पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
एम.एस.सयाना दीवान सेठ जी मूलतः चिलकिया, पिथौरागढ़ के रहने वाले थे। उनके पिता स्व. चन्द्र सिंह पांगती समाजसेवी थे। उन्होंने अपने समय में गाँव में स्कूल खुलवाए, घराट बनवाए तथा रास्ते का निर्माण किया। दीवान सेठ जी अपने समय के जोहार समाज के जानेमाने सेठ थे, तिब्बत व्यापार के समय बागेश्वर उत्तरायणी मेले में तिब्बती भेड़ का उन गांधी आश्रम वालों को बेचा करते थे। एक बार उन का दाम इतना बढ़ गया कि सूठ जी दो बक्सा नोट अपने खच्चरों में लाद कर चिलकिया गये, व्यापार घटने के बाद उन्होंने भैंसखाल में आरामशीन लगवाई परन्तु लकड़ी के अभाव से मशीन बन्द करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने जंगलात का कार्य किया, उसमें भी अपेक्षाकृत लाभ नहीं हुआ। इस कार्य को छोड़कर उन्होंने ‘दीवान ट्रान्सपोर्ट’ की स्थापना की। अपने समय में सेठ जी ने सभी गरीब तबके लोगों की खूब मदद की। किसी की बेटी की शादी हो या कोई दुःख बीमार हो, सेठ जी सभी को उधर दिया और कभी किसी से भी पैसे लौटाने के लिये तकाजा नहीं नहीं करते थे। जिसने लौटाया तो ठीक नहीं लौटाया तो उनको कहना तौहीन समझते थे। सेठ जी को अनेकों लोगों ने पैसे नहीं लौटाये। वे सही मायने में गरीबों के मसीहा थे। जब वे हल्द्वानी में आकर बसे तो भोटिया पड़ाव में 52 बीघा जमीन जोहार संघ के नाम से लीज पर थी, यदि वे चाहते तो कई बीघा अपने नाम कर सकते थे परन्तु उनकी इतनी महानता कि उन्होंने एक इंच जमीन अपने नाम नहीं की तथा औरों को जमीन दिलाई। जमीन के सम्बन्ध् में अनेक विवाद भी होते रहते, लोग अपनी समस्याएं लेकर सेठ जी के घर जाते थे, वे आसानी से उनका समाधान कर देते थे। उनका निर्णय सर्वमान्य हुआ करता था। सभी पड़ाववासी उनका आदर करते थे क्योंकि उनका कहीं पर भी किसी प्रकार लोभ लालच नहीं था। ऐसे निस्वार्थ व्यक्तित्व को जोहार रत्न से नवाजा जाना चाहिये। ———————————————————————— स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुस्तक ‘हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखे’ में भी स्व.दीवान सिंह जी के सीमान्त ट्रान्सपोर्ट सहित तमाम रोचक जानकारियों का उल्लेख है।
पुस्तक समीक्षा डा.पंकज उप्रेती हिमालय संस्कृतियों का जनक है और आज भी इसकी आदि संस्कृति उपस्थित है। समय के साथ बहुत कुछ बदला है लेकिन बीज हमेशा अंकुरित होते हैं। हिमालयी संस्कृतियों में जोहार घाटी के जेष्ठरा बारापटिया समाज की संस्कृति भी इस प्रकार की पुरातन संस्कृति है। कभी गोरी नदी के दोनों ओर इस समाज का काफी जमजमाव था। इन्हीं का एक गाँव है- बोथी। बोथी के बोथियालों को जेष्ठरा यानी ज्येष्ठ/सयाना/बड़ा माना जाता है। जैसा कि सभी समाजों में प्रचलित है कि ज्येष्ठ को अधिक अधिकार दिये जाते