‘तरकेब’ लगाकर होती थी हरि प्रदर्शनी

गोविन्द सिंह जंगपांगी

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्त के महान स्वतंत्रता सेनानी हरिसिंह जंगपांगी की याद में प्रतिवर्ष होने वाली प्रदर्शनी इस बार भी नवम्बर में होगी। इस प्रदर्शनी को आजादी के बाद से लगातार मल्लादुम्मर मुनस्यारी में मनाया जा रहा है। इसे बनाये रखने में क्षेत्रावासियों की श्रद्धा और लगन है। प्रदर्शनी के शुरुआती दिनों में जब कोई साधन नहीं थे ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर लोग जुटते थे। उन पुरानी यादों को बताने के लिये 69 वर्षीय गोविन्द सिंह जंगपांगी जी से बातचीत के बाद यह प्रस्तुति है-
जंगपांगियों का गाँव बुर्फू में हुआ। बूबू पद्मसिंह के पुत्रा हुए मान सिंह, पान सिंह और विजय सिंह। इन्हीं मान सिंह के पुत्र हैं- गोविन्द सिंह और मंगल सिंह। विजय सिंह के पुत्र हैं- शेरसिंह और माधे सिंह। पिता मानसिंह माता चन्द्रा जंगपांगी के घर बुर्फु में जन्मे गोविन्द सिंह ने जीवन के कष्टकर दिनों को बचपन में गुजारा है। छोटी उम्र में पिता के निधन के बाद मामा जी संरक्षण में शुरुआती शिक्षा गढ़वाल में हासिल की। लौटकर मुनस्यारी में फिर अल्मोड़ा से शिक्षा ली। 1971 में आर्मी में भर्ती होने के बाद आठ साल नौकरी की और ओंरिएटल इंश्योरेंशन में सेवा के लिये आ गये। यहीं से मण्डलीय प्रबन्धक पद से 2009 में सेवानिवृत्त हुए।
जंगपांगी परिवार भी सीमान्त के अन्य परिवारों की भांति माइग्रेशन में एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहे हैं। इनका परिवार बुर्फू, मल्लादुम्मर और भकुंडा;नाचनी के पास में क्रमवार रहता था। अपनी लगन और परिश्रम से मुकाम हासिल करने वाले गोविन्द सिंह जी का विवाह जोहार की महान विभूति रामसिंह पांगती की नातिनी तारा से हुआ। श्रीमती तारा जंगपांगी अध्यापिका होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में शुरु से ही बेहद अभिरुचि रखती हैं। सेवानिवृत्ति के बाद यह दम्पत्ति जोहार नगर, हल्द्वानी में निवास कर रहा है और दुम्मद की हरिप्रदर्शनी सहित सभी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय है
अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए गोविन्द सिंह जी बताते हैं कि साधन नहीं के बराबर थे लेकिन हरि प्रदर्शनी का उत्साह लोगों में बहुत था। इलाके की एकमात्र अलग तरह की इस प्रदर्शनी में लोग ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर जुट जाते थे। तब लगभग सभी परिवारों के पास तरकेब हुआ करते थे, क्योंकि मल्लाजोहार से लेकर गर्म घाटी तक यात्रा करते समय इनकी आवश्यकता होती है। पुराने लोगों में प्रेम सिंह जंगपांगी, नरसिंह जंगपांगी का नाम उल्लेखनीय है। सक्रियता की इस परम्परा को महेन्द्र सिंह ‘महन्त’ जंगपांगी ने भी निभाया। पुराने समय में नेत्र सिंह ल्वाल सांस्कृतिक प्रस्तुति और बच्चों को सिखाने के लिये आते थे। बम्मई में रहकर शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ले रहे नेत्रसिंह जी प्रत्येक वर्ष इस मौके पर दुम्मर आते थे। उनके भाई प्रताप सिंह भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में साथ देते। प्रदर्शनी के लिये घरेलू उत्पादों का बहुत सामान आता रहा है। श्री जंगपांगी चाहते हैं कि परम्परा बन चुकी यह प्रदर्शनी हमेशा चलती रहे और नई पीढ़ियां इससे सीखें।

