वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी…..

डाॅ.पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल का आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीन भाई बहन ;पंकज, ध्ीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे भवाली सेनेटोरियम में भर्ती करवाना पड़ा। ईजा की बीमारी के समय दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। पहाड़ टूट पड़ा था। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा ;दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपने जीवन संग्राम में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई ध्ीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा फिर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। पिफर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और टेªेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना पराया क्या होता है………..।
मुपफलिसी में दवाईयों तक को पैसे नहीं होते थे लेकिन अखबार निकालना प्रतिब(ता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज ढंग से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आधे रास्ते से लौट कर आई हँू।’’ संघर्षों के इन घोर दिनों को कई जगह किराये के मकान में हमने काटा। इसके अलावा ‘शक्ति प्रेस’ तो हमारा केन्द्र ही रहा। इस पुराने मकान में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेस वार्ता, जुलूस-आन्दोलन वालों की भीड़, बच्चों की पढ़ाई और संगीत सबकुछ एकसाथ चलता रहता था। ईजा का शरीर रोग से घिर चुका था लेकिन उसने संघर्ष नहीं छोड़ा। अपनी और अपने परिवार की परेशानियों के बावजूद वह पिता जी के साथ बराबर की हिस्सेदार थी। बैठकों में भाग लेना, अखबार की तैयारी, आने-जाने वालों का तांता सबकुछ मेला सा लगा रहता था। इतना ही नहीं, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में हमारा शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के कौने-कौने से आने वाले ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों को ईजा अच्छी तरह पहचानती थी। घर में रोटी की समस्या बनी रहती लेकिन ईजा-बाबू के लिये आन्दोलन और अखबार जरूरी था। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के आन्दोलन में ईजा ने कई बसों के सीसे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के सीसे तोड़ने को खेल मानकर तोड़ डालते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग अड्डे से जुड़ चुके थे और वह बस अड्डे को वहीं रखना चाहते थे जहाँ पर हमारा छापाखाना था। उन्होंने लोभ भी दिया कि टिकट बुक आपके छापेखाने में ही छपवायेंगे। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में एसपी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके सीसे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। बीमार ईजा ने मेले के झण्डे तक सिले थे। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्धजनों की बैठक वहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में सार्टहैंड भी सीखा। गायत्री परिवार के अभियान में जुड़कर उन्हें सहयोग किया। ईजा को राजनैतिक पार्टियों की ओर से लगातार पार्टी में शामिल होने के निमंत्राण मिलते रहे लेकिन वह कभी किसी से नहीं जुड़ी। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने लखनउ में ईजा को पार्टी से जुड़ने का निवेदन किया लेकिन वह टाल गई। कठोर संघर्षों के बाद एक दिन हमारा छोटा सा घोंसला बना और सारा परिवार एकजुट हो गया। जैसे-तैसे हम भाई-बहिन ने भी अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली। बीच-बीच में बीमारी का सफर भी चलता रहता। सन् 2004 में हल्द्वानी में हमने अपना एक आशियाना बना लिया था- जे.के.पुरम् छोटी मुखानी हल्द्वानी में। इस छोटे से मकान में अपनी नई-पुरानी यादों के साथ पड़ाव डाल दिया। सालों साल की परेशानी के बाद पटरी में आते परिवार को झटका लगा लगा जब बाबू आनन्द बल्लभ जी 22 पफरवरी 2013 को अचानक चल दिये। उनके निधन के 6 माह में ईजा को फालिश/लकवा पड़ गया। अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद ईजा अपने पैरों में खड़ी कर दी गई लेकिन पहले से ही कमजोर शरीर के कारण वह अस्पताल-दवाईयों से बधी रही। इतने के बाद भी ईजा तो ईजा थी। उसकी उपस्थिति हमारे लिये सबकुछ था। 15 सितम्बर 2018 को प्रातः उसने प्राण त्याग दिये। उसे अहसास हो गया था अपने जाना का। सच्चाई की यह कहानी बहुत लम्बी है, फिर कभी……

मोहन उप्रेती के बाद नईमा सींचती रही पर्वतीय कला केन्द्र

डाॅ.पंकज उप्रेती
लोक कलाकार नईमाखान उप्रेती का 15 जून 2018 की प्रातः दिल्ली उनके आवास में निधन हो गया। वह पिछले दो साल से अस्वस्थ्य चल रही थीं। निधन के बाद शरीर दान होने के कारण उनके शव को चिकित्सा शोध् केन्द्र को दे दिया गया। बाद में उनके परिजनों ने शान्ति पाठ करवाते हुए श्रद्धांजलि दी।

‘मोहन उप्रेती-नईमा खान’ चर्चित जोड़ी रही है। लोक कलाकार संघ के साथ ही पर्वतीय लोक ध्ुनों को विश्व स्तर पर स्थापित करने वाले मोहन दा और नईमा की पहचान अल्मोड़ा में हुई थी। 70 के दसक में जब नृत्य सम्राट पं. उदयशंकर अल्मोड़ा प्रवास में थे, नईमा को अवसर मिला कि वह पंडित जी से संगीत के बारीकियां सीखे। नृत्य-गीत- नाट्य की तालीम के साथ ही मोहन उप्रेती के साथ इनकी निकटता अल्मोड़ा शहर को खटकने लगी थी लेकिन यह संयोग तय हो चुका था। लोक कलाकार संघ के बैनर तले स्थानीय कलाकारों को एकजुट कर मोहन उप्रेती ने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई थी। उनकी खुशी- उनका आक्रोश गीत- संगीत के माध्यम से ही कोरस के रूप में सुनाई देता था। शास्त्राीय संगीत की जानकारी होने के बावजूद उन्होंने लोक संगीत को चुना और उनके किये गये प्रयोग आज तक मंचों पर प्रचलित हैं। अल्मोड़ा निवासी नईमा खान के साथ मोहन दा की नजदीकियां बढ़ीं लेकिन घर व समाज के अखरते हुए दिनों में इन्होंने अपने रियाज  पर ही ध्यान दिया। बाद में इन दोनों ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध मेंविवाह कर लिया।

युवा मोहन उप्रेती ने हुड़के थाप पर जिन प्रकार मंचीय प्रस्तुतियों को जीवंत किया था, उतनी की बारीकी से नईमा ने अपने नृत्य-गीत से दर्शकों में सम्मोहन सा कर दिया था।

मोहन उप्रेती, नईमा खान जब दिल्ली में स्थापित हो चुके थे। उस समय नाटककार लेनिन पन्त भी इनके साथ दिल्ली में थे। गीत-संगीत-नाटक के अद्भुत प्रयोग इनके द्वारा कर दिये गये। मोहन उप्रेती राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ड्रामेटिक म्यूजिक के प्रोपफेसर थे तब उन्होंने पर्वतीय कला-नाटक-संगीत को प्रोत्साहन देने के लिये पर्वतीय कला केन्द्र की स्थापना की। इस केन्द्र के नाम से मोहन-नईमा ने जो हलचल की, वह सांस्कृतिक गढ़ के रूप में स्थापित हो गये। मोहन दा के निर्देशन में पर्वतीय लोक कला के अद्भुत प्रदर्शन व्यापक रूप से होने लगे। पचास महत्वपूर्ण नाटक 15 दूरदर्शन नाटक और सीरियल में इस केन्द्र ने योगदान दिया। 22 विदेशी मुल्कों में इस केन्द्र ने धाक जमाई। इसमें कालीदार रचित ‘मेघदूत’ नृत्य नाटिका बेहद लोकप्रिय हुई। पर्वतीय कला केन्द्र द्वारा प्रदर्शित अमीर खुसरो तथा संगीत नाटक ‘इन्द्र सभा’ भी लोकप्रिय रहे हैं। पहाड़ की लोकगाथाओं को नाटक के रूप में मंच पर लाने का ऐतिहासिक कार्य भी इनके द्वारा किया गया। इनमें ‘गोरिया’, ‘राजुला मालूशाही’ मुख्य हैं। ‘बेडू पाको बारहमासा’ को आध्ुनिक स्वरूप व संगीत-स्वर देकर अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बनाई। पं.जवाहर लाल नेहरु मोहन दा को प्यार से ‘बेडू पाको ब्वाय’ कहत थे। 5 जून 1997 को उनके निध्न के बाद श्रीमती नईमा ने पर्वतीय कला केन्द्र को सींचा। स्व.मोहन दा की यादों में वह निरन्तर कार्यक्रमों का संचालन करती रहीं। मोहन दा के भाई प्रो.ध्ीरेन्द्र उप्रेती हल्द्वानी में अपनी गृहस्थी में थे, एक दिन वह भी चल दिये। मोहन उप्रेती के छोटे भाई पखावज वादक भगवत उप्रेती ने पर्वतीय कला केन्द्र के कार्य को आगे बढ़ाने में सहयोग किया। भगवत जी का निध्न होने के बाद नईमा खान पिफर भी अकेले हिम्मत जुटाती रहीं। लेकिन उम्र के साथ-साथ वह हार चुकी थीं और पिछले दो सालों से अस्वस्थ होने के कारण घर में ही थीं। उनकी सेवा के लिये एक नर्स को रखा गया था और उनके निकटस्थ लोग सुध्बुध् लेते रहे। इस बीच वह हम सबसे विदा हो चुकी हैं। परिवार में स्व.ध्ीरेन्द्र उप्रेती के सुपुत्रा डाॅ.मनोज उप्रेती, स्व.भगतव उप्रेती की विववाहित पुत्रियां दीक्षा व दिव्या सहित अन्य लोगों ने जुटकर अपनी ताई का स्मरण और संस्कार किये। रंगकर्म से जुड़े लोगों ने भी नईमा जी के निधन पर शोक जताया है। मोहन दा के भांजे हिमांशु जो की गीत-संगीत की बेहतरीन पकड़ रखते हैं, से उम्मीद की जा रही है कि वह इन मोहन-नईमा की विरासत को विस्तार देंगे।

