आजादी के बाद भी सुलगते सवाल

कमला उप्रेती

स्वतंत्राता दिवस की बधई। हर साल की तरह इस साल भी  ध्ूमधम से मनाया गया आजादी का जश्न। देश की रक्षा और तरक्की के लिये संकल्प दोहराये गये और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ मिष्ठान वितरण हुआ। लेकिन स्वतंत्राता के सही अर्थों को हम हम आज तक नहीं समझ सके हैं। हम अपनी बात मनवाने के लिये वह उस स्वर लगाना चाहते हैं जो विवादी है। आजाद होने का मतलब ऐसी स्वतंतत्रा मान लिया गया है कि चाहे जो कुछ करते रहें। ऐसे में आजादी के बाद भी तमाम सवाल सुलग रहे हैं। देश के सन्दर्भ में हजारों सवाल हैं जो मार-काट पर उतर आये लोग समझने को तैयार ही नहीं हैं।

यहाँ पर बात पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की ही कर लेते हैं। हमेशा आजाद प्रिय लोगों ने पृथक राज्य भी बनवा लिया लेकिन सवालों के चट्टे लगते जा रहे हैं। रक्षा-सुरक्षा, पर्यावरण, वन, जल, भू, विज्ञान, खेत-खलिहान, शिक्षा चिकित्सा से लेकर हर प्रकार की प्रगति का पाठ विज्ञापन के रूप में सरकारें पढ़वाती रही हैं परन्तु इनकी सच्चाई सामने है। बरसात में 250 से ज्यादा सड़कें प्रदेश में बन्द हैं। भूस्खलन से करोड़ो का नुकसान हो चुका है। आॅलवेदर रोड का सपना बहुत अच्छा है लेकिन इस कार्य में जितनी तोड़पफोड़ हो चुकी है उससे कई ज्यादा नुकसान हुआ है। डम्पिंग जोन में कटिंग का मलबा न डालने का परिणाम ही है कि कई नदियों में टनों मलबा घुल चुका है, हजारों पेड़ कट चुके हैं, पेयजल स्रोत दब गये, बस्तियों को खतरा हो गया। कटिंग का मलबा-पत्थर मीलों तक विकास से पहले का विनाश दिखा चुका है। राहत-बचाव के नाम पर अखबारों की सुर्खियों में बने रहने वाले बेहद सक्रिय हैं। आपदा हमेशा से होती रही है लेकिन आपदा के नाम पर ‘बचाव’ से ज्यादा अपना ‘बनाओ’ की होड़ भी देखी जा रही है। वही कर्ता वही ध्र्ता। खुद ही ठेकेदार, खुद ही खुदान करने वाले, खुद ही मलबा उठाने वाले……….। वाह रे स्वतंत्राता। ऐसी आजादी। अतिवृष्टि से मकान टूटने की घटनाएं हुई हैं लेकिन पहले से खण्डहर मकानों के नाम पर भी मुआवजा लेने वाले जुगत लगा रहे हैं। पीड़ितों के नाम पर आने वाली राहत राशि डकारने वाले नेतृत्व करने को लालायित रहते हैं। ये इतने बेशर्म होते हैं कि पीड़ितों के नाम पर आने वाले राशन, कम्बल, बर्तन, साबुन सबकुछ खा लेते हैं। इन्हंे पूरी आजादी है।

हालात यह हो चुके हैं हम खुद से नहीं संभल पा रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोगल वार्मिंग और वन आवरण घट जाने के कारण उत्तराखण्ड के ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। इससे गंगा, यमुना जैसी नदियों के पानी पर प्रभाव पड़ेगा। भारतीय अन्तरिक्ष शोध् संस्थान ;इसरोद्ध ने उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों पर नज़र रखने का निर्णय लिया है। इसरो के पूर्व निदेशक पद्मश्री प्रो.ए.एस.किरण कुमार बताते हैं कि राज्यपाल के आग्रह पर उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों में आ रहे बदलाव पर नज़र रखने के निर्देश इसरो के स्थानीय सेन्टर को दिए गए हैं। दूसरी ओर पर्यटन मंत्राी सतपाल महाराज ने गंगा के पानी में रेडिएशन का खतरा बताते हुए प्रधनमंत्राी नरेन्द्र मोदी से नन्दादेवी क्षेत्रा में गुम हुए प्यूटोनियम पैक का पता लगाने की मांग की है। महाराज ने कहा कि 1965 में चीन पर नज़र रखने को भारत और अमेरिका एजेंसी सीआईए की पर्वतारोही टीम ने नन्दादेवी की चोटी पर राडार पिफट किए जाने की कोशिश की। इस राडार का न्यूक्लियर पावर जेनरेटर बपर्फीले तूपफान में गुम हो गया था। उसके टूटने की स्थिति में समूची गंगा का पानी रेडिएशन का शिकार हो समा है।

आजादी का मतलब ऐसी मनमानी हो चुका है कि हम अपनी पर उतर चुके हैं। करोड़ों का एनएच घोटाला अभी तक पहेली बना हुआ है। कुछ पकड़ और कुछ पफरार के बीच जाँच जारी है। चर्चा है कि एनएच-74 मुआवजा घोटाले में जमीन का लैंड यूज बैक डेट में बदलवाकर 30 करोड़ रुपये का मुआवजा हड़पने वाले जसपुर के तीन किसान विदेश भाग गए हैं। इस बीच कुछ मामले पकड़ में हैं। देहरादून में पत्राकारिता की आड़ में दुष्कर्म कर ब्लैकमेलिंग करने वाले पाँच पत्राकारों की गिरफ्रतार हो चुकी है। चम्पावत में नकली नोट जमा कराने के आरोप में बैंक मैनेजर पर मामला दर्ज हुआ है। आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ.मृत्युंजय मिश्रा के खिलापफ जाँच चल रही है। आरोप है कि उन्होंने तकनीकी विवि और आयुर्वेदिक विवि में अनियमितताएं कीं। बिना टैंडर के खरीद सहित कई आरोप डाॅ.मिश्रा पर हैं। टनकपुर में नशे में बौराए पर्यावरण मित्रा ने नगर पालिका के ईओ को पीट डाला।

