सीधे और सच्चे पत्रकार थे ललितमोहन कोठियाल

उमेश डोभाल ट्रस्ट के महासचिव व वरिष्ठ पत्रकार का 7 अक्टूबर 2018 को हृदयगति रुकने से निधन हो गया। मिशन की पत्रकारिता में लगे रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान रखने वाले भाई एम.मोहन कोठियाल को पीड़ा होने पर पौड़ी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें श्रीनगर के लिये रेफर कर दिया। अस्पताल, दवाईयाँ, सड़क, बिजली जैसी आम जरूरतों की मांग के लिये लड़ने वाले कोठियाल जी इतनी जल्दी हमसे विदा हो जाएंगे, किसी ने सोचा ही न था। पौड़ी की समस्याओं के साथ ही उत्तराखण्ड के हर भले आन्दोलन में उनकी किसी न किसी रूप में भागीदारी थी। चकबन्दी को लोगों का हथियार बनाने की आवाज उठाने का काम उन्होंने किया। उमेश डोभाल ट्रस्ट के महासचिव होने के साथ ही उन्होंने एक कार्यकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाई और हर किसी के सुख-दुःख में सम्मिलित हुए। उन्हें पत्रकारिता की सूझ और समझ थी तभी तो वह कुरेदने वाले सवाल उठाते थे और पहाड़ के दर्द को पहचानते थे। पिघलता हिमालय स्व.कोठियाल को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करता है कि दुःख की इस घड़ी में उनके परिवार को साहस-शक्ति प्रदान करे।

देशज: ऐसी छटपटाहट का अहसास था

डाॅ.पंकज उप्रेती
इस बार उत्तराखण्ड के हल्द्वानी महानगर में 2 से 4 अक्टूबर 2018 ‘देशज’ उत्सव का आयोजन बहुत कुछ सिखाने वाला था। इसमें ऐसी छटपटाहट देखने को मिली, जिसका पहले से अहसास था। आयोजनों को लेकर कलाकारों में थिरकने और दर्शकों में उत्साह की फड़पफड़ाट अच्छी लगती है लेकिन जब अनुशासन न मानने वाले आयोजन में अपने जिद कर दें तो ऐसा महसूस होता है जैसे उन्हें उनके जीवित होने का प्रमाण पत्र लेना हो। ऐसा ही देशज में भी हुआ।
दरअसल इस आयोजन का क्षेत्रीय समन्वयक मुझे बनाया गया था और हिमालय संगीत शोध् समिति के युवा कार्यकर्ताओं की टीम पूरी व्यवस्था को सम्भाले हुए थी। संगीत नाटक अकादमी की अधिकारी-कर्मचारी पैनी नज़र रखते हुए चारों ओर जुटे थे। ऐसे में आयोजन का भव्य होना तय हो चुका था। हुआ भी ऐसा कि तीन दिन तक कार्यक्रम स्थल पर सैकड़ों की तायदात में भीड़ उमड़ पड़ी। लद्दाख से लेकर कर्नाटक तक का लोक संगीत श्रोताओं के कानों में रस घोल रहा था और बहुत से सजीव प्रसारण देख रह थे। देश की 18 टीमों ने जितनी आकर्षक प्रस्तुतियां दीं उससे भी ज्यादा संयम दर्शकों ने बनाया। इसके बावजूद उन तत्वों के लिये क्या कहा जाए जो अनुशासन तोड़ने पर आमदा थे। वह तो ईश्वर की कृपा ही थी कि सब कुछ कुशलता से हुआ। पूरे आयोजन को यथा समय शुरु करने से लेकर उसकी मर्यादा बनाये रखने के लिये हिमालय संगीत शोध् समिति के युवा जुटे रहे।
आयोजन के दौरान मैं स्वयं एक क्षण के लिये भी कुर्सी पर नहीं बैठा और चक्कर लगाते हुए व्यवस्थाओं को देख रहा था। मैंने देखा ढलती उम्र में भी कुछ सिर्फ इसलिये अनुशासन तोड़ने वाले सक्रिय हो उठे क्योंकि मंच से उनका नाम नहीं लिया जा रहा था। कलाकार होने का दम्भ भरने वाले कतिपय युवा भी उच्छृंखलता करते रहे। समारोह स्थल की प्रथम कुर्सी घेरने से लेकर मंच संचालक तक बार-बार चक्कर लगाने की होड़ इनमें थी परन्तु मंच का अनुशासन बनाये रखने के लिये इन्हें तीन दिनों तक रोके रखा गया। इनकी छटपटाहट बढ़ने लगी और पिछले दरवाजे से घुसकर अराजकता करने वाले फिर भी सक्रिय थे लेकिन सजीव प्रसारण के भय के कारण मंच तक नहीं फटक सके। हे प्रभु! सबको सद्बुद्धि दे। किसी भी आयोजन की मर्यादा को बनाये रखना बहुत जरूरी है

भारत की लोक, जनजातीय एवं पारम्परिक अभिव्यक्तियों का उत्सव देशज

चन्द्रशेखर जोशी
संगीत नाटक अकादमी भारत सरकार द्वारा इस बार 2 से 4 अक्टूबर 2018 हल्द्वानी महानगर में ‘‘देशज’’ भारत की लोक, जनजातीय एवं पारम्परिक अभिव्यक्तियों का उत्सव मनाया गया। गांधी जी की 150वीं जयन्ती पर तीन दिन चले इस उत्सव ने कलाकारों और दर्शकों को उत्साहित किया। महोत्सवों बाढ़ में यह अलग प्रकार का आयोजन था। उत्तराखण्ड में महोत्सवों के नाम पर बाढ़ सी आ चुकी है लेकिन अभिव्यक्तियों का ऐसा संगम जिसमें सबकुछ अनुशासन के साथ हो करना कठिन है। बावजूद ऐसा उत्सव इस बार हुआ। क्षेत्राीय समन्वयक  और हिमालय संगीत शोध् समिति की पूरी टीम दिन-रात इसमें जुटी रही जबकि नाटक अकादमी के अधिकारियों, कर्मचारियों की टीम निरीक्षण के साथ हर पल चैकस थी। आयोजन से पूर्व पत्रकार वार्ता में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग उत्तराखण्ड के उपनिदेशक डाॅ.योगेश मिश्रा ने लोक कलाओं और संयोजन कर रहे डाॅ.पंकज उप्रेती ने जनजातीय कला पर विचार रखे। अकादमी की ओर से सलाहकार अमित सक्सेना ने ‘देशज’ आयोजन पर विस्तार से जानकारी दी। हिमालय संगीत शोध् समिति के वरिष्ठ सदस्यों में डाॅ.नवीन तिवारी युवाओं की टीम में धीरज उप्रेती, संगीत बिष्ट, योगेश उपाध्याय, तनुज उपाध्याय, देवेन्द्र पाण्डे, पूजा लटवाल, मनमोहन वर्मा, आशुतोष सहयोगी रहे।
देश के विभिन्न प्रान्तों की पारम्परिक संस्कृति और कला अपना वजूद खोती जा रही है। टीवी और सोशल मीडिया पर फैल रही संस्कृति ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। रंगमंच, नृत्य वाद्य, गीत-संगीत की अनमोल ध्रोहर को बचाने और विकसत करने के लिये यह अनूठा प्रयास था, जिसके तहत उत्तराखण्ड में पहली बार देशभर की विविध् लो संस्कृतियों का संगम हुआ।
उल्लेखनीय है कि संगीत नाटक अकादमी पिछले 66 सालों से देश के विभिन्न इलाकों में लोक संस्कृति का प्रदर्शन कर रही है। प्रदर्शन कला की यह शीर्षस्थ संस्था विविध् सांस्कृतिक विरासतों, लोक कलाओं, अमूर्त परम्पराओं को जीवित करने व उन्हें आगे बढ़ाने के लिए संगीत उत्सव कराती है। पाँच साल पहले अकादमी द्वारा देश के लोक एवं जन जातीय संगीत, नृत्य और नाट्य के विविध् रूपों से जुड़े कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए देशज महोत्सव शुरू किया। संस्था अब तक दिल्ली, पटना, हैदराबाद, जमशेदपुर दरभंगा, आजमगढ़, इम्पफाल, कानपुर, कुरुक्षेत्रा समेत दर्जनों स्थानों पर देशज महोत्सव आयोजित कर चुकी है। इसी क्रम में हल्द्वानी में यह विराट आयोजन किया गया।
इस तीन दिवसीय आयोजन का उद्घाटन लोकगाथाओं पर जबर्दस्त कार्य कर चुके डाॅ.प्रयाग जोशी द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया। आकदमी के सलाहकार अमित सक्सेना, कंसलटेंश मनीष ममगई, नरेंद्र पांथरी, हिमालय संगीत के अध्यक्ष धीरज उप्रेती मंच पर थे। कार्यक्रम में पहले दिन उत्तराखण्ड, राजस्थान, पंजाब, मणिपुर, हरियाणा के कलाकारों ने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों की प्रस्तुति देख दर्शक झूम उठे। इस दौरान टिहरी गढ़वाल के नत्थीलाल नौटियाल ने घस्यारी नृत्य प्रस्तुत किया। जयपुर की मीना सपेरा ने कालबेलिया नृत्य, पटियाला के रवि कुमार की टीम ने भांगड़ा नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी। मणिपुर के प्रदीप सिंह के दल ने थाॅग-टा और ढोल चोलम की आकर्षक प्रस्तुति दी। रोहतक के सलीम कुमार की टीम ने फाग नृत्य प्रस्तुत किया। उत्तराखंड नरेंद्र पांथरी के दल ने झोड़े की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम के द्वितीय दिवस पर कुशल भण्डारी के नेतृत्व में कलाकारों ने आयोजन सलूड़-डुंग्रा के परम्परागत पूजा-अनुष्ठान का अद्भुत प्रदर्शन किया। भूम्याल देवता की यह पूजा गढ़वाल क्षेत्र में प्रचलित है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के कलाकारों ने पफरवाई नृत्य पेश किया। आजमगढ के राजकुमार शाह के दल ने बोलों के साथ शानदार प्रस्तुति दी। असम के बीहू नृत्य ने खूब वाहवाही बटोरी। गुवाहाटी से निलिकांत दत्ता के साथ आए कलाकारों ने पैंपा, बांसुरी, ताल, ढोल के साथ पर्वते-पर्वते बोगाबो पारू मोय, लौता नु बोगाबोलय ताव गीत पर जनजातीय संस्कृति की छटा बिखेरी। तेलंगाना के राम चंद्रुडडू के दल ने की प्रस्तुति दी। हिमाचल के जोगिंदर हबबी के दल ने सिरमौरी नाटक प्रस्तुत किया। तीसरे दिन उत्तराखंड की छपेली सामूहिक नृत्य से हुई। अल्मोड़ा से आए प्रकाश बिष्ट के दल ने मसहूर छपेली नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद लेह लद्दाख के लुंडब दौर्जे की टीम ने जम्मू कश्मीर का जनजातीय बोनोन लोक गीत और नृत्य की प्रस्तुति दी। उत्तराखंड के देबू पांगती के दल ने सीमांत का दुस्का नृत्य प्रस्तुत किया। त्रिपुरा का धमाइल और बीजू नृत्य संतोष सूत्रधर के दल ने प्रस्तुत किया। कर्नाटक के कलाकारों ने महालिंगप्पा के नेतृत्व में करडी मजलू जनजातीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया। अंत में उत्तराखंड के शिवदत्त पन्त की टीम ने नन्दा राजजात की आकर्षक प्रस्तुत दी। इस मौके पर सुरेन्द्र महरा, आरती जोशी, बाबूलाल गुप्ता, उमेश पांडे, प्रो. अतुल जोशी, ओ.पी.पाण्डे, हरीश पन्त, जगमोहन रौतेला, भाष्कर उप्रेती, डाॅ.दीपा गोवाड़ी, डाॅ.जयश्री भण्डारी सहित सैकड़ों की तादात में दर्शक मौजूद थे। इस तीन दिनी आयोजन से बहुत कुछ सीखने को मिला है हल्द्वानी शहर व इस प्रदेश को।