उल्लेखनीय है कि मोहन उप्रेती मूल रूप से कुंजनपुर, गंगोलीहाट के निवासी थे। इनके दादा अपनी अल्मोड़ा रानीधारा आकर बस चुके थे। मोहन उप्रेती, ध्ीरेन्द्र उप्रेती, भगतव उप्रेती का बचपन अल्मोड़ा में बीता। नईमा खान का परिवार अल्मोड़ा के संभ्रात परिवारों में रहा है। संगीत कला जगत में मोहन उप्रेती और नईमा की पहचान उन्हें करीब लाई परन्तु अपने-अपने घरों की मर्यादा को रखते हुए दोनों ने दूरी रखी। घर के बूढ़े-बुजुर्गों के निधन के पश्चात जीवन  के उत्तराद्र्ध में एक दूजे के हो लिये। पर्वतीय कलाकार केन्द्र के रूप में अपने लोक से जुड़ी एवं यहाँ के गीत-संगीत को संजोने वाली नईमा खान उप्रेती के निधन पर पिघलता हिमालय परिवार श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
अल्मोड़ा। लोककला की वाहक जानीमानी रंगकर्मी नईमा खान उप्रेती के निधन के बाद से उनसे जुड़ी हर स्मृतियाँ का स्मरण करते हुए लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की है। 15 जून को मयूर विहार फेस 2 के उनके किराए के घर में लम्बी बीमारी के बाद 80 वर्षीय नईमा का निधन हो गया था। उनके शरीर को करारनामे के अनुसार आयुर्विज्ञान संस्थान;एम्सद्ध को दे दिया गया। स्व.नईमा और स्व.मोहन उप्रेती के साथ बीते बचपन का स्मरण करते हुए अल्मोड़ा के वरिष्ठ होल्यार चन्द्रशेखर पाण्डे कहते हैं कि वह दोनों अद्भुत प्रतिभासम्पन्न थे और लोकसंगीत के लिये उन्होंने जबर्दस्त कार्य करते हुए विदेशों में तक हमारे पहाड़ को पहचान दिलवाई।
अल्मोड़ा के रंगकर्मियों ने नईमा जी के निधन पर शोक प्रकट करते हुए श्रद्धांजलि दी। हल्द्वानी में हिमालय संगीत शोध् ने स्व.नईमा को पहाड़ की लोक संस्कृति के लिये प्रतिबद्ध कलाकार बताते हुए श्रद्धांजलि दी।