कुमाउँफ मण्डल आयुक्त राजीव रौतेला को एक पत्रा डाॅ.ओंकार नाथ कोष्टा प्रधनाचार्य राजकीय पालीटेक्निक शक्तिपफार्म जिला उध्मसिंह नगर की ओर से भेजा गया है। बताया जाता है कि आयुक्त ने बैठक के दौरान सख्त तेवर दिखाये। मामला क्या था इसी को लेकर डाॅ. कोष्टा ने जिस सापफगोई के साथ अपनी बात पत्रा में कही है वह हिम्मत की बात है। वह लिखते हैं- ‘‘निर्माण कार्यों की समीक्षा बैठक आपकी अध्यक्षता में काठगोदाम हल्द्वानी में आयोजित की गयी थी,  जिसमें विभिन्न संस्थानों के प्रधनाचार्य भी मौखिक आदेश पर बुलाये गए थे जो कि बैठक के दौरान बाहर बैठे हुए थे। इसी मध्य आपने मुझे बुलाया और पूछना शुरु किया किया। आपने विषयान्तर करते हुए, पोलिटेक्निक क्यों खोले? प्रिंसिपल क्या करता है? आदि आदि प्रश्न अप्रत्याशित रूप से लगभग चीखते हुए, असभ्य तरीके से पूछे। उस समय मुझे बैठने के लिए सीट भी नहीं दी गयी थी। आपके असभ्य व्यवहार के कारण आपकी किसी भी बात का जवाब देना उस समय सम्भव नहीं था। आपके द्वारा मांगी गई सूचना थोड़ी देर बाद मैंने आपको उपलब्ध् करा भी दी थी। इस प्रकार आपने एक वरिष्ठ प्रथम श्रेणी राजपत्रित अध्किारी, एक प्रधनाचार्य और एक ईमानदार प्रतिष्ठित नागरिक का भरी सभा में अपमान किया है। इसके साथ ही समाचार पत्रों में एकपक्षीय सचाचार प्रकाशित करवाकर सार्वजनिक रूप से मेरी प्रतिष्ठा को ठेस पहँुचाई। आपके इस क्रूर व्यवहार की में। निन्दा करता हँू।’’

आजादी का मतलब यह भी मान लिया गया है कि आईएएस अध्किारी पर कोई टिप्पणी नहीं हो सकती। आंखिर क्यों नहीं हो सकती है? उत्तराखण्ड में हमेशा से नौकरशाही हाबी रही है। पार्टियां चुनाव गणित में नचाती रही हैं। शराब को राजस्व का प्रिय स्रोत मान लिया गया है और खनन को सपफलता का आधर। अपराध् की दुनिया नेतागर्दी के साथ दिखाई दे रही है। सुख-शान्ति के लिए पृथक राज्य की मांग हुई थी परन्तु राज्य की अवधरणा को कुचल दिया गया है। विधनसभा सत्रा के दौरान ही बांहे समेटते माननीयों से क्या उम्मीद की जा सकती है। विधयक बनने के चस्के भी अपराध्यिों के पालनहार हैं। अभी ताजा घअना मंे पूर्व स्वास्थ्य मंत्राी तिलकराज बेहड़ को मोबाइल पर जान से मारने की ध्मकी दी गई। तराई की राजनीति में तो गोली-बारुद की बात सामन्य हो चुका है। पहाड़ में भी कुर्सी के लिये हथकण्डे अपनाये जाने लगे हैं। गैरसैंण राजधनी का मामला आज तक अटका हुआ है। भराड़ीसैंण में सत्रा चलाने के नाम पर हुई पिकनिक  ने हमारी सोच को दिखा दिया है। गैरसैंण की मांग को लेकर गैरसंैण में आन्दोलन करने वालों को जबरन उठाने-ध्कियाने के समाचार भी खूब चर्चा में थे लेकिन नेताशाही और अफसरशाही पर कोई असर नहीं हुआ है। प्रदेश को चलाने के लिये मांग-मांग काम चल रहा है। इस बीच प्रदेश सरकार ने आरबीआई से 250 करोड़ रुपये का ट्टण लिया। बताया गया है कि अवस्थापना कार्यों के लिए सरकार ने कर्ज लिया। जुलाई माह में भी सरकार 300 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। इस प्रकार त्रिवन्द्र सरकार अब तक 2150 करोड़ का आरबीआई से कर्ज ले चुकी है। 18 सालों में प्रदेश पर कर्ज की सीमा तकरीबन 45 हजार करोड़ से उफपर पहँुच चुकी है। पिफलहाल आजादी का जश्न मनाते हैं।

पिघलता हिमालय 20 अगस्त 2018 के अंक से

सीमान्त ग्रामों का विकास सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम से सम्भव

वाई.एस.पांगती

भारत सरकार ने सीमा क्षेत्र के विकास के लिये बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम चलाया है। सरकार की गाईड लाइन में स्पष्ट किया गया है कि सीमा क्षेत्रा में रहने वाले लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ग्रामवार प्राथमिक शिक्षा, चिकित्सा केन्द्र, सामुदायिक केन्द्र, सड़क, बिजली, सम्पर्क मार्ग, नालियां, पीने का पानी आदि व रोजगार के साध्न उपलब्ध् कराने के लिये प्रस्ताव मांगकर उनको अन्तिम रूप देने के लिये खण्ड विकास कार्यालय के माध्यम से सम्बन्ध्ति विभागों को प्रशिक्षण करने के लिये भेजा जायेगा। यदि विभाग में गाँव की योजना पूर्व से प्लान में है तो सीध् विभाग द्वारा कार्यक्रम को संचालित करने के लिये प्लान में वजट पास करेगा और जो योजना प्लान में नहीं है उसको बी.ए.डी.पी. के माध्यम से प्रस्तावित करेगा।

इस प्रकार की योजनाओं को विकास खण्ड स्तरीय कमेटी बजट के अनुसार अनुमोदन हेतु जिला विकास कार्यालय के माध्यम से शासन को भेजेगा। शासन भारत सरकार मंत्रालय से अनुमोदन प्राप्त कर ग्रामों में योजनाओं का क्रियान्वयन करेगा। इस प्रकार की कमेटी के अध्यक्ष उपजिलाध्किारी, सचिव खण्ड विकास अध्किारी और सदस्य क्षेत्रा प्रमुख के अलावा विभागों के अध्किारीगण व चयनित ग्राम प्रधन व ग्राम पंचायत के अध्किारी सदस्य नामित हैं जो प्रत्येक त्रौमास में समीक्षा/बैठक करेंगे।