 

देशज: सबसे कमजोर मंचीय प्रदर्शन उत्तराखण्ड का रहा

पि.हि.प्रतिनिधि
हल्द्वानी में हुए ‘देशज’ उत्सव में देश भर के लोक कलाकारों ने अपने फन का जादू बिखेरा और लोक के शास्त्र को इस प्रकार उकेरा कि शास्त्रीय संगीत के जानकार  दातों तले अंगुली दबा रहे थे और उनकी लय पर झूम रहे थे। कर्नाटक के लोक कलाकारों ने ‘रघुपति राघव राजा राम’ की की कर्णप्रिय धुन पर घनवाद्य झांझ, सुषिर बाद्य शहनाई, चर्म वाद्य ढोल नगाड़ों में चमत्कृत करने वाली लयकारियों की करामात दिखाई। तिहाई, पल्टे, रेले, चक्करदार……क्या कुछ नहीं था उसमें। तिहाईयों के साथ सम पर आते ही दर्शक वाह कर रहे थे। लद्दाख के नर्तकों ने परम्परागत वेशभूषा में अपने त्यौहार का जो नृत्य प्रस्तुत किया वह तो अद्भुत था। आसाम का बिहू नृत्यगीत उसकी लचक और चलक को समझाने वाला था। मणिपुर मिजोरम के कलाकारों ने नृत्यकला के साथ उनके रहन-सहन का समझाया। उन्होंने परम्परा का निर्वहन करते हुए समझा दिया कि प्रकृति के बीच वह कितने सजग हैं और आत्मरक्षा के गुर नृत्यगीत के साथ जानते हैं। बात करें उत्तराखण्ड की तो यहाँ के कलाकारों ने बेहद निराश किया। गढ़वाल से आये दल को लेकर बहुत उत्साह था लेकिन दल नायक ने दर्शकों को समझाने के लिये जो लम्बा भाषण दिया वह दर्शक सहन नहीं कर पाये। जोहार की टीम अच्छा कर रही थी लेकिन निर्धरित संख्या से अध्कि कलाकारों की भीड़ मंच पर थी। अल्मोड़ा से आये दल ने झपेली नृत्य का वही स्वरूप दिखाया जो आजकल पंजीकृत दल सामान्यता करने लगे हैं। दिल्ली से आये उत्तराखण्डी दल दल ने बहुत ही निराश किया। शिवदत्त पन्त की टीम नन्दा राजजात प्रस्तुति में कुछ सफल रही।

रामसिंह जागरुक जनों की धुरी थे, एनटीडी अल्मोड़ा को बनाया केन्द्र

लक्ष्मण सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
जोहार के इतिहास-भूगोली की समग्र जानकारी के लिये याद किये जाने वाले रामसिंह पांगती के बारे में पिघलता हिमालय डाॅ.आर.एस.टोलिया का कालम नियमित रूप से प्रकाशित हो रहा है। इस अंक में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला दिया जा रहा है। परिवार के वरिष्ठ सदस्य लक्ष्मण सिंह पांगती से बातचीत के आधार पर यह जानकारियां हैं। 80 वर्षीय लक्ष्मण सिंह पांगती भी हमेशा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने मिडिल मुनस्यारी से करने के बाद हाईस्कूल अल्मोड़ा से किया। आईबी में नौकरी करते हुए नैनीताल, इलाहाबाद, लेह-लद्दाख, लखनउ रहे। असि0डायरेक्टर आईबी से सेवानिवृत्त होकर अब हल्द्वानी में रह रहे हैं। अपनी सरकारी सेवा के दौरान भी सामाजिक मेल-मिलाप में रहने वाले लक्ष्मण सिंह जी ने लखनउफ में काफी समय व्यतीत किया और पहाड़ की संस्कृति से युवाओं को जोड़ने के लिये लेखन भी करते रहे। पिघलता हिमालय में भी आपके द्वारा लेख व उपयोगी सामग्रियां उपलब्ध् करवाई गई।
पिता रामसिंह पांगती व माता हिरमा देवी के कनिष्ठ पुत्रा लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि उनके पिता ने परिवार से ज्यादा समय समाज के लिये दिया। रामसिंह जी जागरुक जनों की धुरी थे, उन्होंने सीमान्त क्षेत्रा के लोगों को मदद के लिये एनटीडी अल्मोड़ा में केन्द्र बनाया। 8 जून 1884 को राडागाडी तहसील मुनस्यारी में जन्मे रामसिंह मिडिल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और 17 अगस्त 1906 में सर्वे आपफ इण्डिया देहरादून में सर्वेयर के पद पर नियुक्त हुए। कुछ वर्षों बाद नौकरी भी छोड़ दी। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आन्दोलन चलाने के साथ ही कई पुस्तकें उन्होंने लिखी। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में- जोहार का इतिहास व वंशावली ;सन् 1936 ई.द्ध, आत्म कहानी, स्त्री शिक्षा ;1910द्ध, जोहारीय उपकारक;भाग 1, भाग 2द्ध हैं। हस्तलिखित पुस्तकों में- होली का अखबार ;सन् 1935, महिला सुधर ;जोहारी बोली में 1936द्ध, देशोपकारक ;जिसमें शौका सेवक मण्डल, जोहार पंचायत, सुधरकों को आदेश, अछूतोद्धाार और मनोभिलाषा शामिल हैद्ध, भूत शंका निवारण है। इन दिनों उनकी हस्तलिखित पुस्तकों के आधर पर जोहारी बोली में ‘छितकू की कथा एवं ऐतिहासिक कथाएं’ पुस्तक तैयार हो रही है। पिता जी ने अल्मोड़ा के लाला बाजार में दुकान भी ले ली थी लेकिन वह नहीं कर सके। रामसिंह जी ने जोहार उपकारिणी महासभा, जोहार सोसाइटी ;सम्वत 1969, नौजवान पांगती पुस्तकालय, जोहार कांग्रेस मण्डल सामाजिक तथा राजनैतिक संस्थाओं के गठन में सक्रिय सहयोग दिया। महिला उत्थान के लिए 1900 से ही प्रयास करते रहे। बाल विवाह, कन्या विक्रय, अशिक्षा व महिलाओं में पर्दे का प्रचलन रोकने के लिए प्रचार तथा प्रयास किया। 1910 में महिलाओं में जागृति के लिए स्त्रीशिक्षा नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। 12 जुलाई 1951 को जोहार भवन, नारायण तेवाड़ी देवाल ;एनटीडी अल्मोड़ा में उनका निध्न हुआ था।
इस पांगती परिवार की बात करें तो सोबन सिंह, रामसिंह और नरसिंह तीन भाई थे। दरकोट में रहते हुए इन्होंने मुनस्यारी में शान्तिकुन्ज में आसियाना बनाया। शान्तिभवन नाम से बने आवास में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और वंशावली तैयारी के लिये दूर-दूर से लोग आते थे। जागरुक जनों की बैठकें और सामाजिक चेतना के लिये बनने वाली रणनीति के बीच परिवार के छोटे बच्चे लोकरंग में रंगते हुए काफी जागरुक हो चुके थे। रामसिंह के परिवार में पुत्र-पुत्री- मोहनसिंह, उत्तमसिंह, गोविन्द सिंह, तुलसी देवी, लक्ष्मण सिंह हुए। यही वंशावली आगे बढ़ते हुए मोहन सिंह परिजनों में कमला, राजकुमारी पांगती, हरीश, भगवान, राजेन्द्र सिंह। उत्तम सिंह जी के परिजनों में मुन्नी देवी, तारा जंगपांगी, पूरन सिंह। तुलसी रावत के पति श्रीराम सिंह रावत जी हैं। लक्ष्मण सिंह के पुत्र- जयन्त व तनुज पांगती।

पिघलता हिमालय 29 अगस्त 2016 अंक से

उनकी ‘प्रेरणा’, उनका सर्जन, हमेशा हमारा और हमारे समाज का पथ आलोकित करता रहेगा…….

