी की सुपुत्री), मैं एकटक सोच में डूब गया। 81 वर्षीय भुवन कपिल सच्चे रंगकर्मी थे, पहाड़ की होली और रामलीला में उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा। हल्द्वानी शहर के मुखानी में रहने वाले कपिल परिवारों का शुरु से दबदबा रहा है। एक जमाने में जब मुखानी में दादाओं का नाम लेकर लोग डर जाते थे, खुली नहर में उफनते पानी को देख भयभीत हो जाते थे, भुवन कपिल का आवास सुरलहरियों में भीगा रहता था। मुखानी में होने वाली पर्वतीय रामलीला का बहुत नाम हुआ करता था। रात्रि में होने वाली रामलीला की तालीम से लेकर तैयारी तक इनके आवास पर होती। इसके अलावा मंगलवार को होने वाले सुन्दरकांड में युवाओं की टीम सक्रिय रहती। कपिल जी का आवास पूरी तरह अखाड़ा बना हुआ था, रात्रि को होली की महफिलों का जमजमा अब इतिहास बन चुका है। शायद ही कोई कलाकार रहा हो जो पहाड़ी ढब की होली को सुनने, सुनाने, देखने के लिये इनके आवास में न गया हो। पुराने जमाने के मकान में एक कमरा गोल आकार में था जिसमें लगातार होली की बैठक जमी रहती। बीच-बीच में चाय की चुस्की, पान-बीड़ी-सिगरेट………हर प्रकार के लोग जुटते और होली के भस्सी और उस्ताद भीमताल, नैनीताल, अल्मोड़ा से तक आया करते। इनमें कपिल जी का अपना स्टाइल था जो सबको सजग कर जाता। चाहे कोई किसी पद-कद का हो, गोल कमरे में सजने वाली महफिल में सब एक हो जाते। बाद में हिमालय संगीत शोध समिति का प्रशिक्षण केन्द्र इसी गोल कमरे में बना। उनका संरक्षण हम सभी के लिये रहा। होली की तीन-चार महीने तक चलने वाली खूबसूरत महफिलों में धुंआ- धुरमण्ड कोई मायने नहीं रखता था। श्रीमती ज्ञान कपिल की सेवा को भी नहीं भुलाया जा सकता है, जिन्होंने कपिल जी का पूरा साथ दिया और हर आने-जाने वाले मेहमान व कलाकारों होल्यारों को निभाया। किन्हीं कारणों से मुखानी की रामलीला बन्द हो गई लेकिन होली की बैठकें वर्तमान तक जारी रही। उनके साथ ही बैठकों में इधर-उधर जाने का अवसर भी मिला। उनकी उपस्थिति मात्र से महफिल ठहर सी जाती थी। वह बैठक के बीच किसी भी प्रकार की आवाज बेकार को पसन्द नहीं करते और गाने से पहले कह देते ‘या तो आप ही बोलो या मुझे गा लेने दो।’ उनका स्वभावत सरल और कलाकार के रूप में मूडी था। वह खुले मन ने जीने वाले लोगों में से थे। कलाकार के अलावा अपनी संस्कृति संरक्षण के लिये वह समर्पित थे। स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद कपिल जी की अन्तिम चाह संगीत और महफिल रही। वर्तमान कें हल्द्वानी शहर में बहुत बदलाव आ चुका है, समय के साथ इस परिवार ने भी अपना को व्यवस्थित किया। जिस स्थान पर गोल कमरा हुआ करता था, उनके सुपुत्र मोहित का चिकित्सालय है और आवास कुछ ही दूरी पर है। अपने नये आवास में भी उन्होंने होली की बैठकें करवाई और पुरानी महफिलों की यादें को ताजा किया। स्वास्थ्य कारणों से वह लड़खड़ाए लेकिन उनकी धुन व जिद होली बैठक थी जिसके लिये वह हम दोनों भाई (पंकज-धीरज) को खूब याद करते और कहते- ‘मेरे हीरा-मोती हैं।’ महफिल सजती और होली के टीके की बैठक अनिवार्य रूप से की जाती। इस बार भी वह होली के लिये रुके थे लेकन ईश्वर की लीला को वही जाने। वह अपने पीछे पत्नी श्रीमती ज्ञान कपिल, सुपुत्र डाॅ.मोहित, विवाहित सुपुत्री सीमा सहित भरापूरा परिवार, मित्रों को छोड़ गये हैं। वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी प्रेरणा से वह अभियान चलता रहेगा जो शुरु हुआ था
डाॅ.पंकज उप्रेती जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी हल्द्वानी द्वारा इस बार भी दो दिवसीय जोहार महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। महोत्सवों की बाढ़ में इस आयोजन की जो विशेषता दिखाई देती है वह एक घाटी की संस्कृति तो है ही लेकिन प्रतिस्पद्र्धा और द्वन्द के बीच यह साफ हो चुका है कि ‘समय बदलने की आहट है’। हल्द्वानी की बसासत के साथ किस प्रकार से भोटिया पड़ाव बसा वह लम्बी कहानी है। (पिघलता हिमालय के सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे से’ विस्तार से दिया गया है।) तब तिकोनिया पर से घोड़े-बकरियों के झुण्ड लम्बी कतार में लग जाया करते थे। डीएफओ हीरासिंह पांगती साहब सहित दो-तीन परिवार सबसे पुराने परिवार यहाँ बसे। दोनहरिया में लक्ष्मण निवास भी मिलने जुलने वालों का केन्द्र बना। पुष्कर सिंह जंगपांगी जी का आवास ‘प्रताप भवन’ बनते समय नहर के पास बहुत संघर्ष की कहानी है। ‘शंकर निवास’ पुरानी यादों का परिवार है। खैर पहाड़ में कुछ परिवारों का जम-जमाव हो गया। पड़ाव के बीचोंबीच पांगती परिवार का ‘मिलम निवास’ भी बुद्धिजीवियों का अखाड़ा बन गया। उस दौर में हल्द्वानी के होल्यार बंजारा होली के रूप में दोनहरिया शिवमन्दिर तक जाया करते थे। समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है परन्तु भोटिया पड़ाव में जाते ही अलग प्रकार की अनुभूति होती थी। हाँ, यहाँ मोहल्ले में आबादी घनी होने लगी थी और जोहार-मुनस्यार से आने वाले व्यापारियों का अड्डा दीवान सिंह जी का ‘सीमान्त ट्रान्सपोर्ट’ हो चुका था। मुख्य बाजार में ओके होटल के पास इस ट्रान्सपोर्ट कम्पनी की धक थी। 1968 में कालाढूंगी रोड स्थित हमारा छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ जन मिलन का बड़ा केन्द्र बन चुका था, जहाँ पहाड़ के हर कौने से आने-जाने वाले मिलते थे। बाद में यहीं पर बाजपुर बस अड्डा बन गया और तराई क्षेत्रा के लोगों का मिलन केन्द्र भी हुआ। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ शुरु होते ही शक्ति प्रेस व्यापारियों के मिलन का केन्द्र भी बना। संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने रिंगाल के कारोबार के लिये यूपी के व्यापारियों से सम्पर्क बनाए थे। ‘रहमत अली शेख फारुखी’ नाम मुझे आज भी याद है। कई व्यापारी रिंगाल के लिये आते और हिन्दू धर्मशाला इत्यादि स्थानों में रुकते थे। व्यापारियों की अपनी इशारों की भाषा थी जिसे वह हाथ मिलाते हुए रुमाल से ढक कर एक-दूसरे के सौदा कर लेते। हल्द्वानी का पर्वतीय उत्थान मंच का कार्यालय भी पिघलता हिमालय शक्ति प्रेस ही बना। रामलीला मैदान से शुरुआती शोभा यात्रा निकाली गई थी। बाद में हीरानगर में इसे स्थापित किया गया लेकिन जब तक भवन नहीं बन गया, उत्थान मंच की सारी गतिविधियों का केन्द्र शक्ति प्रेस ही रहा। मुझे भली भांति याद है हल्द्वानी में उत्तरायणी जुलूस को मेले का स्वरूप देने के लिये प्रथम बार स्टाल लगाने का विचार आया तो पिता जी ने सबसे पहले मिलम के जड़ी-बूटी विशेषज्ञ उत्तम सिंह सयाना और दुम्मर से उनी कपड़ों के लिये जंगपांगी जी को बुलाया। मात्र दो-चार स्टाल लगे थे। अगले साल भी ऐसा ही हुआ। बाद में यह मेला स्टालों की भरमार का बना। समाज में बढ़ती उच्छंृखलताओं को देख पिता जी ने उत्थान मंच को हमेशा के लिये छोड़ दिया। जिस मंच के लिये वह दिन-रात समर्पित थे, उन्होंने क्यों छोड़ा होगा, यह आज आज समझ में आने लगा है………. पिता जी लेखन में जुटे रहते। तब उन्हें ‘राजजात के बहाने’ कृति के लिये राहुली सांकृत्यायन पुरस्कार से सम्मान मिला था। लगातार धारदार लेखन वह करते रहे। हीरसिंह राणा, गोपालबाबू गोस्वामी मिलने प्रेस में ही आ जाया करते थे। मेले की भीड़ क्या होती है, इस प्रश्न को पिता जी बहुत रोचक तरीके से हमें समझा देते थे। साथ ही पहाड़ के तमाम कौतिकों का उदाहरण देते, जो स्वयंस्पफूर्त होते हैं। पिछले एक दशक में तो हल्द्वानी सहित आसपास उत्तरायणी महोत्सव नाम के ही ढेर लग चुके हैं। तमाम मंच जगह-जगह सजने लगे हैं। इसके अलावा फैलते जा रहे हल्द्वानी में कई प्रकार के जलसे-जुलूसों का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कई प्रकार की संस्कृतियों का गुलदस्ता यह भाबर है लेकिन हर कोई चाहेगा कि वह अपनी जड़ों को पल्लवित करे और अपने संस्कार अगली पीढ़ी तक पहँुचाए। ऐसी ही कोशिश जोहार समाज में भी हुई। शुरुआत में अपने स्थानीय तीज-त्यौहारों साथ जो शुरुआत हुई थी वह होली पूजा के रूप में बेहतर शुरुआत बन गई। माघ की खिचड़ी का आयोजन भी ध्यैनियों के सम्मान में मिलने-जुलने का बड़ा आयोजन बनने लगा। जोहार मिलन केन्द्र आपस में मेल-जोल का शानदार केन्द्र स्थापित हो गया, जिसमें हर आयुवर्ग के लोग आते हैं। ऐसे में उर्जावान युवाओं ने विचार किया कि क्यों न आधुनिक समय को देखते हुए किसी ऐसे आयोजन को अंजाम दिया जाए जिसकी सपफलता बड़ा परिणाम दे। जोहार की बात और व्यवहार को लेकर कई संगठन हैं लेकिन जोहार सांस्कृतिक बेलफेयर सोसाइटी ने इसे कर दिखाया और ‘जोहार महोत्सव’ के रूप में जो वृक्ष रोपा वह आज हरा है। इसके पहले आयोजन में अनुभव कम था लेकिन उत्साह ज्यादा, जिसका परिणाम यह हुआ कि तमाम जगह से जोहारी बन्धु आयोजन में भागीदार बने। पहले अनुभव के बाद सोसाइटी ने अगले वर्ष इसके स्वरूप में बदलाव किये बगैर आयोजन को तरीके से समेट लिया। इसके बाद आयोजन का स्वरूप लगभग तय हो चुका था और समझ आने लगा था कि हल्द्वानी भाबर मेें किस प्रकार से सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसके स्टालों में जोर दिया गया और व्यावसायिक गतिविधियां द्रुत हुईं। सांस्कृतिक माहौल बनाने के लिये उन कलाकारों को बुलाया जाने लगा। सांगीतिक दृष्टि से आयोजन का यह हिस्सा बहुत असरकारी होता है, इसका प्रभाव दूरगामी होता है। खैर, आयोजकों ने जोहार की प्रतिभाओं को मौका देने के अलावा बाहर से कलाकार आमंत्रित किये। ‘जोहार-महोत्सव-मेला-संस्कृति’ की समग्र पड़ताल के बाद आयोजकों को बधाई दी जानी चाहिये कि वह इस बड़े आयोजन को अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। साथ ही सुझाव भी है कि आयोजन के ‘जोहार’ नाम अनुरूप इसकी हर हरकत उस संस्कृति की ठहस से भरपूर हो। जिस जोहार नगर (भोटिया पड़ाव) के बसने के समय घोर संघर्ष हुए थे तब इसके फैलाव के बारे में विचार भी नहीं आता था। वर्तमान में हल्द्वानी के अलग-अलग स्थानों पर जोहार वासियों की बसासत है। सारे साधन-संसाधन होने के बावजूद अब वह स्थिति है कि अधुना समय में इसकी चमक और ज्यादा हो। यह सच भी स्वीकार लेना चाहिये कि समय बदलने की आहट इस बार के महोत्सव में दिखाई दी। पुरानी पीढ़ी के बहुत से लोग हमारे बीच नहीं हैं। कुछ समर्पित जन अस्वस्थ्य होने के बावजूद समाज की बेहतरी के लिये जुटे हैं। कई जुझारु जन अपने अनुभवों के साथ इस अभियान को बनाये रखने की कसक लिये हुए दिखाई दिये। देखना होगा समय का चक्र किस दिशा को तय करेगा….