हमें यह भी जान लेना चाहिये कि केन्द्रीय गृह मंत्राी भारत सरकार द्वारा अभी हाल में ही जनपदवार बी.ए.डी.पी. की समीक्षा बैठक की गई। उनके द्वारा कहा गया कि सीमान्त में रहने वाले लोग देश के लिये सामरिक लिहाज से कापफी अहम हैं और सुरक्षा की भी अहम कड़ी हैं। जिसके कारण इन इलाकों के विकास को सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। सरकार द्वारा देश के सीमावर्ती ग्रामों को माॅडल के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया गया है और भविष्य में बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम की आनलाइन मानीटरिंग  के साथ ही गाँवों के लिये चयनित योजनाओं को सीध्े आॅनलाइन सिस्टम में डालकर अनुमोदन, राज्य को बजट की अवमुक्त किया जायेगा।

पूर्व अनुभव के आधर पर बी.ए.डी.पी. योजनाओं के बजट का बन्दरबांट किया गया, जिसके कारण ग्रामों का समुचित विकास नहीं हो पाया है। जो चिन्ता का विषय है। जोहार के दुर्गम 14 ग्राम, धरचूला के दुर्गम ग्राम, चमोली, उत्तरकाशी के सीमान्त ग्रामों की टोह लेते हुए जागरुक हो जाना चाहिये। मल्ला जोहार में तो जितनी सुविध मिल पाई है उसका श्रेय मल्ला जोहार विकास समिति को जाता है, जो जागरुक रहकर कार्य कर रही है। यह जागरुकता प्रत्येक नागरिक में होनी चाहिये।

अपेक्षा है सभी लोग जागरुक रहकर विकास के लिये भागीदार होंगे। जिला विकास कार्यालय से सम्पर्क कर पूर्ण जानकारी लेकर बी.ए.डी.पी. के अन्तर्गत आने वाले गाँवों का समुचित विकास में योगदान करेंगे।

पिघलता हिमालय 30 जुलाई 2018 के अंक से

तुलसी देवी का उफनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
ग्वालदम। तुलसी देवी मर्तोलिया ऐसा नाम है जिसने उफनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उपेक्षित लोगों को अवसर दिलाने के लिये उन्होंने अपनों का विरोध् भी सहन किया था। इन्हीं तुलसी देवी की याद में आज मूर्ति स्थापित है और लोग उनकी कर्मठता को याद करते हैं।
अपनी पुरानी यादों के साथ बातचीत करते हुए 70 वर्षीय हीरा सिंह पंचपाल बताते हैं कि करीब 1936 में जोहार के व्यापारी गरुड़ में आकर रहने लगे। ठण्डे स्थान में रहने वाले इन व्यापारियों को गरुड़ में भी गर्म लगने लगा और 1946 में ग्वालदम आ गये। इसमें उनके नाना मोहन सिंह रावत भी थे, जो पौड़ी-चमोली जिले के सम्मानित व्यक्तियों में थे। पिता स्व.राजेश सिंह पंचपाल भी व्यापार के सिलसिले में यत्रा-तत्रा जाते थे। देवाल, वाण, थराली, नारायणबगड़ दूरस्थ क्षेत्रों तक तत्कालीन ढुलान का कारोबार इन लोगों के पास था। श्री पंचपाल बताते हैं कि उनकी बुआ जी बेटी तुलसी देवी के पति की भाबर में मृत्यु के बाद वह असहाय सी महसूस करने लगी थी। तब नाना मोहन सिंह जी उन्हें ग्वालदम ले आये और वह उफनी कारोबार करने लगी। तुलसी दीदी के साथ माँ गंगादेवी पंचपाल भी उफनी फैक्ट्री में सहयोगी थी। 1954 में यू.पी. स्मोल स्केल इंडस्ट्रीज में पांचवे नम्बर का रजिस्ट्रेशन इनकी पफैक्ट्री का ही था। तब उफनी कपड़ों का बहुत चलन था और गढ़वाल के दूर-दूर क्षेत्रों तक इनकी धक थी। तुलसी दीदी जिला बोर्ड की सदस्य के अलावा महिला कांग्रेस चमोली की संयोजिका थी। भारत सरकार के प्रोग्राम कल्याण विस्तार परियोजना के 16 स्थानों में चलने वाले स्कूलों को वह देखती थी। आगनबाड़ी में कताई-बुनाई जैसे कार्य भी सिखाये जाते थे। उस समय यह लोग अवैतनिक कार्यकर्ता होते थे। मात्रा यात्रा भत्ता इन्हें मिलता था।
तुलसी दीदी ने कई धर्मिक अनुष्ठान यहाँ करवाये। साथ ही उपेक्षित लोगों को आगे बढ़ाने के लिये जुटी रहीं। बच्चों की रुचि पढ़ाई-लिखाई की ओर करने, ग्रामीणों को स्वावलम्बी बनाने, किसानों को कृषि औजार दिलाने जैसे कार्य में वह लगी रहती थी। 1985 में उन्होंने विद्याभारती संस्था को अपनी पफैक्ट्री दान कर दी, जिसमें आज सरस्वती स्कूल चल रहा है। 1985 में तुलसी देवी का निधन  हुआ। उनकी प्रेरणा से प्रेरित कई लोग आज काफी आगे हैं। ऐसी प्रेरणादायक की याद में स्कूल के पास ही उनकी मूर्ति स्थापित की गई है।
हीरा सिंह जी पुरानी शिक्षा व्यवस्था को गुणवत्तायुक्त मानते हुए बताते हैं कि तब हर कोई नहीं पढ़ता था। लगनशील बच्चे आगे बढ़ते थे और श्रम करते थे। तब पढ़ाने वाले पण्डित जी बहुत कम मेहनताने में योग्य शिष्यों को तैयार करते थे। समाज का भी उत्तरदायित्व गुरु की ओर ध्यान देने का था। स्कूल जाते समय बच्चे एक लकड़ी जरुर ले जाते थे और गुरुजी की घर के पास डाल देते, ग्रामीण महिलाएं उनके घर की लिपाई-घिसाई कर देती, कोई घी-सब्जी देता, कोई पानी ला देता। यानी कि बड़े ही शुद्ध भाव से गुरु सेवा होती थी और गुरुजन भी समाज को बनाने और सुधरने के लिये समर्पित थे। उनकी इलाके भर में प्रतिष्ठा होती थी, वह स्कूल की छुट्टी के बाद गाँव में घूमकर बकायदा बच्चों के बारे में उनके माता-पिता से बातचीत करते थे। गुरुजी पिटाई भी बहुत करते थे, जो हमें सुधार के लिये ही थी।
पिघलता हिमालय 11 जुलाई 2016 के अंक में प्रकाशित