पिघलता हिमालय 25 जून 2018 के अंक से

पुस्तक समीक्षा: ईथर से कागज पर

डाॅ.प्रयाग जोशी

मैं, कम्प्यूटर, स्मार्टपफोन, इण्टरनेट आदि पर निकलने वाले पोर्टलों की करिस्माई तकनीकों के सहारे चलने वाली साहित्यिक गतिविधियों से निरक्षर आदमी के जितना अनजान हँू। इधर संयोग से ही चन्द्रशेखर जोशी की किताब ‘धरती के चुभते सवाल’ हाथ आ गई जो पफेसबुक के एप पर प्रकाशित हुए एक सौ पचास ब्लागों के कण्टेण्ट को लेकर पुस्तकाकार छपी है।
एक ब्लाग एक पृष्ठ में है तो एक सौ पचास ब्लाग भी उतनी ही गिनती के पृष्ठों में आ गए हैं। मुद्रण की इस सुविचारिता से, किसी भी एक ब्लाग को पढ़ने के लिए, अगले पृष्ठ में जाने या पृष्ठ को पलटने की जरूरत नहीं होती। एक पेज पर एक विषयवस्तु पूरी खत्म हुई और दूसरे में नयी चीज पढ़ने को मिलती जाती है। एकरसता के लिए उसमें कोई ठौर नहीं हैं अखबार का जैसा, बिना आयास के पढ़ते जाने का तारतम्य उत्सुकता बढ़ाता जाता है कि देखें अगले पेज में क्या लिखा है? जितने पेज पढ़ने का मन हो, पफुर्सत से पढ़ो और रखते जाओ। हर रोज, हर बैठक में पाठक नयी-नयी सम-सामयिक सोच विचार की चीजंे पढ़ता जाता है। विविध् वण्र्य-वस्तु की यह किताब नाना प्रकार के स्रोतों से जुटाई गई और मौलिक अंदाज में प्रस्तुत की गई ज्ञातव्य जानकारियों से सजी हुई है। ज्ञान का ‘बखार’ नहीं है इसमें। पाठक को ज्ञान के उजाले में लाने की कोशिश है। जीवन और जगत की तात्कालिकता में अनुभव की गई बेचैनियों से निःसृत हुई यह प्रेरणा प्रशंसनीय है।
अधसधे हाथों की लिखाई से, स्कूली विद्यार्थियों की कापियों में छोटे निबन्ध्/ लेखों की तरह, अधिक से अधिक तीन-चार पृष्ठों में प्रश्नों का उत्तर लिखकर परीक्षा देने वालों का भी एक जमाना हुआ करता था। मैं उसी जमाने की अनुश्रुति में इस किताब को देखता और पढ़ता भी गया। कमजोर आँचाों में होने वाली किरकिरी और जलन के बावजूद किताब पढ़ने की उत्सुकता थमी नहीं। उसकी वजह विषयों को लिखने के लिए बरती गई सूझ, सोचने की निजता और भाषा की सतर्कता और सरलपन लगी। पढ़ने के लिए रखे अखबार और पत्रिकाओं की तरह किताब मेज में पड़ी रही। जो ब्लाग पढ़ लिया उसमें निशान बनाकर रखता गया। समय-साक्ष्य ‘वर्तमान’ था। विषयों की तरतीबें और संयोजन मनोनुकूल लगते गए तो मजे से बीस दिन में आद्योपांत पढ़ लेने के बाद, एक अच्छी और नयी शैली में लिखी हुई सर्वतोभद्र नालेज की किताब पर प्रतिक्रिया लिखे बगैर रह न सका।
किताब में, उत्तराखण्ड से सन्दर्भित सबसे ज्यादे तेरह ब्लागों में लेखक की स्व चेतना, सामाजिक संचेतना और मानवीय सम्वेदनशीलता की झलक मिली। लेखक ने अपनी ध्रती की खासियतें सुर्खियों में रखीं। क्षमताओं को समझा और विडम्बनाओं को रेखांकित किया है। ‘उत्तराखण्ड मंे जहाँ सुविधएं न होने और पहाड़ छोड़ने की मानसिकता अपफसरों के लिए कस्तूरी बनी हुई है तो वहीं, वहाँ के अपेक्षाकृत सम्हले हुए मौरुसी लोगों के महा-पलायन को थामने को कोई समाधन किसी के पास नहीं है।’ अपने लोगों का, अपने लोगों के लिए और अपने भूगोल की खातिर बना बना उत्तराखण्ड ‘रैबार खत्म दीदा करव जाणा छा?’ से शुरु होता है। उसके उत्तर की भद, गिर्दा  की, सिर्फ एक पंक्ति की कविता-भाषा की लाक्षणिकता मं है कि ‘खेल तुम्हारा तुम्हीं खिलाड़ी’।
अपने बड़बोलेपन से रौशनदार शीर्षकों से ही नहीं अपितु एक-एक वस्तुगत यथार्थ का सार्वभौमिक व सार्वजनिक परिचय कराते जाते ब्लाग हैं- ‘सॅवर जाये तो जन्नत से कम नहीं उत्तराखण्ड’, ‘प्रेम की दुनियाँ उत्तराखण्ड’, ‘वीरों की ध्रती उत्तराखण्ड’, ‘डब डब आँखें उत्तराखण्ड’, पर क्या करते हो कह कर? विडम्बनाआंे ने पेच ऐसे पफॅसा रखे हैं कि ‘खनन, ठेकेदारी और भ्रष्टाचार से उपजे ध्न से बलवान बने नेता और सत्ता के दाॅवों से बाजी मारने के अभ्यासी अफसर कुछ ही समय में यहाँ बदमाश का रूप ध्र लेते हैं।’ नशे का व्यापार और दबंगई कार्य-संस्कृति का ऐसा अंग हो जाती है कि ‘लोकोपकारी’ कहा जाने वाला सबकुछ, वांछित अपेक्षाओं से एकदम उलट चले जाता है। लेखक के पास लिखने को बचा रह जाता है तो यही कि ‘लाचार जवानी उत्तराखण्ड’, ‘चोखे धन्धे उत्तराखण्ड’, ‘इस धरती पर गहरे जख्म उत्तराखण्ड’। आइरनी यह है कि यह सब धन के प्रवाह में तेजी से हो रहा है। नव-धनिक और हुकूमत इस प्रवाह की धर को तेज करते हैं। इसका अंदाज ‘शादियों और सेल्फियों पर लिखे गए ब्लागों से होता है।’ उच्च तकनीक के उपयोग का विरोध् ठीक वैसे ही नहीं किया जा सकता जैसे कि शराब का, लेकिन ये दोनांे चीजें यदि कम अक्ल और कम उम्र के बच्चों की पहँुच में चली जाऐं तो बर्बादी तय है। सस्ते और अच्छे मोबाइल फोन और उस पर भी सस्ते इण्टनेट वाउचरों ने युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्रत में ले लिया है।’
यहाँ, ‘खुशियों और मेल-मिलाप के विस्तार के सामूहिक भावना से शुरु हुए मेलों और संस्कार समारोहों में बाजार का इरादा घुसा तो बेचने और कमाने की नीयत में सब कुछ बिगड़ता चला गया है। देखने को बच गया केवल ‘हुड़दंग’। लेखक का जिम्मेदार और समझबूझ भरा मशवरा है कि ‘शादियों के सम्बन्धें को जीवन्त, उल्लासपूर्ण और बहुआयामी बनाने में कोलाहल व लेन-देन का कोई महत्त्व नहीं है। यह एक मजबूरी की रश्म भी नहीं। यह जीवन का महत्वपूर्ण पल हैं इसे महत्वपूर्ण बनाने के लिए लालच, ढोंग व पाखण्ड की जरूरत नहीं होती’ परन्तु कौन सुन रहा? ‘सड़कों पर उतरी सिरफिरों की टोली’, ‘इस सुहानी डगर में सौ खतरे’, ‘गिरने का सीजन’, ‘मेरी बच्ची अब शादी के बाद तेरा हर कदम’ आदि ब्लागों को सामाजिक चलों की वर्णनात्मकता में नहीं अपितु हमारे सीध्े सादे और सरल रिवाजों में हाबी होते सम्बन्नता की विकृतियों के रूप में लेना होगा।
‘कैसा चलन हो गया है कि ठण्ड कितनी ही हो, कुछ महिलाएं स्वेटर तक नहीं पहन देतीं। दुल्हन को ऐसे बना देते हैं कि जैसे प्लैैस्टिक की गुड़िया। कार्यक्रम में, एक-दो आदमियों को रजिस्टर थमाकर कुर्सी पर ऐसे बिठा दिया जाता है मानो मण्डी में आड़ती के मुंशी।’
विविध् जातियों के, अलग-अलग वर्गों के असल और कम असल आयोजनों की शादियाँ होती रहती हैं पर ‘दिलदारों की शादी ओ हो’ क्या कहने। ‘रहम है कि ‘आज मेेरे यार की शादी है’ गीत को बैंड मास्टर पूरा नहीं गाते। ‘आदमी सड़क का’ पिफल्म के उस गीत में रपफी साहब ने आगे गाया था- ‘आज तू हमें नचाए, वक्त वो आने वाला ओ हो दुल्हनियाँ तुझे नचाए’।
लग्न, मुहूर्त और कर्मकाण्ड की शास्त्राीय जो अभी हाल-हाल के वर्षों तक जीवन के सबसे सुन्दर रिश्ते का केन्द्र बिन्दु हुआ करता था, इस कदर आडम्बरों से घिर गया है कि अब उसकी याद आते ही हर व्यक्ति तनाव में आ जाता है। लड़के-लड़कियों की बेडौल ऐठती कमरें, बेवजह आसमान में झूलते हुए हाथ और लात मारते पैरों को ये लोग डांस कहते हैं। ये डांस सड़कों पर होते हैं। शादियों का सबसे बड़ा किरदान पफोटोग्रापफर होता हैं पफोटोओं की अल्बम, विवाह के बड़े खर्च की मदों में से एक होती है। संगीत का सत्यानाश पिटी इन अल्बमों को कोई नहीं देखता फिर भी इनको घरों में रखे रहने का रिबाज हो गया है।’
उपर्युक्त सामाजिक नव-चलनों के बहुत गम्भीर सांस्कृतिक अर्थ हैं। लेखक सभी के घोड़ों को एक चाबुक से नहीं हांकता। किसी वर्ग, वर्ण या जाति के प्रति उसके मन में कोई पूर्वाग्रह, दुराग्रह नहीं है। वह निष्पक्ष हो, चलन, शगल, पिफतरत और फैशन के नाम पर पफैलाई जाती धन की की बदौलतो को देखता है। जहाँ उंगली उठानी हो, तर्जनी से वरजता है। उसकी मंशा के विपरीत मौजियों को भी वह भांपता है। रसूखदारों की मानसिकताओं की भद्दी नकल करने वाले जलसों पर भी उसकी नज़र है परन्तु भाषाई तिक्तता उसमें नहीं मिलती। समझदारों और कुछ नया करने के सम्भावनाशीलों से अपेक्षा भी कम नहीं हैं परन्तु उसका कोई एनजीओ नहीं है। चुटकियाँ, नख-क्षत, व्यंग्य और पफब्तियों के कुछ नमूने हैं-
‘दिनकर की लड़की एम.एस.सी. पास है। शादी के मामले में उसका मन अभी भी ‘पंछि बनूं उड़ति पिफरूँ’ में ही तरंगित हैं सक्सेना जी का लड़का हैसियत से 25 लाख का है। जोशी जी के लड़के की शादी बिना दहेज की हुई। बलबीर ने तीन वर्ष पहले बड़े बेटे की शादी की तो सवर्णों के लिए अलग से भोजन का इंतजाम करवाया था। छोटे लड़के की शादी का नम्बर आया तो बोले थे ‘जीवन भर अपमान करने वालों को खुशी में शामिल नहीं किया जाएगा। वर्मा जी ने सापफ कह किदया कि शादी कर रहा हँू पर एक रुपये का भी दहेज नहीं लिया जाएगा। एक शादी और हुई। लड़की एम.एस.सी. पास थी। लड़का सरकारी स्कूल में शिक्षक था। लड़के वाले सुबह एक स्टील का परात लेकर गए।’
फिजूल-फिजूल ही बखत-बखत सेल्पफी लेने के चलन पर शिक्षा-विभाग को निशाना बनाती सरकारी मशीनरी पर चुटकी अकारण नहीं है। विद्यार्थियों की तरफ से गुजारिश हुई है, ‘भेजो मास्साब सेल्फी भेजो। हाजरी के समय ही नहीं हर पीरियड की सेल्पफी केदारनाथ धम की तरह भेजना। हिन्दी के पीरियड पर वेष हिमाचल का सा बनाना। उर्दू के पीरियड की पफोटो उलेमाओं से मुलाकात जैसी होनी चाहिए। अंग्रेजी पढ़ाने की सेल्पफी हमेशा बदली-बदली भेजना। जिस विषय में शिक्षक न हो तो अध्किारी के पास की सेल्पफी दिखा देना। आपकी उंगली लगता है, सही-सही काम कर रही है, इसलिए जल्द आपका पूरा शरीर नेट पर लिंक किया जाएगा। इसके बाद आप आदर्श शिक्षक बन जाओगे।’
मजाक की ससब बनती सरकारी योजनाओं में ‘महेशराम की कागजी मशरूम’ भी एक ब्लाग है। उससे शुरु होकर, बीमार आदमी की चारपाई पर लकड़ी बाँध् कर अस्पताल ले जाने के लिए नदी पार कर रहे ग्रामीणों के पफोटो के साथ छपा ‘हम जीते हैं अपने दम पर सरकार की यहाँ जुर्रत नहीं’ के रोष भरे शब्दों को ‘बाक्स बंद’ करके ‘कब तक सितम सह लें: तड़प लें या रो लें’ तक और उसके बाद भी कई ब्लाग हैं। एक में, अपन ओवर टाइम में पोस्टमार्टम का अतिरिक्त काम करके घर लौटा सपफाई कर्मचारी सोनपाल है। वह अपने सत्राह वर्ष के लड़के को, सड़क में सापफ करने को बची पड़ी ढेरियों को उठाने के लिए काम पर जाने को विवश कर रहा है’, ‘पनीराम के घर नेता आए’, ‘भल्लू की दो किलो मंूगपफली’, आदि की सीरीज के सभी ब्लाग हमारे-आपके सभी के आँखों देखे शब्द-चित्रा हैं। जिनके विषय में ये व्यक्त किये गए हैं उन उन तबकों तक पहँुचने वाली हमारी सरकार की इमदादों की परिणति दिखाती हैं ‘रुलाते रहेंगे बैंक में’। इनमें मैंहदी, भानु और कितने ही ट्टण लेने वालों के हश्र की दास्तानें हैं। कथारस से पूर्ण। इनको पढ़ने से, लेखक की, बद किस्मती, घटना- दुर्घटनाओं, विडम्बनाओं और पचड़ों का लेखक की कहस की क्षमता का पता चलता है। मन मारकर ही उसने छोटे से भी छोटे में अपने कथनों को सीमित किया है।
‘सुन्दरराम का बेटा जम्मू मेमं शहीद हो गया। दीवान सिंह की पत्नी विमला पत्ते काटने भीमल के पेड़ पर चढ़ी, गिर गई। इलाज कराने बड़े अस्पताल के आई.सी.यू. में पाँच दिन रही। खर्च तो खूब किया पर वह मर गई। तेरहवीं भी नहीं हुई थी कि रात में गुलदार गोठ में घुसकर उसकी दोनों बकरियों को खा गया। इन सब घटनाओं के इतिवृत्त कहानियों जैसे हैं पढ़ने में।
उत्तराखण्ड पर कहने के लिए लेखक के पास जितना है उससे कम देश और दुनियाँ पर नहीं है। भीड़, सड़कों के पचड़े, शोर, गन्दगी, मार्ट-माॅल बाजार, खरीददारी, बाजारों के चलन, उनका कार्पोटीकरण, देसी आदतों के लोगों की आदतें, जनपद जनों की पुराने जमाने की दिलेर मेहमानबाजी, वैश्विक घटनाऐं, सब अपनी जगह हैं। उन पर लेखक के अबोझिल विचार हैं। ‘यूं जंगल पर भली विजय’, ‘नमकचोरी’ और ‘चमचमाती ध्रती’ लेख पूर्वोत्तर के अपने देश के राज्यों पर हैं तो ‘महान कहलाये जाखा’ अण्डमान-नीकोबार के मूल निवासियों पर हैं।
‘सोच में विज्ञान न हो तो जान को खतरा’ ब्लाग भले ही एक ही पेटी में भरी हुई अलग-अलग कम्पनियों की दवाओं की तस्दीग लेने के लिए की गई मस्ती से शुरु होता हो उसकी जद में ‘वट्सएप’ और ‘फेसबुक’ जैसे निरंकारी चलक भी है। पागल कुत्तों के काटने से संक्रमित होने वाले ‘वायरस’ की बाते तो हैं ही, शैलानी, होटल-मालिक, दलाल, मापिफया और लपफंगे भ्ीा समाज और संस्कृति के तानों-बानों में घुसे ‘वायरस’ ही हैं। वैज्ञानिक सोच को रेखांकित करने वाले लेखों के क्रम में, ‘बोस हाकिन्स में गहरा नाता’, ‘हाकिन्स का जाना इस युग की दुःखद घटना’, ‘याद रहेंगे गैलीलियो’ख् ‘आइन्स्टीन हमेशा जिन्दा रहेंगे’ जैसे विषय शीर्षकों से लिखे गए ब्लाग हैं। इन सब में काॅस्मोलाॅजी विषय पर संक्षिप्त पर प्रमाणिक टीपें, उसके अध्ययन के विकास की ऐतिहासिक जानकारी और उसकी सूचना देने वाली खोजों की किताबों की भू सूचनाएं हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे उम्मीदवारों के लिए उपयोगी सामग्री है इनमें।
मनोवृत्ति, भावना और संवेगों की परतों को पहचानने की दृष्टि से लेखक ने एक विशिष्ट किस्म का ब्लाग लिखा है ‘गुस्सा’। इसमें अनुभव, विचार, अध्ययन और तजुर्बे से प्रत्यक्ष हुए यथार्थ का अच्छा विमर्ष है। झूठ और लालच, झूठ और दगाबाजी, गुस्सा और हिंसा, खुशी और गुस्सा, हिंसा और नपफरत आदि- आदि संवेगों के मनोविज्ञान की गहराई में जाने की यह कोशिश वस्तुनिष्ठ विषयों की तुलना में विषयीगत विश्लेषण की है। लेखक का प्रतिपादन है, ‘नपफरतों का न्यूनतम रूप मन मुटाव और उच्चतम रूप आतंक तक पहँुच जाता है। महबूब के चेहरे पर प्रेम के गुस्से के भाव, बच्चों के माँ-बाप का लाड़ से भरा वो चेहरा और बुराई के खिलापफ उमड़ा गुस्से का सैलाब सभी मानव जीवन के लिए सुखद है।’ ढाई सौ रुपये दाम की यह किताब पढ़ने लायक है।
चन्द्रावती कालोनी,
छोटी मुखानी, हल्द्वानी