स्व.आनन्द बल्लश्रभ उप्रेती

प्रो0देवसिंह पोखरिया
‘प्रेरणा’ स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती ;संस्थापक/सम्पादक पिघलता हिमालयद्ध की कविताओं का संग्रह है। ये उनकी 1965 से 1995 के बीच लिखी गई कविताएं हैं। विश्व प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डाॅ.हेम चन्द्र जोशी के सानिध्य में रहे उप्रेती जी अक्सर नैनीताल में उनके साथ का उल्लेख करते थे। डाॅ.जोशी को गुरु के रूप में मानने वाले उप्रेती जी उनसे पर्याप्त प्रभावित हुए थे, वे उनके प्रेरणा स्रोत थे। सुमित्रानन्दन पन्त जैसे महान कवि का जीवनवृत्त व कृतित्व उनकी साहित्यक अभिरुचि को गहरा करता रहा है। युवावस्था में अपने मित्रा अच्छेलाल ‘पथिक’ के साथ रुद्रपुर में ‘प्रेरणा’ नामक कविता संग्रह प्रकाशित करने वाले उप्रेती जी ने इससे पूर्व अल्मोड़ा में अपने शिक्षार्जन के दौरान काव्य रचनाकारों  की संगत की। अल्मोड़ा से आगरा और फिर लौटकर तराई के दानपुर-रुद्रपुर तक के सफर में काका हाथरसी जैसे कवियों का साथ उन्हें लगातार लिखने को उकसाता रहा। हल्द्वानी में भी कविता-पाठ का दौर चलता रहा और उन्होंने इस बीच कई कविताओं की रचना की।
स्व. आनन्द बल्लभ उ्रप्रेती जी के सुपुत्र डाॅ.पंकज उप्रेती ने उक्त कालखण्ड में लिखी गई उनकी कविताओं को ‘प्रेरणा’ के दो खण्डों में विन्यस्त कर इस संग्रह को रूपाकार दिया है। खण्ड-एक में 25 तथा खण्ड-दो में 23 कविताएं संगृहीत हैं। आनन्द उप्रेती बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार थे। कहानी, उपन्यास,व्यंग्य, कविता और पत्रकारिता कोई भी विध उनकी कलम से अछूती नहीं रही। एक पत्रकार की पैनी दृष्टि सम्पूर्ण कटाक्ष के साथ हमेशा हर विध में उनके साथ चलती उसी में अंतरनुस्यूत मिलती है। उप्रेती साहित्य को ईमानदारी से जीते हुए एक भुक्तभोगी के यथार्थ में लपेट कर उसे प्रस्तुत करते हैं।
इस संग्रह के खण्ड-एक की कविताओं में प्रकृतिपरकता, भावुकता, स्वाभाविकता, जिज्ञासा, सुकोमलता, मनुष्य मात्रा को उद्बुद्ध करने के भाव व्यक्त हुए हैं। दुख ही सुख को मापने का पैमाना है। कहीं जयशंकर प्रसाद जैसी भावाकुलता है, तो कहीं ‘मैं बजरी की बेटी हँू’ कविता निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ कविता की याद ताजा कर देती है, इसमें मानवीय सम्वेदना की चरम परिणति परिलक्षित होती है-
‘‘माँ बजरी ने बजरी मैं पैदा कर बजरी बना दिया,
बजरी में ही खेल-खेल कर बजरी कूटा करती हँू।
‘जंगल और वीरानों में’ कविता में अध्किारियों से लेकर संसद तक की देश की बदहाल स्थिति का चित्राण हुआ है। कवि दुखी है कि समाज के असली लुटेरे अब जंगलों में नहीं समाज के बीच ही रह कर सभ्यता का मुखौटा पहन कर उसे लूट रहे हैं।
‘सब कुछ लिख कर भेजना भाई’ जैसी कविता ग्रामीण जीवन के अभावों और समस्याओं को सिद्दत से चित्रित करती है। बेशर्मों पर कवि ने निर्मम एवं निष्ठुर व्यंग्य किया है-
‘‘मेरे दरवाजे के ठीक सामने
नंग धड़ंग प्रजातंत्र लेट गया है
उसकी नाक पर उग आया दरख्त
अपनी बाहें फैलाता…..’’
कवि कहीं सरस्वती के वरद् पुत्रा सुमित्रानन्द पन्त को नमन करता है और कहीं नये काव्य और छन्द ज्ञान शून्य अकवियों पर व्यंग्य करता कहता है-
‘‘जब से नागपफनी घर आई, तुलसी का विरवपा जंगल में
तब से मेरी चुभन नई है, उखड़ी सी हर सांस नई है
नागफनी पर गीत लिख रहे, छन्द लिख रहे नये अकवि हैं
तुलसी का सूना बृन्दावन, नई उदासी नया दर्द है….।’’
हताशा, निराशा, अभाव और संघर्षों के बीच भी उप्रेती दुधर््र्ष जिजीविषा के साथ कुछ नया करने की चाह रखते हैं। उनके इस दर्शन को ‘मेरा हर दिन नया वर्ष है’ कविता रूपायित करती है।
मुक्तिबोध् की फंतासी और नागार्जुन का लोक जीवन का चित्राण कवि की अंधेरे ने निगल लिया’ कविता में एकत्र एकसाथ अन्तर्भूत-सा लगता है। और यह भी कि दलित-दुर्बल-दीन-हीन के साथ सूरज भी छल करता है-
‘‘लाख मशालें लिये ढूंढता रहा आसमान
रमजनियां बरसतिया की झोपड़ी में
फुटपाथ पर लेटे
अनाम दुदमुंहे छोरे के सूखे होंठो में
किसी बहसी दरिन्दे द्वारा
उघेड़ी लिजलिजी टागों में
उसे सूरज नहीं मिला
मशालें बुझा कर
थका-हारा सोने को ही था आसमान
ठगिनी के अड्डे से सूरज बाहर निकल आया….’’
पर सूरज के उगने की बलवती आशा कवि को कमजोर नहीं पड़ने देती। ‘वातायन के बंद न कर तू द्वार बावरी’ कविता गीतात्मकता एवं ग्राम्य चित्रण की दृष्टि से नागार्जुन की कविताओं की टक्कर की है। ‘बिदका हुआ सांड’ में कवि ने सांड को निद्र्वंद्व अराजक गुण्डे के और तितली को आम आदमी के नव्य प्रतीक के रूप में चित्रित किया है। कुछ कविताएं स्वार्थलिप्सु, अपना घर भरने वाले लोभी डाॅक्टरों पर लिखी गई हैं। कुछ समर्थ लोग ‘दिशाहीन सूरज’ को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं। कुछ कविताएं सम्वाद करती-सी लगती हैं। इनमें ‘कब्र का हाल’, ‘आसमान कहाँ है?’ आदि उल्लेखनीय हैं। सामयिक परिवेश के जीवंत चित्राण की दृष्टि से ‘बोलना छोड़ दिया है’ कविता छोटी होते हुए भी प्रभावशाली है। बसंत में मिनिस्टर के दौरे के कारण कोयल तक बोलना छोड़ देती है। असहिष्णुता के माहौल में दहशतजदा लोग व्यर्थ की अफवाहों से खौपफ के मंजर में जिन्दगी बसर करते हैं, पर कवि हताश नहीं होता। आक्रोश है, किन्तु आशा भी कम बलवली नहीं, कवि को हँसती धूप का जमीन में उतर आने का इंतजार है।
कवि नए प्रतीकों के द्वारा वन बिल्लों के शाकाहारी होने और तुलसी के वृंदावन में नागफनी के पलने की बात स्वीकार करता है। वह पत्रकार के व्यंग्य-कौशल को कविता में प्रविष्ट करा कर उसे और धरदार बना देता है। प्रजातंत्रा में वैयक्तिक स्वातंत्रय और अध्किारों के बदले सौदेबाजी को लेकर वह तंज है, आज शेरों के बाड़े में ‘कुत्तों का पहरा’ है। भगतसिंह को याद करते हुए वह वर्तमान प्रजातंत्र पर सवाल खड़े करता हुआ कहता है कि आज भगतसिंह होते, तो वे डाकू और आतंकी घोषित होते और जेल में होते। आज लोग जिन्दा लाश हो गए हैं। उनमें दीन-ईमान शेष नहीं रह गया है, न प्रतिरोध् की कोई ताकत रह गई है। ‘भ्हगत सिघा’ कविता में आज के नेताओं पर व्यंग्य किया गया है। खण्ड-एक की कविताओं में श्रृंगार तिरोहित-सा है।
खण्ड-दो की पहली कविता ‘प्रेरणा’ है। इस कविता के आधर पर ही प्रस्तुत संग्रह का नामकरण किया गया है। गीत-योजना एवं विरहाकुल भावाभिव्यंजना की दृष्टि से यह कविता महादेवी वर्मा की कविताओं का स्मरण दिलाती है। प्रिय की पे्ररणा दग्ध्-अंगारों में चल कर कवि के कर्मपथ की राह प्रशस्त करती है। इस खण्ड की कविताओं में भावप्रवणता का अतिरेक दिखता है। प्रकृति में कवि मिलन के दृश्य देखता है, उसके कल्पना-प्रसून प्रकृति के उपवन में ही खिलते हैं, वह ‘प्रेम का भूखा’ है। ‘हलचल’ आदि कई कविताओं में छायावादी भावाकुलता दिखती है, साथ जीवन-सत्यों का उद्घाटन भी होता है। मांसलता और भोग के प्रति सावधनी भी बरती गई है। ‘कौन यह बाला’ एक लम्बी प्रेमपरक प्रबन्धात्मक कविता है। इसमें इंदु-बाला का रूपक बांधते हुए कवि ने सूर्य और इंदु के प्रेम को व्यंजित किया है, चाँदनी के पट से नभ रूपी सेज पर वह प्रिय सूर्य को निहारा करती है। वसुध, उषा, संध्या, रात्रि आदि का मानवीकरण कर कवि द्वारा इन सबका मनोहारी वर्णन किया गया है। कवितांत में नित्य मिलन की आशा में दो प्रेमी हृदय नित्य प्रतीक्षा में रहते हैं। क्या इन प्रेमियों का कभी मिलन होगा? क्या सूर्य का आत्म-समर्पण सार्थक होगा? इसका उत्तर पूरी कविता को पढ़कर ही मिलता है। कवि का विश्वास है कि जीवन में प्यार ही सब कुछ है, संसार की सम्पूर्ण शान्ति प्यार में ही निहित है। यह प्यार केवल प्रिय-प्रिया का प्यार नहीं अपितु प्यार के वृहत्तर अर्थ को व्यंजित करता है। विछोह, प्रियतम से मिलन की आकांक्षा, नयनों का व्यापार- उन्मीलन- निमीलन सुखद प्रेम की मध्ुर स्मृति की व्यक्तिनिष्ठता समष्टिगत प्रेम में पर्यवसित होकर उदात्त रूप ग्रहण कर लेती है। तब कवि ओज और वीरता के भावों से ओतप्रोत होकर ‘होइए तैयार’ कहता राष्ट्र प्रेम के गीत गा उठता है-