कैलास मानसरोवर को जाने वाले परम्परागत मार्ग के सभी बगड़ रड़ रहे हैं

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि

बागेश्वर। उत्तराखण्ड के विकास की कहानी कितनी कोरी है इसका एक उदाहरण कपकोट-विनायक-शामा रोड से पता चलती है। भराड़ी बाजार के बाद पिण्डारी रोड से कटने वाला यह मार्ग कैलास मानसरोवर का परम्परागत मार्ग रहा है लेकिन वर्तमान में इसमें सड़क निर्माण का सुस्त कार्य चल रहा है। दर्जनों गाँव सुविधओं के आभाव में उजाड़ होते जा रहे हैं। यह क्षेत्र बगड़ों का का है। ;नदी किनारे बसे इलाकों को बगड़ कहा जाता है। तिमलाबगड़, कासूबगड़, रीसाबगड़, खारबगड़, देबीबगड़, हरसिंगिया बगड़, डोटिलाबगड़ इत्यादि। यहाँ रेवती गंगा, गांसूगंगा, सरयूगंगा नदियां बहती हैं और इनके संगम स्थान पर तीर्थ है। ये सारे बगड़ रड़ ;बग रहे हैं। पिछली आपदा में तो खारबगड़ में आये मलवे से कापफी नुकसान हुआ था। नदी आर-पार के तमाम ग्रामों का मुख्य व्यवसाय कृषि है लेकिन किसी भी प्रकार की सुविधाओं के न होने से गाँव के गाँव खाली हो चुके हैं। खारबगड़ होते हुए विनायक को जाने वाले मार्ग पर इन दिनों कार्य हो रहा है किन्तु एकदुम दुर्गम के इस क्षेत्र में देखरेख न होने से कार्य की सुस्ती देखने को मिली। यह मार्ग आगे विनायक के बाद शामा तक मिलता है। कैलास मानसरोवर जाने के लिये पुराने मार्गों में इसकी गणना होती है। मानसरोवर में महात्मा गांध्ी की अस्तियां विसर्जन के लिये इसी मार्ग से गये थे। इस मार्ग पर कभी बहुत आवत-जावत थी। पैदल यात्रा के समय घोड़े-खच्चर, भेड़-बकरियों के साथ व्यापारी जाते थे। जोहार के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोपाल सिंह मर्तोलिया के परिजन आज भी देवीबगड़ में निवास करते हैं। धरचूला में बूबू के नाम से विख्यात रहे स्वतंत्राता सेनानी जोगा सिंह मर्तोलिया का भी यहाँ मकान था। इनके परिजन आज धरचूला व हल्द्वानी में रहते हैं।
प्रहलाद सिंह मर्तोलिया बताते हैं कि तिब्बत को जाने के लिये इस मार्ग का प्रयोग होता था। पुराने समय में अल्मोड़ा से गिनती करते हुए व्यापारी विभिन्न पड़ावों में रुकते हुए जाते थे। इस गिनती में उन्हें मालूम था कि किस गिनती के अंक के बाद कौन सा स्थान आने वाला है। उन स्थानों का नामकरण भी कर दिया गया था जैसे- खारबगड़, मिलमढुंग।
इस क्षेत्रा में उत्तरभारत प्रा.लि. द्वारा जलविद्युत परियोजना का कार्य भी किया जा रहा है। परियोजना के कामकाज के तौर-तरीकों पर आरोप लगते रहे हैं लेकिन बात पिफर वही है कि इस दूरस्थ क्षेत्रा में कोई सुनवाई नहीं। नेतागर्दी का हाल यह है कि छुटभैय्ये से लेकर बड़े नेताओं तक का दबाव रहता है, खनन वाले भी मौका देखते रहते हैं। इन सारे हालातों में दूर-दराज के ग्रामीण विकास की राह जोह रहे हैं। वह चाहते हैं कि सड़क-संचार-शिक्षा जैसी मलभूत समस्या दूर हो जाये तो काफी राहत मिलेगी।
पिघलता हिमालय 9 मई 2016 के अंक में प्रकाशित