उत्तराखण्ड की उच्चशिक्षा में प्रयोग

पिघलता हिमलाय प्रतिनिधि
मान्यता है कि यदि समाज को बदलना है तो शिक्षा में बदलाव करना होगा। राज करने के लिये भी शिक्षा का ढर्रा राजा के अपने अनुकूल होना जरूरी होता है। लगता है इन्हीं सिद्धान्तों को लेकर उत्तराखण्ड की सरकार चल रही है। शिक्षा व्यवस्था की पूरी मशीनरी को प्राइमरी से लेकर उच्चशिक्षा तक हिला दिया गया है। ऐसे में कुछ बातें राज की हैं और कुछ नाराजी की भी। शिक्षा मंत्री अरविन्द पाण्डेय हों या उच्चशिक्षा स्वतंत्र प्रभार मंत्राी डाॅ.धनसिंह रावत, अपने निर्णयों व तेवरों के चलते बेहद चर्चा में हैं।
उच्चशिक्षा हमेशा चर्चा में रही है लेकिन प्रदेश में इस बार जब से भाजपा की त्रिवेन्द्र रावत सरकार आई तब से इसमें ज्यादा ही हलचल है। इस हलचल का मुख्य कारण युवा तेज-तर्रार उच्चशिक्षा मंत्राी डाॅ.धनसिंह हैं। प्रदेश में क्रिया-प्रतिक्रिया भी सबसे ज्यादा इसी विभाग में है। चार महीने तक स्थानान्तरण  का प्रचार करने के बाद सितम्बर माह के मध्य 154 प्रवक्ताओं के बम्पर तबादले आदेश कर दिये गये। तबादले किन स्थानों में किये जा रहे हैं इसे लेकर भी अन्त तक अनिश्चितता बनी रही। स्थानान्तरण सूची जारी होने से पहले तक महाविद्यालयों के वह प्रवक्ता स्थानान्तरण सूची में अपना नाम तलाशने के लिये बेचैन दिखाई दिये जो लम्बे समय से सुगम या एक जगह ठहराव में बने हुए थे। जुलाई से लेकर सितम्बर माह के प्रथम सप्ताह तक स्थानान्तरण सूची आने, बदलने, देहरादून में होने, मंत्री जी के पास होने, निदेशालय में होने, हस्ताक्षर के लिये फाइल जाने, नाम जुड़ने, नाम घटने जैसी बातों के साथ चर्चा होती रही। कालेजों में प्रवेश प्रक्रिया आरम्भ हो गई और कहा जाने लगा अब कुछ नहीं होने वाला है लेकिन पिफर से हल्ला मचने लगा। इसके बाद छात्रा संघ चुनाव की तैयारी हुई और मान लिया गया कि स्थानान्तरण लटक गये हैं। कुछ मन से और कुछ बेमन से काम में जुट गये। इस बीच कुछ प्रवक्ताओं ने इधर उधर व सीध्े मंत्री से तक सम्पर्क साध् लिया। बताते हैं कि मंत्राी ने बहुत ही तरीके से मुलाकात भी की लेकिन स्थानान्तरण में कोई छूट देना अब उनके हाथ का भी नहीं रह गया था। क्योंकि जिस स्थानान्तरण को लेकर पहले से ही दुनियाभर का हल्ला मच रहा हो उसपर हर किसी की नज़र है।
विगत दिवस शासन स्तर से उच्चशिक्षा मंत्री डाॅ.धनसिंह रावत की संस्तुति के बाद अपर मुख्य सचिव डाॅ.रणवीर सिंह के हस्ताक्षर से राज्य के 154 प्राध्यापकों के अलग-अलग स्थानान्तरण आदेश जारी कर दिए गए। स्थानान्तरण सूची में सर्वाध्कि एमबीपीजी कालेज हल्द्वानी, डिग्री कालेज कोटद्वार, रिषिकेश, डाकपत्थर, रानीखेत, काशीपुर, पिथौरागढ़, रामनगर, नई टिहरी कालेज से सर्वाधिक तबादले हुए हैं। इन्हें तैनाती के लिये रिक्त पड़े सुदूरवर्ती डिग्री कालेजों में तैनाती दी गई है।
स्थानान्तरणों को लेकर भी तमाम चर्चाएं होना स्वाभाविक है क्योंकि इसकी सूची बनने तक जितनी नाटकीय क्रम रहा है वह किसी से छुपा नहीं है। दूर दराज भेज दिये गये प्रवक्ताओं के बीच कानापफूसी और कोर्ट की बात पहले से ही हो रही थी। कुछ नामों पर आश्चर्य हो रहा है कि उन्हें किस प्रकार सुगम के करीब या दूर पहाड़ भेज दिया गया। पिफलहाल जो भी, ध्नसिंह ने जो कह दिया था वह किया। स्थानान्तरण सूची भी छात्रासंघ चुनाव निपटते ही जारी हुई। शासन जानता था कि छात्रासंघ चुनाव म कालेज प्रशासन पूरी तरह उलझा हुआ है और उस बीच स्थानान्तरण की सूची जारी होती तो अपफरा-तपफरी मच जाती और कालेजों में चुनाव कार्य सम्पन्न करवाने में दिक्कत होती। होने को तो इस समय विशेष सुधर परीक्षा कार्यक्रम चल रहा है और कई कालेजों से वरिष्ठ प्रवक्ताओं के स्थानान्तरण के कारण व्यवस्था बनाये रखने के लिये जूझना पड़ रहा है। सत्रा के बीच में हुए स्थानान्तरण को कई अर्थों में देखा जा रहा है।
सवाल है कि शिक्षा व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन कर क्या हो जायेगा? उत्तराखण्ड में जगह-जगह डिग्री कालेज खोल दिये गये हैं और बिना सुविधओं के उनका संचालन हो रहा है। ऐसे में यह मान्यता बन जाती है कि डिग्री कालेज ऐसे ही हुआ करते होंगे। जिनमें इण्टर पास कर जाना होता है और साल में एक बार छात्रा संघ चुनाव होते हैं। इन हालातों में महाविद्यालय पठन-पाठन से ज्यादा अन्य चीजों के अड्डे बन सकते हैं। इसलिये जरूरी हो जाता है कि उच्चशिक्षा में प्रयोग की करने वाली सरकार केवल स्थानान्तरण को ही अपना लक्ष्य न रखे बल्कि इसमें सुधर के लिये ठोस पहल हो। महाविद्यालय प्रशासन के पास प्रवेश से लेकर अन्य बातों का दबाव बना रहता है, उसे दूर करने के लिये कदम उठाये जाएं। छात्रा संघ चुनाव के दौरान कालेजों में हुई घटनाओं को पुलिस व प्रशासन तक को रोकने में जूझना पड़ा था तो कैसे कल्पना करें कि महाविद्यालय प्रशासन अपने आप से दबाव व दादागिरी की परम्परा से निपट लेगा। यह भी होना चाहिये कि सड़क चलता कोई भी नेता अथवा कोई रौब दिखाता हुआ कालेजों में प्रवेश न करे। यदि सरकार इस प्रकार की व्यवस्था करवा सकी तो यह ऐतिहासिक कदम होगा। स्थानान्तरण तो एक सामान्य प्रक्रिया भी हो सकती है और नौकरी करने वाले इध्र नहीं तो उध्र कर लेंगे परन्तु महाविद्यालयों में विद्यार्थी न होने के बावजूद आ ध्मकने और ध्मकी भरे लहजे में घूमने वालों को कैसे रोका जाए? कहने को तो कालेज का अनुशासक मण्डल भी होता है लेकिन उसके पास परिचपत्रा दिखाओ कहने तक की ताकत होती है। दबंगई पर उतर आये अराजक कुछ नहीं सुनते हैं। ऐसे में इस दिशा में ही कदम उठाने जरूरी हैं।