हैं और उसकी जिम्मेदारी भी ज्यादा होती है। वही स्थिति बारापटिया ज्येष्ठराओं की भी रही है। अपने समाज को आगे बढ़ाना, उसे सुरक्षित रखना ज्येष्ठ यानी बड़े का धर्म भी है। अपने इसी धर्म के पालन के लिये इस समाज के बुजुर्गों ने जब जोहार घाटी में कदम रखा तो यह जनशून्य स्थान उन्हें अनुकूल लगा। घोर जंगल और जंगली जानवरों के बीच हिमालय के कई रंग उन्होंने निहारे और तय कर लिया कि यहीं अपने घरौंध्े बनायेंगे। बस, फिर क्या था। कृषि योग्य भूमि को तराश कर खेतीबाड़ी की जाने लगी, पशुपालन किया जाने लगा। शान्तिप्रिय और आस्थावान लोग कैलास मानसरोवर के दर्शन को भी जाने लगे। व्यापार के सिलसिले में तिब्बत में भी इनकी यात्राएं होती थीं। इस प्रकार बारपटिया संस्कृति फैलती चली गई। यहीं से शुरू हुआ है ‘बारह पाट का घाघरा’ वाला किस्सा। याने इनके परम्परागत वस्त्राभूषण इतने भारी और रौबदार होते थे कि हर किसी के बस की बात नहीं। इस क्षेत्र के पुरुष बारह पाट का उफनी लमकोट बखुला और सिर में बारह हाथ लम्बी पगड़ी पहनते थे। महिलाएं बारह पाट घाघरा आघरा और सिर में सफेद खौंपी पहनती थी। जोहार-गोरीफाट के विभिन्न बाहर पट्टियों में सदियों से ज्येष्ठरा लोग बसे हुए थे। तेहरवीं-चैदहवीं सदी में इनका बड़ा व्यापारिक काम था। ज्येष्ठराओं में धील्ली गोल्फाल और हरपू बनिया बड़े व्यापारी बताये जाते हैं। किन्तु उच्च हिमालयी परिस्थितियों एवं तिब्बत क्षेत्र में लूटपाट की वहज से ज्येष्ठराओं ने व्यापार की अपेक्षा जमीदारी का कार्य अपना लिया। पुरातन संस्कृति के वाहक इन लोगों द्वारा दुर्गमता का वह स्वाद चखा गया जो इन्हें विपरीत स्थितियों में भी हौंसला देता है। आज भले ही समाज का फैलाव पहाड़ से मैदान तक हो चुका है और गाँव से शहर बनने की होड़ है लेकिन किसी भी समाज की जड़ें उसके मूल में होती हैं। उसका यह मूल उसका गाँव, उसकी संस्कृति है। दुर्गा सिंह बोथियाल बारपटिया समाज के उन अनुभवी व बुद्धिजीवियोें में से हैं जिन्होंने वर्तमान के हालात और अवसरों को जानते हुए ‘‘बोथी’’ के बहाने अपनी संस्कृति को उजागर किया है। सीमान्त की दुर्गम स्थितियों से तपकर निकले दुर्गा सिंह जी बैंकिंग सेवा में रहे हैं लेकिन उनके लिखने-पढ़ने और समाज के लिये सजगता का भाव हिमालयी संस्कृति के एक हिस्से का परिचय करवा रहा है। ‘बोथी’ के बहाने यह यह एक दस्तावेज होगा। श्री दुर्गा सिंह जी के लेखन में ठैठ ग्रामीण परिवेश के शब्दों का आना स्वाभाविक है, जिससे इसकी संस्कृति और सांस्कृतिक झांकी को समझना आसान हो जाता है। वह अपने बचपन के जिये हुए को इस पुस्तक की भूमिका में धाराप्रवाह लिखते हैं और अपने बुजुर्गों को याद करते हैं। बोथी में बसासत की कहानी इतनी रोमांचक और सच्ची है कि वह पुरातन समाज के सच्चे रिश्तों को उजागर करती है। बोथियाल