देखंे कौन हमारे सन्मुख
अब पल भर भी टिकता है।
हम सपूत, इस पावन-भू पर-
बलिदानी बेड़ा उठता है।
इस हरित-धरा के शुभ्र-क्रीट पर
आघात वक्ष पर झेले हैं।
बलिदानों के खिलवाड़ हुए नित
तन मिट्टी से मिले हुए हैं।
मनुष्य के विकास की कहानी केवल भौतिकजन्य ही नहीं, सचेतन भी है। अपने समाज के चैतन्य का जागरूक प्रहरी साहित्यवेत्ता ही होता है। वह मनुष्य मात्र को जागरण संदेश देता है, साथ ही मनुष्य की अन्तर्दृष्टि जगाने का आह्वान करता है। उप्रेती की ‘खोल रे कपाट खोल’ कविता इसी सत्य को समुद्घाटित करती है। कवि प्रकृति के आलम्बन चित्राण को माध्यम बना कहता है-
‘‘खोल रे कपाट खोल
रे मनुज कपाट खोल,
लाल हो उठे कपोल-
भोर के विभोर छोर।
तम दिया झकोर घोर
नागरी उषा विभोर।’’
क्षणभंगुरता यदि क्षणिक और सुगंध् प्रफुल्लता प्रदान करे तो वह आनन्द कई जन्मों से भी श्रेष्ठ है। कवि की खण्ड-दो की कविताएं गम्भीरता, उदादत्ता, संप्रेषणीयता एवं भाव-सौंदर्य की दृष्टि से अधिक अर्थपूर्ण हैं। ‘तम हृदय कगार पर’ जलद-नयन उमड़-घुमड़ कर विद्युत दीप बुझा देते हैं, पर ‘बचपन की याद’ अल्हड़ता की सुमधुर स्मृतियों का स्मरण करा जाती हैं। ‘कलियों की चाह’ के बहाने किशोर और युवा हृदय खिल उठता है, मन-भ्रमर पिंग पराग के लिए पुष्प-पुष्प पर जाकर डोलने लगता है। ‘जैसे सैंध् लगाने चल बैठा हँू’ थोड़ी लम्बी कविता है। इसमें सूर्य का मानवीकरण और आलम्बन चित्राण हुआ है। निशि सूर्य से उषा सुन्दरी की माँग भरवाती है। शशि, उषा पात्रा के रूप में कविता चित्रित है। कविता में सम्वाद, अलग-अलग स्थान, स्थितियां और बिम्ब चलचित्र की भाँति देखते ही बनते हैं।
वस्तुतः कविता मानव के सुख-दुखात्मक जीवन की जीवित अनुभूति का मूर्त रूप होती है, सम्वेदन ही व्यक्ति के अंतःकरण से सामंजस्य स्थापित कर उसे हृदयग्राही बनाते हैं। ‘एक भारतीय सैनिक की आत्मा’ कविता इसी प्रकार के संवेदनों से संवेदित है। यह राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति से परिपूर्ण एक प्रभावशाली कविता है। चीनी चैकी पर तैनात सैनिक अपनी परिवेशगत स्थिति का चित्रण करता अपनी वृद्ध माँ को एक भावपूर्ण पत्रा लिखता है। यह कविता सैन्य-जीवन की एक बलिदान गाथा है। एक सैनिक किन विषम परिस्थितियों में सीमा पर अटल प्रहरी बन कर देश की रक्षा करता है, इसका चित्रण करते कवि लिखता है-
‘‘पर्वत की चोटी पर
छोटा सा टैण्ट है
बहता समीर झकझोर कर-
जाड़ों का,
हिलता है टैण्ट तो,
हिल जाता दिल भी
काँपते हैं हाथ
काँप जाती लेखनी भी।
वह वृद्ध माँ, तरुणी पत्नी को अपना अन्तिम बलिदानी ओजपूर्ण सन्देश इस प्रकार भेजता है-
‘‘होगा कलंकित
कैसे तुम्हारा दूध्,
जब तक तुम्हारा पूत
जीता जगत में।
यह एक उदात्त प्रबन्धत्मक लम्बी कविता है, जिसे भाषा, भाव और वर्णित लय की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद की ‘शेर सिंह का शस्त्र समर्पण’ कविता के समकक्ष रखा जा सकता है।
‘कविते तेरा साथ न होता’ इस खण्ड की एक अन्य महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें काव्य की व्यापकता और उसका महत्व प्रतिपादित करते हुए कवि कहता है- फूलों में मध्ु व सुवास, शशि में प्रकाश, वन में मध्ुट्टतु, कलियों में विकास, सरिता में लहर, सागर में उछाह, निर्झर में नीर, यौवन में सौन्दर्य, वनस्पतियों व फूलों में रंग, पपीहे की ‘पिउ’, कोयल की मल्हार सब कविता के कारण ही- उसके सानिध्य में ही सम्भव हुई है। कविता न होती, तो विहँसती भोर, सरसों का स्पंदन, सम्पूर्ण जगत का व्यापार और मनुष्य में मनुष्यता कुछ भी न होती। इस कविता में जीवन की समग्रता में कविता का मूल्यांकन हुआ है।
‘किसान बाला’ सुमित्रानन्दन पन्त की ग्राम्य बाला जैसी सुन्दर, सरल हृदय युवती का चित्राण है। यह एक लम्बी प्रबन्धत्मक कविता है। अभावग्रस्त होने पर भी कवि ने जीवन को सबसे मध्ुमय, सबसे सुखमय माना है। कवि ‘किसान बाला’ का चित्राण इन शब्दों में करता है- ‘‘गेहँू की बाली बोल उठी-
‘तू सजल सरोवर में विकसे,
मकरन्द, कुमुदनी की सारी,
तू बता कौन है इस जग में,
तुम सी पुनीत सुन्दर नारी?
फूलों की शैय्या पर सोना,
क्या इस को ही कहते जीवन?’’
कली खिल कर जैसे फूल बनती है, वैसे ही उस युवती का स्वप्न तब साकार होता है, जब वह एक सैनिक की पत्नी बनती है। उसके समस्त अभाव भावों और सारे दुख, सुखों में पर्यवसित हो जाते हैं। ‘नयनों का व्यापार यहाँ’ कविता में कवि ने जहाँ एक ओर छलना एवं प्रवंचना को चित्रित किया है, वहीं यह भी प्रतिपादित किया है कि समस्त भोगलिप्साएं इहलोक तक ही सीमित रह जाती हैं। ‘ताजमहल’ कविता में प्रगतिवादी जीवन मूल्यों का चित्राण करते हुए कवि साहिर लुधियानवी की तर्ज पर कहता है कि यह पे्रम का प्रतीक नहीं शोषितों के खून पसीने के गारे और बेगारी से बना भवन है, जिसमें सैकड़ों गरीबों की आह दबी है। शाहजहाँ के इस कथन में कविता अपनी चरम परिणति को प्राप्त करती है-
‘‘ताज को बना करके,
मैंने जो पाप किया,
मुझ सा अधम-नीच
जग में न कोई है,
मेरी मुमताज आज
ताज में ही सोई है,
दिल में यदि होती तो
ताज क्यों बनाता मैं?’’
कविता में शाहजहाँ और मुमताज के सम्वाद उसे गत्यात्मक और नाटकीय बना देते हैं। ‘हे पूज्यनीय’ कविता विश्वप्रसिद्ध भाषाविद् डाॅ.हेमचन्द्र जोशी को समर्पित है। व्यक्तिनिष्ठ होने पर भी इस कविता में डाॅ.जोशी का स्मरण करते हुए कवि ने भाषाविद् और आलोचक का क्या दायित्व है, इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि सच्चा समीक्षक ही लूले-लँगड़े साहित्यकारों को सहारा देकर उन्हें चलना सिखाता है। आलोचना की मध्ुरिम छाया में ही साहित्यकार भाषा की औषधीय घुट्टी पीकर बड़े होते हैं।
कविता न दार्शनिकों के दर्शन का विषय है,न अर्थशास्त्रिायों का यथार्थ। सत्य के समुद्घाटन, सौंदर्य के प्रस्थापन के साथ ही वह शितत्व का मार्ग प्रशस्त करती है, ‘आ अब उजली राह बना दे’ कविता मेें इसीलिए कवि प्रकाश को पुकारता है, जिससे मानवता की राह उज्जल हो सके।
‘प्रेरणा’ संग्रह के काव्य-शिल्प पर कुछ कहना प्रासंगिक होगा। इस संग्रह की कुछ कविताएं गीतात्मक हैं और कुछ मुक्त एवं गद्यच्छंद में निब( हैं। सरसी, ताटंक, वीर, पदपादाकुलक, मनोरमा आदि पारम्परिक छन्दों और उनकी लयों में कविताएं विन्यस्त हैं। गद्यच्छंदों में पद-मैत्राी और अर्थलय निहित है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि सादृश्यमूलक अलंकार कविताओं में प्रकृतितः समाविष्ट हो गए हैं। भाषा तत्समबहुला है, पर जन-प्रचलित अरबी-फारसी के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। लाक्षणिकता भी पर्याप्त है। अवसरानुकूल मुहावरों और कहावतों का सटीक प्रयोग हुआ है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उप्रेती जी ने जितनी ईमानदारी से अन्य विधाओं में सर्जना की है, उतनी ही ईमानदारी कविता रचना में भी दिखाई है। यश और अहंमन्यता से परे उनका समग्र व्यक्तित्व ही इन कविताओं में प्रतिफलित होता लगता है। वे एकाएक इतनी जल्दी और खड़े-खड़े हमारे बीच से चले गए, पर उनकी ‘प्रेरणा’, उनका सर्जन, हमेशा हमारा और हमारे समाज का पथ आलोकित करता रहेगा। उनकी रचनाओं के बहाने इन शब्दों में श्रद्धा-सुमन व्यक्त करते हुए मैं इस अवसर पर उन्हें नमन करता हँू। डाॅ.पंकज उप्रेती को साधुवाद देता हँू कि ‘प्रेरणा’ संग्रह के रूप में स्व.उप्रेती जी की कविताओं का विग्रह सम्मुख आया। आशा करता हँू, यह कविता संग्रह हिन्दी जगत में समादृत होगा।