पिघलता हिमालय की सम्पादक कमला उप्रेती का निधन

ईजा, तुमसे जिन्दा है ये यह…….

डाॅ.पंकज उप्रेती
15 सितम्बर 2018 प्रातः 9 बजे पिघलता हिमालय की सम्पादक श्रीमती कमला उप्रेती निधन हो गया। ईजा सम्पादक के रूप में ही नहीं आन्दोलनकारी व पत्राकार के रूप में जिन्दगीभर सक्रिय रही। बीमारियों से लड़ते-लड़ते अपने मिशन के लिये जूझने वाली ईजा से ही जिन्दा था ‘पिघलता हिमालय’ और इन्हीं की यादों के साथ चलाने का संकल्प लिया है।
पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के बाद इस समाचार पत्रा को जिन्दा रखने की चाह में उन्होंने अपनी जिन्दगी की परवाह नहीं की। पति के निध्न के बाद सदमे से घायल हो चुकी श्रीमती उप्रेती बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाते रहीं। वैसे तो ईजा मौत के मुंह में कई बार जा चुकी थी लेकिन 22 पफरवरी 2013 पिता आनन्द बल्लभ जी के निध्न के समय से टूट चुकी ईजा को 6 माह के भीतर फालिस/लकुवा पड़ गया और उनके बांये हाथ-पैर में परेशानी हो गई थी। हर दिन दवाईयों के सहारे खड़े होने वाली ईजा ने हिम्मत नहीं हारी और अपने मिशन और अपने कर्तव्यों के साथ घर में बच्चों का मार्गदर्शन करती थीं। वर्तमान की पत्राकारिता पर वह चिन्तित थी और परेशानी में गुजारे हुए अपने पुराने दिनों का स्मरण करती रहती थी। अस्वस्थ्य होने के बाद भी ईजा की इच्छाएं अपनों के बीच घिरी थीं और प्रातः 4 बजे से नियमित रूप से फोन पर जगह-जगह सम्पर्क कर कुशलबात पूछना उनकी आदत में था। अस्वस्थ्य होने के बाद वह अल्मोड़ा, रानीखेत, गंगोलीहाट, मसूरी तमाम जगह मिलने के लिये पहँुची। उत्तरायणी में रानीबाग में कत्यूरियों की जागर हो या जोहार महत्व में ढुस्का, ईजा जरूर जाती। अपने स्वास्थ्य को देखते हुए वह चुपचाप जाकर दर्शक दीर्घा में पीछे से बैठ जाती, यदि किसी ने पहचान लिया तो कहती- ‘मेरी बजह से कार्यक्रम में कोई दिक्कत न हो, इसलिये पीछे बैठ गई है। चिन्ता मत करो। कार्यक्रम जारी रखो।’ हिमालय संगीत शोध् समिति के अध्यक्ष के रूप में उनका संरक्षण था। युवा कलाकारों द्वारा की रही तैयारियों को देखने के लिये वह कक्षाओं में तक जाती और होने वाले सांस्कृतिक आयोजनों में मौजूद रहती थी। वह अपने पीछे पुत्र पंकज, ध्ीरज, पुत्रबध्ू गीता, आरती, पौते आशुतोष, उत्कर्ष, नवीन, पुत्री मीनाक्षी जमाई अशोक जोशी सहित भरापूरा परिवार छोड़ गई हैं।
कमला देवी का जन्म 16 नवम्बर 1951 को माता श्रीमती इन्द्रा व पिता ज्वालाप्रसाद पाण्डे जी के घर रानीखेत में हुआ। पफाल्गुन 5 गले 1971 को इनका विवाह आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ हुआ। शिक्षित होने के बाद भी उन्होंने उस दौर में सरकारी नौकरी नहीं की और उप्रेती जी के साथ उनके छापाखाना ष्शक्ति प्रेसष् में सहयोग किया। वह दौर जब अखबार टेªडिल मशीन में छपा करते थेए उसकी प्रूपफ रीडिंग से लेकर मशीन में कागज उठानेए अखबार मोड़ने तक का कार्य मिशन के रूप में किया। जीवन को संग्राम के रूप में देखने वाली श्रीमती उप्रेती ने अस्वस्थ्य होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और हमेशा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किये। जीवन भर संघर्ष में घिरे परिवार की परम्पराओं को दृढ़ता के साथ पूरा करने वाली ईजा अपनी प्रतिब;ता के साथ कभी भी किसी राजनैतिक पार्टी से नहीं जुड़ी। जबकि तमाम पार्टियों के शीर्ष नेताओं द्वारा उन्हें सम्मानपूर्वक पार्टी में आने का अनुरोध् किया जाता रहा। उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनकारी के रूप में वह सक्रिय रही हैंए जिसके लिये शासन द्वारा इन्हें राज्य आन्दोलकारी का प्रमाण पत्रा दिया गया। इनके संचालन में महिलाओं ने कई बड़े आयोजन किये। जनमुद्दों व तमाम महिला संगठनों के आयोजनों में इनकी भागीदारी रही है। घर.परिवार की जिम्मेदारी के के साथ पत्राकारिता के मिशन को इन्होंने बनाये रखा। पिघलता हिमालय के सम्पादक के रूप में अपनी निष्पक्ष पत्राकारिता को संरक्षण दे रही थीं। ईजा के निधन हमारे लिये सबसे बड़ा आघात है।