यह एक कौम का सवाल नहीं बल्कि हमारी सीमा पर एकता का प्रतीक है

पि.हि. प्रतिनिध्
मुनस्यारी। श्री हरि स्मारक समिति द्वारा इस बार भी महान स्वतंत्राता संग्राम सेनानी हरि सिंह जंगपांगी की याद में आयोजन किया गया। मल्ला दुम्मर में हुई हरि प्रदर्शनी में क्षेत्रावासियों ने जबर्दस्त उत्साह के साथ भागीदारी की। साथ ही इस बात पर आश्चर्य कि आजादी के बाद से अपने संसाध्नों पर निरन्तर चलने वाली इस प्रदर्शनी के लिये किसी भी प्रतिनिध् िद्वारा सहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया गया जबकि उत्तराखण्ड में जगह-जगह महोत्सव के नाम पन घोषणाएं व राशि वितरण करने का रिवाज सा बन गया है।
उल्लेखनीय है कि जंगपांगियों द्वारा मल्ला दुम्मर में बहुत ही उत्साह व क्रम से प्रतिवर्ष करवाये जाने वाला यह आयोजन मात्रा एक कौम का सवाल नहीं बल्कि हमारी सीमा पर एकता का प्रतीक भी है। देश के लिये मर-मिटने वाले जोहार के तमाम स्वतंत्राता सेनानियों का स्मरण इस मौके पर किया जाता है और ध्वजारोहण के साथ दुर्गम क्षेत्रा में रहने वाले सभी लोग मिल-बांटकर आयोजन को सपफल करते हैं। छोटे बच्चे भी ‘हरि बूबू की जै’ जैसे नारे लगाते हुए दिखाई देते हैं। यहाँ होने वाली सारी गतिविध्यिां अपने देश की सीमा की रक्षा के लिये संकल्प लेने वाली, अपने कुटीर उद्योग ध्न्धें को बनाये रखने, अपनी कृषि व पशुपालन को बढ़ावा देने के लिये हैं। मनोरंजन के लिये सांस्कृतिक मंच भी सजता है और शिक्षाप्रद कार्यक्रम किये जाते हैं। इतना होेने पर भी, हरि प्रदर्शनी के स्वरूप को और भव्यता देने की दिशा में स्थानीय जनप्रतिनिध्यिों का रुचि न लेना आश्चर्यजनक है।
इस बार भी हरि प्रदर्शनी के मौके पर ग्रामवासियों ने सांस्कृतिक मंच पर और अपने उत्पादों की प्रदर्शनी लगाकर प्रतिभा का परिचय दिया। मल्ला जोहार आने-जाने के आदी लोगों का भी यहाँ जुटना सुखद है। समिति के संरक्षक विजय सिंह जंगपांगी, अध्यक्ष ललित सिंह जंगपांगी, सचिव गंगा सिंह जंगपांगी, प्रधन पंकज वृजवाल, लोकबहादुर सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह ध्पवाल, धम सिंह बरपफाल, मंगल सिंह जंगपांगी, मंगल सिंह मर्तोलिया, श्रीरामसिंह ध्र्मशक्तू, गोकर्णसिंह मर्तोलिया, नेत्रासिंह पांगती, खुशाल सिंह, गजराज सिंह, गजेन्द्र सिंह, नरेन्द्र सिंह, भूपेन्द्र जंगपांगी, नारायण सिंह, लक्ष्मण लछबू, राजेन्द्र मर्तोलिया, मनोज ध्र्मशक्तू सहित बड़ी संख्या में लोग जुटे। समाचार लिखे जाने तक प्रदर्शनी जारी थी। ;हरि प्रदर्शनी सम्बन्ध्ी समाचार अगले अंक में भी पढ़ें।द्ध
पिघलता हिमालय 7 नवम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित

हरि प्रदर्शनी शुरु करवाने व समाजसेवा में अग्रणीय थे नरसिंह जंगपांगी

 