द्वारा लोहार को किसी सुरक्षित और उन्नत स्थान की खोज के लिये भेजने पर लोहार ठीक उसी प्रकार अपने गुसांई के लिये निकल पड़ता है जैसे भगवान राम जी के आदेश पर हनुमान निकल पड़ते थे। हनुमान की सी सेवा और भक्ति हम बोथी के लोहार की भी देखते हैं। इस पुस्तक में ‘पारिवारिक वृक्ष’ के रूप में श्री दुर्गा सिंह जी ने बुजुर्गों से लेकर वर्तमान पीढ़ी तक जिस प्रकार उल्लेख कर दिया है वह आने वाली पीढ़ियों के लिये महत्वूपर्ण होगा। साथ ही ‘लोहार’ परिवार की भूमिका को उन्होंने बहुत आदर के साथ बताया है। उनकी भी पीढ़ियों का उल्लेख इसमें है, जो सीमान्त क्षेत्र के उन लोगों के बारे में जानकारी दे रहा है अपने हुनर के अलावा अपनी परम्परा को बनाये रखने में निरन्तर रहे हैं। श्री बोथियाल जी ने अपने बचपन के खेलों और ग्रामीण परिवेश का वर्णन करने के साथ ही बोथियालों के बारे में बताया है कि या तो वे महर लोगों में से हैं या कुथलिया बोरा। क्योंकि इनके पास इस प्रकार के प्रमाण मिले हैं और उन्होंने स्वयं भी देखा है। यह सब शोधार्थियों के लिये भी शोध् का विषय हो सकते हैं। इतना जरूर है कि महर और कुथलिया बोरा दोनों कुछ दूरी पर आज भी हैं। रा.स्ना.महाविद्यालय पिथौरागढ़ के संगीत विभाग में रहते हुए मैंने स्वयं कुमौड़ सहित महरों की शानदार परम्पराओं को देखा है। इसी प्रकार रा.स्ना.महाविद्यालय बेरीनाग के संगीत विभाग में रहते हुए कुथलिया बोरा संस्कृति को नजदीक से देखा। गंगोलीहाट के बौराणी क्षेत्र में भांग की पौध से चीजें बनाने की वही संस्कृति रही है जिसका उल्लेख श्री बोथियाल जी कर रहे हैं। यह इतना विशद विषय है कि इस पर अध्ययन जरूरी है। फिलहाल, बोथी को लेकर हिमालय की जिस संस्कृति का यह दस्तावेज है, वह सिर्फ एक गाँव का नहीं बल्कि पूरे समाज का है। इस प्रकार के अध्ययन से उन भूली-विसरी जानकारियांे के बारे में पता चलता है जिसकी बहुत से लोग केवल कल्पना मात्रा करते होंगे। दुर्गा सिंह बोथियाल जी के सद्प्रयासों का लाभ समाज को होगा इन्हीं कामनाओं के साथ। -डाॅ. पंकज उप्रेती
अस्कोट राजा के दीवान परिवार से सम्बन्ध् स्व. केशवदत्त अवस्थी अस्कोट गर्खा के उन बुद्धिजीवियों में रहे हैं जिन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये अपने को समर्पित किया। इनका सम्बन्ध् अस्कोट राजा के दीवान अवस्थी परिवार से है। इनके पिता मोतीराम अवस्थी राजा के दीवान थे। इसी परम्परा में इनके बड़े भाई भी पदवी संभाले हुए रहे। केशवदत्त बचपन से ही बिलक्षण प्रतिभा के थे और शिक्षा में विशेष रुचि के कारण इन्हें उसी प्रकार की सुविधा दी गई। केशवदत्त जी का जन्म अस्कोट गर्खा इलाके के नरेत ग्राम में सन् 1902 को हुआ था। इनके पिता स्व. मोतीराम अवस्थी व माता स्व. श्रीमती हंसा अवस्थी थे। बाल्यकाल से ही प्रखर बुद्धि के केशव ने मिडिल की परीक्षा जूनियर हाईस्कूल बजेटी में प्राप्त की। हाईस्कूल व इण्टर की परीक्षा रैमजे इण्टर कालेज अल्मोड़ा से पूर्ण की। स्नाकत की पढ़ाई 1927 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। पढ़ाई के साथ-साथ बेहतर खिलाड़ी केशवदत्त जी मेरठ यूनिवर्सिटी की फुटबाल टीम का नेतृत्व किया। इनके बड़े भाई हरिबल्लभ अवस्थी अस्कोट राजा के दीवान थे।