श्रद्धासुमन डाॅ.पंकज उप्रेती हिन्दी के जाने-माने कथाकार शेखर जोशी का गाजियाबाद के एक अस्पताल में 4 अक्टूबर 2022 को निधन हो गया। स्वास्थ्य कारणों से वह सप्ताह भर इस अस्पताल मेें रहे और सबसे विदा ले ली। लेखन-पढ़न में 90 वर्ष तक ईमानदार कार्य करने वाले जोशी जी सामाजिक मिलनसार थे। उनकी कहानियों का अंग्रेजी, चेक, पोलिश, रूसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसाइटी द्वारा फिल्म का निर्माण किया गया है। उम्र के उत्तराद्र्ध में आँखों की रोशनी कम होने के बावजूद वह लैंस के सहारे पुस्तकें, चिट्ठी-पत्राी पढ़ते थे। 11 सितम्बर को अपने जीवन के 90 साल पूरे करने वाले शेखर जोशी का जन्म अल्मोड़ा जिले के ओलिया गाँव में 10 सितम्बर 1952 को हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा अजमेर और देहरादून में हुई थी। इण्टरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही सुरक्षा विभाग में जोशी जी का ई.एम.ई. अप्रेन्टिसशिप के लिये चयन हो गया, जहाँ वो सन् 1986 तक सेवा में रहे। तत्पश्चात स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्वतंत्र लेखन करने लगे। दाज्यू, कोशी का घटवार, बदबू, मेंटल जैसी कहानियों में शेखर जोशी को हिन्दी साहित्य के कथाकारों की अग्रणी श्रेणी में खड़ा कर दिया। उन्होंने नई कहानी को अपने तरीके से प्रभावित किया। पहाड़ के गाँवों की गरीबी, कठिन जीवन संघर्ष, उत्पीड़न, यातना, प्रतिरोध्, उम्मीद और नाउम्मीदी से भरे औद्योगिक मजबूरों के हालात, शहरी-कस्बाई और निम्नवर्ग के सामाजिक-नैतिक संकट, धर्म और जाति में जुड़ी रूढ़ियां- ये सभी उनकी कहानियांे के विषय रहे हैं। शेखर जोशी की प्रमुख रचनाओं में कोशी का घटवार 1958, साथ के लोग 1978, हलवाहा 1981, नौरंगी बीमार है 1990, मेरा पहाड़ 1989, डायरी 1994, बच्चे का सपना 2004, आदमी का डर 2011, एक पेड़ की याद, प्रतिनिधि कहानियां शामिल हैं। हिन्दी साहित्य को अपनी कालजयी रचनाओं से समृ( करने वाले शेखर जोशी ने चिकित्सा शोध् के लिये अपने शरीर को दान किया था। जिस कारण उनकी पार्थिक देह को ग्रेटर नोएड के शारदा हाॅस्पिटल को दिया गया। शेखर जी के सुपुत्र प्रत्तुल जोशी पिछले महीने ही आकाशवाणी अल्मोड़ा केन्द्र से सेवानिवृत्त हुए है।। छोटे सुपुत्र संजय जोशी फिल्मकार हैं। ‘प्रतिरोध् का सिनेमा’ नाम से उनके अभियान चर्चित हैं। शेखर जोशी जितना अपने लेखन पढ़न में डूबे थे उतना ही सामाजिकता में रमे रहे। उनका अधिकांश समय पहाड़ से बाहर बीता लेकिन उनके दिल-दिमाग में पहाड़ बसता था। इलाहाबाद में लम्बी यात्रा उनकी रही है। पत्नी के निधन के बाद जब उनसे उनका इलाहाबाद छूटा, वह भी उन्हें बहुत उदास कर चुका था लेकिन समय ने बहुत उलट किया वह लखनउ रहने लगे। अपने मित्रांे-साथियों के साथ बराबर पत्राचार करते, पुस्तकों की समीक्षा लिखते, स्वतंत्रा रूप से लेख लिखते। नव लेखकों को प्रोत्साहित करते और पहाड़ को आवाद करने की बात करते। पिघलता हिमालय परिवार के साथ ही भी उनका यह रिश्ता बना रहा। सम्पादक स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के कहानी संग्रह की भूमिका भी उन्होंने लिखी। इसके अलावा निरन्तर पत्राचार से सम्वाद होता रहता था। उप्रेती जी के निधन के बाद सम्पादक श्रीमती कमला उप्रेती को ढांढस बंधते हुए जोशी जी ने मार्मिक पत्रा लिख भेजा था, जिसमें उन्होंने अपने इलाहाबाद छूट जाने के दर्द को भी लिखा और कामना की कि संकट की इस घड़ी में पिघलता हिमालय को सींचना होगा। इलाहबाद के समय से ही शेखर जोशी के तमाम संगी-साथी थे और उनका जुड़ाव-लगाव सभी से था लेकिन लखनउ आने के बाद पहाड़ के सभी प्रमुख जनों से उनकी मुलाकात थी। पत्रकार-लेखक नवीन जोशी उनकी लगातार टोह लेते रहते। वरिष्ठ पत्रकार महेश पाण्डे नियमित रूप से भेंटघाट करने के साथ ही उन्हें पहाड़ की सूचनाओं से जोड़े रहते। आज जब शेखर जोशी जी हमारे बीच नहीं हैं, सभी उनके रचना संसार के अलावा उनके व्यक्तित्व को याद कर श्रद्धासुमनअर्पित कर रहे हैं। वह हमेशा अपनी रचनाओं के माध्यम से याद रहेंगे। वाकेई शेखर जोशी अपनी पीढ़ी के विराट व्यक्तित्व वाले रचनाकार थे, जिनकी रटन लिखने-पढ़ने-समझने की थी। उनकी सच्चाई थी कि वह गुंथते चले जाते, उन्हें सम्मान की चाह नहीं थी। पिघलता हिमालय परिवार स्व. शेखर जोशी को श्रद्धासुमन अर्पित करता है। ———————————————————————- साहित्यकार/कहानीकार शेखर जोशी 2016 में मुनस्यारी भी आये थे। दरअसल वह इस बार अपने ग्रीष्म प्रवास में परिजनों के साथ पहाड़ों की सैर में निकले थे। तब 84 वर्षीय श्री जोशी जी ने पिघलता हिमालय के साथ खूब बातचीज की। उनका जीवन इलाहाबाद पिफर लखनउ में बीता लेकिन उनकी यादों में पहाड़ का बचपन हमेशा रहा है। पिघलता हिमालय से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा था- ‘‘गाँव-घरों में ताले लटक जाना दुर्भाग्य है जो हमारी परम्परा की जड़ रहे हैं।’’ उस समय लेखक मंच प्रकाशन से उनकी पुस्तक ‘मेरा ओलिया गाँव’ तैयार हो रही थी। जोशी जी अपनी पुरानी यादों में घिरते हुए कहने लगे- उनका गाँव परम्परा और आध्ुनिकता का मेल था, खेती भी अच्छी होती थी, लोगों के पास समय भी था, लोक संस्कृति- गीत, एंेपण सभी तो था। 12 घरों के इस गाँव में अब केवल 2 घर खुले रहते हैं। यह सब कैसे हुआ, उसी का वृत्तांत पुस्तक में है। कमोवेश यही स्थिति आज हर गाँव की है।
अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश डाॅ.पंकज उप्रेती किसी भी समाज की जो लोक मान्यता और बोली भाषा होती है, वह उसके पूरे बात-व्यवहार को बताती है। उस समाज की विशिष्ट शब्दावली उसके इतिहास, भूगोल और व्यवहार को बहुत सटीक बताती है जबकि उसका अनुवाद या दूसरी बोली भाषा में वही शब्द उसके पूरे अर्थ को व्यक्त करने में अधूरापन ही लगता है। ऐसा ही अधूरापन हमारी हिमालयी सीमा की बोली-भाषाओं को लेकर समाज मेें रहा है। जबकि हमारे सीमान्त क्षेत्र की विशिष्ट बोली-भाषा अपनी चाल के साथ अपने सटीक शब्दों के लिये बहुत समृद्ध है। भारत सरकार के शब्दावली आयोग ने भी देश की विभिन्न बोली भाषाओं का अध्ययन करते हुए बहुत कार्य किया है परन्तु आज भी लगता है कि हमारी लोकभाषा का बहुत बड़ा हिस्सा उसमें नहीं है। बोली-भाषा उसके व्यवहार के साथ पनपनी है वरना दुनिया की सैकड़ों भाषाएं समय के साथ बुझ चुकी हैं। बोली भाषा के इस सच को जानते हुए शौका समाज के विद्वान गजेन्द्र सिंह पांगती ने बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य किया है। श्री पांगती ने अंग्रेजी-हिन्दी- शौका शब्दकोश के रूप में समाज को सजग किया है। दो खण्डों के इस शब्दकोष के पीछे उनकी सीधी सी मंशा है कि शौका बोली भाषा को पुनर्जीवित किया जाए, इसके लिये यह योजनाबद्ध प्रयास है। भाषा में जबर्दस्त पकड़ रखने वाले और अनुशासन प्रिय पांगती जी ग्रन्थ की भूमिका में शब्दकोष के बारे में बताने के साथ-साथ जितना भी उल्लेख करते हैं वह जानना शौका ही नहीं हर समाज के लिये जरूरी है। बहुत ही श्रम के साथ उन्होंने इस कार्य को किया है। शब्दकोष की भूमिका में उन्होंने इतिहास-भूगोल सहित जो जानकारी दी है वह इस प्रकार है- भारत तिब्बत सीमा में स्थित गोरीगंगा की घाटी जोहार के मूल निवासी शौका नाम से जाने जाते हैं। यहाँ की अपनी विशिष्ट संस्कृति और भाषा रही है। प्राचीन काल में यहाँ की आबादी बहुत कम थी क्योंकि विकट होने के कारण यहाँ से तिब्बत जाने वाला दर्रा, उंटाधूरा से व्यापारिक