छोटी विलायत के नाम से प्रसिद्ध रहा ‘गर्ब्यांग’

गर्ब्याल दम्पत्ति से बातचीज –

शिक्षा विभाग के बाद नगर पंचायत धारचूला की चैयरमैन बनीं साबित्री ह्यांकी गर्ब्याल
-दुर्गासिंह मर्तोलिया जब डीएसबी कैम्पस में अध्यक्ष बने, पहाड़ की लहर थी
-पधान मनोरथ सिंह ने गुंजी में स्कूल बचाने के लिये अपने बच्चों का प्रवेश करवाया
डॉ. पंकज उप्रेती

बात जब हिमालय की करें तो वहाँ के मजबूत स्तम्भ हमेशा स्मृति में रहते हैं। आज की विशेष वार्ता श्रीमान जमन सिंह गर्ब्याल-श्रीमती साबित्री गर्ब्याल के साथ है। इस दम्पत्ति ने सीमान्त के जिस वैभव को देखा है उतना ही दुरुह जिया भी है। इसी लिये यह यर्थाथ पर जीने वाले हैं और वर्तमान की दिखलावटी दुनिया को खोखला मानते हैं। श्रीमती साबित्री 33 साल शिक्षा विभाग में रहने के बाद धारचूला नगर पंचायत की चैयरमैन रही हैं। जमन सिंह जी एफसीआई से सेवानिवृत्त हैं।
पांगू के पधान भीम सिंह ह्यांकी और श्रीमती डमस्यां (दमयन्ती देवी) के घर जन्मी साबित्री ने सीमान्त पांगू में हाईस्कूल तक शिक्षा के बाद नैनीताल में चन्द्रभवन छात्रावास में रहकर इण्टर फिर एसआर छात्रावास में रहकर बीए की शिक्ष ग्रहण की। इलाहाबाद से एलटी करने के बाद शिक्षा विभाग में सेवा की। इसी प्रकार गर्ब्यांग के पधन परिवार में मनोरथ सिंह गर्ब्याल जी श्रीमती कुन्ती देवी के घर जमन सिंह गर्ब्याल का जन्म हुआ। इन दोनों परिवारों ने भारत तिब्बत व्यापार के दिनों को देखा और चुना है। पधानचारी होने के नाते सक्षम होते हुए हमेशा अपनी मातृभूमि के लिये समर्पित रहे हैं।
बातचीज के दौरान श्रीमती सात्रित्री गर्ब्याल अपने पुराने दिनों में लौटते हुए बताती हैं- धारचूला से नैनीताल पढ़ाई को जाते समय दो दिन लग जाते थे। पहले अल्मोड़ा पहंुचकर एम्बेसेडर होटल में रुके थे फिर अगले दिन नैनीताल जाते थे। आने-जाने के लिये दन्या वाली रोड पूरी तरह धूलपट्ट थी। पिघलताल हिमालय के संस्थापक स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया को याद करते हुए वह बताती हैं- दुर्गा सिंह एमए में थे और वह बीए की पढ़ाई कर रही थीं। तब डीएसबी कैम्पस में छात्र संघ चुनाव को लेकर पहाड़ यानी सीमान्त की लहर थी। दूर-दूर से आकर पढ़ने वाले सभी साथी एकजुट हो गये और दुर्गा दा को अध्यक्ष बनाया। अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान सावित्री जी सन् 1968 में सरकारी सेवा में लगी। गर्ब्यांग के जमन सिंह जी के साथ 1980 में इनका विवाह हुआ। अपनी 33 साल की सेवा में गोपेश्वर बदरीनाथ में अधिक समय व्यतीत किया। सन् 2003 कांग्रेस के टिकट पर इन्हें धारूचला नगर पंचायत सीट पर चुनाव लड़ाया गया और यह चैयरमैन बनीं। घर में हर प्रकार से सक्षम इस परिवार का ध्येय अपने इलाके को सुदृढ़ करना था ऐसे में कई महत्वपूर्ण कार्य इनके द्वारा किये गये। एनएचपीसी द्वारा लीज पर लिया गया स्थान स्टेडियम बनना था लेकिन इसमें हीलहवाली हो रही थी। तत्कालीन डीएम नवीन पाण्डे जो सावित्री जी के सहपाठी रहे थे, घूमने