पिघलता हिमालय 22 फरवरी 2016 के अंक में ‘पेरणा’ पुस्तक की समीक्षा

तिब्बत के दर्चिन में थी हमारी छोटी सी दुकान

कैप्टन रतन सिंह टोलिया से बातचीत

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
यदि लगन हो तो हम किसी भी कार्य में सफलता पा सकते हैं और समाज में योगदान लायक बन सकते हैं। पहले जब साधन नहीं थे, लोग ज्यादा परिश्रम करते थे। उनका श्रम उन्हें लक्ष्य तक पहँुचाता। ऐसे ही श्रमशील परिवार के सदस्य हैं 79 वर्षीय कैप्टन रतन सिंह टोलिया। मूल रूप से टोला, जोहार के टोलिया जी का जन्म भैंसकोट ;नाचनी के निकटद्ध में हुआ था। इनके पिता जीत सिंह जी 6 भाई हुए- मानसिंह, किशनसिंह, नैनसिंह, जीतसिंह, हयातसिंह माधे सिंह। अपने इलाके में 32 लोगों का संयुक्त परिवार मुख्यतः व्यापारियों का परिवार था। तिब्बत व्यापार के साथ आन्तरिक व्यापार के लिये परिवार के बुजुर्गों ने मजबूत नींव डाल रखी थी।
जोहार नगर, भोटिया पड़ाव, हल्द्वानी निवासी रतन सिंह जी अपने बचपन का स्मरण करते हुए बताते हैं कि माइग्रेसन में उनका स्कूल भी साथ-साथ चलता था। भैंसकोट, साईं, टोला में उनका प्राइमरी स्कूल चलता था। कक्षा चार की पढ़ाई नाचनी में दी, पंडित बासुदेव जी ने परीक्षा ली थी। मीडिल की पढ़ाई शेर सिंह टोलिया के संरक्षण में डीडीहाट से की। वह बताते हैं- ‘‘कक्षा आठ की पढ़ाई करके अपने ग्राम टोला गया था। व्यापारी परिवार का होने के कारण बड़े व्यापार में जुटो, तिब्बती भाषा का ज्ञान भी लो। मेरा मन पढ़ाई का था। एक दिन घर के सब सयानों के सामने मैंने झोला पकड़ा और जाने की बात करते हुए निकल पड़ा। टोला से पैदल बोगड्यार पहुंच कर रात काटी। शान्त एकान्त रात में डाक लिया हलकारा पहुंचा, वही मेरा साथ था। अगले दिन बरम रुका और फिर नारायण नगर पहुंच गया। जहाँ मेरे मित्र दलजीत सिंह वृजवाल ;स्वतंत्राता सेनानी त्रिलोक सिंह के सुपुत्र और भीमसिंह वृजवाल ;पांखू में निवास कर रहे हैं। मिल गये। नारायणनगर से हाईस्कूल किया’
रतन सिंह जी का सन् 1954 में नानासेम मुनस्यारी के माधो सिंह पांगती की सुपुत्री नन्दा से विवाह हुआ।
टोलिया जी व्यापार के पुराने दिनों की बताते हैं- ‘‘सन् 1954 में पिता के साथ तिब्बत गया। दर्चिन में हमारी छोटी सी दुकान थी। 2-3 माह के लिये वहाँ जाया करते थे। हमारे तिब्बती मित्रा व्यापार के लिये इन्तजार करते थे। दर्चिन में अपनी दुकान से आगे तिब्बती मित्र के गोम/घर वहाँ जाकर उन काटने का काम भी किया। उनका टैंट वाला घर चवर गाय के वालों का बना था, जो गर्म था। वहाँ से उन लेकर अपनी दुकान पर लौटा। बाद में सामान जमा होते ही हम लोग टोला वापस आ गये।’’
व्यापार के इस अनुभव के बाद रतन सिंह पुलिस में भर्ती हो गये। इनके ताउ रतन सिंह टोलिया ने देहरादून में इन्हें भर्ती में मदद की। लेकिन इस समय सन् 55-56 में एक दिन इन्हें टेलीग्राम आया कि पिता जीतसिंह और बड़े भाई उमराव सिंह लकड़ी काटने गये थे, भूस्खलन से मौत हो गई है। इस दुखभरे समाचार के बाद टोलिया जी नौकरी छोड़ घर आ गये। बाद में नौकरी की तलाश में निकले और चकराता में पफौज के एक धर्मगुरु से भेंट हुई। गोरखा बटालियन में कर्नल मानसिंह से उन्होंने रतन सिंह के बारे में बताया और यह भर्ती हो गये। सिपाही से भर्ती होेकर अथक श्रम करते हुए प्रमोशन पाने वाले टोलिया जी बटालियन के ट्रेनिंग सेंटर में शिक्षक की भूमिका में भी रहे। सन् 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई के समय इनकी तैनाती स्यालकोट थी। अपने परिवार के साथ यह लोग स्यालकोट थे। ट्रेनिंग के बहाने इन्हें युद्ध में भेज दिया गया। इनका और इनके जैसे अन्य फौजियों के परिवारों ने काफी नजदीक से सीमा पर गोलाबारी की आवाजें सुनी और धुंआ देखा। इनकी कार्यशैली को देखते हुए आनरेरी कैप्टन के रूप में इन्हें सम्मान मिला। टोलिया जी अपनी यादों के साथ स्वस्थ्य रहें, कामना है।

पिघलता हिमालय 17 सितम्बर 2018 से

ट्रेडिल मशीन में हैल्पर तक बनी वह

स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व. कमला उप्रेती

डाॅ.पंकज उप्रेती
किसी की जिन्दगी पूरी तरह संग्राम बन जाती  है और इस संग्राम में जो लड़ता है वह योद्धा है। ऐसी की योद्धा ही ईजा। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी अनगिनत कहानी मुझे याद हैं। ‘पिघलता हिमालय’ को बनाने में ईजा का घोर संग्राम रहा है। यह कहानी 1964 से शुरु हो जाती है जब पिता स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने छापाखाना खोला होगा। मैंने ईजा-बाबू के मुँह से ही सुना था- ‘पहले छापाखाने की बहुत इज्जत थी।’ इस इज्जत को मैंने देखा भी। ‘शक्ति प्रेस’ नाम से हमारा छापाखाना हल्द्वानी के इतिहास मेें चार सबसे पुराने छापाखानों में से है। पिता ने बाईडिंग, परफेटिंग, रूलिंग, कम्पोजिंग, मशीनमैन हर प्रकार का काम किया था। इसी छापेखाने में हमारी बहुत बड़ी ट्रेडिल मशीन हुआ करती थी, पूरे ट्रक के बराबर। जिसमें दैनिक पिघलता हिमालय भी छपा। बाद में छोटे आकार की ट्रेडिल मशीन वगैरह भी प्रेस में लगाई गईं। इन मशीनों में अनगिनत मशीनमैन, कम्पोजिंग में अनगिनत कई आज नये प्रकार की प्रिटिंग तकनीक के साथ सफल हैं।

बचपन की याद याद आती है, जमाना भला था। तब छापाखाने में प्रतिस्पदर्धा नहीं थी और शादीकार्ड, बिलबुक इत्यादि के ग्राहकों के अलावा लिखने-पढ़ने वालों का अड्डा छापाखाने ही हुआ करते थे। आजकल तो प्रिंटिंग प्रेस लिखना आसान हो चुका है। और प्रतिद्वंद्वी अपने ग्राहकों को ढूंढने के लिये दौड़ते हैं, सरकारी काम के लिये तिकड़मबाजी करनी पड़ती है। उन दिनों हल्द्वानी पोस्टर, पर्चे, कार्ड छपवाने वालों में आन्दोलनकारी, समाज सेवी, पुस्तकें-पफोल्डर-पर्चे छपवाने के लिये लेखक, कुछ खास-खास लोग शादीकार्ड छपवाने के लिये छापेखाने तक आते थे। प्रेस की बड़ी जिम्मेदारी थी और लोगों को भरोसा था कि उनकी गलतियां भी सुधर कर छपेगा। तब एपफएस, एपफोर, एथ्री जैसे कागज साइजों को नहीं जानते थे बल्कि रिमों के साइजों के बाद कागज कटिंग होती थी। आज भी बड़े छापेखानों में यही होता है। खैर, बात पिघलता हिमालय की हो रही थी। 1978 में पिघलता हिमालय शुरु हुई, तब मैं 6 साल का था। बहुत उत्साह था पिता आनन्द बल्लभ ज्यू और हमारे चाचा दुर्गा सिंह मर्तोलिया में। इनका जोश अखबार को दैनिक में तक बदल गया। लेकिन जीवन के संग्राम में यह उलझ कर रह गये। दुर्दिनों की वह कहानी बहुत लम्बी है, फिर कभी लिखूंगा।

ईजा कमला उप्रेती ने पिता के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर छापाखाना और अखबार सींचा। लोहे की उन भारी मशीनों की खटखट आवाजों में कागज को मशीन में लगाने और उठाने में सावधानी चाहिये। कई ऐसे अवसर थे जब ईजा मशीनमैन पिता के साथ हैल्पर बनी। तब आजकल की तरह सुविधाएं और साधन भी नहीं थे। डाक से जाने वाले अखबारों में पते लिखने में भी ईजा सहायक थी। अखबार की प्रूफरीडिंग का काम भी वह करती और कभी लिखने बैठ जाती।
मन में विचार आता है कि पत्रकारिता के उस जमीन में कितनी पवित्रता थी। पत्रकारिता का मिशन था, आन्दोलन था, सामाजिक चेतना का प्रतीक था। अब ईजा हमारे बीच नहीं है लेकिन उसकी जिद, उसकी लगन, उसका संघर्ष हमें याद दिलाता रहेगा कि योद्धा संग्राम में विचलित नहीं होते। उन यादों में खुशी के साथ आँसू और साहस है।