चैती गायन का परम्परा ही सिमट चुकी है

डाॅ.पंकज उप्रेती
थल-बेरीनाग मार्ग के बीचोंबीच का  इलाका है- काण्डेकिरौली। काण्डे, किरौली, जगथली कभी एक ही ग्रामसभा हुआ करती थी, अब यह तीन ग्राम सभाएं हैं। इसी काण्डे के मूल निवासी पनीराम परम्परागत कलाकर हैं। नागों में मुखिया पिंगलीनाथ के दास के रूप में अपनी परम्परा को आज भी पनीराम और इनता परिवार निभा रहा है। लोक गायन की कई विधओं को जानने वाले 72 वर्षीय पनीराम के शिक्षित पुत्र राजन, गोपाल, महिपाल भी इन विधओं को जानते हैं और मेलों के असल रंग में झूमने के लिये जाते हैं।
पनीराम के दादा रुद्रराम और पिता गुलाबराम जागर व अन्य गायन की अन्य लोक विधाओं के जानकार थे, इन्हीं से सीखे हुए पनीराम आज भी नित्य प्रातः और सायं अपने घर में ढोल बजाकर पिंगलीनाथ का स्मरण करते हैं। ग्रामीण भी इनके मान-सम्मान में कसर नहीं छोड़ते हैं। लोक की यह अद्भुत परम्परा में कोई भेदभाव नहीं है, सब लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। जिसके घर में जो नई पफसल का जो होता है उसका हिस्सा अनिवार्य रूप से इस परिवार को भी दिया जाता है। ऐसा सामाजिक तानाबाना हमारी कला-संस्कृति को जोड़ने वाला रहा है लेकिन सरकारी धन से कला-कलाकारों के संरक्षण के नाम पर हो रहा खेल दिल दुःखाता है।
पनीराम गंगनाथ की जागर लगाते हैं, जिसे हुड़के पर गाया जाता है। गोल ज्यू, नौलिंग, बजेंण, छुरमल, कालसिन की बंशावली को गाते हैं, जिसे ढोल की संगत में गाया जाता है। ढोल में पिंगलनाथ का स्मरण किया जाता है। वह बताते हैं कि नागों की वंशावली नहीं गाई जाती है, अन्य देवी-देवताओं के भांति नागों के डांगर नहीं होते हैं।
ढोल-जागर के अलावा पनीराम चैती गायन में माहिर हैं। इस गायकी में ट्टतु का रंग, रोमांच और उदासी के स्वर गूंजते हैं। पहाड़ में गाई जाने वाली यह गायकी अब सिमट चुकी है। बातचीत के दौरान वह ढोलकी के साथ सुनाने लगते हैं-
‘ट्टतु औंछे पलटि बरस का दिना
ज्यूना भागी जी रौला,
सौभागी सुणला बरस की ट्टतु……
मालो जानी गबड़ी पलटी आला,
खेवी जानी मौनू पलटी आला,
चैतोलिया मासा भाई भिटोली आला।
जाको न छि भाई, कौ भिटोली आला,
दैराणी-जैठाणी का भाई भिटौली आला,
गोरीध्ना रौतेली, कौ भिटोली आला,
छाजा बैठी गोरी आँसुवा ढोललि……..।’
इसमें चैत मास का वर्णन करते हुए गायक कहता है बर्ष में यह ट्टतु भी अपने समय से आयेगी, सभी राजीखुशी रहें, सौभाग्यवती सुनेंगी, भाबर जाने वाले ग्रामीण लौट आयेंगे जैसे मध्ुमक्खी रस लेकर अपने स्थान पर लौट आती है। इस वर्णन में गायक आगे कहता है- चैत के मास में भाई मिलने आयेगा। बहुत ही कारुणिक वर्णन इसमें है जब वह कहता है- गोरीध्ना का तो भाई ही नहीं है, कौन भिटोली लेकर आयेगा। वह छज्जे में बैठकर आंसु गिरायेगी।
चैती का यह वर्णन बहुत लम्बा है जिसमें आगे बताया गया है कि गोरीध्ना का भाई नहीं था। उसके विवाह के उपरान्त घर में एक भाई हुआ, जो बाद में उसके लिये भिटौली लेकर आया। इस प्रकार पुराने समय में ट्टतु के रंग, रोमांच के साथ करुणरस के स्वरों को घोलता हुआ चैती गीत गाया जाता है। वर्तमान में इसके गायक गिनती भर के हैं, जो गाँवों में घर-घर जाकर इसे सुनाया करते थे और सुनने वाले भी बहुत ही भावपूर्ण ढंग से इसे सुनते और कलाकार को पुरस्कार स्वरूप कुछ देते थे। काण्डे के पास ही बैठोली के दलीराम और उड्यारी के चनरराम भी चैती गायकी के अच्छे जानकार थे। इन्हीं परिवारों में से दलीप राम और मोहनराम ने गणतंत्रात दिवस के अवसर पर सबसे पहले छोलिया नृत्य किया था। यहाँ की ध्नीराम एण्ड पार्टी नैनीताल, लखनउफ, दिल्ली तमाम जगह में जाया करती थी। सनेेती, सनगाड़, भनार, नागमन्दिर बेणीनाग में कभी जबर्दस्त झोड़ा-चांचरी के आयोजन होते थे और परम्परागत कलाकार अपने गाँवों से ढोल-दमुवा बजाते हुए जात्रा के रूप में जाते थे। हुड़कीबौल सामन्यतः धन रौपाई में लगाई जाती है किन्तु यहाँ मडुवा गोड़ाई के समय इसे लगाया जाता था। समय बदला और अब पनीराम के ढोल की स्वर सुनाई देते हैं।

पिघलता हिमालय 19 सितम्बर 2016 के अंक से

शौका समाज आक्रोशित, मुख्यमंत्री को पत्र भेजा

सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का परिवर्तन कर सम्पूर्ण जनजाति को आहत किया है

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
उत्तराखण्ड सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का नाम परिवर्तन करने से शौका समाज बेहद आक्रोशित है। नाराज संगठनोें ने मुख्यमंत्राी सहित उच्च पदों पर बैठे लोगों को पत्रा भेजे हैं। जोहार मिलन केन्द्र हल्द्वानी, जोहार सांस्कृतिक वेलपफेयर सोसाइटी हल्द्वानी, मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी के अलावा उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति देहरादून ने सभी बुद्धिजीवियों का ध्यान इस ओर आकृष्ट करते हुए चिन्ता जताई है कि नाम परिवर्तन की नीति अपनाई गई है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व कांग्रेस सरकार ने सचिवालय के विश्वकर्मा भवन सभागार का नाम पूर्व मुख्य सचिव व प्रदेश के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त डाॅ. आर.एस.टोलिया के नाम पर रखा था जिसे अब भाजपा शासन ने बदल कर वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम पर कर दिया है। आक्रोशित लोगों का कहना है कि वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली का वह बहुत सम्मान करते हैं और चाहते हंै उनके नाम पर कई कार्य हों लेकिन डाॅ. टोलिया के नाम पर एकमात्रा सभागार का नाम बदलने की राजनीति बर्दाश्त नहीं होगी।
उत्तराखण्ड अनुसूचित जनजाति कल्याण समिति ने प्रदेश के समस्त बुद्धिजीवियों एवं जनजाति समाज की ओर से सरकार से अनुरोध् किया है कि अपनी उदारचेतना एवं व्यापक दृष्टि का पुनः परिचय देकर राज्य के मंत्राीमण्डल द्वारा पारित प्रस्ताव तथा जनभावनाओं का सम्मान करके उपरोक्त सभागार का नाम पुनः स्व. डाॅ.आर.एस.टोलिया के नाम पर करे। साथ ही शासन द्वारा की इस बारे में की जा रही कार्रवाई से समिति को अवगत करा दें ताकि राज्य के जनजाति समाज को निर्णय से अवगत कराया जा सके। समिति के संरक्षक एस.एस.पांगती, अध्यक्ष चन्द्र सिंह ग्वाल, महासचिव सुश्री विमला ने पत्रा जारी करते हुए जनजाति कल्याण सिमति एवं अ0भा0आदिवासी संगठन, रं कल्याण संस्था, नीतिमाणा घाटी कल्याण समिति, जोहार घाटी कमेटी, पूर्व विधयक गगन रजवार, वनराजि समाज संगठन, जौनसार बाबर समिति, जनजाति मोर्चा, बोक्सा आदिम संगठन, जोहार कल्याण संगठन, थारू विकास समिति खटीमा सहित तमाम जगह सम्पर्क किया है। मामले में संगठनों सरकार से निर्णय लेने की मांग की है।
जोहार सांस्कृतिक बेलपफेयर सोसाइटी हल्द्वानी के अध्यक्ष देवेन्द्र सिंह धर्मशक्तू, जोहार मिलन केन्द्र हल्द्वानी के अध्यक्ष डाॅ. पी.एस.मर्तोलिया की ओर से मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड सरकार को पत्र भेजकर अनुरोध् किया गया है कि डाॅ.टोलिया के नाम को यथावत रखा जाए। पत्रा की प्रतिलिपि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को भी मामले में हस्तक्षेप करने की उम्मीद के साथ भेजी है। कहा है कि हस्तक्षेप किया जाए ताकि उत्तराखण्ड सरकार के इस अविवेकपूर्ण निर्णय से आहत प्रदेश के जनजाति वर्ग इसे पार्टी का दुर्वल वर्ग के प्रति दुर्भावना न माने और आपकी दूसरी पार्टियां इसका राजनीतिकरण न करें।
पत्र में कहा है कि प्रदेश की वर्तमान सरकार द्वारा बिना किसी कारण व औचित्य के अचानक किये गये इस नाम परिवर्तन से उत्तराखण्ड का सम्पूर्ण जनजाति वर्ग व कुमाउँ निवासी और मुख्य रूप से भोटिया जनजाति व पिथौरागढ़ की जनता स्तब्ध् व आहत है। जोहार सांस्कृतिक एवं बेलफेयर सोससाइटी तथा जोहार मिलन केन्द्र के तत्वावधन में आयोजित वृहद सभा के पश्चात मुख्यमंत्री को सम्बोधित इस पत्र में कहा है कि आपके निर्णय पर आक्रोश व्यक्त करने और आपसे जनजाति और मुख्यरूप से जोहार के शौका समुदाय को आहत व अपमानित करने वाले इस निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध् करने के लिये जनभावनाओं का पत्र प्रेषित है। स्व.टोलिया पर्वू मुख्य सचिव व प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त न केवल उत्तराखण्ड जनजाति बल्कि पूरे प्रदेश के गौरव थे। उत्तर प्रदेश सरकार के उत्तराखण्ड राजधनी चयन आयोग के सचिव के कार्यकाल से ही उत्तराखण्ड राज्य की स्थापना में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। नये राज्य की स्थापना के निर्णय से ही उन्होंने नवगठित राज्य के प्रशासन व विभिन्न विभागों, निगमों व अन्य संस्थओें को सुव्यवस्थित व सुसंचालित करने और दोनों राज्यों में कर्मियों व परिसम्पत्तियों के बंटवारे के कार्यों को जिस निष्ठा और योग्यता से निष्पादित किया उसके कारण उन्हें राज्य का मुख्य सचिव तथा संस्थापक मुख्य सूचना आयुक्त बनया गया। प्रदेश की विकास योजनाओं की परिकल्पनाओं से लेकर उनके सपफल क्रियान्वयन तथा उनकी जो महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह सर्वविदित है कि प्रशासनिक अकादमी नैनीताल को केन्द्रीय स्तर पर मान सम्मान दिलानाभी उन्हीं का कार्य है। उत्तराखण्ड प्रशासन इतिहास के इतिहास पर उन्होंने जो शोध् किये और अनेकानेक शोध्ग्रन्थ लिखे वे न केवल इतिहास के बहुमूल्य व प्रमाणिक अभिलेख हैं बल्कि नवगठित राज्य के प्रशासकों के लिए मार्ग निर्देशिका भी हैं। सेवा निवृति के बाद भी वे उत्तराखण्ड के विकास और पहाड़ से पलायन रोकने की योजनाओं पर जुड़े रहे। इतना ही नहीं, सेवानिवृति के बाद मुनस्यारी जैसे पहाड़ के गाँव में बसकर उन्होंने पहाड़ के पुनर्वास की बात करने वालों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने जिस योग्यता, निष्ठा और समर्पण की भावना से उत्तराखण्ड के विकास में योगदान दिया उसी के सम्मानस्वरूप उक्त सभागार व कुछ संस्थाएं पूर्ववर्ती सरकार द्वारा उनके नाम पर रखी गयी थी। टोलिया जी गैर राजनैतिक व्यक्ति थे। उनकी निष्ठा अपने राज्य और उसकी जनता के विकास से थी। वे हमेशा धर्म, जाति और क्षेत्रा के संकुचित दायरे से बाहर रहे। उनका सम्मान उत्तराखण्ड की समस्त जनता का सम्मान था और है। इसलिये सभागार से इस तरह नाम हटाया जाना प्रदेश की पूरी जनता और मुख्य रूप से जनजाति वर्ग का अपमान है। सभा के प्रतिभागियों का मानना है कि आदरणीय डाॅ.टोलिया जी को बेवजह कांग्रेस और भाजपा की प्रतिद्वंद्विता में बलि का बकरा बनाने का कृत्य किया गया है। उत्तराखण्ड के अन्य लोगों की तरह जनजाति के लोग भी वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के स्वतंत्रता संग्राम और उत्तराखण्ड की अस्मिता में योगदान के प्रशंसक हैं। उनके नाम पर किसी भी भवन, संस्था, शहर का नामकरण हमारे लिये हर्ष और गर्व की बात होगी। लेकिन इस कार्य के लिए किसी अन्य का नाम हटाना दुर्भावनापूर्ण और अपमान जनक है और इसलिए हमें स्वीकार नहीं है। यह न केवल दिवंगत आत्मा का अनादर है बल्कि समस्त जनता का और मुख्य रूप से डाॅ. टोलिया के जोहार शौका समुदाय का अपमान है।
सभा के दौरान सभी ने एक स्वर से प्रदेश के मुखिया से अपील दोहराई है कि अपने निर्णय पर अविलम्ब पुनर्विचार कर उक्त सभागार का नाम फिर से स्व.आर.एस.टोलिया के नाम पर रखा जाए। वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम पर उससे भी अध्कि प्रमुख भवन को किया जा सकता है।
मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी ने मुख्यमंत्राी को मामले में पत्रा भेजा है। समिति के अध्यक्ष श्रीराम सिंह धर्मशक्तू के साथ ही नाथूराम वर्मा एडवोकेट, अमरराम आर्या, गौरत पांगती, पूरन लस्पाल, दरपान राम, शंकर सिंह ध्र्मशक्तू, कैलाश सिंहधर्मशक्तू, मनीराम, खड़क सिंह पांगती, दीवान वर्मा, मंगल सिंह मर्तोलिया, कुन्दन सिंह पांगती, गजेन्द्र पांगती, मनोहर दरियाल, माधेसिंह पांगती, बलवन्त सिंह, गोकर्ण सिंह मर्तोलिया, लक्ष्मण सिंह, हरीश सयाना, पूरन सिंह, शेर सिंह वृजवाल, मानसिंह, देवेन्द्र सिंह सहित तमाम लोगांे के हस्ताक्षर पत्र में हैं।