आवागमन सबसे बाद में खुला। यहाँ के तत्कालीन लोग जो भाषा बोलते थे वह रंकस कहा जाता था। पूर्व मध्यकाल में तिब्बत व्यापार के लाभ से आकर्षित होकर जब कुमाउँ व पश्चिम नेपाल के राजदूत व खस लोग जोहार आये तो वे अपने साथ हिन्दू वैदिक धर्म व कुमाउंनी-हिन्दी भाषा ले आये। परिणामतः इस समुदाय ने न केवल वैदिक धर्म अपनाया बल्कि कुमाउंनी और रंकस के सम्मिश्रण से निर्मित एक विशिष्ट भाषा को भी अपनाया जिसे सूकिखून कहा जाता था। मध्यकाल में गढ़वाल और तिब्बत होते हुए मूल रूप से राजस्थान के राजपूत धाम सिंह जोहार मिलम में, काशी के पण्डित भट्ट मर्तोली में, गढ़वाल के शौका और कुमाउँ के व नेपाल के राजपूत बड़ी संख्या में आकर विभिन्न गाँवों में बसे तो जोहार में वैदिक धर्म के और सुदृढ़ होने के साथ ही कुमाउंनी की सहोदर एक ऐसी भाषा का जन्म हुआ जिसे सूकिबोलि/शौकी बोली कहा जाने लगा। इस विशिष्ट भाषा ने सूकिखून को चलन से बाहर कर दिया। शौका बोली में कुछ ऐसे शब्द है। जो न तो कुमाउंनी में पाए जाते हैं और न ही हिन्दी में। वे शब्द सूकिखून से आये हैं। उनमें से कुछ दारमा के रंगलू में पाए जाते हैं। और कुछ का मूल भाषा विज्ञानी ही बता सकते हैं। तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने के कारण जब शौका लोग जोहार घाटी से पलायन करके देश के विभिन्न स्थानों में बस गए और उनके आर्थिक क्रियाकलापों में अमूलचूल परिवर्तन हो गया तो उनकी संस्कृति और भाषा मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी। परिवर्तन की यह दिशा व गति ऐसे ही जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब शौका संस्कृति और भाषा दोनों विलुप्त हो जायेंगे। इसलिए इस समाज के प्रबुद्ध लोग इनके संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। उनके प्रयास को सफल बनाने के लिये आवश्यक है कि, मेरी आयु वर्ग के लोग जिन्होंने बचपन में शौका जीवन जिया है, शौका संस्कृति से सम्बन्धित शोधग्रन्थ और रचना साहित्य लिखें। ऐसा किया भी जा रहा है। मै। खुद ऐसी कई रचनाएं कर चुका हूं लेकिन यह सब कुछ हिन्दी में किया गया है शौका भाषा में नहीं। शौका बोली को पुनर्जीवित करने के लिए अभी तक कुछ भी नहीं किया गया है। वर्ष में तीन-तीन गाँवों में उत्क्रमण तथा व्यापार हेतु लम्बी अवधि के लिए तिब्बत और भारत के विभिन्न भागों में भ्रमणशील रहने के कारण शौकाओं को रचना साहित्य लेखन और भाषा को व्यापकरण की परिधि में लाने का कोई अवसर नहीं मिला। आधुनिक काल में भी इस भाषा का रचना साहित्य कुछ कविताओं के लेखन तक ही सीमित है। यदि यह कहा जाये कि शौका बोली कभी भी भाषा नहीं बन पायी तो गलत नहीं होगा। बोली वह होती है जो बोली जाती है। जब उस बोली में लेखन कार्य किया जाता है तो वह भाषा बन जाती है। शौका बोली के इतनी जल्दी चलन से बाहर होने का एक कारण यह भी है कि इसका लिखित साहित्य नहीं है जो इसे स्थायित्व दिला सकता था। भाषा और संस्कृति का चोली-दामन का सम्बन्ध है। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व बना नहीं रह सकता है। शौका भाषा को पुनर्जीवित किये बिना शौका संस्कृति को संरक्षित और सम्बर्धित नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह भाषा अब मुनस्यारी के कुछ गाँवों तक ही सीमित रह गयी है जिसका उल्लेख किया जा चुका है। इसके संरक्षित करने के लिये कोई आधर भी उपलब्ध् नहीं है। हमारी आयु-वर्ग के लोग इस भाषा को जानते और कुछ हद तक बोल भी सकते हैं। उनके बाद यदि यह भाषा भी सूकिखून की तरह विलुप्त हो जाये तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा, ऐसा न हो इसके लिए प्रयास किया जा रहा है। इस प्रयास को सपफल बनाने के लिये आवश्यक है कि शौका भाषा का व्याकरण तैयार किया जाये। इसके मुहावरों और लोकोक्तियों को लिपिबद्ध किया जाये और एक बृहद शब्दकोष बनाया जाये, इसी कड़ी में शब्दकोष बनाने का यह मेरा छोटा सा प्रयास है। शब्दकोष में सामान्यतः मूल शब्द दिया जाता है। उसके साथ उसका अर्थ, वाक्य प्रयोग, समानार्थक व विलोम शब्द, उससे बने शब्द आदि दिए जाते हैं। और ऐस बने शब्द यथा संज्ञा, भाववाचक संज्ञा, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण आदि में से क्या है यह संकेतकों के द्वारा दर्शाया जाता है। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि हर शब्द को अलग लिखने से शब्दकोष बहुत बड़ा हो जाता है। लेकिन अब सन्दर्भ बदल गया है। इन्टरनेट के कारण न तो शब्दकोष बड़ा होने की समस्या रह गयी है और न ही इसके छापने की आवश्यकता रह गयी है। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारा लक्षित वर्ग इस भाषा को जानता ही नहीं है। उसे किसी अंग्रेजी या हिन्दी शब्दकोष का समानार्थक शौका भाषा का शब्द ढूंढने के लिए उसके मूल शब्द जानने में भी कठिनाई होगी। इसलिए इस शब्दकोष में हर शब्द को अलग लिखा गया है। प्रोग्रामिंग के माध्यम से वे अपनी उंगुली से अंग्रेजी, हिन्दी और शौका भाषा के किसी भी शब्द को क्लिक करके अन्य दो भाषाओं में उनका समानार्थक शब्द ढूंढ सकते हैं। या यूं कहें कि जिस तरह आधुनिक टैक्नोलाॅजी के माध्यम से दुनिया उनकी मुट्ठी में है उसी तरह इन तीन भाषाओं के शब्द उनके फिंगरटिप में होंगे। शब्दकोष उपयोगी होने के साथ बहुत बड़ा भी न हो इसके लिए संज्ञा और क्रिया दोनों बनाने वाले शब्दों में उनमें से केवल उस एक को लिया गया है जो ज्यादा चलन में है। यह इस आशा में किया गया है कि दूसरी शब्द रचना पाठक स्वयं आसानी से कर सकता है। जैसे लेख से लिखना आदि। फिर भी जहाँ भी कुछ भिन्न अर्थ का शब्द बनता हो उसे दिया गया है। इसी प्रकार हिन्दी और अंग्रेजी के समानार्थक शब्दों के साथ शौका बोली के केवल शब्द दिए गए हैं और उनका अर्थ इस विश्वास से छोड़ दिया गया है कि पाठक हिन्दी या अंग्रेजी के शब्दों से उसका अर्थ बखूबी समझ जाएंगे। आवश्क समझे जाने पर कुछ खास शब्दों का वाक्य प्रयोग बाद में दिया जा सकता है। जो शब्द इन दोनों भाषाओं में नहीं हैं उनका अन्य भाषा का समानार्थक शब्द दिया गया है। उसके लिए (न) संकेतक दिया गया है। कोई भी भाषा पूर्ण रूप से न तो स्वतंत्रा है और न ही रह सकती है। भाषा की समृद्धि के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को हर भाषा में अपनाया जाता रहा है और यही हमें भी करना होगा। इसलिए हिन्दी, फारसी, उर्दू और अग्रेजी के प्रचलित तथा प्रचलित की जाने लायक शब्दों को बिना संकोच के शब्दकोष में स्थान दिया गया है। शौका बोली का मूल स्वरूप जीवित रहे इसके लिए आवश्यक है कि इसका मूल उच्चारण कायम रहे। इसमें श तथा ष के लिए बहुधा स का प्रयाग किया जाता है। इसी तरह इ की जगह र का प्रयोग किया जाता है। ण के स्थान पर भी न का प्रयोग किया जाता है। मात्राओं में भी अन्तर है। जैसे अ की आ और आ की जगह आ। इसी तरह शब्दों में भी अन्तर है। जैसे ध् की जगह द आदि। मूल उच्चारण की इन विशेषताओं को मानये रखने का प्रयास किया गया है। इस भाषा की एक बहुत बड़ी खामी है इसमें संयुक्ताक्षर का अत्यधिक प्रयोग। इससे भाषा न केवल कर्ण कटु हो जाती है बल्कि इसके लेखन में भी कठिनाई आती है। भाषा के आम प्रचलन और सहज लेखन के लिए इसमें सरलता लाना आवश्कय है। इस हेतु जहाँ भी सम्भव है वहाँ संयुक्ताक्षर के स्थान पर सरल शब्दों का उपयोग किया गया है जो सम्भव है कुछ शुद्धता के पोषक लोगों को पसन्द न आये। उन विद्वानों से से मैं निवेदन करना चाहूंगा कि भाषा के संरक्षण के लिए यह