यह एक कौम का सवाल नहीं बल्कि हमारी सीमा पर एकता का प्रतीक है

पि.हि. प्रतिनिध्
मुनस्यारी। श्री हरि स्मारक समिति द्वारा इस बार भी महान स्वतंत्राता संग्राम सेनानी हरि सिंह जंगपांगी की याद में आयोजन किया गया। मल्ला दुम्मर में हुई हरि प्रदर्शनी में क्षेत्रावासियों ने जबर्दस्त उत्साह के साथ भागीदारी की। साथ ही इस बात पर आश्चर्य कि आजादी के बाद से अपने संसाध्नों पर निरन्तर चलने वाली इस प्रदर्शनी के लिये किसी भी प्रतिनिध् िद्वारा सहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया गया जबकि उत्तराखण्ड में जगह-जगह महोत्सव के नाम पन घोषणाएं व राशि वितरण करने का रिवाज सा बन गया है।
उल्लेखनीय है कि जंगपांगियों द्वारा मल्ला दुम्मर में बहुत ही उत्साह व क्रम से प्रतिवर्ष करवाये जाने वाला यह आयोजन मात्रा एक कौम का सवाल नहीं बल्कि हमारी सीमा पर एकता का प्रतीक भी है। देश के लिये मर-मिटने वाले जोहार के तमाम स्वतंत्राता सेनानियों का स्मरण इस मौके पर किया जाता है और ध्वजारोहण के साथ दुर्गम क्षेत्रा में रहने वाले सभी लोग मिल-बांटकर आयोजन को सपफल करते हैं। छोटे बच्चे भी ‘हरि बूबू की जै’ जैसे नारे लगाते हुए दिखाई देते हैं। यहाँ होने वाली सारी गतिविध्यिां अपने देश की सीमा की रक्षा के लिये संकल्प लेने वाली, अपने कुटीर उद्योग ध्न्धें को बनाये रखने, अपनी कृषि व पशुपालन को बढ़ावा देने के लिये हैं। मनोरंजन के लिये सांस्कृतिक मंच भी सजता है और शिक्षाप्रद कार्यक्रम किये जाते हैं। इतना होेने पर भी, हरि प्रदर्शनी के स्वरूप को और भव्यता देने की दिशा में स्थानीय जनप्रतिनिध्यिों का रुचि न लेना आश्चर्यजनक है।
इस बार भी हरि प्रदर्शनी के मौके पर ग्रामवासियों ने सांस्कृतिक मंच पर और अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाकर प्रतिभा का परिचय दिया। मल्ला जोहार आने-जाने के आदी लोगों का भी यहाँ जुटना सुखद है। समिति के संरक्षक विजय सिंह जंगपांगी, अध्यक्ष ललित सिंह जंगपांगी, सचिव गंगा सिंह जंगपांगी, प्रधन पंकज वृजवाल, लोकबहादुर सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह ध्पवाल, धम सिंह बरपफाल, मंगल सिंह जंगपांगी, मंगल सिंह मर्तोलिया, श्रीरामसिंह ध्र्मशक्तू, गोकर्णसिंह मर्तोलिया, नेत्रासिंह पांगती, खुशाल सिंह, गजराज सिंह, गजेन्द्र सिंह, नरेन्द्र सिंह, भूपेन्द्र जंगपांगी, नारायण सिंह, लक्ष्मण लछबू, राजेन्द्र मर्तोलिया, मनोज ध्र्मशक्तू सहित बड़ी संख्या में लोग जुटे। समाचार लिखे जाने तक प्रदर्शनी जारी थी। ;हरि प्रदर्शनी सम्बन्ध्ी समाचार अगले अंक में भी पढ़ें।द्ध
पिघलता हिमालय 7 नवम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित

दीर्घकालीन वर्षा जल संरक्षण हेतु वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता

पि.हि. प्रतिनिध्
मुनस्यारी। जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक संगठन देहरादून व मल्ला जोहार विकास समिति द्वारा ग्रीष्मकालीन आयोजनों के दौरान दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। जिसके मुख्य अतिथि केन्द्रीय राज्य मंत्राी अजय टम्टा थे। आयोजन का शुभारम्भ करने मुख्यमंत्राी त्रिवेन्द्र रावत को आना था लेकिन उनके स्थान पर श्री अजय टम्टा पहँुचे थे। संगठन के अध्यक्ष डाॅ.भगत सिंह बरपफाल ने आयोजन समिति की ओर से सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि दीर्घकालीन जल संरक्षण हेतु वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है। इसके अन्तर्गत सभी मुख्य तथा उप जलधराओं के जल प्रवाह निर्वहन का दीर्घकालीन अध्ययन ;कार्यवाही- जल संस्थान एवं जल निगमद्ध, लम्बी अवध् ितक जलवायु मापन के डाटा ;कार्यवाही- जलवायु विज्ञान निदेशालयद्ध, भू-भौतिकीय अध्ययन ;कार्यवाही- वाडिया संस्थान आपफ हिमालयन जियोलोजीद्ध, भू-गर्भीय जल विज्ञान का अध्ययन ;कार्यवाही- उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्रद्ध, वन जल विज्ञान का अध्ययन ;कार्यवाही- राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्था रुड़कीद्ध जरूरी है।
उल्लेखनीय है कि सीमान्त क्षेत्रा मुनस्यारी के जल व जैवविविध्ता को ध्यान में रखते हुए जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक समिति ने एक रूपरेखा बनाई और इस बार कार्यशाला का आयोजन करते हुए चाहा है कि इस दिशा में ठोस कार्य हो ताकि जल और जैवविविध्ता की दिशा में वैज्ञानिक विध् िसे कार्य होने के साथ ही इसका सभी को लाभ हो।
भौगोलिक दृष्टिकोण से मुनस्यारी एक अन्तन्त दुर्गम एवं दूरस्थ क्षेत्रा में चीन/तिब्बत सीमा पर स्थित है। वर्ष 196. के आसपास भारत-तिब्बत व्यापार बन्द होने के बाद मुनस्यारी एवं मल्ला जोहार का क्षेत्रा अपने असतित्व को बनाए रखने के लिये अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। जिनमें वन एवं जैव- विविध्ता में त्वरित गति ऐ हो रहे ह्रास, निरन्तर बढ़ रही जल संकट, जीवन-यापन के लिये संसाध्न एवं रोजगार की कमी, यातायात सुविध की चिन्ताजनक स्थिति, समुचित एवं उचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, शिक्षा के स्तर में गिरावट आदि मुख्य है। इन्हीं कारणों से इस क्षेत्रा से ध्ीरे-ध्ीरे पलायन हो रहा है और कई गाँव या तो खाली हो गए हैं या पिफर उनमें बहुत ही कम परिवार रह गए हैं।
चीन/तिब्बत सीमा पर बसे सामरिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण मुनस्यारी एवं मल्ला जोहार क्षेत्रा से पलायन रोकने व पुनर्वास करने के लिये यह आवश्यक है कि इस क्षेत्रा का पर्यावरण संरक्षण के साथ दीर्घकालीन सर्वांगीण एवं सतत विकास की रूपरेखा बने और पिफर उसी के अनुरूप विकास के कार्य अमल में लाये जाएं। इसी उद्देश्य से स्थानीय लोगों की सहभागिता से यह कार्यशाला आयोजित की गई। जिसका विषय- ‘ मुनस्यारी क्षेत्रा के जल स्रोतों एवं जैवविविध्ता के संरक्षण के परिप्र्रेक्ष्य में भू-गर्भीय पर्यावरण तथा वन-जल विज्ञान की भूमिका’ है।
जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक संगठन देहरादून द्वारा मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मुनस्यारी पूर्व स्टूडेंट्स ऐसोसिएशन की सहभागिता से आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े दो सौ लोगों ने प्रतिभाग किया।
पिघलता हिमालय 18 जून 2018 के अंक में प्रकाशित रपट

