कमला उप्रेती
स्वतंत्राता दिवस की बधई। हर साल की तरह इस साल भी ध्ूमधम से मनाया गया आजादी का जश्न। देश की रक्षा और तरक्की के लिये संकल्प दोहराये गये और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ मिष्ठान वितरण हुआ। लेकिन स्वतंत्राता के सही अर्थों को हम हम आज तक नहीं समझ सके हैं। हम अपनी बात मनवाने के लिये वह उस स्वर लगाना चाहते हैं जो विवादी है। आजाद होने का मतलब ऐसी स्वतंतत्रा मान लिया गया है कि चाहे जो कुछ करते रहें। ऐसे में आजादी के बाद भी तमाम सवाल सुलग रहे हैं। देश के सन्दर्भ में हजारों सवाल हैं जो मार-काट पर उतर आये लोग समझने को तैयार ही नहीं हैं।
यहाँ पर बात पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड की ही कर लेते हैं। हमेशा आजाद प्रिय लोगों ने पृथक राज्य भी बनवा लिया लेकिन सवालों के चट्टे लगते जा रहे हैं। रक्षा-सुरक्षा, पर्यावरण, वन, जल, भू, विज्ञान, खेत-खलिहान, शिक्षा चिकित्सा से लेकर हर प्रकार की प्रगति का पाठ विज्ञापन के रूप में सरकारें पढ़वाती रही हैं परन्तु इनकी सच्चाई सामने है। बरसात में 250 से ज्यादा सड़कें प्रदेश में बन्द हैं। भूस्खलन से करोड़ो का नुकसान हो चुका है। आॅलवेदर रोड का सपना बहुत अच्छा है लेकिन इस कार्य में जितनी तोड़पफोड़ हो चुकी है उससे कई ज्यादा नुकसान हुआ है। डम्पिंग जोन में कटिंग का मलबा न डालने का परिणाम ही है कि कई नदियों में टनों मलबा घुल चुका है, हजारों पेड़ कट चुके हैं, पेयजल स्रोत दब गये, बस्तियों को खतरा हो गया। कटिंग का मलबा-पत्थर मीलों तक विकास से पहले का विनाश दिखा चुका है। राहत-बचाव के नाम पर अखबारों की सुर्खियों में बने रहने वाले बेहद सक्रिय हैं। आपदा हमेशा से होती रही है लेकिन आपदा के नाम पर ‘बचाव’ से ज्यादा अपना ‘बनाओ’ की होड़ भी देखी जा रही है। वही कर्ता वही ध्र्ता। खुद ही ठेकेदार, खुद ही खुदान करने वाले, खुद ही मलबा उठाने वाले……….। वाह रे स्वतंत्राता। ऐसी आजादी। अतिवृष्टि से मकान टूटने की घटनाएं हुई हैं लेकिन पहले से खण्डहर मकानों के नाम पर भी मुआवजा लेने वाले जुगत लगा रहे हैं। पीड़ितों के नाम पर आने वाली राहत राशि डकारने वाले नेतृत्व करने को लालायित रहते हैं। ये इतने बेशर्म होते हैं कि पीड़ितों के नाम पर आने वाले राशन, कम्बल, बर्तन, साबुन सबकुछ खा लेते हैं। इन्हंे पूरी आजादी है।
हालात यह हो चुके हैं हम खुद से नहीं संभल पा रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोगल वार्मिंग और वन आवरण घट जाने के कारण उत्तराखण्ड के ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। इससे गंगा, यमुना जैसी नदियों के पानी पर प्रभाव पड़ेगा। भारतीय अन्तरिक्ष शोध् संस्थान ;इसरोद्ध ने उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों पर नज़र रखने का निर्णय लिया है। इसरो के पूर्व निदेशक पद्मश्री प्रो.ए.एस.किरण कुमार बताते हैं कि राज्यपाल के आग्रह पर उत्तराखण्ड के ग्लेशियरों में आ रहे बदलाव पर नज़र रखने के निर्देश इसरो के स्थानीय सेन्टर को दिए गए हैं। दूसरी ओर पर्यटन मंत्राी सतपाल महाराज ने गंगा के पानी में रेडिएशन का खतरा बताते हुए प्रधनमंत्राी नरेन्द्र मोदी से नन्दादेवी क्षेत्रा में गुम हुए प्यूटोनियम पैक का पता लगाने की मांग की है। महाराज ने कहा कि 1965 में चीन पर नज़र रखने को भारत और अमेरिका एजेंसी सीआईए की पर्वतारोही टीम ने नन्दादेवी की चोटी पर राडार पिफट किए जाने की कोशिश की। इस राडार का न्यूक्लियर पावर जेनरेटर बपर्फीले तूपफान में गुम हो गया था। उसके टूटने की स्थिति में समूची गंगा का पानी रेडिएशन का शिकार हो समा है।