किया जाना आवश्यक है। फिर भी जो संयुक्ताक्षर न केवल बहुत आम है बल्कि शौका बोली की विशिष्टता है उनका स्वरूप यथावत रखा गया है। इसमें कुछ शब्द छूटे हो सकते हैं और कुछ अन्य भाषाओं के शब्द शौका बोली में लेने की आवश्यकता पड़ सकती है। शब्दकोष को छोटा और उपयोगी बनाने के लिये अंग्रेजी के कुछ ऐसे शब्द छोड़ दिए गए हैं जो उपयोग में नहीं हैं। इसी प्रकार मूल शब्द से बने अन्य शब्दों में से उनको छोड़ दिया गया है जिनका प्रयोग आमतौर पर नहीं होता है। उपयोगी पाए जाने या हो जाने पर भविष्य में छोड़ गए कुछ शब्दों को शब्दकोष में लेने की आवश्कता पड़ सकती है। इसके लिये अपने वाले सुझावों के आधर पर एडमिन व सम्पादक द्वारा इसे अद्यतन व परिष्कृत कराते रहना होगा। इसके लिए मेरी पूर्व स्वीकृति है। वैसे भी अब हार्ड काॅपी का जमाना चला गया है। मैं आशा करता हूं कि नई पीढ़ी आन लाइन शब्दकोष को अधिक सहजता से स्वीकारेगी। शौका बोली में दो ऐसे विशिष्ट शब्द हैं जिनको उच्चारण के अनुरूप देवनागरी में लिखना सम्भव नहीं है। इस पर अभी विचार विमर्श चल रहा है। क्योंकि हम देवनागरी लिपि का प्रयोग करते हैं और करते रहेंगे इसलिए इसके अनुशासन के अन्तर्गत इसका कोई सर्वमान्य हल निकल सके तो अच्छा होगा। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो हमें इसको भविष्य के लिए छोड़ना होगा। एक और महत्वपूर्ण बात है, हमारी बोली कुमाउनी के सबसे नजदीक है। फिर भी वह उससे बहुत भिन्न है। कुमाउनी में एक ही शब्द के अलग-अलग अर्थ दशाने के लिए उच्चारण भिन्नता को अपनाया गया है लेकिन हमारी बोली में इस भिन्नता को दर्शाने के लिए कुमाउनी के अ और आ का स्थान परिवर्तन कर दिया गया है या फिर व, य, ह जैसे अक्षर में ए आदि के ध्वनि के साथ नए शब्द का निर्माण कर दिया गया है। इस अर्थ में हमारी बोली कुमाउनी से अधिक समृद्ध है। लेकिन इसके कारण हमारी बोली कुछ कर्ण कटु हो गयी है। पिफर भी इसकी विशिष्टता को बनाए रखने के लिए हमें न केवल इस अन्तर को बनाए रखना होगा बल्कि इसे और भी सुदृढ़ करना होगा। इस विशिष्टता को बचाए रखने के लिए लघु ह्रस्व के लिए हलन्त और अति दीर्घ के लिए विसर्ग (:) का प्रयाग बहुत आवश्यक होने पर ही करना होगा अन्यथा हमारी भाषा कुमाउनी या हिन्दी में समाहित हो जायेगी। शौका बोली के जिन शब्दों का समानार्थक शब्द किसी अन्य भाषा में नहीं है उनको तथा उनके प्रयोग को संलग्नक में देने का प्रयास किया जाएगा। शब्दकोष को साॅफ्रटवेयर में डाने वाले युवा यह निर्णय लेंगे कि इसे शब्दकोष में कहाँ और किस रूप में स्थान दिया जाये। शब्द और भाषा का समाज और उसकी संस्कृति से चोली दामन का साथ होता है। इसलिये कई शब्दों का समानार्थक शब्द कुछ अन्य भाषाओं में नहीं मिलता है। ऐसे ही अंग्रेजी के कुछ शब्दों का हिन्दी समानार्थक शब्द की तुलना में शौका शब्द अध्कि सटीक होने पर उसे अपनाया गया है। ऐसे में हिन्दी और शौका शब्द एक-दूसरे के समरूप नहीं मिलेंगे। पाठकों से अनुरोध् है कि ऐसे में अंग्रेजी शब्द देखें क्योंकि इस शब्दकोश की मूल भाषा अंग्रेजी और लक्षित भाषा शौका है। एक ही वस्तु, भाव व प्रकटीकरण के लिये शौका भाषा में कई शब्द हैं और समानार्थक शब्द अंग्रेजी व हिन्दी में नहीं हैं। ऐसे शब्दों को और विशिष्ट कार्य व्यवहार से सम्बन्धित शब्दों को एक ही जगह दिया गया है ताकि यह शब्दकोष एक सन्दर्भ पुस्तक के रूप में काम आ सके और भावी पीढ़ी को भाषा का उपयोगी ज्ञान हो सके। सन्दर्भ में आसानी के लिये सम्बन्धित अंग्रेजी शब्द को s Capital Ietter में दिया गया है। शब्द चयन का आधर पफादर बुल्के का ‘अंग्रेजी हिन्दी कोश’ रहा है। जिसके लिये मै। उस महान आत्मा का रिणी हूं। उनके शब्दकोष के उन शब्दों को छोड़ दिया गया है जो न तो प्रयोग में हैं और न ही उनके प्रयोग में आने की सम्भावना है। उसमें जो कुछ शब्द छूट गये हैं उनको सम्मिलित कर लिया गया है। कुछ मित्रों ने शौका बोली के शब्द चयन में जो सहयोग दिया उनके लिये मैं उनका आभारी हूं। इसमें संशोधन करने और कुछ शब्दों को इससे हटाने तथा कुछ और शब्दों को इसमें जोड़ने की प्रक्रिया दसकों तक जारी रखनी होगी। इसके लिए, इसके प्रकाशित कराने और इसके उ(रण की अनुमति देने के लिए मैं जोहार पुस्तकालय और मेरे पुत्रा नवीन को सम्मिलित रूप से अधिकृत करता हूं।
(राजुला मालूशाही की अमर प्रेम कहानी को अपने तर्कों द्वारा समझाते हुए कई लोगों ने लेख लिखे हैं। पर यह लेख दारमा रं लुंग्बा जनों के अनुसार लिखा गया है, जो वह सुनते रहे हैं।) न्यौला पंचाचूली उत्तराखण्ड हिमालय की प्राकृतिक सुन्दरता का आकर्षण जितना खूबसूरत है, उतनी ही ‘राजुला-मालूशाही’ की अमर प्रेम मिलन कथा भी एक है। जो प्रेम पर समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। यह प्रेम मिलन की गाथा विषम सांस्कृति सामाजिकता के बाद भी प्रेम के प्रति प्रेमिका राजुला स्वयं को समर्पित कर स्वप्न प्रेमी के पास पहुंचना और राजुला का अपने प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ और पूरे भोंट देश को बचाने की खातिर, अपने मन-मस्तिष्क का आत्म-समर्पण करती है। यह प्रेम मिलन की गाथा ‘प्रेमी-प्रेमिका’ के परस्पर प्रेम के प्रति समर्पण-त्याग की ऐसी इबारत लिखती है जो तत्कालीन विषम सामाजिक, सांस्कृतिक और सभ्यता को स्वीकार कर नया इतिहास बनाती है। भोंट देश का प्रान्त रं-लुग्बा दारमा घाटी में विख्यात मालदार व्यापारी सुनपति भोट रं रहते थे। वे धन-धान्य और सभी सुखों से परिपूर्ण होने के बाद भी सन्तान सुख से अभागे थे। सन्तान सुख भोगने की ललक में उनको परेशान देख उन्हीं के घनिष्ट व्यापारी मित्र ने बताया कि आप सन्तान प्राप्ति के लिये बागनाथ मन्दिर (वर्तमान बागेश्वर) जाकर शवि की आराधना करें तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ सन्तान प्राप्ति के लिये शिव आराधना करने बागेश्वर बागनाथ मन्दिर गए, वहाँ वा पर उनकी मुलाकात बैराठ (वर्तमान चैखुटिया) के राजा दुलाशाह व उनकी पत्नी से हुई, वह भी सन्तान की चाह मे बागनाथ मन्दिर आए हुए थे। दोनों की आपस में अच्छी दोस्ती हो गई और दोनों ने आपसी दोस्ती बनाए रखने के लिये एक-दूसरे को वचन दिया, यदि हमारी सन्तान ‘लड़का-लड़की’ हुई तो उनकी आपसी में शादी करा देंगे। ऐसा ही हुआ भगवान बागनाथ की कृपा से सुनपति भोट रं के घर में पुत्री का जन्म हुआ, जिसका नाम राजुला रखा गया। कुछ दिनों पहले इसी दौरान बैराठ के राज दुलाशाह के पुत्र जन्म हुआ। उनका नाम मालूशाही रखा गया। पुत्र जन्म के बाद राजा दुलाशाह ने ज्योतिषी को बुलाया और बच्चे के भाग्य के बारे में पूछा, ज्योतिष ने बताया- हे राजा तेरा पुत्र बहुरंगी है लेकिन इसकी बाल्य/अल्प आयु में ही मृत्यु का योग है। इसके निवारण के लिये जन्म नामकरण के 21वें दिन बाद इसका ब्याह किसी नवरंगी बाल कन्या से करना पड़ेगा। राजा दुलाशाह ने बागनाथ मन्दिर प्रांगण में अपनी बात याद करते हुए अपने पुरोहित को भोंट प्रदेश रं लुंग्बा दारमा सुनपति भोट (रं) के वहाँ भेजा। वहाँ की स्थिति जानकर प्रतिनिधि मण्डल ने सुनपति भोंट को राजा दुलाशाह की बात बतायी, सुनपति भोंट ने अपने दिये बचन का मान रखते हुए उनकी बात को स्वीकार किया और अपनी नवजात पुत्री का प्रतीकात्मक विवाह (जन्ममंगली/बालमंगली) मालूशाही से कर दिया। लेकिन विधि का विधान कुछ और ही था। बालमंगली के कुछ दिनों बाद राजा दुलाशाह की मृत्यु हो गई। इस अवसर का पफायदा राज्य प्रतिनिधियों ने उठाते हुए यह कुप्रचार