लोक रंगों में रंगा उत्तराखण्ड

डाॅ. मनीषा पाण्डे
इन दिनों पूरा उत्तराखण्ड लोक उत्सवों के रंग में रंगा है। आठूं-सातूं के अलावा जगह जगह होने वाले स्थानीय मेले व बड़े त्यौहारों में लोक कलाकारों के दर्शन हो रहे हैं। सीमान्त में नन्दा पूजन, अल्मोड़ा-नैनीताल सहित अन्य जगह नन्दा-सुनन्दा पूजन, अस्कोट में हीरन-चीतल नृत्य, डीडीहाट में ठुल खेल, चमोली उत्तरकाशी में जात्राओं के आयोजनों के अलावा लोेक देवताओं के पूजन का यह यह समय है। केदारघाटी के बणसू जाखधर में माँ राजेश्वरी की देवयात्रा हुई। देवर, रुद्रपुर, सांकरी, गुप्तकाशी, नाला, नायणकोटी समेत कई जगह भक्तों को आशीर्वाद मिला। 18 साल के अन्तराल में यह यात्रा होती है। उत्तरकाशी के गोपाल मन्दिर में अनुष्ठान जारी है। रुद्रप्रयाग जिले में उफखीमठ देवरियाताल महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ। इसम उफखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर, सारी के भूतनाथ मन्दिर तथा नागराज मन्दिर तक झांकियां निकाली गई। इस इलाके में बहुत प्राचीन मेला है। गंगोलीहाट क्षेत्रा में कई ग्राम पतारबाड़ा, पुनोली, कोठेरा इत्यादि में बच्चों से लेकर बूढ़े तक झोड़े चांचरी की मस्ती में हैं। चम्पावत जिले के देवीध्ुरा का प्रसि( बग्वाल मेला हो चुका है परन्तु स्थानीय स्तर के कई महोत्सवों का क्रम बना हुआ है। तराई भाबर क्षेत्रा में भी पहाड़ से आकर बस चुके लोगों ने अपने ईष्ट-मित्रों के साथ खेलों ;झोड़े-चांचरीद्धका आयोजन किया। लोकमंच का यही असल उत्सव है। लोक उत्सव के क्रम में सोर घाटी के नाम से प्रसि( पिथौरागढ़ शहर में भी अगस्त-सितम्बर के महीने मनाए जाने वाले अनेक मेलों से वातावरण लोक रंजित हो जाता है। यहाँ के गाँव घरों में सातूं-आठूं का पर्व बड़ी ध्ूमधम से मनाया जाता है। इस पर्व में विशेष रूप से गौरा महेश्वर की पूजा की जाती है और उनकी गाथा गाई जाती है। सातूं आठूं की तैयारी पंचमी तिथि से हो जाती है। पंचमी के दिन सभी महिलाएं सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर विरुड़ भिगाती हैं। इसके बाद सप्तमी-अष्टमी को गौरा महेश्वर की पूजा की जाती है। यहाँ ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 17 से 22 अगस्त तक यह मेला ध्ूमधम के साथ मनाया गया। सातूं के दिन पित्रौटा गाँव की महिलाओं द्वारा गौरा का विग्रह बनाकर उसे ढोल-नगाड़ों के साथ नगर में शोभा यात्रा के रूप में घुमाया गया। उसके बाद गौरा के विग्रह को रामलीला मैदान में स्थापित करके पूजा-अर्चना हुई। अगले दिन महेश्वर का विग्रह बनाकर उसे भी गौरा के विग्रह के साथ स्थापित किया गया। आठूं में प्रतिदिन अनेक कार्यक्रम देखने को मिले। हुड़के की थाप पर झोड़ा, चांचरी, न्योली-छपेली के अलावा स्थानीय विद्यालयों ने रंगारंग प्रस्तुतियां दीं। छह दिन तक चले इस मेले के अन्तिम दिन गौरा-महेश्वर का विदाई समारोह ध्ूमधम से हुआ। वर्तमान में गाँवों से पलायन के कारण पहाड़ की यह अद्भुत संस्कृति सिमटती जा रही है। ऐसे में आठूं मेले जैसा भव्य कार्यक्रम रामलीला कमेटी द्वारा कराना सराहनीय है। जो लोेग अपने ग्राम से दूर शहर में बस चुके हैं और उनकी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को नहीं जान पा रही है। उनके लिये यह आयोजन संस्कृति का परिचय पाठ भी है। सोर रामलीला प्रबन्ध् कारिणी के सभी सदस्य बहुत बधई के पात्रा हैं क्यांेकि पिछले नौ वर्षों से उन्होंने इस आयोजन को शहर में करवाकर सबको एकसूत्रा में बांध् दिया है। जिसमें नई पीढ़ी ने भी अभिरुचि ली है।
सोर के कुमौड़ गाँव में मनाया जाने वाली हिलजात्रा ध्ूमधम से मनाई गई। यहाँ कई ग्रामों में हिलजात्रा मनाई जाती है परन्तु कुमौड़ की हिलजात्रा में ‘लखिया भूत’ नामक पात्रा आकर्षण का केन्द्र होता है। इसके भगवान शिव का बारहवां गणमाना गया है, जो भगवान शंकर के क्रोध् से उत्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि यह भयानक भूत का मुखौटा नेपाल के राजा ने महर भाइयों को उनकी वीरता से प्रसन्न होकर दिया था। जो व्यक्ति विशेष लखिया भूत का मुखौटा है उसके शरीर पर लखिया अवतरित हो जाता है। इस बार भी भयानक मुखौटा पहने, शरीर पर घंटियों सहित श्रृंगार किये लखिया भूत ने जब ऐतिहासिक हिलतात्रा मैदान में प्रवेश किया तो दर्शकों के रौंगटे खड़े हो गये। लखिया महाराज की जय और लटेश्वर महाराज की जय के नारों ऐ गूंजते मैदान का वातावरण एक बार पिफर से लोक की अपनी मान्यताओं पर सोचने को मजबूर कर देता है। इस आयोजन को कृषि से जोड़ कर भी देखा जाता है। लखिया भूत के अलावा बैलों की जोड़ी, गल्या बल्द का मुखौटा लगाकर, हुक्का पीता व्यक्ति, कमेड़ लगाने वाला, मछुआरे आदि पात्रों भी मैदान में आते हैं। यह सब आस्था के अलावा लोगों का भरपूर मनोरंज भी है।
चम्पावत जिले के पाटन-पाटनी में 14 सितम्बर से चार दिवसीय झूमाध्ूरी कौतिक होना है।
चमोली जिले में बधण और दशोली की मां नन्दा को भक्तों ने कैलास के लिये विदा किया। जागर लगाई गई।

