बरपटिया समाज ने कृषि में उन्नत स्थान बनाया तो शौका समाज ने उनी कारोबार में

प्रेम सिंह जंगपांगी से बातचीज
डॉ. पंकज उप्रेती

सीमान्त क्षेत्र मदकोट के ‘इमला’ गाँव को लेकर आज की विशेष बातचीत श्रीमान प्रेम सिंह जंगपांगी के साथ है। इमला गाँव की पहचान सिर्फ पहाड़ों से नहीं बल्कि यहाँ बसने वाले शौका और बरपटिया समाज की साझा विरासत से है। सांस्कृतिक रूप से खास घाटियों में इसकी गणना होती है। जोहार घाटी के इस क्षेत्र में गोरी और सहायक नदियां बहती हैं। अपनी संस्कृति और परम्परा को जीने वाले लोगों ने जिस जीवटता के साथ अपने को स्थापित किया वह प्रेरणादायक है। बैंकिंग सेवा में रहे श्रीमान प्रेम सिंह जी कहते हैं- ‘‘इमला का बचपन सीख दे गया। आतिथ्य सत्कार का जो भाव बड़े-बुजुर्गों में था वह पीढ़ियों में है। माता पार्वती देवी गृहस्थ जीवन में जिस तनमयता के साथ हर आने वालों का मान-सम्मान करती थीं, उनका आशीर्वाद किसी न किसी रूप में हम सभी परिजनों को मिलता रहा है।’’
बातचीज का यह सिलसिला आगे बढ़े उससे पहले श्री प्रेम सिंह जी के बारे में बताते हैं- बुर्फू में एक हुए मान सिंह जंगपांगी। इनके चार पुत्र एक पुत्री हैं, जिनमें रुद्रसिंह, मोहनसिंह, रामसिंह, मानधाता सिंह खिमुली देवी। अब यदि इनकी अगली पीढ़ी की बात करें तो रुद्रसिंह जी के सुपुत्र हुए- नन्दन सिंह, प्रेम सिंह। मोहन सिंह जी के गणेश सिंह, हरीश सिंह। राम सिंह जी के नरेन्द्र सिंह, भूपेन्द्र सिंह। मानधाता सिंह के पूरन सिंह, पुष्कर सिंह। खिमुली देवी का विवाह रावत परिवार में हुआ। वह दौर जब सीमान्त में सीमा पार व्यापार और मौसम अनुसार माइग्रेशन का का निश्चित समय था, जंगपांगी परिवार भी बुर्फू से घाटी में उतर आता। जाड़ों के दिनों में यह लोग भकुण्डा, इमला मेें आते। प्रेमसिंह जी का जन्म इमला में 1963 में हुआ।
बचपन की पाठशाला इमला में होने के कारण बचपन के वह दिन हमेशा याद करने वाले श्री जंगपांगी बताते हैं कि कोटाल गाँव, गोल्फा, इमला का एक एक प्राइमरी स्कूल था- जसपुर खान। 1963 में शुरू हुए इस स्कूल में इन तानों गाँवों के सभी बच्चे पढ़ने जाते थे। आज भी ये स्कूल शिक्षा की नींव माना जाता है। जसपुरखान इमला की विरासत है। इमला से प्राइमरी के बाद प्रेम सिंह जी ने मदकोट से हाईस्कूल, मुनस्यारी से इण्टर फिर नैनीताल से स्नातकोत्तर किया। 1989 में बैंकिंग सेवा आते हुए इनकी पहली पोस्टिंग इलाहाबाद बैंक मलिहाबाद, लखनउ में हुई। दस साल ठहराव के बाद नैनीताल पिफर लखीमपुर में इनकी सेवा रही। इसके बाद उत्तराखण्ड में शेष सेवा काल रहा और सन् 2003 में हल्द्वानी में वरिष्ठ प्रबन्धक के रूप में सेवानिवृत्त हुए।
अपने बचपन, शिक्षा और बैंकिंग सेवा के लम्बे सफर में श्री जंगपांगी को बचपन हमेशा याद रहा है। वह बताते हैं- जब वह 7-8 में पढ़ते थे, इमला गाँव में रामलीला शुरू हुई। गोकुल राम तालीम करवाते थे, बाद में गोविन्द सिंह पंचपाल तालीम देने आए। उस समय के जिस भी युवा ने रामलीला में पात्र की भूमिका निभाई, संयोग से सभी नौकरी में लग गये। अपनी जन्मभूमि को लेकर वह कहते हैं- कृषि और घरेलू उद्योग-धन्धें से जुड़े कर्मठ लोगों की भूमि है इमला। बरपटिया समाज ने कृषि में उन्नत स्थान बनाया, वहीं शौका समाज ने उनी कारोबार को बढ़ावा दिया। मदकोट का यह क्षेत्र जितना उपजाउ है उतना ही संस्कार और सीख देने वाला भी है। वह बताते हैं कि मल्ला दुम्मर में होने वाली हरि प्रदर्शनी के लिये बुजुर्गवार घोड़ों सहित अन्य सामग्री के साथ जाते थे। तब प्रदर्शनी में पशुओं की प्रदर्शनी मुख्य रूप से लगती थी। घरेलू कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिये लगने वाली प्रदर्शनी में दन-कालीन इत्यादि सामान इमला से तक लाया जाता था। इस बहाने अपने इष्ट-मित्रों से भेंटघाट का अवसर भी होता। यह प्रदर्शनी वर्तमान तक भी वदस्तूर जारी है और इसमें नई पीढ़ी के लोग जुड़ रहे हैं।
प्रेम सिंह जी का विवाह बूंगा, मुनस्यारी के रावत परिवार में हुआ। अपने समय के प्रधान जोत सिंह रावत श्रीमती लीला रावत की सुपुत्री प्रभा जी से से इनका विवाह हुआ। श्रीमती प्रभा शिक्षा विभाग से जुड़ी हैं। मुनस्यारी से अपनी सेवा का सफर आरम्भ करते हुए वह धुलई, घोड़ाखाल में रहीं। इसके बाद जूनियर हाईस्कूल भीमपुर, कमोला नैनीताल में सेवारत हैं। इनके सुपुत्र मयंक जंगपांगी जेएनयू से शिक्षा के बाद दिल्ली में और सुपुत्री शिवानी बंगलौर में हैं। वाकेई हम जिन दुर्गम क्षेत्रों को बेढप मान लेते हैं, वहीं से उपजे लोग अपनी जीवटता और ईमानदारी से किस प्रकार रास्ते बनाते हैं, यह प्रेम सिंह जंगपांगी के सफर से सीखने को मिलता है।