कर दिया कि जो बालिका जन्ममंगली के बाद ही अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आएगी तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिये मालूशाही से यह बात गुप्त रखी गई। धीरे-धीरे मालू और राजुला दोनों बाल्यावस्था से युवावस्था में प्रवेश करने लगे। राजुला का रंगरूप सौन्दर्य आकर्षण पूर्णिमा के चाँद की तरह पूरे भोट प्रान्त रं लुंग्बा के साथ पूरे भोट देश और सीमान्त विदेशों तक के लोगों में चर्चा का विषय बन गया था। तभी सुनपति भोट रं को लगा कि मैंने राजुला को बैराठ राजकुमार से विवाह का बचन राजा दुलाशाह को दिया था लेकिन वहाँ से कोई खबर नहीं आ रही हैै। यही सोचकर वे चिन्तित रहने लगे। एक दिन राजुला ने अपनी माँ से पूछा- माँ दिशाओं में कौन सी दिशा? पेड़ में कौन सा पेड़ बड़ा? गंगाओं में कौन सी गंगा? देवों में कौन सा देव? राजाओं में कौन सा राजा? देशों में कौन सा देश? माँ ने उत्तर दिया- दिशाओं में सबसे प्यारी पूरब दिशा जो धरा को प्रकाशवान रखती है। पेड़ों में सबसे बड़ा पेड़ पीपल, जिसमें देवी-देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी गंगा भागीरथी, जो असंख्य जनों की प्यास बुझाती है और सबसे अधिक जल की आवश्यकताओं को पूरी करती है। देवताओं में सबसे बड़ा देव ह्या गंगरी ‘महादेव’, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का आशुतोष है। राजाओं में सबसे बड़ा राजा दुलाशाह, जो मानवीय व्यक्तित्व के धनी हैं। देशों में देश है रंगीलो बैराठ। तब राजुला मुस्कुराते हुए अपनी माँ से कहती है, माँ मेरा ब्याह रंगीलो बैराठ के राजकुमार से ही करना। इसी बीच राजकुमार मालू ने सपनू में राजुला को दखा, उसकी मोहिनी रूप व शालीन स्वभाव को देखकर मालू मोहित हो गया। मालू ने सपने में ही राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हें ब्याह कर जाउँफगा। यही स्वप्न राजुला को भी हुआ। इसी दौरन हूण देश का राजा विक्खीपाल शादीशुदा होने के बाद भी भोंट प्रान्त रं लुंग्बा पुत्राी राजुला की खूबसूरत मोहिनी रूप के बारे में सुनकर दारमा सुनपति भोट के यहाँ उनकी पुत्री राजुला का हाथ मांगने आया और मालदार सुनपति भोट रं को धमकाया, अगर तुमने अपनी बेटी का ब्याह मुझसे नहीं किया तो हम तुम्हारे भोट प्रान्त रं लुंग्बा दारमा व पूरे भोट देश को गुलाम कर देंगे। एक ओर राजकुमार मालूशाही (स्वप्न प्रेमी)) प्यार व परस्पर बचन। दूसरी ओर हूण देश राजा विक्खीपाल की धमकी। इन सब असमंजस से व्यथित होकर राजुला ने निर्णय लिया, क्यों न मैं स्वयं बैराठ जाउं। माघ माह बागेश्वर उत्तरायणी मेला लगने का समय होता है। (मिलन हेतु जाने-आने का समय) राजुला अपनी माँ को बिना स्वप्न प्रेम की बात बताए, बैराठ देश का रास्ता पूछा, लेकिन राजुला की माँ ने क्यों कहते हुए कहा, बेटी तुझे तो हूण देश को जाना है, बैराठ के रास्ते का तुम्हें क्या मतलब। इस बीच जब बैराठ राजकुमार मालू ने स्वप्न प्रेम वाली बात अपनी माँ को बताई और वे भोट प्रान्त रं लुंग्बा, दारमा घाटी जाकर राजुला से विवाह कर लाने की बात माँ का कही, माँ ने अलग बेमेल सामाजिक, सांस्कृतिक, सभ्यता व सुदूर भोट देश कहकर मालू को समझाया। पर मालू इन सभी बातों को न मानते हुए माँ पर दबाव बनाने लगा। माँ अपने पुत्र को खोने के डर से मालू को एक वर्ष की लम्बी निद्रा के लिए निद्रा जड़ी-बूटी सुंघा दी, जिससे वे अपनी स्वप्न प्रेम वाली बात भूल गया। इसी दौरान राजुला ने सहेलियों संग और अपने सेवक व्यापारिक समूह के साथ उत्तरायणी बागेश्वर मेला देखने जाने का आग्रह किया। इस मेले में दरमानी और भोट प्रान्त व्यापारी भी व्यापार हेतु बागेश्वर मेले में आते थे। बागेश्वर बागनाथ मेला देखने के बहाने से पहली बार राजुला सीपू-बलाती हिम दर्रा मार्ग व खतरनाक कठिनाई युक्त मार्ग को पार कर मुनस्यारी होते हुए सरयू नदी के किनारे लगा बागेश्वर उत्तरायणी मेले में पहँुची। बागेश्वर बागनाथ मन्दिर का दर्शन कर आगे बागनाथ की कृपा से कफू पक्षी रूपी सन्यासी बाबा/लामा राजुला को बैराठ राज्य तक पहँुचाने का मार्ग दिखाया। राजुला मालू क कक्ष तक पहँुची लेकिन मालू तो एक वर्ष की जड़ी निद्रा के बश में अचेत पड़ा था। इसलिये मालू उठ न पाया। निराश होकर राजुला ने अपनी रत्न जड़ी अंगूठी निकाल कर मालू को पहना दी और एक पत्रा लिख कर तकिये के नीचे रख दिया। राजुला रोते-रोते दुःखी होकर अपने प्रान्त ;वर्तमान रं लुंग्बा,(दारमा) लौट गई। बैराठ राज्य में सब सामान्य हो जाने व मालू की जड़ी निद्रा पूर्ण होने के बाद, जैसे ही मालू को होश आया, उसने अपने अंगुली में राजुला की पहनाई अंगूठी देखी, जो उसे स्वप्न प्रेम की बात याद आती है, और लिखा गया पत्र भी उसे दिखा जिसमें लिखा था कि हे मालू मैं तो तुम्हारे पास आई थी लेकिन तुम निद्रा के वश में अचेत पड़े थे। अगर तुमने स्वप्न-प्रेम में मुझे सच्चे मन से वचन दिया है तो मुझे लेने हूण देश आना क्योंकि मेरे पिता जी भोट प्रान्त रं-लुंग्बा जनों और पूरे भोट देश जनों को हूण देश की क्रूरता, अत्याचार व गुलामी से बचाने के खातिर मुझे हूण देश राजा विक्खीपाल से ब्याह रहे हैं। ये सब घटित घटनाक्रम के बारे में सोच कर राजकुमार मालू अपने के जिम्मेदार समझते हुए बहुत दुःखी हुआ। तब राजकुमार मालू अपने गुरु की शरण में गया, इस प्रेम घटना चक्र के बारे में गुरु जी को बताकर हूण देश जाने की अनुमति मांगी। गुरु जी न चाहते हुए उनके स्वप्न प्रेम वाली वास्तविक प्रेम-लीला को सुनकर मालू को साधू के वेश में हूण जाने की अनुमति दी। राजकुमार मालू जोगी (साधू) का वेश धारण कर अपनी साधू रूपी सैनिकों के साथ भोट प्रान्त रं-लुुुुुुुंग्बा, दारमा घाटी होते हुए हूण देश सीमा पर पहँुचा। उस हूण देश के सीमान्त मार्गों में ‘विष पानी’ की बावड़ियां लगी थी। उसका पानी पीकर कुछ साधू सैनिकों के साथ मालू भी अचेत हो गए। उस विष की अधिष्ठात्री विषला को साधू मालू की चेतन तड़पन देख दया आ गई। देवी ने मालू का विष निकाल दिया। मालू वही साधू वेश में घूमते-घूमते राजमहल परिक्षेत्र तक पहँुचा। वहाँ बड़ी चहल-पहल थी। क्योंकि राजा विक्खीपाल राजुला को कुछ दिनों पहले ब्याह का लाया था। साधू मालू ने अलख (उँची आवाज) लगाते हुए बोला- ‘दे माई भिक्षा दे, माई भिक्षा’। श्रृंगार व गहनों से लदी राजुला सोने की थाल में भिक्षा लेकर आई और कहा- लो जोगी, भिक्षा लो। पर जोगी मालू उसे देखता रह गया। उसने अपने सपने में आई राजुला को साक्षात देखा तो वे अपनी सुध्-बुध् ही भूल गया। जोगी मालू ने कहा- अरे रानी तुम तो बड़ी भाग्यशाली हो। यहाँ कहाँ से आ गई। रानी राजुला ने कहा कि जोगी बता मेरे हाथ की रेखाएं क्या कहती हैं। तब जोगी ने कहा कि मैं बिना नाम, ग्राम, प्रान्त के हाथ नहीं देखता। तब रानी ने कहा- मैं सुनपति भोट (रं) मालदार व्यापारी की लड़की राजुला हूं। अब बता जोगी मेरे भाग्य में क्या है। तो जोगी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा चेली (लड़की) भाग्य कैसे फूटा। तेरे भाग्य में तो रंगीलो बैराठ का राजकुमार मालूशाही है। राजुला ने रोत हुए कहा- हे जोगी मेरे माँ-बाप ने तो मुझे अपना भोट प्रान्त रं लुंग्बा, अपना भोट देश बचाने के खातिर हूण राजा विक्खीपाल से विवाह करवाया। अपने रं लुंग्बा को बचाने के लिये मैंने ब्याह किया। यह सुनते ही मालूशाही अपना जागी ( साधू ) वेश उतारकर कहता है- हे राजुला! मैं रंगीलो बैराठ का राजकुमार मालूशाही हँू। मैंने तेरे लिये ही जोगी का वेश धरण किया है। मैं