पिथौरागढ़

पिथौरागढ़ नगर की चार समस्यायें

मदन चन्द्र भट्ट
पिथौरागढ़ नगर 1380 ई. में कत्यूरी राजा पिथौरा ने बसाया। उसकी तीन रानियाँ थीं- गंगा देवी, धर्मा देवी और मोलादेवी ;जियारानी। तीनों रानियों सेे तीन राजकुमार पैदा हुए- सिंहराज, बागदेव और दुलाशाही ;धमदेव। जागरों और वंशावलियों से ज्ञात होता है कि ‘पिथौरा’ लाड़प्यार का नाम था। इसके अलावा उसके चार नाम और थे- पृथ्वीशाही, पृथ्वीपाल, पृथ्वीमल्ल और प्रीतमदेव। उसका पौत्र और धमदेव का बेटा मालूशाही दारमा के सार्थवाह शुनपति शौक की पुत्री राजुला शौक्याणी के साथ गन्धर्व विवाह के लिए प्रसिद्ध है।
ब्रिटिश शासनकाल ;1815-1947 ई. तक पिथौरागढ़ की सीमा दक्षिण में सुकौली और ऐंचोली से लेकर उत्तर में सात शिलिंग तक तथा पूर्व में भड़कट्या से लेकर पश्चिम में पौण गाँव पैंगउाक शिलिंग तक फैली हुई थी। उस समय थरकोट गाँव में छः थरों ;पट्टी की एक पंचायत बैठती थी और सभी राजनैतिक समस्याओं का निबटारा करती थी। उदाहरण के लिए थरकोट की थर ने 1815 ई. में यह निश्चय किया कि रामेश्वर और थलकेदार के आचार्य होने से बिशाड़ गाँव के भृगुवंशी और विश्वामित्रा गोत्री ब्राह्मणों को अंग्रेजों की कुली बेगार से मुक्त रखा जाय। इस निर्णय को सपफल बनाने के लिए ‘रावल’ और ‘बल्दिया’ पट्टी के सभी थोकदार और जिमदार तलवार और खुखरी पहन कर अलमोड़ा ;प्राचीन लखनपुर में कमिश्नर ट्रेल की अदालत में उपस्थित हुए। जिस तरह ‘गर्खा’ ;परगनाद्ध के अन्तर्गत डीडीहाट, द्वाराहाट, गंगोलीहाट आदि बाजारें थें, उसी तरह कत्यूरी, चन्द, बम, मल्ल, पाल, गोरखा ;1790-1815 ई. आदि के शासन काल में थरकोट और हाट गाँवों में ‘शोरहाट’ थी। शोर का अर्थ है हल्ला। यह शब्द लोक में ‘सोर’ के नाम से प्रचलित है। स्थानीय अनुश्रुति के अनुसार कैलास-मानसरोवर और पशुपतिनाथ के तीर्थयात्रियों के यहाँ ग्रीष्मकाल में आने से भयंकर शोर होता था। जाड़ों में तिब्बती लामा, शौका और भोटिया अपने ढाकरों के साथ चार महिने पिथौरागढ़ में पड़े रहते थे। वैदिक काल में पिथौरागढ़ में वैराज्य ;राजा रहित परम्परा का गणराज्य था जिसकी राजधनी ‘गणकोट’ सोर की हाट के उत्तर मेें नाग नदी के किनारे स्थित है। बिशाड़ गाँव के बिल्वेश्वर महादेव में नाग नदी में ‘बिल्ववती’ और ‘सरस्वती’ नदी के मिलने से ‘त्रिवेणी’ बन जाती है।
स्कन्दपुराण के मानसखण्ड के अनुसार नाग, यक्ष, असुर, विद्याधर  और  सिद्ध यहाँ के मूल निवासी थे। पिथौरागढ़ नगर के मध्य में बहने वाली ‘ठुलि गाड़’ को ‘यक्षवती’ नदी कहा गया है। इसके समीप स्थित घंटाकरण देवता, जाख और जाखिनी गाँव यक्ष परम्परा के नाम हैं। प्राचीन काल में तिब्बत के ‘ताकलाकोट’ को अलकापुरी कहते थे। शीतकाल में अलकापुरी के यक्ष पिथौरागढ़ में आ जाते थे और यक्षवती नदी के दोनों ओर शीतकाल में रहते थे। इस प्रकार पिथौरागढ़ वैदिक काल में शीतकालीन अलकापुरी था और उत्तराखण्ड का सबसे पहला और चर्चित नगर था। मानसखण्ड के अनुसार यक्षवती नदी ‘असुर’ प्रान्त से निकलती थी। आज भी ठुलियाड़ के उद्गम के समीप दो उँचे ‘असुरचुल’ नाम के पहाड़ हैं जिनमें लोक देवता ‘असुर’ की थापना है। असुर देवता की पूजा जागर प(ति से होती हैं आसपास के ग्रामीणों का विश्वास है कि यह असुर देवता तिब्बत से ‘सोर’ आया। मानसखण्ड में कत्यूरी शैली की मूर्तियों से भरी -घुंसेरा’ गुफा को ‘विश्वकर्मा’ की गुफा कहा गया है।
पिथौरागढ़ नगर में चैतोला, हिलजात्रा, आठूं, होली, रामलीला आदि के आयोजनों में ढोल-नगाड़े के साथ भयंकर भीड़ एकत्र होती है और प्राचीन ‘उत्सव संकेत’ गणराज्य की यादें ताजा हो जाती हैं।
पिथौरागढ़ तीन पीढ़ी तक- राजा पृथ्वीशाही, दुलाशाही और मालूशाही की राजधानी रहा है। उस समय कत्यूरी साम्राज्य उत्तर में कैलास-मानसरोवर से लेकर दक्षिण में सहारनपुर जिले के शाकम्भरी मन्दिर तक तथा पश्चिम में देहरादून जनपद के जौनसार में स्थित बैराटगढ़ से लेकर नेपाल के ‘डोटीगढ़’ तक फैला हुआ था। डाॅ.प्रयाग जोशी ने द्वाराहाट में प्रचलित कत्यूरी वंशावली को एकत्रा किया है। उसमें कहा जाता है कि कत्यूरी साम्राज्य में बारह रजबार और नौ लाख सेना थी-
‘जोत राजा कत्यूराॅ की!
जदोल मनसोर करम चाको पाट।
पफीणी कत्यूर रणचूलीहाट।
सचनी नागनी पूरब।
मालिनी पछम लागो ढांउ।
एकै बीड़ा सब लोगन को बानँू।
छाटछारी बार रजबारी।
नौ लाख कत्यूराॅ ले तपायो।
धरती को तीसरो बानूॅ।
कभी वैराज्य, कभी उत्सव संकेत गण और रंगीली सोर रहा पिथौरागढ़ आज चार ऐसी भीषण समस्याओं से त्रस्त है जिसका समाधन न अपफसरों के पास है और न नेताओं के पास है। उन समस्याओं के समाधन के लिए छात्रा, महिलायें, राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता और ग्रामीण निरन्तर आन्दोलित हैं। यूं कहिये कि उनकी नींद हराम है। ये चार समस्यायें हैं-
1. डिग्री कालेज को कुमाउ वि.वि. का कैम्पस का दर्जा दिया जाना और दिल्ली की तर्ज पर तीन वर्ष का बीए, एलएलबी खोलना।
2. बारहमासी सड़क को ऐंचोली से सप्त शिलिंग तक न जाने देना।
3. प्रस्तावित नगर निगम में आसपास के गाँवों को सम्मिलित न होने देना।
4. पंचेश्वर बांध् को न बनने देना।

पिघलता हिमालय 20 अगस्त 2018 अंक से

पिथौरागढ़ की चार समस्यायें- 2

डाॅ.मदन चन्द्र भट्ट
पिथौरागढ़ डिग्री कालेज तिब्बत पर चीनी आक्रमणसे सीमान्त विकास की नीति के अन्तर्गत खुला। पहले जूनियर हाईस्कूल बजेटी में कक्षायें शुरु हुईं, फिर घुड़साल में टिनशेड बनाये गये। जब कुमाउँ विश्व विद्यालय की स्थापना के लिए आन्दोलन हुआ तो सबसे उग्र आन्दोलन पिथौरागढ़ में हुआ। छात्रों की उग्र भीड़ पर गोली चलानी पड़ी जिससे दो लोगों की मौत हो गई। आगरा विश्वविद्यालय बहुत दूर होने से छात्र-छात्राओं की बहुत परेशानी होती थी लेकिन कुमाउँ विश्वविद्यालय बनने पर नैनीताल और अल्मोड़ा दो कैम्पस बनाये गये, पिथौरागढ़ को छोड़ दिया गया। उसी समय गढ़वाल विश्विद्यालय भी बना। उसके तीन कैम्पस श्रीनगर, पौड़ी और टिहरी बनाये गये। नैनीताल के बजाय अल्मोड़ा में वि.वि. का केन्द्र बनाया जाता तो तब भी पिथौरागढ़ वालों के लिये नजदीक होता। नैनीताल एक पर्यटक नगर है। आज कारों से जाम लग जाने से पर्यटक बेहद परेशान हैं। जब छात्रों ने नैनीताल में विश्वविद्यालय का केन्द्र बनाने के लिए आन्दोलन शुरु किया तो वहाँ के ‘होटल एसोसिएशन’ ने उसका विरोध् किया क्योंकि पर्यटन पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। इसी तरह नैनीताल में ‘हाईकोर्ट’ का बनना भी पर्यटन के लिए बाध्क रहा है। नैनीताल में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए यह आवश्यक है कि हाईकोर्ट गैरसैंण में नवनिर्मित विधान सभा भवन में डाला जाय और पिथौरागढ़ को विश्वविद्यालय का कैम्पस बनाया जाय।
जब से कुमाउँ विश्वविद्यालय बना है, हर वर्ष पिथौरागढ़ का छात्रसंघ वि.वि. कैम्पस बनाने की मांग करता है। छात्रसंघ के चुनाव की पूर्व वेला में जब जनरल गैदरिंग होती है तो सभी प्रत्याशी वादा करते हैं कि वे महाविद्यालय को विश्वविद्यालय का कैम्पस बनाने के लिए पूरा जोर लगायेंगे। अंक तालिकाओं में गड़बड़ी हो जाने पर छात्र-छात्राओं को नैनीताल दौड़ना पड़ता है, वहां के महंगे होटलों में रहना पड़ता है। पीएचडी की मौखिकी परीक्षा के लिए नैनीताल जाना पड़ता है और वहाँ के महंगे होटलों में रहना पड़ता है। अगर पिथौरागढ़ में वि.वि. का कैम्पस बन जाता तो सीमान्त के सभी डिग्री कालेजों ;नारायण नगर, बलुवाकोट, मुनस्यारी, गंगोलीहाट, बेरीनाग आदि के छात्रों को अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए नैनीताल न भटकना पड़ता।
कैम्पस बन जाने से उत्तराखण्ड सरकार का आर्थिक बोझ भी कम होता। अध्यापकों के वेतन का अस्सी प्रतिशत व्यय विश्वविद्यालय अनुदान आयोग वहन करता, केवल बीस प्रतिशत राज्य सरकार को देना पड़ता। शोध् योजनाओं, शोध् छात्रवृत्तियां तथा प्राध्यापकों के विदेश जाने में भी विशेष सुविध होती। सबसे बड़ा काम यह होता कि छात्रासंघ का चुनाव लड़ने वालों को अपने भाषण में कैम्पस बनाने का झूठा वायदा न करना पड़ता।
छात्रों की एक प्रमुख मांग महाविद्यालय में बीए, एलएलबी खोलने की है। इसके लिए आजकल कई छात्र-छात्रायें दिल्ली जा रहे हैं। प्राइवेट कम्पनियों में जिस तरह बी.टैक. करने वाले छात्रों को नौकरी मिल जाती है, उसी तरह एल.एल.बी. करने वालों के लिए भी प्राइवेट कम्पनियों के द्वार खुले हैं। एल.एल.बी. करने वाले ‘जज’ की परीक्षा दे सकते हैं, स्वतंत्र रूप से वकालत कर सकते हैं, राजनैतिक दलों के सदस्य बनकर नगरपालिका, जिला परिषद, ग्राम पंचायत, वन पंचायत, सहकारी बैंक आदि के चुनाव लड़ सकते हैं।
तीसरी भीषण समस्या स्टापफ क्वार्टरों की है। आज महाविद्यालय बने पचपन वर्ष हो गये हैं लेकिन न प्रचार्य के लिए आवास बना, न चपरासियों के लिए। प्राचार्य ‘किंग जार्ज कारोनेसन हाईस्कूल’ के प्रधनाध्यापक के लिए बने मकान में जी.आई.सी. परिसर में रहते हैं। जब महाविद्यालय का भवन बनाते समय कुछ निर्माण सामग्री बच गई तो प्राचार्य डाॅ. छैलबिहारी लाल गुप्ता ने तत्कालीन पिथौरागढ़ के डी.एम. गोबिन्द डबराल से आग्रह कर ठेकेदार श्री रौतेला को पाँच क्वार्टरों के लिए लीज में भूमि दिलायी और डिग्री कालेज रोड में पंचकुटी अस्तित्व में आयी। डी.एम., ठेकेदार और प्राचार्य के बीच एक ‘डील’ बनायी गई कि पंचकुटी में विज्ञान के विभागाध्यक्षों को सीनियर्टी के आधर पर प्राचार्य पंचकुटी में अलाट करता रहेगा और रु. 75/- किराये के रूप में ठेकेदार को मिलेंगे। आज स्थिति यह है यथासम्भव सुविध शुल्क लेकर एक क्वार्टर प्राथिमक शिक्षक संघ के नेता को और एक जीआईसी के एलटी ग्रेड के अध्यापक को दे दिया गया है।
डिग्री कालेज की और भी अनेक समस्यायें हैं। उनके समाधन के लिए अवकाश प्राप्त प्रोफेसरों ने ‘डिग्री कालेज वेलपफेयर एसोसिएशन’ बनाया है। राजकीय महाविद्यालय के सेवानिवृत्त प्राचार्य डाॅ. हरीश चन्द्र जोशी जी को अध्यक्ष बनाया गया है। डाॅ. हीरा बल्लभ खर्कवाल उपाध्यक्ष, डाॅ.लच्छी लाल वर्मा सचिव, डाॅ. मदन चन्द्र भट्ट कोषाध्यक्ष, डाॅ.परमानन्द चैबे सम्वाददाता और श्रीमती भागीरथी भट्ट महिला उपाध्यक्ष बनायी गई हैं। कार्यकारिणी में डाॅ.त्रिलोचन जोशी, प्रो. के.के.भट्ट, श्रीमती देवकी फर्तयाल और डाॅ. शीतल सिंह भण्डारी रखे गये हैं। सदस्यता शुल्क एक सौ रुपये प्रतिमाह रखा गया है ताकि प्रतिनिधि मण्डल समय-समय पर देहरादून भेजे जा सकें। इस एसोसिएशन की मासिक बैठक रामाश्रय-1, मालूशाही कालोनी, पिथौरागढ़ के सुमेरू संग्रहालय हाल में माह के अन्तिम रविवार को चार बजे से छः बजे तक होगी।