यादों के अलावा समर्पण जरूरी है

गोविन्द सिंह जंगपांगी से बातचीज
डॉ.पंकज उप्रेती
किसी भी समाज को बनाने के लिये यादों के अलावा समर्पण जरूरी है। अपने समाज के लिये ऐसे ही समर्पित हैं श्रीमान गोविन्द सिंह जंगपांगी। वरिष्ठ नागरिक के अलावा ‘बूबू’ के रूप में प्रतिष्ठि जंगपांगी जी की बात करें तो जोहार के पदम सिंह जंगपंागी के पुत्र हुए मान सिंह जंगपांगी। पिता मानसिंह और माता श्रीमती चन्द्रा देवी के घर गोविन्द सिंह व मंगल सिंह ने जन्म लिया। 3 मार्च 1949 को बुर्फू में जन्मे गोविन्द सिंह सीमान्त के जिस दुरुह क्षेत्र से आते हैं उतनी ही गहराई उनके व्यवहार में है।
बचपन की पढ़ाई दरांती ग्राम में हुई। माइग्रेश के रूप में जब-जब परिवारों की यात्रा होती इनका परिवार भी बुर्फू से दुम्मर आता। बुपर्फू, दरांती के अलावा अपने मामकोट छिनका, गढ़वाल में शिक्षा दीक्षा के बाद अल्मोड़ा कालेज से पढ़ने वाले गोविन्द सिंह जी सन् 1071 में आर्मी में भर्ती हो गए। 6 साल तक सेना की सेवा के बाद ओरिएंटल इंश्योरेंश कम्पनी लि. में इनका प्रतिभा का लाभ मिला। मार्च 2009 में डिविजन मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त होने वाले ‘बूबू’ जी ने समाज में अपनी सक्रियता को बरकरार रखा है।
बुर्फू से जंगपांगी परिवार मल्ला दुम्मर, भकुण्डा, इमला में रहने लगे थे। अपने बचपन की यादों में डूबते हुए गोविन्द सिंह बताते हैं- बचपन का एक खेल था केले/कदली के पेड़ की डंठ्ल में द्यार डालकर उसे जलाते हुए लालटेंन जलाते थे। परिवार ह्यून/जाड़ों में भकुण्डा आ जाता और गर्मी में बुर्फू जाता था। तिब्बत व्यापार की अवसर इन्हें नहीं मिला लेकिन वह यादें इनके साथ जुड़ी हैं जब व्यापारी तिब्बत जाते थे और वहाँ से भी आने वाले जोहार आते थे। वह बताते हैं जिस प्रकार ब्राह्मणों के जजमान
होते हैं उसी तरह तिब्बती मित्रों यहाँ के लोगों से सम्पर्क था यानी अपने-अपने घनिष्ट परिवार मित्रों के पास उनका आना-जाना था और तिब्बत लौटते समय वह उपहार स्वरूप हुनकारा तिब्बती बकरी परिवार को देकर जाते थे। हुनकारा की यादें भुलाए नहीं भूलती जब लोगों में परस्पर मेल होता था।
वास्तव में श्री जंगपांगी जी की बातों का मर्म यह बताता है कि दुर्गमता के रास्तों में राहें तब भावना हो और समाज के लिये कुछ करने की ललक। अपनी सेवाओं के दौरान समाज और मित्रों के लिये समर्पित रहे गोविन्द सिंह जी सेवानिवृत्त के बाद भी बेहद सक्रिय हैं और उनकी कोशिश हमेशा जोड़ने की रही है। मल्ला जोहार में होने वाली हरि प्रदर्शनी से लेकर अन्य तमाम आयोजनों पर ठोस कार्य के पक्षध्र श्री जंगपांगी जी पिघलता हिमालय परिवार के भी भी संरक्षक रूप में रहे हैं।
उनसे हुई भंेटवार्ता केवल समाचार विचार तक सीमित नहीं बल्कि उन पुरानी यादों को ताजा करना भी है जिससे नई पीढ़ी को उन पुराने दिनों की याद आ सके जब गर्मी-जाड़ा-बरसात में यात्राओं के बीच निकलने वालों ने अपने रास्ते हमेशा सच के साथ बनाए और बहुत ही ईमानदारी से रिश्तों को निभाया। श्री जंगपांगी प्रतिवर्ष मल्ला जोहार हरि प्रदर्शनी के लिये भी तत्परता से जुटते हैं और यत्र-तत्र निवास करने वाले प्रवासियों की टोह भी लेते हैं ताकि वह समाज के प्रति जुड़ाव बनाए रखें। इनकी सहजता-सरलता समाज के प्रति समर्पण को बताता है। वाकेई समाज में इस प्रकार के सयानों का होना सुखदाई है जो स्थितियों को सम्भालते और रास्ते दिखाने का काम करें। इनके अनुभवों का लाभ नई पीढ़ी ने लेना चाहिये।