तुझे यहाँ से छुड़ाकर ले जाउँफगा। तब राजुला ने मालू का बैठने के लिये कहा और राजा विक्खीपाल को बुलाया। राजुला ने विक्खीपाल से कहा- ये जोगी बड़ज्ञ काम का है और बहुत विद्याएं जानता है। यह हमारे राज्य के काम आयेगा। राजा विक्खीपाल रानी राजुला की बात को ना नहीं कर पाया और मान गया। लेकिन जोगी के मुख पर राजसी प्रताप देखकर उसे थोड़ा शक तो हो ही गया, पर राजुला के खातिर जोगी मालू को महल परिक्षेत्रा में रहने की अनुमति दे दी। साथ ही उसपर नज़र रखता रहा। जोगी मालू राजुला से छुप-छुप कर मिलता रहा। बाद में एक दिन विक्खीपाल को यह बात पता चल गयी कि यह तो बैराठ का राजकुमार मालूशाही है। उसने मालू को मारने का षड़यन्त्रा रचा और खास दिन, भोजन बनवाया जिसमें उसने जड़ी विष जहर डाल रखा था। मालू को खाने पर आमन्त्रित किया गया। भोजन करते ही मालूशाही जड़ी विष की जकड़न से वहीं अचेत हो गय। उसकी यह हालत देखकर राजुला भी वहीं अचेत हो गई। बाद में हूण राजा विक्खीपाल ने राजुला को कैद में रख दिया। उसी रात मालू की माँ ने स्वप्न में मालू ने बताया कि माँ मैं हूण देश में जड़ी विष से मर रहा हँू। इस जगह पर हँू। माता जी ने मालू को वहाँ से लाने के लिये मामा मृत्योन्द्र सिंह (गढ़वाल के किसी गढ़ी के राजा थे) और सिदुवा-विदुवा रमोल (जड़ी बूटी बोकसाड़ी विद्या के ज्ञाता) के साथ हूण देश भेजा। मालू के मामा राजा मृत्योन्द्र दोनों रमोला भाई व सैनिकों को लेकर भोट देश होते हुए हूण देश पहुंचे। रमोल भाई खुफिया रूप से राजमहल परिक्षेत्र में जाकर राजकुमार का पता लगाया और अपनी अपना जड़ी-विष बोकसाड़ी विद्या का प्रयोग कर मालू को जड़ी-विष की जकड़न से बाहर निकालकर जीवित किया। मालू हूण सैनिकों के वेश में राजमहल जाकर कैद राजुला को जगाकर अपने साथ लाया। फिर मामा मृत्योन्द्र के सैनिकों ने विक्खीपाल के अधिकतर सैनिकों के साथ विक्खीपाल को भी मार डाला। राजकुमार मालू ने बैराठ सन्देश भिजवाया कि मै। राजुला को अपनी धर्मपत्नी बनाकर ला रहा हँू। मालू-राजुला प्राचीन भोट प्रान्त रं लुंग्बा, दारमा घाटी में पिता सुनपति भोट रं और माता जी का आशीर्वाद लेकर वे सीपू-बलाती हिम दर्रा मार्ग से होते हुए बैराठ देश लौट गये। वहाँ उनकी धूमधाम से शादी हुई। दोनों राजी-खुशी जिन्दगी जीते हुए प्रजा की सेवा करने लगे।
न्यौला पंचाचूली दार्शनिक विद्वानों का मानना है कि तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार भारत से लगभग 7-8वीं शताब्दी में से हुआ। उससे पहले पश्चिम तिब्बत में स्थानीय धर्म बौंन धर्म ही था, पर 8-9 सदी के मध्य में अधिकांश राजकीय समर्थक बौद्ध धर्म लामाओं की ओर मुड़ गये और बौंन धर्मालम्बियों के साथ भेदभाव बरता जाने लगा। धीरे-धीरे वहाँ के जन मानस बौद्ध धर्म को ही अधिकतम मान्यताएं और धर्म काण्ड अपनाने लगे, जिससे यह मूल बौंन धर्म समूह जन बुद्धिजम का ही एक सम्प्रदाय लगने लगा। जिस प्रकार कालान्तर में तिब्बती बौद्ध परम्परा कई धाराओं में कट गयी, जैसे- निम्न द्येलुक, न्यिंगमा, कान्ग्यु, शाक्य, बौद्ध सम्प्रदाय हैं। तिब्बत में बौंन धर्म के ऐतिहासिक लिखित प्रमाण 11 वीं सदी से मिलते हैं और 14 वीं शताब्दी में बौंन धर्म का धर्मिक पुनर्गठन हुआ। यह बौंन धर्म ‘तोनपा-शेन-रब’ के द्वारा स्थापित किया गया था, जो शाक्य मुनि गौतम से भी पहले के युग से बौद्ध थे। बौन धर्म का मूल विहार मेनरी मोनेस्ट्री है। जो दुनिया भर के बौंन धर्म अनुयायियों का सबसे बड़ा केन्द्र है। मेनरी का अर्थ- औषधियों का पर्वत होता है। इस मोनेस्ट्री की स्थापना सदियों पहले पश्चिम तब्बत में हुई थी। चीनी कब्जे के बाद कई बचे बौंन धर्मावलम्बी भारत और सीमान्त देशों में भाग आए। दोलाजी का मौजूदा विहार, मूल मेनरी विहार के नाम से फिस नामक स्थान में बनाया गया। सन् 1969 में यहाँ मौजूद ‘पुंगडुंग बौंन पुस्तकालय’ बनाया गया, जहाँ दुनिया भर के बौंन साहित्य का सबसे बड़ा संग्रह है। बौंन धर्म का अनुयायी प्रमुख देवाल्या ‘मिवो-शेन-रब’ ‘शेन-रब-मिवोचे’ को मानते हैं। अनुयायी इन्हीं की पूजा अर्चना करते हैं। जी-टुची के अध्ययन वर्णन में ‘मिये-शेन-रब’ का स्वरूप बुद्ध की तरह ही एक पाषाण कमल पर आसीन चित्रण किया गया है। स्नेल ग्रोव ने मूल बौंन देवाल्या ‘कुन्तु-जाग्पो’ तो ‘म्वै-शेन-रब गुरु शेन-रब’ को बताया। बौंन धर्म का गढ़ (केन्द्र) ‘ख्युग-लुग व छपराड़’ दोनों प्रान्त के मध्य स्थित ‘शाग-शगु’ प्रान्त माना, जहाँ कैलास मानसरोवर स्थित है। कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग का उल्लेख हिन्दू साहित्य ‘स्कन्द पुराण’ के मानस खण्ड के अध्याय 1 में भी वर्णन किया गया है। स्कन्द पुराण के अनुसार कैलास पर्वत पर तपस्थल ब्रह्मा, वशिष्ट तथा दधिची के पुत्रों ने प्रतिदिन मन्दाकिनी नदी की स्नान यात्रा से मुक्ति पाने के लिये ब्रह्मा से कैलास पर्वत पर स्थान की व्यवस्था करने की मांग की तब देव ब्रह्म ने अपनी मानसिक-शक्ति के मानसर (मानसरोवर ताल )का सृजन किया। उस आदि काल से ही प्रतिवर्ष उत्तराखण्ड हिमालय पर्वतों को पार कर बड़ी संख्या में हिन्दू तीर्थयात्री भोले कैलाशपति के दर्शन के लिये कैलास मानसरोवर तीर्थ की यात्रा में जाते हैं। दार्शनिक जी-टुजी ने अपने पुस्तक Tibet land of Snow में ब्रह्मा का उल्लेख करते हुए कहा, कैलास मानसरोवर हिन्दुओं, बौद्धों और बौंन तीन धर्म , धर्मावलम्बियों का मुख्य तीर्थ स्थल है। 18वीं शताब्दी में तिब्बत के बौंन अनुयायी क्षेत्रों पर दजुन्गर कबीलों का कब्जा हो गया। लामाओं और बौंन धर्मावलम्बियों को पकड़ कर जेल में ठूंस दिया गया। उस समय बौंन धर्मावलम्बियों अनुयायियों का लगातार मन्त्र पढ़ने से जीभ का रंग काला पड़ जाता था। इस लिये दजुन्गर अधिकारी इन बौंन अनुयायियों से मिलने आये। हर व्यक्ति को अपनी जीभ दिखानी पड़ती थी ताकि दोनों व्यक्तियों का परस्पर पहचान कर सकें कि वहाँ लाया है या नहीं। कालान्तर में लोगों के बीच यही अभिवादन का तरीका बन गया था। आज भी तिब्बत में लोग एक दूसरे का अभिवादन जीभ दिखाकर ही करते हैं।
इतिहास कथा नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली प्राचीन समय में उत्तराखण्ड का उत्तर-पूर्वी (वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय सीमान्त क्षेत्र) का हिम क्षेत्र, पश्चिम तिब्बत प्रान्त और हूण देश के सम्बन्ध इस प्रकार से थे। भोट देश- वर्तमान कुमाउँ का उत्तर पूर्व अन्तर्राष्ट्रीय हिम सीमान्त क्षेत्र और पश्चिम तिब्बत हिम सीमान्त क्षेत्र को सर्वप्रथम स्वतन्त्र भोट देश के नाम से जाना जाता था। ‘कूर्मांचल वाले’ कुमाउंनी लोग भारत तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय हिम सीमान्त क्षेत्रा को ‘भोट देश’ कहते थे। जो हिमाच्छादित प्रान्तों का नाम है। इनका माने उस देश से है, जहाँ ‘भोट-भोटिया’ रं, रौंगपा, शौका, जाड़ औन अन्य जनजातीय लोग रहते हैं। इस क्षेत्र के वासियों को कुमाउंनी लोग भोट-भोटिया और कुछ लोग शौका से भी सम्बोधित करते थे। ( कुमाउं का इतिहास, पेज नं. 