ओ हो रे नैनीताल…..

कार्यालय प्रतिनिध्
पर्यटन नगरी नैनीताल में बढ़ता जा रहा दबाव और चल रही नीति-रीति से अजब हाल हो चुका है। गर्मियों में यहाँ का ताल सूखने लगा है और बरसात में अगल-बगल टूटने लगा है। देशी-विदेशी पर्यटकों की पसंदीदा जगह सरोेवर नगरी नैनीताल की रोजी-रोटी होटल उद्योग है। ऐसे में यहाँ के बाशिन्दों के अलावा बाहर से आकर कापफी संख्या में लोग रहने लगे हैं। बड़ा पैसा, बड़ा दीमाग, बड़ी पहँुच वालों ने उँफची पहाड़ियों से लेकर झील के पास तक साम्राज्य पफैला लिया जबकि पार्किंग के लिये यह पहाड़ी स्टेशन बेचैन है। नैनीताल बचाओ, इसका पर्यावरण बचाओ के नाम पर बहुत नारे लग चुके हैं लेकिन मनमापिफक सजावट पसन्द लोगों ने रातों रात कंक्रीट के ढेर लगा लिये जबकि अपनी ही जमीन पर अपना घंरौदा बनाने के लिये नियम पसन्द लोग परेशान हो चुके हैं। पीढ़ियों से नैनीताल रहने वाले चाह कर भी अपने मकान को न तो सजा पा रहे हैं और न बना पा रहे हैं जबकि नियम का पेंच लगाने वाले यह नहीं बता पा रहे हैं कि वह जिस स्थान पर बैठे हैं वहाँ किस नियम के तहत निर्माण कार्य या सजाया गया था। नैनीताल में लोअर माल रोड ध्ंसने लगी है। ऐसे में मान लिया जाता है कि शहर में बहुत दबाव है और निर्माण कार्यों को रोक कर सबकुछ ठीक कर लिया जायेगा। हाईकोर्ट ने भी झील के दो किलोमीटर के दायरे में निर्माण कार्यों पर रोक की बात कही। बाद में बात-बहस के बाद इस मामले में विचार हुआ। एनओसी लेकर अपनी जमीन पर अपना निर्माण करने वाले अभी तक भटक रहे हैं। दूसरी ओर झील को मजबूती देने के लिये हुए निर्माण कार्य की पोल खुल चुकी है। बार-बार लगाये जा रहे बजरी- सीमेंट का कोई असर नहीं है और सड़क का 25 मीटर भाग टूट कर नैनी झील में समा गया। ऐसे में अपर मालरोड से डिवाइडर लगाकर वाहनों का संचालन किया गया है। इसी समय 25 मीटर और हिस्सा में दरार आ गई।
इस बीच हाईकोर्ट के अनुपालन में नगर पालिका ने चाट पार्क व भोटिया मार्केट चार दर्जन दुकानों के अतिक्रमण हटाये। 36 दुकानों की झाप हटाने के अलावा 16 दुकानों के अतिरिक्त निर्माण को ध्वस्त किया गया। कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद प्रशासन हरकत में है और हाईकोर्ट के खिलापफ नारेबाजी करने वाले व्यापारियों ने क्षमा मांगी।
बहुत ही सीध्ी सी बात है कि चाट हो या चाकलेट, खिलौने हों या कपड़े की दुकान…..सभी ने अपनी जगह तलाशनी है। जिस जगह पर्यटकों की भीड़ और बिक्री की सम्भावना हो वहाँ दुकान जरूर सजेगी। यह बात दूसरी है कि कौन अपनी जगह पर दुकान सजाता है और कौन किराये पर या अतिक्रमण कर। चूंकि नैनीताल में हाईकोट है और न्यायमूर्ति सहित तमाम छोटे-बड़े अध्किारी यहाँ होते हैं। ऐसे में घिचपिच नैनीताल से होकर जाने में यदि इन्हें असुविध हुई तो सख्ती तो होगी ही। पिफर हाईकोर्ट के खिलापफ बोलना तो बहुत ही गलत हो जायेगा। यही सब हो रहा है इस नैनीताल में। यहाँ तक कि हाईकोर्ट को नैनीताल में पसन्द करने वाले भी चाहने लगे हैं कि यह किसी दूसरी जगह चला जाता। चारों ओर से डण्डे बरसने जैसा हो गया है इस सरोवर नगरी में। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, यहाँ के बाशिन्दों को एकजुट होकर न्यायालय का सम्मान करते हुए रास्ता तलाशना चाहिये। आंखिर नैनीताल की रंगत कुछ और ही ठैरी। इसे खूब सजाओ, खूब संवारो। पर्यावरण का ध्यान रखो, अतिक्रमण मत होने दो, जबरन के निर्माणों से बचो। नहीं तो क्याप्प से क्याप्प हो जायेगा।