आशा सिंह रावत ने कन्योटी के जोशी परिवार से डोटिला में खरीदी थी भूमि

शेर सिंह रावत से बातचीत

डाॅ.पंकज उप्रेती
आज भारत-चीन व्यापार और कैलास मानसरोवर यात्रा का बहुत हल्ला करने के बाद गिनती भर के लोग सरकारी निगरानी में सीमा पार यात्रा कर पाते हैं। पहले जब सीमाओं के ये बन्धन इतने जटिल नहीं थे, भारत-चीन युद्ध नहीं हुआ था, तिब्बत तक स्वतंत्रत आना-जाना था, धर्मिक यात्राी कैलास-मानसरोवर तक जाते थे, तब के व्यापार और यात्रा का स्वरूप कितना शुरु रहा होगा वह प्रसंग सुनकर नई पीढ़ी परीलोक की सी कहानी मानती है। वाकेई उस दौर के प्रसंग आलौकिक यात्राओं के ही थे और दुरुह में भी यात्राओं का अपना भोलापन था। व्यापार होते हुए भी प्रकृति के साथ नियमों की पालना थी। दुनिया के देश एक-दूसरे पर झपटने लगे, युद्धों का प्रभाव अतिआध्ुनिक तकनीक के साथ होने लगा। तिब्बत चीन ने कब्जा लिया और भारत पर हमला। चीन युद्ध के बाद भारत-तिब्बत व्यापार बन्द हो गया और दूर-दूर तक पैदल यात्रा करने वाले सीम के व्यापारी जो जहाँ थे, वहीं ठहर गये। माइग्रेशन की बहुत सी परम्पराएं भी सिमट कर रह गई। व्यापार के उन पुराने दिनों में जोहार से मुनस्यार, गिरगांव, रौछाल-क्वीटी, शामा होते हुए भी रुट था और लोगों का आना-जाना था। तब जलद के आशा सिंह रावत ने कन्योटी ग्राम सभा ;अब बागेश्वर जिले में के जोशी परिवार से डोटिला में भूमि खरीदी थी। और व्यापार बन्द होने के बाद रावतों के परिवार यहाँ रहने लगे। वर्तमान में नौकरी या अन्य कारणों से भी ये परिवार शहरों में रहने लगे हैं। डोटिला ग्राम खाली सा हो चुका है।
इसी डोटिला ग्राम में जन्मे 80 वर्षीय शेर सिंह रावत बताते हैं कि करीब सन् 1957 में उनके दादा आशा सिंह रावत ने कन्योटी में भूमि खरीदी। यह डोटिला तोक में है। जलद के रावत परिवार यहाँ पर रहते हैं। पिता दौलत सिंह, दुर्गा सिंह, बाला सिंह के दादा, प्रकाश सिंह के पिता महेन्द्र सिंह, खुशाल सिंह कई नाम स्मृतियों में हैं। भरा-पूरा गाँव था डोटिला। माइग्रेशन में इधर से उधर जाने के दिनों में शेर सिंह जी ने प्राइमरी की पढ़ाई कपकोट से ही की। वह बताते हैं कि यात्रा के उस कठिन समय से पढ़ाई भी अनियमित हो जायाकरती थी। दरकोट ;मुनस्यारीद् में वह पढ़ते थे। स्कूल में वासुदेव जी अध्यापक थे तो जाड़ों में तेजम और वर्षा में मिलम जाते थे। माइग्रेशन के हिसाब से स्कूल भी चलते थे। शेर सिंह जी जब मीडिल में पढ़ते थे, उनके परिवार ने मिलम जाना छोड़ दिया गया। उस समय विद्यानन्द सरस्वती ने तिकसैन, मुनस्यारी में एक स्कूल शुरु किया था।

श्री रावत बताते हैं कि बड़े भाई खुशाल सिंह रावत इस विद्यालय में हैडमास्टर बनकर आये। हिन्दी के लिये कपकोट के शास्त्राी जी थे। लोहाघाट के घनानन्द जोशी अंग्रेजी पढ़ाया करते थे। कक्षा आठ तक तिकसैन में पढ़ाई की। पिफर यह स्कूल नमजला में शिफ्रट हो गया, बाद में कन्या विद्यालय बना। वह बताते हैं कि जिला बोर्ड के हाथ में चले जाने के बाद वह लोग पिफर से पढ़ाई के लिये कपकोट आ गये। उनके साथ दुर्गासिंह रावत थे। लाछुली वाले भवानसिंह-उदयसिंह शामा पढ़ने गये जबकि तेजम वाले ध्रम सिंह-गोकरणसिंह अल्मोड़ा आ गये। इस प्रकार जलद, लाछुली और तेजम के 6 युवा रावत अलग-अलग जगह गये। कपकोट से हाईस्कूल, अल्मोड़ा से इण्टर करने के बाद नैनीताल से पढ़ाई की।