523, लेखक बद्री दत्त पाण्डे) हूण देश- कूर्मांचल ( कुमाउं ) के कुर्मांचली लोग मध्य तिब्बत क्षेत्र के मूल/स्थायी तिब्बतियों के बौद्धिकबौद्ध और उनके देश को बौद्धिक देश/बौ( देश भी कहते थे। वास्तविक बौद्ध देश के जगह हूण देश का नाम बार-बार इतिहास में आने का कारण चैथी और पाँचवीं शताब्दी में हूण समुदायों के समूह का वर्चस्व पूरे बौद्ध /लामा देश के मध्य केन्द्र तक फैल गया था। ये हूणीये चीन के पश्चिम दक्षिण हिमालय क्षेत्र से, पश्चिम उत्तर बौद्ध देश की सीमान्त से होते हुए बौद्ध देश के केन्द्र तक पहुँचे। बौद्ध लामाओं का वर्चस्व कम होने के कारण बाद में यह बौद्ध /लामा देश ही हूण देश कहलाने लगा/हूण देश के नाम से जाना जाने लगा। श्री मूर प्रोफ्ट और उसके साथी श्री विल्सन 1812 में तिब्बत गए थे। उन्होंने इसे हूण देश यानि उन देश बताया, किन्तु इस समय असली नाम हूण देश था। जिसका तात्पर्य उन मानववादी, बौद्धिकता वादियों से था, जो मानवीय और बौद्धिकता पर पूर्णतयाः विश्वास करते थे। जहाँ पर मूल बौ( लामा रहते थे। पर उस समय काल में उन हूणीयों को प्रभुत्व मध्य तिब्बत तक फैल गया था। जो हूणीयों, बौद्धिकबौद्धिकतावादी और मानववादी लामाओं से अलग व्यक्तित्व वाले लामाएं/ बौद्ध कहे जाते थे। ये अपने समुदाय और क्षेत्र से अलग दूसरे बाहरी लोगों पर जबरदस्ती अधिकार जमाते थे, दूसरे क्षेत्रा में लूटपाट व क्रूरतापूर्ण व्यवहार करते थे। इनके समुदाय में एक सरदार (मुखिया) होता था और ये सरदार (मुखिया) को राजा समतुल्य मानते थे और बाहरी लोग भी उसे राजा ही समझते थे। ये हूणी लोगों को आतंकित करते हुए, दूसरे क्षेत्रों को जबरदस्ती अपने अधीन करते थे। ये हूण समुदायी लोग मूल तिब्बती नहीं थे। आरम्भ में ये हूणी लोग चीन के पश्चिम क्षेत्र में रहते थे। पहली-दूसरी शताब्दी के मध्य में चीनियों ने इन हूणीयों को हराकर इनके मूल स्थान से पश्चिम और दक्षिण हिमालय क्षेत्रा की ओर भगाया। बाद में इन्हीं हूणीयों ने पश्चिम-दक्षिण हिम क्षेत्रों के मध्य पर अधिकार जमाया और यही क्षेत्र बाद में हूण देश कहलाने लगा। हिन्दू सांस्कृतिक ग्रन्थोें में हूण शब्द अनेकों स्थान में आया है। हूण देश के हूणी व्यापारी, जोहारी व्यापारी को ‘क्योनवा’ कहते थे। उनकी बोली में जोहार और कुमाउफँ का नाम ‘क्योनम’ था। दरमानियों को ‘भोट-भोटिया या श्योण’ के नाम से सम्बोधित करते थे। व्यासियों को ‘ज्यालबू’ कहते थे। भोट देश के भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ की पूर्ण स्वतंत्राता पर ‘प्रथम प्रहार’- हुणियों की क्रूरता का प्रमाण- भोट प्रान्त का मशहूर मालदार व्यापारी सुनपति रं भोट, भोट देश के सीमान्त दारमा प्रान्त के राजा न होते हुए भी उनका यहाँ के सामाजिक नियम-कानून (शासन- प्रशासन) की व्यवस्था में तूती बोलती थी, दबदबा चलता था। इसी कारण हूणी क्रूर, घमण्डी, शादीशुदा, मुख्य सरदार/ राजा विक्खीपाल ने उसकी पुत्री की मोहिनी रूप की सुन्दरता को देखकर सुनपति भोट से पुत्री राजुला का विवाह का प्रस्ताव रखा। मना करने पर रं भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ के साथ पूरे भोट देश को गुलाम कर अपने अधीन करने की धमकी दी थी। सुनपति भोट-भोटिया ने भोट प्रान्त (वर्तमान रं लुंग्बा) और भोट देश को बचाने के लिए हूण देश के मुख्य सरदार/राजा विक्खीपाल का विवाह प्रस्ताव न चाहते हुए भी स्वीकार किया, राजुला ने अपने पिता का मान रखने और प्रान्त के साथ देश को बचाने के खातिर बेमेल विक्खीपाल के साथ विवाह किया। बाद में वर्तमान कुमाउँ मण्डल उत्तर-पूर्व क्षेत्र और पश्चिम तिब्बत का सीमान्त हिम क्षेत्र यानि भोट देश को हूण देश के नये शासन ने कुछ महीनों बाद गुलाम कर अपने अधीन कर लिया। (क्योंकि हूण देश के शासक विक्खीपाल के साथ सुनपति भोट की लड़की राजुला का विवाहिता जीवन ज्यादा दिनों तक सफल न हो सका। कारण- राजुला का जन्मकालीन/बाल्यकालीन मंगेतर बैराठ स्पप्न प्रेमी राजकुमार मालुशाही उसे लेने साधु के भेष में दारमा रं भोट प्रान्त होते हुए हूण देश पहँुचे। विक्खीपाल को मारकर राजुला को अपने राजधानी -बैराठ ‘वर्तमान चैखुटिया’ ले गए।) हूण प्रशासन का जबरदस्ती कर वसूली- मध्य तिब्बती हूण देश के प्रशासन हमारे इस रं भोट रं लुंग्बा से तीन प्रकार कर वसूला करते थे- 1. सिंहथल मालगुजारी (जानवरों की चराई पर कर) 2. थाथल ( धूप सेकने पर टैक्स) 3. क्यूथल (जिजारत में नफा) व्यापार में कर और व्यापार में नफा पर कर। हुमला-झुमला राज्य, नेपाल का जबदस्ती अध्ीन कर/टैक्स, भोट ‘रं लुंग्बा’ की स्वतंत्रता पर द्वितीय प्रहार- यह दारमा परगना का (दारमा, व्यास और चैंदास) तीनों क्षेत्रा पर हुमला-झुमला राज्य ने कुछ महिने-सालों तक जबरदस्ती अपना अध्किार जमाया। वह जबरदस्ती कर वसूली, आतंकित लूटपाट किया करते थे, और जो भी आवश्यक सामग्री मिले उसे कर/टैक्स के रूप में अपने साथ ले जाया करते थे। नेपाल हुमला-झुमला प्रान्त का जबरदस्ती कर वूसली के बाद में दारमा परगना, दारमा घाटी, व्यास घाटी, चैंदास घाटी, चंद राज्य, गोरखाराज, अंग्रेज राज्य में कुमाउँ प्रान्त के अधीन आ गया। चन्द शासन राज का जबरस्ती अधीन कर टैक्स, रं लुंग्बा की स्वंत्रता पर तृतीय प्रहार- चंद शासक ने दारमा
परगना से सोने-चाँदी के छोटे-छोटे चूरे के रूप में टैक्स लेते थे। गोरखा शासन राज का जबरदस्ती अधीन कर/टैक्स, रं लुंग्बा स्वतंत्रता पर चतुर्थ प्रहार- गोरखा राज के प्रशासन दारमा परगना रं लुंग्बा से जड़ी-बूटी, बाज के पेड़, कस्तूरी, शहद और खेती पर टैक्स/ कर लेते थे। रं लुग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) में रं भोट जनों के द्वारा हूणियों से लेकर हुमला-झुमला, चंद, गोरखा और अंग्रेज राज के शासकों तक कोई हिंसक क्रूरता अप्रिय घटनाक्रम का प्रमाण नहीं मिलता है। इससे हम रं जन यह सि( कर सकते हैं कि इस रं लुंग्बा के रं जन की विचारधारा रागद्वेष, कटुता से काफी दूरी है। इसी मानवीय, बौद्धिक विचार धारा के कारण हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक और सभ्यता अन्य समुदाय की मानसिकता से काफी आगे है। विडम्बना यह है कि हम सब रं जनों को भोटिया और यहाँ की हमारी निवास को भोट कैसे कहा जाता है। सच तो यह है कि सर्वप्रथम इतिहास में तिब्बत को ही भोट/भोत/ बौद्ध नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश भारत के प्रशासकों, लेेखकों, जासूसों और अनुसंधनकर्ताओं ने वर्तमान रं लुंग्बा के इस क्षेत्रा में रहने वाले रं जनों को तिब्बत की भांति हम जनों को भोट और यहाँ रं लुंग्बा के निवासियों को भोटिया उपजाति नाम देकर परिचित कराया। इन्हीं शब्दों का अनुसरण आज तक होता आ रहा है। जबकि हम भोट देश, भोट प्रान्त-रं लुंग्बा के ‘रं-रंस्या’ जन हैं। ब्रिटिश काल के शुरुआत और उससे पहले के राजशाही में यह सब क्षेत्रा स्वतंत्रा और भोट देश का भोट प्रान्त ‘रं-लुंग्बा’ हुआ करता था (रं लुंग्बा जनों का व्यापार भोट देश तिब्बतीय सीमान्त प्रान्त से हुआ करता था।) तिब्बती भोट शब्द को सात समुन्दर पार वाले अंगे्रज अंग्रेजी में भोट ही लिखा करते थे। अतः भोत ठीवज से यह भोट हो गया। ठीक इसी प्रकार ऐसा ह इन अंग्रेजों ने तिब्बत के याक ;चवर गाय) को रोमन में समस्त विश्व में याक को मशहूर कर दिया। जोहारी, व्यासी, चैंदासी, एवं दारमिया को सम्मिलित रूप से पड़ोसी कुमाउंनी एवं नेपाली जन भोटिया और शौक्याण शब्द से भी सम्बोधित करते आ रहे हैं। (पिता श्री मोहन सिंह दताल जी के कथानुसार 20वीं शताब्दी के मध्य तक भी पश्चिमी-तिब्बत प्रान्तीय प्रशासन दारमा घाटी के मध्य ग्रामों तक जबरदस्ती कर वसूली किया करते थे। पिता श्री 9-10 बार व्यापारी सहायक के रूप में व्यापार के लिये प्राचीन भोट देश प्रान्त- रं लुंग्बा और वर्तमान तिब्बत देश प्रान्त- पश्चिम तिब्बत के सीमान्त क्षेत्रा शिल्दी थं, ज्ञानिमा, ठुकर निम्न व्यापारिक मण्डियों में व्यापार के लिये गये थे।) जय हो हमारे पूर्वज, जय हो हमारा रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) ‘‘खा जैनु निसु – खा लिजु – थन गुम निनि’’