आजादी का मतलब ऐसी मनमानी हो चुका है कि हम अपनी पर उतर चुके हैं। करोड़ों का एनएच घोटाला अभी तक पहेली बना हुआ है। कुछ पकड़ और कुछ पफरार के बीच जाँच जारी है। चर्चा है कि एनएच-74 मुआवजा घोटाले में जमीन का लैंड यूज बैक डेट में बदलवाकर 30 करोड़ रुपये का मुआवजा हड़पने वाले जसपुर के तीन किसान विदेश भाग गए हैं। इस बीच कुछ मामले पकड़ में हैं। देहरादून में पत्राकारिता की आड़ में दुष्कर्म कर ब्लैकमेलिंग करने वाले पाँच पत्राकारों की गिरफ्रतार हो चुकी है। चम्पावत में नकली नोट जमा कराने के आरोप में बैंक मैनेजर पर मामला दर्ज हुआ है। आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ.मृत्युंजय मिश्रा के खिलापफ जाँच चल रही है। आरोप है कि उन्होंने तकनीकी विवि और आयुर्वेदिक विवि में अनियमितताएं कीं। बिना टैंडर के खरीद सहित कई आरोप डाॅ.मिश्रा पर हैं। टनकपुर में नशे में बौराए पर्यावरण मित्रा ने नगर पालिका के ईओ को पीट डाला।
कुमाउँफ मण्डल आयुक्त राजीव रौतेला को एक पत्रा डाॅ.ओंकार नाथ कोष्टा प्रधनाचार्य राजकीय पालीटेक्निक शक्तिपफार्म जिला उध्मसिंह नगर की ओर से भेजा गया है। बताया जाता है कि आयुक्त ने बैठक के दौरान सख्त तेवर दिखाये। मामला क्या था इसी को लेकर डाॅ. कोष्टा ने जिस सापफगोई के साथ अपनी बात पत्रा में कही है वह हिम्मत की बात है। वह लिखते हैं- ‘‘निर्माण कार्यों की समीक्षा बैठक आपकी अध्यक्षता में काठगोदाम हल्द्वानी में आयोजित की गयी थी, जिसमें विभिन्न संस्थानों के प्रधनाचार्य भी मौखिक आदेश पर बुलाये गए थे जो कि बैठक के दौरान बाहर बैठे हुए थे। इसी मध्य आपने मुझे बुलाया और पूछना शुरु किया किया। आपने विषयान्तर करते हुए, पोलिटेक्निक क्यों खोले? प्रिंसिपल क्या करता है? आदि आदि प्रश्न अप्रत्याशित रूप से लगभग चीखते हुए, असभ्य तरीके से पूछे। उस समय मुझे बैठने के लिए सीट भी नहीं दी गयी थी। आपके असभ्य व्यवहार के कारण आपकी किसी भी बात का जवाब देना उस समय सम्भव नहीं था। आपके द्वारा मांगी गई सूचना थोड़ी देर बाद मैंने आपको उपलब्ध् करा भी दी थी। इस प्रकार आपने एक वरिष्ठ प्रथम श्रेणी राजपत्रित अध्किारी, एक प्रधनाचार्य और एक ईमानदार प्रतिष्ठित नागरिक का भरी सभा में अपमान किया है। इसके साथ ही समाचार पत्रों में एकपक्षीय सचाचार प्रकाशित करवाकर सार्वजनिक रूप से मेरी प्रतिष्ठा को ठेस पहँुचाई। आपके इस क्रूर व्यवहार की में। निन्दा करता हँू।’’
आजादी का मतलब यह भी मान लिया गया है कि आईएएस अध्किारी पर कोई टिप्पणी नहीं हो सकती। आंखिर क्यों नहीं हो सकती है? उत्तराखण्ड में हमेशा से नौकरशाही हाबी रही है। पार्टियां चुनाव गणित में नचाती रही हैं। शराब को राजस्व का प्रिय स्रोत मान लिया गया है और खनन को सपफलता का आधर। अपराध् की दुनिया नेतागर्दी के साथ दिखाई दे रही है। सुख-शान्ति के लिए पृथक राज्य की मांग हुई थी परन्तु राज्य की अवधरणा को कुचल दिया गया है। विधनसभा सत्रा के दौरान ही बांहे समेटते माननीयों से क्या उम्मीद की जा सकती है। विधयक बनने के चस्के भी अपराध्यिों के पालनहार हैं। अभी ताजा घअना मंे पूर्व स्वास्थ्य मंत्राी तिलकराज बेहड़ को मोबाइल पर जान से मारने की ध्मकी दी गई। तराई की राजनीति में तो गोली-बारुद की बात सामन्य हो चुका है। पहाड़ में भी कुर्सी के लिये हथकण्डे अपनाये जाने लगे हैं। गैरसैंण राजधनी का मामला आज तक अटका हुआ है। भराड़ीसैंण में सत्रा चलाने के नाम पर हुई पिकनिक ने हमारी सोच को दिखा दिया है। गैरसैंण की मांग को लेकर गैरसंैण में आन्दोलन करने वालों को जबरन उठाने-ध्कियाने के समाचार भी खूब चर्चा में थे लेकिन नेताशाही और अफसरशाही पर कोई असर नहीं हुआ है। प्रदेश को चलाने के लिये मांग-मांग काम चल रहा है। इस बीच प्रदेश सरकार ने आरबीआई से 250 करोड़ रुपये का ट्टण लिया। बताया गया है कि अवस्थापना कार्यों के लिए सरकार ने कर्ज लिया। जुलाई माह में भी सरकार 300 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। इस प्रकार त्रिवन्द्र सरकार अब तक 2150 करोड़ का आरबीआई से कर्ज ले चुकी है। 18 सालों में प्रदेश पर कर्ज की सीमा तकरीबन 45 हजार करोड़ से उफपर पहँुच चुकी है। पिफलहाल आजादी का जश्न मनाते हैं।
पिघलता हिमालय 20 अगस्त 2018 के अंक से