पिघलता हिमलाय 10 सितम्बर 2018 अंक से

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का संगीत और पहाड़ प्रेम

डाॅ.पंकज उप्रेती
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ जितने गहरे कलाकार थे उतने ही वैज्ञानिक। संगीत विज्ञान पर उनका ऐसा प्रभाव देखा जा सकता है। कवीन्द्र रवीन्द्र ने संगीत की जिस विधा को जन्म दिया उसे- ‘रवीन्द्र संगीत’ कहा जाता है। रवीन्द्र बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के थे और उन्होंने धर्म- कला-विज्ञान-ज्ञान की शाखाओं के मर्म को समझते हुए प्रकृति की रीति के साथ चलने का संदेश दिया। ऐसे में गुरुदेव का पहाड़ प्रेम होना स्वाभाविक है। जिस संगीत को लेकर वह शुरु होते हैं उसकी लहर यात्र और खोज के बाद उत्पन्न होती है। इस सच्चाई को मैं तक महसूस करता हँू जब पहाड़ की दुर्गम यात्रओं को अंजाम देता हँू और अंजान पथों पर पग धरता हँू। संगीत मात्र सरगम का खेल नहीं बल्कि वह एक विचार भी है। प्रकृति के बीच विचरने से दर्शन, कला, विज्ञान की कौंध् होने लगती है और एक शैली बन जाती है। टैगोर की शैली भी अपनी शैली बनी जिसे उनके गीत, कविता, नाट्य, संगीत में देखा जा सकता है। ‘रवीन्द्र संगीत’ के रूप में जिस विशिष्ट संगीत की धारा उन्होंने चलाई उसका अपना ही शास्त्र है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर बंगाल के ख्याति प्राप्त विष्णुपुर घराने से प्रभावित थे। कहते हैं इस घराने की स्थापना तानसेन के वशंज बहादुर खाँ ने की थी। रवीन्द्र के पहले संगीत शिक्षक विष्णु चक्रवर्ती थे। बंगाल संगीत विध का गढ़ रहा है, रवीन्द्रनाथ के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ संगीत कला के संरक्षक थे। यदि रवीन्द्रनाथ की वंशावली को देखें तो पता चल जाता है कि सभी विख्यात कलाकार और पारखी थे। महर्षि देवेन्द्रनाथ, गिरीन्द्रनाथ, द्विजेन्द्रनाथ, सत्येन्द्र, हेमेन्द्र, ज्योतिरीन्द्रनाथ, स्वर्णकुमारी, गुणेन्द्रनाथ, अश्वनीन्द्र, गुरुदेव रवीन्द्र, दीपेन्द्र, इन्दिरादेवी, लेडी प्रतिभा चैध्री, क्षितीन्द्रनाथ………। इस लम्बी सूची में मंचीय कलाकार, कलावन्त, रचनाकार, स्वरलिपिकार, गायक-वादक सभी हैं। तत्कालीन विख्यात संगीतकारों का जमावड़ा इनके घर में होता था। विष्णु चक्रवर्ती, सुरेन्द्रनाथ वन्दोपाध्याय, राम प्रसाद, श्यामसुन्दर मिश्र, जगतचन्द्र गोस्वामी, राधिका प्रसाद जैसे श्रेष्ठ कलाकारों का इनके वहाँ आना-जाना था। ऐसे में रवीन्द्र भी इसमें गोता लगा रहे थे लेकिन उनके मुँह से निकलने वाले सजह स्वरों ने एक नई धरा को चलाया। उन्होंने जो रचनाएं तैयार की उनमें काव्य और संगीत को सन्तुलित रखा गया है। वह प्राकृतिक आवाज के साथ हाव-भाव का ध्यान रखते हुए होने वाली प्रस्तुति को संगीत की श्रेणी में मानते थे। ऐसे में स्वाभाविक रूप से रवीन्द्र संगीत ने अपना स्थान लोगों के बीच बना लिया।
लोक का अपना शास्त्र होता है, सो गुरुदेव के संगीत में भी उनके लोक का प्रभाव है किन्तु मात्र बांग्ला होना ही उनकी शैली नहीं है। इस बात को वह महसूस करते थे शायद इसी लिये उन्होंने उत्तराखण्ड के जनपद नैनीताल के रामगढ़ को चुना होगा। रामगढ़ ही वह स्थान है जहाँ कवियत्री महादेवी वर्मा ने भी अपनी साहित्य साधना की। वह दौर जब संसाधनों का कमी थी, कवीन्द्र रविन्द्र ने बंगाल से यात्रा कर इसे ही क्यों चुना होगा? एकदम निर्जन में जिस स्थान को इस कलावन्त ने चुना उसके खण्डहर आज भी पुकार रहे हैं। वह तो भला हो हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट सोसाइटी ने इस पुकार को सुना और पिछले कुछ सालों से निरन्तर यहाँ आयोजन करते हुए सबका ध्यान इस ओर आकर्षित किया।
लोक संगीत ही शास्त्रीय संगीत की जननी है और लोक की मान्यता समूह में होती है। लोक हमेशा नकल की बजाय स्वाभाविकता का पालन करता है। गुरुदेव का भी यह मानना था, तभी तो उन्होंने शास्त्राीय संगीत की जड़ों को जानने के बावजूद अपनी स्वाभाविकता को नहीं छोड़ा। यह एक बड़ा सत्य है कि जो भी स्वाभाविक कलाकार-चित्राकार- लेखक- विज्ञानी-ज्ञानी होगा वह अपनी छाप अपने अंदाज से छोड़ता है। शास्त्रीय संगीत कलाकारों के तमाम उदाहरण देख लीजिये- भीमसेन जोशी, जसराज, कुमार गन्ध्र्व, बिस्मिला खान, हरिप्रसाद चैरसिया, पन्नालाल घोष इत्यादि। पिफल्मी गायकों के उदाहरण भी देख लें- लता, रपफी, मुकेश इत्यादि। कहने का आशय यह है कि असल कलाकार अपने आप में एक होता है और शेष उसकी नकल करने लगते हैं। संगीत में नायकी-गायकी के बारे में बताया जाता है, जिसका मतलब है- जब शिष्य अपने गुरु/उस्ताद से सीखता है तब वह नकल करता है अर्थात नायकी और जब वह मझ कर अपनी प्रस्तुति देता है तब वह गायकी करता है। सीखने के क्रम में नकल स्वाभाविक है किन्तु अपनी प्राकृतिक स्वाभाविकता को नष्ट नहीं करना चाहिये। इस बारे में गुरुदेव का मानना था कि शास्त्रीय किलिष्टता के चक्कर में संगीत रचना और उसमें निहित भाव को गम्भीर हानि पहँुचती है। भाव के साथ ही संगीत खिलता है। भावपूर्ण संगीत ही कर्णप्रिय और रंजक होता है।
रवीन्द्र संगीत पर उत्तर भारत में प्रचलित ध््रुपद-धमार, ख्याल, टप्पा, ठुमरी, पाश्चात्य ओरल गीत, बंगाल की लोक ध्ुनों का प्रभाव रहा है। गुरुदेव ध््रुपद गायकी से प्रभावित थे ऐसे में रवीन्द्र संगीत का मूलाधर भी ध््रुपद है। ऐसे में गुरुदेव ने लगभग दो हजार गीत लिखे जिनमें हिन्दी गीतों के आधार पर रचित गीतों की संख्या 215 बताई जाती है। बंगला भाषा में ये गीत ‘भाँगा-गान’ के नाम से प्रसिद्ध हुए जिन्हें पूजा गीत या ब्रह्म संगीत के रूप में गाया जाता है। श्रदेय प्रभुलाल गर्ग ने रवीन्द्र संगीत पर गहन अध्ययन करते हुए बताया है कि रवीन्द्र संगीत की अधिकांश रचनाएं तोड़ी, भैरवी, आसावरी, पूर्वी, ईमन, मल्लार और केदार में की गईं हैं। मालकौंस और बागेश्वरी का प्रयोग भी किया गया है लेकिन अधिक नहीं। भैरवी राग में लगभग 150, मल्हार में 40 और पूर्वी में 30 रचनाएं की गई हैं। तालों में सरलता का ध्यान रखा गया है ताकि गीत का काव्यपक्ष किसी भी कारण से मन्द न पड़े। गुरुदेव के 215 गीत हिन्दुस्तानी संगीत में रूपान्तरित हैं। उनका गीत- प्रथम आदि तव शक्ति आदि ‘परमोज्जवल’ उनके प्रथम कोटि के गीतों में गिना जाता है, इसे ध्ु्रपद से लिया गया है। वर्षाकालीन गीत राग देश व दादरा ताल में निबद्ध है- ‘आई सावन की बेला’। बाउल गीत के आधार पर रची गई उनकी रचना- ‘यदि तोर डाक शुने केउ ना आसे तवे एकला चलो रे’ गांध्ी जी को अतिप्रिय थी। महात्मा गांध्ी ने ही रवीन्द्रनाथ के नाम के साथ- ‘गुरुदेव’ और ‘कविगुरु’ शब्द जोड़े थे और रवीन्द्रनाथ ने उन्हें ‘बापूजी’ नाम दिया था।
शान्तिदेव घोष द्वारा लिखित ‘रवीन्द्र संगीत’ में टैगोर की अनेक रचनाओं से सम्बन्धित राग-तालों का उल्लेख मिलता है। ‘गीत-वितान’ नामक बंगला पुस्तक में टैगोर के गीतों की स्वरलिपि का वृहद संग्रह मिलता है। इसके कई भाग हैं। उनकी रचनाओं से पता चलता है कि वह अवसर के अनुकूल तैयारी करते थे तभी यह भाव प्रधान थीं।शास्त्रीय रागों को गुरुदेव अपने ढंग से प्रस्तुत करते। ऐसे में शास्त्रीय संगीत का प्रभाव होते हुए भी उसकी अपनी धारा थी। उन्होंने वैष्णव पद, ईसाई प्रार्थनाएं, कीर्तन, आॅपेरा, समूहगान को नई ऊँचाई दी। रवीन्द्र संगीत के गीतों को 6 भागों में समझा जा सकता है- 1. पूजा गीत, 2. स्वदेश गीत, 3. प्रेम गीत, 4. प्रकृति गीत, 5. नृत्यनाटक गीत, 6. विविध् गीत। रवीन्द्रनाथ ने 1901 में नैवेद्य, 1906 में खैया, 1909 में गीतांजलि की रचना की। इनके अन्तर्गत आने वाले गीत पूजा गीत श्रेणी में हैं। इनमें ध्वनिमय व्यंजना और आदिशक्ति के लिये व्याकुलता दिखाई/सुनाई देती है। उदाहरण- ‘आजि तजो तारा सब आकाशे, सबे मोर प्राण भरि प्रकाशे।’ उनके लिखे/गाये देश गीत उच्चकोटि के हैं। एक उदाहरण- ‘ओ आमार देशेर माटी तोमार पाये छो आई माथा।’ बंगाल के महान प्रेमकाव्य रचनाकार निध्ु बाबू, मध्ुकान, बिहारी लाल का रवीन्द्र संगीत के गीतों मंे गहरा प्रभाव था। भौतिक प्रेम प्रसंगों को गुरुदेव ने आध्यात्म चेतना में ढालने के साथ ही छायावाद और रहस्यवाद की ओर ध्यान आकर्पित किया। चित्रांगदा, चंडालिका, श्यामा, कालमृगया, मायार खेला, वाल्मीकि प्रतिभा जैसे गीत तथा नृत्यनाटकों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है। प्रकृति सम्बन्ध्ी गीतों में गुरुदेव ने जड़ और चेतन दोनों के प्रति वाणी मुखर की है। नृत्य-नाटक के लिये उन्होंने रचना तैयार की तथा कथावस्तु इस प्रकार गठित की कि उसका प्रभाव श्रोता/दर्शक को तत्काल हो। उनके गीतनाट्यांे को कलामंच पर हमेशा प्रसिद्धी मिली है। इसके अलावा उन्होंने विविधगीतों को गुंथा। गुरुदेव भावपूर्ण संगीत के लिये ताल को भी सहज-सुगम करने को कहते। सांगीतिक दृष्टि से देखें तो पता चल जाता है कि भावपूर्ण गायन के लिये उन्होंने ऐसे प्रयोग किये। यही कारण है कि रवीन्द्र संगीत का प्रभाव पिफल्म संगीत पर भी पड़ा। सचिनदेव बर्मन, आर0सी0 बोड़ाल, हेमन्त कुमार, सलिल चाौैधरी, पंकज मलिक, पहाड़ी सान्याल इत्यादि संगीतकारों की रचनाएं इसके उदाहरण हैं।
रवीन्द्रनाथ के संगीत में बंगाल के लोक की छाप और पहाड़ का सा दर्द है। वह कहते थे- शास्त्रीय संगीत सीखने के लिये गले के प्राकृतिक गुण-धर्म को नष्ट करना न्यायसंगत नहीं है। आवाज मिठास युक्त और भावपूर्ण होनी चाहिये। बंगाल संगीत विध में समृद्ध रहा है, यहाँ के लोक का संगीत और शास्त्राीय संगीत का अद्भुत प्रचलन सोचने पर मजबूर करता है कि गद्य और पद्य दोनों में लयकारी है। ऐसी लयकारी जो कई सम्भावनाओं को संगीत की दृष्टि से बताता है। यहाँ राध-कृष्ण से सम्बन्धित गीतों को कीर्तन के नाम से जानते हैं और पदावलियों को दुहराते हुए गाते हैं। लोकध्ुनों की छाया भी इनमें है। बंगाल में भटियाली लोकगीत भी समृद्ध है, इसमें दीर्घ स्वरों के साथ ध्ुन गाई जाती है। बाउल संगीत के रूप में काव्य की भावप्रधन प्रस्तुति देखने को मिलती है। चटक प्रस्तुति के लिये चटका गायन भी एक शैली है। इसमें व्यंग्यवाण के साथ छेड़छाड़ भरा मनोरंजन होता है। विरह गीत के रूप में भवइया सुना जा सकता है। ऐसी ही अन्य विधएं बंगाल के लोक में हैं। जब बात पहाड़ यानी कि उत्तराखण्ड की करें तो यहाँ भी इसके लोक के अनगिनत गीत विविध् शैलियों में मिलते हैं। न्योली के रूप में दर्दभरे स्वरों का आलाप, झोड़ा-चांचरी-ढुस्का के रूप में नृत्यगीत, बैर के रूप में सवाल-जबाब का मनोरंजन, हुड़कीबौल के रूप में कृषिगीत, होली के रूप में शास्त्रीय और लोक संगीत का मिश्रण व भावप्रधन गायकी, रामलीला के रूप में गीतनाट्य शैली, सम्वाद के रूप में पांडव नृत्य, झुमौलों, बाजूबन्द, थड्या, पफाग, सगुनगीत, संस्कार गीत……और भी कितने ही प्रकार हैं। लोक बंगाल का हो, उत्तराखण्ड का हो या कहीं अन्य का, उसकी सहजता-सरलता जन्म से होती है, विकार और विकास तो उसका अगला चरण है। जब बात लोक गीतों की हो तो उनमें गेयता, व्यक्तितत्व, भावप्रवणता, रागात्मक अन्विति, आत्मद्रवणता, प्रवाहमयी शैली, भावाभिव्यंजना, प्रकृति चित्राण होता है। इसमें छन्द, लय, विम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस का स्वाभाविक रूप से होते हैं। लोक का यह शास्त्रा ही है जो शास्त्रीयता के शास्त्र को भी दिशा देता है। लोक से उपजने वाले गीतों की सार्थकता हमेशा नवजीवन देने वाली, जन-जन में ऊर्जा संचार करने वाली रही है। रवीन्द्रनाथ जैसे विद्वान संगीत के इस पक्ष को बखूबी जानते थे। तभी उन्होंने बंगाल से पहाड़ का रुख किया होगा। प्रकृति के बीच अपनी साधना को जारी रखने का संकल्प रखने वाले रवीन्द्र का शान्तिनिकेतन रामगढ़ भी तो हो सकता है? ‘टैगोर टाप’ नाम से जिस खण्डहर को जाना जाता है, रवीन्द्र की उस धरोहर को फिर से स्थापित करने का सपना देख रही संस्था ‘हर्डस’ यदि अपनी योजना में सफल होती है तो रवीन्द्र का पहाड़ प्रेम निश्चित रूप से झलक उठेगा। यह प्रेम गीत-संगीत के रूप में ज्यादा है। गीत-संगीत ही ज्ञान-विज्ञान का सरल उपाय और ध्यान का सुगम माध्यम है। आज के परिप्रेक्ष्य में गुरुदेव का सपना सच साबित करने की जिद होनी ही चाहिये। क्योंकि यह जिद, ‘जिद’ न होकर लोक का स्वाभाविक रंग है।