नरेन्द्र न्यौला पंचाचूली प्राचीन समय की बात जब रं लुंग्बा (प्राचीन भोट प्रान्त) के दारमा घाटी में धनधान्य से परिपूर्ण मालदार व्यापारी सुनपति भोट रं रहा करते थे। तब लगभग 75 प्रतिशत वर्तमान कुमाउँ में कत्यूरी वंश के राजाओं का शासन था। पर रं लुंग्बा (दारमा, व्याँस और चैदाँस घाटी) स्वतन्त्र भोट प्रान्त ‘रं लुंग्बा’ हुआ करता था। उस समय भोट देश का अलग राजा शासन करता था। तब परगना दारमा के वासी भांट देश का भोट प्रान्त होने के बाद भी वे अपने-अपने ग्रामों के स्वतन्त्र स्वामी थे। उस समय दारमानी, दारमा, रंगपा और जोहारी लोग दारमा और जोहार घाटी आने जाने व पश्चिम तिब्बत प्रान्त ;मल्ला जोहार व्यापार मार्ग से पहलेद्ध। ये हिम दर्रा मार्ग निम्न थे- 1 पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग, 2. सीपू- बलाती हिम दर्रा मार्ग। पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग- दारमा-जोहार घाटी के व्यापारी और अन्य लोग पंचाचूली हिमगिरी शिखर के पंचा हिम दर्रा को पार कर दारमा जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह हिम दर्रा तहसील धरचूला, दारमा घाटी में है। यह दर्रा मार्ग छोटा और खतरनाक था। इस मार्ग का प्रयोग तल्ला और मध्य दारमा के 10-15 ग्राम वाले करते थे। यह पंचा-दाँतू हिम दर्रा साफ मौसम में ही पार किया जा सकता था, जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम दाँतू में प्रवेश किया करते थे, साथ ही दारमा घाटी के वासी रालम-पातों ग्राम क्षेत्रा में पहुंचते थे। कहावत- इस पंचा-दाँतू दर्रा मार्ग को तय करने में इतना कम समय लगता था कि मूल दाँतू ग्राम से जड़ी-बूटी, नमक और घीट से से तैयार मरच्या (नमकीन चाय जड़ी बूटी गरम चाय) पीते हुए, जोहार घाटी के रालम-पातौं क्षेत्र में पहुँचा जा सकता था। सीपू-बलाती हिम दर्रा मार्ग- तहसील मुनस्यारी और धारचूला, ग्राम सीपू, अटासी और ग्राम सीपू बलाती के क्षेत्र में पड़ने वाला इस हिमदर्रा को पार करते हुए दारमा-जोहार घाटी आया-जाया करते थे। यह दर्रा मार्ग पंचा दर्रा की अपेक्षा लम्बा और सुरक्षित था। इस मार्ग का प्रयोग मल्ला दारमा के 9-10 ग्राम वाले किया करते थे, यह सीपू-बलाती हिम दर्रा जोहार घाटी वाले इस दर्रा को पार कर ग्राम बलाती, अटासी ‘जोहार घाटी’ में पहुंचते थे। कहावत- ऐसी मान्यता है कि इस हिम दर्रा की दारमा-जोहार नजदीक ग्रामों की दूरी तय करने में इतना समय लगता था कि सीपू गाँव में बनी रोटी कपड़े में तय की गयी, गरम रोटी जोहार घाटी के बलाती ग्राम क्षेत्रा तक गरम ही पहँुचती थी। ;जोहार-रालम घाटी और दारमा घाटी के व्यापारी इन दोनों ही पंचा-दाँतू और सीपू-बलाती दर्रा मार्ग का प्रयोग करके दारमा घाटी होते हुए, सीमान्त पश्चिम तिब्बत प्रान्त के निम्नलिखित क्षेत्र- मंगोल, शिल्दी थं, मिसल, चिन, ज्ञानिमा, दरचन, दयाकार, शिनचिलम और ठूकर मण्डियों में सामाग्रियों का व्यापारी विनियम करते थे। पुरंग, पाला किरमेक, डोंग दर्चिन, जोमजिंन, बिल्थी थं तकलाकोट ठुकर (मानसरोवर) गढ़तोक में अधिकतर व्याँसी लोग व्यापारी विनिमय कर व्यापार करते थे और नीति-माना घाटी वासी शिवचिलम, चपराउफ मण्डियों में व्यापारिक विनिमय के लिए जाते थे। इन्हीं मण्डियों के आसपास लला लसुली देवी के धर्म शालाएं विद्यमान हैं। उन धर्मशालाओं के अवशेष/ साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। दारमा घाटी के तरह ही जोहार घार्टी के व्यापारी भी इन्हीं तिब्बती मण्डियों का प्रयोग व्यापारिक विनिमय के लिये करते थे। इन मण्डियों तक पहँुचने के लिए उटाधूरा, जयन्तीधूरा, कुंगरी-बिंगरी धूरा तीनों गिरी द्वारों को पार करना पड़ता था। अंग्रेज समय काल से भारत-तिब्बत अन्तर्राष्ट्रीय सीमान्त व्यापारियों का विनिमय व्यापार केन्द्र दारमा रं लुंग्बा (दारमा प्राचीन भोट प्रान्त क्षेत्र) मंगोल शिल्दी थं, विदांग नामक ग्राम ;वर्तमान ग्राम खिमलिंगद्ध हो गया, और यह विनिमय व्यापार लगभग 1962 तक चलता रहा। वर्तमान समय इस दारमा भारत-पश्चिम तिब्बत सीमान्त क्षेत्रा से कोई व्यापार नहीं होता है। विनिमय (आदान-प्रदान) पश्चिम तिब्बत सामग्री- निम्न सामाग्री जैसे स्वर्ण चुरे, सुहागा, तिब्बती बकरियों का उन (पसमीन उन), नमक, बहुमूल्य रत्न, लाचा (लाख), जंगली पशुओं का चोखाल (समूर), पत्थर रत्न और अन्य सामग्री होते थे। साथ ही बकरियों, घोड़े, झुप्पू, याक का भी खरीददारी भोट (रं) जन करते थे। यह व्यापार 16500 से 18500 पिफट उफँचाई पर प्रवास के समय होता था। इन सीमान्त वासियों का मुख्य पेशा तिब्बती व्यापार तथा उफनी शिल्प उद्योग में एक दूसरे के पूरक थे। विनिमय भारतीय (भोट/रं) सामग्री- निम्न सामग्री जैसे- गुड़, मिश्री, चीनी, चाय कपड़ा, तम्बाकू सूती वस्त्रा, सामान्य दवाईयां, ड्राई फूड, लपफो और दैनिक प्रयोग की अन्य सामग्रियों की खरीददारी पश्चिम तिब्बत व्यापारीजन करते थे। सुनपति रं भोट समयकाल से ही जोहार-दारमा घाटी आना-जाना, व्यापार करना व अच्छे व्यवहारिक सामाजिक सम्बन्ध् के कारण शादी-विवाह का भी चलन था। पौराणिक किवदंतियाँ (जनश्रुतियाँ)- दारमा-जोहार-रालम घाटी का पारिवारिक सम्बन्ध्- एक समय की बात है, दारमा घाटी के बेटे का ब्याह जोहार रं, रंगपा लड़की के साथ हुआ, ब्याह के बाद कुछ दिन के लिये अपने मायके जोहार-रालम घाटी रहने जा थी। मायका जोहार घाटी जाते समय वे न्यौला पंचाचूली हिमगिरी पंचा-दाँतू दर्रा को पार करने वाली थी, तब वे उच्च हिम मार्ग पार करने से कुछ पहले कुछ देर आराम करते हुए अपने दोनों तरफ ससुराल व मायका को निहार रही थी, और ससुराल से साथ लायी खाद्य सामग्री (स्यली/फाफर के आटे से तैयार गोलनुमा खाद्य) गंदु, चरपा और पतली/कट्टू आटा से तैयार गुठे, श्यली/ फापफर के आटे से तैयार गंदु (गोलनुमा), चरपा खाद्य पदार्थ पैक वाला निंगाल का टिफिन बाॅक्स ढलान की ओर गिरता ही चला गया। उस महिला ने तुरन्त उस जगह को दोष देते हुए, कोई न खा पाएँ, खा यानु बं (कितनी गन्दी जगह) अपशब्द निकल आया, जिसके कारण उसी वक्त मौसम खराब होते हुए हिमस्खलन व भूस्खलन होने लगा, वह महिला जोड़ी इस हिमस्खलन की चपेट में आकर वहीं मर गयी, साथ ही न्यौला पंचाचूली के निचला भूभाग ‘न्योल्पा बुग्याल थं’ के आसपास रहने वाले मूल दाँतू ग्राम के अधिकतर ग्रामवासी उस हिमस्खलन मं दबकर मर गए, कुछ बचे हुए ग्रामवासी वर्तमान स्थित ग्राम दाँतू में आकर बस गए। ये ग्रामवासी ही यह ग्राम दाँतू के मूल दताल निवासी माने जाते हैं। उसी समय इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग पूर्ण रूप से खण्डित हो गया। जिस कारण इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग से दोनों ‘दारमा-जोहार-रालम घाटी’ का सम्पर्क पूर्ण रूप से टूट गया, तब से आज तक इस पंचा-दाँतू हिम दर्रा मार्ग का पता नहीं चल सका। इसी समय में जोहार- दारमा घाटी को मिलाने वाली दूसरी अटासी, बलाती, सीपू हिम दर्रा (बलाती-सीपू हिम दर्रा) के टूटने से यह मार्ग भी बन्द हो गया था। इसके पश्चात जोहार घाटी का व्यापार मल्ला जोहार के रास्ते पश्चिम तिब्बत प्रान्त से होने लगा। पर वर्तमान समय में इस मार्ग का प्रयोग ट्रेकर्स जोहार से दारमा, दारमा से जोहार घाटी ट्रेकिंग किया करते हैं। यह समय काल मीठे, मृदुभाषी, ईमानदार और कर्मठ लोगों का सत्यवादी युक्त समय था।