केशवदत्त अवस्थी ने स्नातक उत्तीर्ण करने के बार काशीपुर के एक विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक नियुक्त हो गये। एक वर्ष बाद इनका स्थानान्तरण लोहाली ;नैनीताल में हो गया। उसके बाद भाॅतड़ ;थल, दशाईथल में रहे। गंगोलीहाट के जाह्नदेवी नौले के पास इन्होंने संस्कृत पाठशाला की स्थापना की। बाद में गर्खा जनता कालेज के प्रथम प्रधानाध्यापक बने। अवस्थी जी गणित, अंग्रेजी, संस्कृत, इतिहास, उर्दू के प्रकाण्ड विद्वान थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इनके इतिहास के गुरु सी.आर.गोरखपुरी व ईश्वरी प्रसाद थे। एक बार नारायण नगर ;डीडीहाट में नारायण स्वामी ने इन्हें अपने विद्यालय में आने का प्रस्ताव किया लेकिन स्वतंत्रात प्रकृति के केशवदत्त जी ने जाने से मना कर दिया। सन् 1942 में अंग्रेज पता लगाते हुए इनके ग्राम नरेत पहँुचे और पूछा- यहाँ कौन व्यक्ति ग्रेजुएट करके आया है। जानकारी मिलने पर कि केशवदत्त ग्रेजुएट हैं उन्हें प्रस्ताव दिया गया कि अंग्रेजी सेना में सीध्े लेफ्रिटनेंट बनाया जायेगा लेकिन अवस्थी जी ने अंग्रेजों के साथ जाने से मना कर दिया। उन्होंने आजीवन शिक्षण कार्य को ही अपनाया। सेवानिवृत्ति के बाद नेपाल सरकार ने उन्हें अपने बुलावा भेजा और वह दो वर्ष नेपाल के थाराकोट में प्रधानाध्यापक रहे। इनके प्रमुख शिष्यों में मोती लाल चैधरी, वंशीलाल विश्वकर्मा, फकीर दत्त ओझा, महिपाल सिंह भैसोड़ा, कृपाल सिंह भैसोड़ा, भुवनचन्द्र गुणवन्त आदि रहे। इनके दो पुत्र थे। बड़े पुत्र स्व. गोविन्द बल्लभ अवस्थी एमईएस पिथौरागढ़ में एसडीओ के पद पर रहे तथा छोटे पुत्र जगदीश चन्द्र अवस्थी काॅपरेटिव बैंक से सेवानिवृत्त हो गए हैं। अवस्थी जी का का 13 जून 1979 को अपने पैतृक निवास नरेत में निधन हुआ। इनके तीन पौते हैं- सी.एम.अवस्थी डहरिया हल्द्वानी, प्रदीप अवस्थी विवेकानन्द इण्टर कालेज पिथौरागढ़, दिनेश अवस्थी मीडिया से जुड़े हैं। स्व.अवस्थी के भतीजे ध्रणीध्र जी लखनउ विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग में रीडर थे और छोटे भाई आनन्दमोहन नाॅर्थ जोन देहरादून ओएनजीसी में जनरल मैनेजर से सेवानिवृत्त हुए। इस प्रकार हम देखते हैं कि अवस्थी परिवार की शाखाएं तमाम जगह फैल चुकी हैं लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े भाई बन्ध्ु परम्पराओं को बरकरार रखे हुए हैं