पिघलता हिमालय 7 मई2018 के अंक से

श्रद्धांजलि स्व.शमशेरसिंह बिष्ट

आन्दोलन का भरोसा थे
अल्मोड़ा। जन आन्दोलनों में अग्रणीय रहे डाॅ. शमेशर सिंह बिष्ट का 22 सितम्बर 2018 की प्रातः निधन हो गया। समाजसेवी, पत्रकार के रूप में भी वह आम जन की आवाज उठाते रहे। उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी के मुखिया के रूप में वह जनता की आवाज उठाते रहे। बिष्ट जी आन्दोलनों का भरोसा थे। अपने छात्र जीवन से ही वह अन्याय के खिलाफ आन्दोलनों में जुड़े रहे। मूल रूप से खटल गाँव, स्याल्दे निवासी डाॅ.शमशेर सिंह बिष्ट का जन्म 4 फरवरी 1947 को अल्मोड़ा में हुआ। बचपन से ही मेधवी और जुझारु बिष्ट जी 1972 में अल्मोड़ा कालेज में छात्रा संघ अध्यक्ष बने। उनके आन्दोलन तरीका एकदम अलग था। जब वह छात्रा संघ चुनाव लड़े थे तब उन्होंने एक मोहर बनाई थी और दूसरे छात्र नेताओं द्वारा फैंके गये पर्चे-बिल्लों के पीछे अपनी मोहर लगाकर बांट देते। उनके सोचने और समझाने का यह तरीका हर किसी को भाता था। उत्तराखण्ड आन्दोलन सहित जल, जंगल, जीमन की बातों पर वह बेवाक लिखते व बोलते थे। पिछले दो साल से स्वास्थ्य विकार के कारण उन्हें दिक्कत थी, बावजूद वह बैठकों, सभा, आन्दोलनों में जुड़े रहे। आर्य समाज के साथ स्वामी अग्निवेश से वह बहुत प्रभावित रहे। स्वास्थ्य बहुत खराब होने के बाद उन्हें दिल्ली अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। वह इलाज करवाकर अल्मोड़ा आ गये और दवाईयों खाने के अलावा स्वध्याय में लगे रहे। किताबों के दोस्त और समझ रखने वाले डाॅ.शमशेर की कल्पना थी- ‘किताब घर’। तभी उनके प्रतिष्ठान का नाम किताबघर रखा गया। जिसमें स्तरीय पुस्तकों का खजाना है।
स्व.बिष्ट जी व उनके परिवार का पिघलता हिमालय परिवार से गहरा रिश्ता है। वह हर सुख-दुःख में शामिल होते रहे हैं। बिष्ट जी के पत्नी श्रीमती बिष्ट अध्यापिका रही हैं। उनके सुपुत्रा अयजमित्र व जयमित्र जानेमाने फोटोग्राफर, ट्रैकर व समाजसेवी हैं। स्व.बिष्ट अपने पीछे ईष्ट-मित्र-भरापूरा परिवार छोड़ गये हैं। पिघलता हिमालय परिवार उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता है।