शेरसिंह जी बताते हैं- ‘हमसे पहले गोविन्द सिंह पांगती ने गणित से बीएससी की, जो फुटबाल के भी अच्छे खिलाड़ी थे। नैनीताल के बाद लखनउ एमए करने चला गया, खुशाल सिंह भी बीए करने के लिये साथ में थे। तीन साल लखनउफ में रहते हुए पी-एचडी के लिये तैयारी की लेकिन 1959 में बीडीओ के के लिये चयन हो गया। पहली नियुक्ति जखोली;टिहरी में हुई। चार-पांच साल बाद ताड़ीखेत;रानीखे. आया। वह दौर था जब चन्द्रभानु गुप्त मुख्यमंत्राी हुआ करते थे और रानीखेत उपमण्डल में तो रामदत्त पाण्डे-देवकीनन्दन पाण्डे की तूती बोलती थी। लेकिन उस समय की राजनीति व नेता आजकल की तरह नहीं थे। श्री रावत बताते हैं कि 1969 में संघ लोक सेवा आयोग के विज्ञापन इण्डियन इकाॅनमिक सर्विस के लिये पफार्म भर दिया था। बीडीओ की नौकरी करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और उनका चयन हो गया। आईएएस प्रोवेजनल में दो साल तक कई जगह पोस्टिंग हुई और सीखने को मिला। भोपाल ;म0प्र0 में प्लानिंग कमीशन में रहा। बाद में सिविल सप्लाई एण्ड काॅमर्स में डिप्टी डायरेक्टर होकर दिल्ली आया।’

रावत जी का विवाह स्वतंत्राता सेनानी और समाजसेवी ससखेत;थल निवासी नरसिंह जंगपंागी की पुत्र कमला देवी के साथ हुआ। जीवन के उत्तराद्ध में शेरसिंह-कमला रावत खट्टी-मीठी यादों के साथ अब हल्द्वानी में रह रहे हंै।

पिघलता हिमालय 18 जुलाई 2016 के अंक से

तीन बार अपनी मौत का समाचार सुन चुके थे

स्व.आर.सी.पन्त स्मृतियाँ

डाॅ.पंकज उप्रेती
कुमाउँ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर रमेश चन्द्र पन्त जी का 18 मई 2018 को हल्द्वानी उनके आवास में निधन हो गया। इसी दिन कुविवि का नैनीताल में दीक्षान्त समारोह भी था। मूल रूप से ग्राम जजुट, गंगोलीहाट निवासी 73 वर्षीय पन्त जी सालभर से अस्वस्थ्य थे और अपने घर पर भी स्वध्याय में लगे रहते थे। हल्द्वानी शहर के चैयरमैन रहे दयाकिशन पाण्डे की सुपुत्राी से उनका विवाह हुआ था। श्रीमती पन्त का भी दो साल पूर्व निधन हो चुका है। पन्त जी के घर में उनके एक सेवक के अलावा कोई नहीं है। उनके भाई-बहन मिलने आ जाया करते थे। ईमानदार और मृदुभाषी के रूप में आरसी पन्त की पहचान रही है। इतना नरम होने के बाद भी उनकी अपनी टेड़ के कारण कुलपति के रूप में वह कई को नाराज कर गये। जर्मन भाषा को जानने वाले पन्त जी संस्कृत के भी प्रकाण्ड थे और हिन्दी में ही कामकाज को पसन्द करते थे। एकाकी जीवन बिता रहे पन्त जी ने अपनी पत्नी के निधन के बाद उनके नाम की तराई में कीमती भूमि बेचकर दरउ क्षेत्र में एक विद्यालय भी स्थापित किया था जिसकी देखरेख के लिये वह परेशान रहने लगे थे। करीब 6 माह पूर्व अटैक पड़ने के कारण एक दिन वह अपने बाथरुम में घण्टाभर बेहोश रहे, बाद में दिल्ली में उनका इलाज हुआ। तब से उन्होंने इधर उधर जाना भी बन्द कर दिया था।
पिघलता हिमालय समाचार पत्र परिवार से उनके मध्ुर सम्बन्ध् थे और इसके संस्थापक सम्पादक स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती को वह बहुत मानते थे। इनके कई आयोजनों में वह पधरे। बुजुर्गवार पन्त जी से मिलने के लिये मैं बीच-बीच में जाया करता था। करीब दो माह पूर्व मैंने दैनिक पत्र में समाचार पढ़ा- ‘पूर्व कुलपति पन्त का निधन’। दरअसल इस नामराशि के पूर्व रजिस्ट्रार पन्त जी के निधन को गलती से पूर्व कुलपति छापा गया था। मैंने पन्त जी को बताया तो वह बोले- ‘अपनी मौत का तीन बार समाचार सुन चुके हैं। पढ़ाई के दौरान किसी के निधन पर उन्हें मान लिया गया। उसके बाद देवीदत्त पन्त के निधन पर मुझे मरा जानकर देखने आ गये थे। अब तीसरी बार तुमने मौत का सामाचार सुना दिया है।’ और हँसने लगे। अब पन्त जी हमारे बीच नहीं हैं, उनकी स्मृतियाँ बनी रहेंगी।

पिघलता हिमालय 28 मई 2018 के अंक से

स्थापना के 41वें साल में

कमला उप्रेती
इस अंक के साथ ही ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के 41वें साल में पहँुच चुका है। सन् 1978 में स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया ने जिस साहस और दृढ़ता के साथ इसकी शुरुआत की वह आज भी नियमित रूप से आपके सामने है। अब तक के 40 सालों में कई उतार-चढ़ाव इसने देखे हैं लेकिन वह मिशन जिसके लिये इसे स्थापित किया गया था जारी है। ऐसे समय में जबकि संचार व समाचार के अनगिनत साधन हैं, पिघलता हिमालय जैसे छोटे समाचार पत्रा को बनाये रखना चुनौती है। फिर, स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया के मिशन पर इसे बनाये रखना और भी कठिन है लेकिन इस मिशन को चुनौतियां स्वीकार हैं। यही कारण है कि समाचार-विचार की दुनिया को रंगीन बनाकर परोसने के बजाए अपनों को जोड़ने का यह साधन है।

दुर्गा सिंह जी मात्रा 49 वर्ष आयु में इस दुनिया से विदा हो गये थे और उप्रेती जी भी 69 वर्ष आयु में हमें छोड़कर चले गये। उनके मिशन में निर्भीकता और स्वाभिमान था। वर्तमान की पत्रकारिता में मिशन के साथ चलने वाले गिने जा सकते हैं। इनसे न तो तिकड़मबाजी होती है और न ही जीहजूरी। इस मिशन पर चलते हुए कई दिक्कतें पिघतला हिमालय के सामने भी हैं। दिनोंदिन बढ़ती जा रही प्रतिस्पद्र्धा के बीच समय से इस पाती को परोसते हुए हमें लगता है स्व.उप्रेती व स्व.मर्तोलिया जी हमारे बीच हैं। उन्हीं का स्मरण करते हुए लगातार इसे आकर्षक बनाने की कोशिश की जा रही है। साधनों के आभाव के बावजूद दूरस्थ क्षेत्रों तक अपने प्रिय पाठकों के बीच पिघलता हिमालय पहँुच रहा है। इसे आॅनलाइन पढ़ने की व्यवस्था भी की गई है ताकि दूर तक समय से हमारा सन्देश पहँुचे और नई तकनीक से जुड़ी युवा पीढ़ी अपने प्रिय पत्र को आसानी से पढ़ सके। इस बार से यूट्यूब चैनल भी पिघलता हिमालय का जारी हुआ है।

सरकार चाहे जो भी रही हो, सबका ध्यान अपना मौका भुनाना रहा है। यही कारण है कि सरकार की विज्ञापन नीति में छोटे-मझले समाचार पत्रों को अवसर नहीं दिया जा रहा है। विज्ञापन का स्वाद बड़े मीडिया घरानों को लगाया जाता है ताकि नेताओं के बड़े और रंगीन पफोटो प्रिंट मीडिया में छपें और इलक्ट्रोनिक मीडिया में दिखाये जाते रहें। इसे मीडिया मैनेजमेंट कहा जाता है और झूठ को सच और सच को झूठ की पतंग बनाकर उड़ाने वाले सक्रिय रहते हैं। स्थानीय स्तर पर भी छुटभैय्यों के चुग्गे पर पत्राकारिता करने वाले तेजी दिखाने लगे हैं। इस प्रकार के वातावरण में मिशन की पत्रकारिता सिर्फ अपने पाठकों के बल पर की जा सकती है।

प्रिय पाठको! आप ‘पिघलता हिमालय’ परिवार हो, आप ही इसके प्रतिनिधि हो, आप ही इसके विज्ञापनदाता हो, आप ही इसके प्रचार-प्रसार वाले भी। तभी आज ‘पिघलता हिमालय’ अपनी स्थापना के चालीस साल पूरे कर चुका है। इसका सारा मैनेजमेंट सीमान्त से लेकर तराई-भाबर तक पफैले हमारे शुभचिन्तक हैं। उन स्थितियों में जब साप्ताहिक पत्रों का रिवाज ही लडखड़ा चुका है, पाठकों में पिघलता हिमालय का इन्तजार इसकी गहरी जड़ों को सि( कर रहा है। इसके पाठकगण एक परिवार के रूप में जुड़े हैं, उनका भावनात्मक लगाव इससे जुड़ने और अपनी अगली पीढ़ी को जोड़ने में सहायक है। आपका यही स्नेह हमारा बल है।