के लिये नारायण आश्रम आए थे। वर्षों बाद उनसे मिलकर एनएचपीसी वाली भूमि को लेकर खेल मैदान के रूप में विकसित करवाया। इसी प्रकार धारचूला का भोटिया पड़ाव बनाने का कार्य हुआ। श्रीमती सावित्री कहती हैं- डीएम पाण्डे जी के संरक्षण में ही वह उम्दा कार्य हो सके। काली नदी से नहर के लिये लाया गया बजट ठेकेदारों को नहीं दिया बल्कि सिंचाई विभाग की देखरेख में कार्य करवाया। नदी के बहाव से धारचूला को बचाने लिये गुणवत्ता युक्त कार्य का होना जरूरी था। उसी दौर में जनजाति व अन्य पिछड़े लोगों के लिये प्रशिक्षण केन्द्र खुलवाया गया जिसका आज तक लाभ हो रहा है। इसमें कम्प्यूटर शिक्षा भी दी जाती है। इसके अलावा बारातघर, गैराज और भारत नेपाल सीमा पर प्रहरियों के एक सेड बनवाया गया ताकि गर्मी, बरसात के दिनों में पुल के पास पहरा देने वाले आराम से रह सकें।
जमनसिंह जी और सावित्री देवी कैलास के मुख्य पड़ाव और तिब्बत व्यापार की देखी और सुनी यादों को बताते हैं कि पांगू कैलास मानसरोवर यात्रा का मुख्य स्थान है। सिरखा, सिर्दांग होते हुए कैलास यात्री यहीं से जाते रहे हैं। पहले समय में इस स्थान पर सफरी डाक्टरों की ड्यूटी लगती थी। सफरी यानी यात्रा में जाने वालों को देखते हुए इन्हंे तैनात किया जाता था। पांगू में भीम सिंह पधान जी यात्रियों के लिये सत्तू गुड़ अािद तैयार रखते थे। यात्रा के दौरान इस प्रकार की खाद्य सामग्री को पसन्द किया जाता है क्योंकि इन्हें सत्तू को पानी में घोलकर भी गुड़ के साथ खाने के लिये तैयार कर लेते हैं, मौसम के लिहाज से गर्म तासीर भी होती है। लिपू दर्रे से होते हुए तिब्बत व्यापार होता था और व्यापार टैण्ट लगाकर रहते थे। तकलाकोट में इसका लगान पड़ता था। बचपन में अपने बुजुर्गों के साथ एक बार जमन सिंह जी को इस यात्रा में जाने का अवसर मिला।
जमन सिंह जी बताते हैं कि सीमान्त का गर्ब्यांग 250 परिवारों का सुन्दर स्थान था, जिसे छोटी विलायत के नाम से पुकारते थे। यहाँ तीन-चार मंजिले के नक्कासीदार शानदान मकान थे, इनमें सबसे उपर मंजिल पर रसोई बनाई जाती थी। सन् 1957 से ग्राम में भूधंसाव हुआ और धीरे-धीरे भारी नुकसान हो गया। चूंकि पढ़ाई के लिये मौसम अनुसार माइग्रेशन व्यवस्था थी और ग्राम से हम लोग धारचूला आते थे लेकिन गर्ब्यांग की हालत देखते हुए जूनियर हाईस्कूल गर्ब्यांग को गुंजी में खोला गया। दूसरी जगह स्कूल खुलने से विद्यार्थी संख्या एकदम नहीं हो सकी, ऐसे में स्कूल की मान्यता बरकरार रखने के लिये पिता जी (पधान मनोरथ सिंह) ने मेरा व चचेरे भाई का प्रवेश उस स्कूल में करवाया। हमें स्कूल को मान्यता मिलने की खुशी थी।
गर्ब्यांग में भूधंसाव का खतरा झेल रहे लोगों को तराई के दिनेशपुर में जगह दी गई, उसके बाद सितारगंज में परिवार भूमि आवंटन हुई। सिद्ध गर्ब्यांग नामक स्थान में गर्ब्याल परिवार रहते हैं। इस प्रकार अपनी ढेरों यादों के साथ यह गर्ब्याल दम्पत्ति रेशमबाग, कुसुमखेड़ा हल्द्वानी में निवास कर रहा है लेकिन इनकी यादों का हिमायल वहीं है।