ढाकर बोकने का अपना मजा था, लाछुली से भराड़ी जाते थे

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
अल्मोड़ा। तिब्बत व्यापार के दिनों में जोहार के रावत परिवार में से एक तेजम से तीन किमी आगे लाछुली और एक जलद बस गया। व्यापार के सिलसिले में इध्र से उध्र जाने वालों ने दुरुह दिन देखे हैं और अपने को स्थापित किया है। अपनी उन पुरानी यादों के साथ पिघलता हिमालय से बात करते हुए 66 वर्षीय रघुनाथ सिंह रावत कहते हैं कि बचपन में उन्होंने भी ढाकर बोका है। लाछुली से बाखड़धर, शामा, हरसिंगियाबगड़ होते हुए भराड़ी तक वह लोग जाते थे। ये व्यापार के पड़ाव थे और बकरियों-भेड़ों ेके साथ सामान लेकर जाना होता था। ढाकर बोकने का अपना मजा था। समूह में जब कई लोग अपने जानवरों के साथ जाते थे तो छोटों को कुछ जानवरों के साथ आगे-आगे भेजा जाता था। पीछे से बड़े-सयाने आते थे। वह बताते हैं कि मुनस्यारी रुट से वह नामिक भी गये। नामिक में रावतों की जमीनें हैं।
श्री रावत के पिता 103 वर्षीय गोविन्द सिंह रावत तो कई बार तिब्बत व्यापार में शामिल हुए हैं। माइग्रेसन के समय यह परिवार लाछुली से शंखाध्ुरा ;मुनस्यारी पिफर मिलम जाता था। इसी अवरोही क्रम में उतरते थे। गोविन्द सिंह जी इस समय शंखाध्ुरा में रहते हैं।
रघुनाथ सिंह जी बताते हैं कि जलद वाले गंगासिंह रावत अभी भी हर साल मिलम जाते हैं। कई पुरानी यादों के साथ रघुनाथ जी अल्मोड़ा में निवास कर रहे हैं। शंखाध्ुरा में भी इनका परिवार है।
पिघलता हिमालय 6 जून 2016 के अंक में प्रकाशित

तिब्बत व्यापार के दिनों गढ़वाल में व्यापार का अपना महत्व था

डाॅ.पंकज उप्रेती
आजादी से पूर्व जब भारत-तिब्बत खुला व्यापार चलता था तब व्यापारियों के आन्तरिक व्यापार का नेटवर्क भी जबर्दस्त था। व्यापार के उन दिनों की चर्चा में अक्सर तिब्बत व्यापार की बात होती है जबकि कुमाउॅ-गढ़वाल के बीच होने वाले व्यापार का अपना महत्व था। व्यापार की इन रोचक जानकारियों के साथ 74 वर्षीय मोहन सिंह धर्मशक्तू बताते हैं कि व्यापार के दिनों में एक व्यापार तिब्बत की ओर होता था, दूसरा गढ़वाल की ओर। बरसात में तिब्बत जाते थे ;जुलाई से नवम्बर तक फिर गढ़वाल में व्यापार होता था।
जब माइग्रेशन में परिवारों के पड़ाव लगते थे तब मिलम, दरकोट, लोधिया बगड़ ;टिमटिया, तेजम के प्रसिद्ध इन धर्मशक्तू परिवार का आना-जाना होता था। माता केसी देवी व पिता हीरा सिंह के घर जन्मे मोहन सिंह, भूपेन्द्र सिंह, स्व.प्रद्युमन सिंह की वाल्यकाल का पढ़ाई दरकोट;मुनस्यारी हुई। पठन-पाठन के बाद सभी नौकरी-पेशा में इधर उधर रहे। मोहन सिंह धर्मशक्तू ने रेमजे अल्मोड़ा से हाईस्कूल, नैनीताल से इण्टर और लखनउ से डिप्लोमा करने के बाद विद्युत विभाग में अपनी नई शुरुआत की। गढ़वाल में उन्हें नौकरी का अवसर मिला और चमोली में कई अनुभवन उन्हें हुए। वह बताते हैं कि जब वह गढ़वाल में थे, स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया से चर्चा होती रहती थी। और बात निकल कर आती- ‘हमारा हिमालय पिघल रहा है।’ पिघलता हिमालय के शुरुआती दिनों में इसके नाम को लेकर चर्चा में सुमार था।
श्री धर्मशक्तू व्यापार के दिनों की पुरानी यादों पर लौटते हुए बताते हैं कि गढ़वाल में उनका व्यापार ज्यादा होता रहा है। कार्तिक माह में जब व्यापारियों का मुनस्यारी निवास होता था, तब गढ़वाल को जाते थे। गढ़वाल में ज्यादातर काला उफन की मां थी क्योंकि वहां काला कम्बल-लवादा पहनने का रिवाज है। तब जोहार के व्यापारियों की कई दुकानें भी गढ़वाल व्यापार के लिये थीं। ग्वालदम, थराली, देवाल, मीनगदेरे, उज्जवलपुर, सिमली, आदीबद्री, तिलवाड़ा, रुद्रप्रयाग, भुनारघाट, महलचैरी, चैखुटिया में जगह-जगह इनकी दुकानें थीं। अक्टूबर से अप्रैल तक व्यापारी इनमें दुकानदारी करते थे। तब तिब्बत से सीधे बकरियों द्वारा सामग्री पहुंचती थी। दुकानदार सम्पर्क कर इन सामग्री को पहुंचाते। भेड़-बकरियों की पीठ में सामान लादने का ‘बिल्च्या’ ;फांचा निकाल कर इनके द्वारा आलू, कोयला, चूना इत्यादि ढुलान करतवाते थे। तब दानसिंह मालदार के कारोबार भी काफी फैलता जा रहा था और व्यापार का सामान लेकर आये भेड़-बकरी पालक मालदार का सामान भी लदवाकर ले जाते थे। तब घोड़े वाले हल्द्वानी, रामनगर भाबर की मण्डी को जाते थे और भेड़-बकरी से समान ढोने वाले गढ़वाल की ओर ज्यादातर आते। व्यापार में उधारी भी होती थी और वसूली/उघाई करने वाले को ‘पगाली’ कहते थे। इस प्रकार गढ़वाल व्यापार का वृहद इतिहास रहा है। ;श्री मोहनसिंह जी से निवेदन भी है कि इस बारे में वह विस्तृत लेखन करेंगे
पिघलता हिमालय 5 दिसम्बर 2016 के अंक में प्रकाशित