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्त क्षेत्रा में मल्लादुम्मर में होने वाली हरि प्रदर्शनी क्षेत्रा की इकलौती यादगार प्रदर्शनी है जो आजादी से लेकर आज तक प्रतिवर्ष होती है। इसमें कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने के अलावा स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण किया जाता है। स्व.हरिसिंह ज्यू के याद में होने वाली इस प्रदर्शनी को शुरु करवाने वाले नरसिंह जंगपांगी सहित यादों की लम्बी श्रृंखला को सहेजे श्रीमती कमला रावत उत्तरांचल विहार हल्द्वानी में रहती हैं।
बात जंगपांगी परिवारों की करते हैं तो पता चलता है कि गौचर, थल के पास पतेत में जंगपांगियों का परिवार बसा। यहीं से लगे हुए ससखेत में जंगपांगी परिवार गया। किशन सिंह, मान सिंह, नर सिंह तीन भाईयों ने ससखेत को आबाद किया। किशन सिंह बहुत ही मान्यता वाले व्यक्ति थे और उनकी बात सभी को मान्य थी। इन्हीं के पुत्र हैं- पान सिंह, दीवान सिंह, राजेन्द्र सिंह। दूसरे भाई मान सिंह थे, जिनके पुत्र हुए- मंगल सिंह और महेन्द्र सिंह ‘महन्त’। तीसरे अर्थात छोटे भाई नरसिंह की सात पुत्रियों व एक पुत्र हुए। विवाहित पुत्रियों में खगौती धर्मशक्तू, चन्द्रप्रभा टोलिया, राजेश्वरी पांगती, लक्ष्मी मर्तोलिया, कमला रावत, बसन्ती टोलिया व कोकिला हुईं। पुत्र प्रहलाद सिंह जी ससखेत में हैं। प्रहलाद जी के पुत्र-पुत्रियों में- भूपेन्द्र, महिपाल, देवेन्द्र/दीपू, अनीता पांगती, जुगुनू पांगती, कविता हैं।
नरसिंह जी की पुत्री श्रीमती कमला रावत बताती हैं कि ताउ जी किशन सिंह की बड़ी धाक थी और जनहित के मुद्दों पर सब उनके साथ थे। उनके बाद छोटे ताउ मानसिंह ने भी समाज को जोड़ते हुए परम्परा को बनाये रखा। बुजुर्गों के बाद पिता नरसिंह में भी जिम्मेदारी आई जिसे उन्होंने निभाया। उनका बड़ा परिवार था। तब कृषि व पशु आधारित कुटीर उद्योगधन्धों पर सभी लोग लगा करते थे। खुशहाल गाँवों में चहल-पहल थी। माइग्रेशन सिस्टम में बुर्फू, मल्लादुम्मर, ससखेत तक लोगों का आवत रहती थी। पशुओं के साथ-साथ कई कामगार भी होने से पूरा परिवार व्यस्त था। ऐसे में पठन-पाठन भी प्रभावित होता। पढ़ने की लगन के कारण अवरोध् के बावजूद उन्होंने पढ़ा। तब ससखेत से अल्मोड़ा आने में पांच दिन लग जाते थे। वह पुराने रास्ते तो अब दिखाई भी नहीं देते हैं। अल्मोड़ा में बुआ तुलसी रावत-स्वतंत्रता सेनानी दुर्गा सिंह रावत के घर दूरस्थ क्षेत्रा से बच्चे जाते थे। छात्राओं को बुआ जी के घर में रहने का इन्तजाम था और छात्रों के लिये जोहार भवन में रुकने की व्यवस्था होती थी। अल्मोड़ा में आकर पढ़ने वाले कई छात्रा-छात्राएं काफी आगे पदों तक पहुंचे हैं। जोहार की प्रथम ग्रजुएट इन्द्रा दीदी थीं, जो लखनउ में प्रधनाचार्या रहीं बाद में हल्द्वानी में भी थी।
पढ़ाई के बाद कमला जी जखोली ;टिहरी में एडीओ बनीं। शेरसिंह रावत के साथ विवाह उपरान्त इन्होंने अपनी सरकारी सेवा छोड़ दी। उन दिनों वैसे भी महिलाओं को कम ही नौकरी में भेजा जाता था। अपनी घर-गृहस्थी में रमने के बाद आज श्रीमती कमला रावत पुरानी यादों को तरोताजा रखे हुए बचपन को याद करती हैं। गाँव-घरों के सामुहिक आयोजन, कुटीर उद्योग, व्यापार सिलसिले में यात्रा, पैदल रास्तों होकर मीलों पढ़ने जाना……………………….।
पिघलता हिमालय 1 अगस्त 2016 के अंक में प्रकाशित