करोड़ों भक्तों की आस्था का प्रतीक है पूर्णागिरी दरबार


डाॅ.पंकज उप्रेती

हिमालय के उत्तरपूर्व में नेपाल सीमान्त पर समुद्रतल से लगभग तीन हजार फीट की ऊँची अन्नपूर्णा की चोटी पर स्थित है करोड़ों भक्तो की आस्था का प्रतीक पूर्णाेिगरी दरबार। उत्तर भारत के इस प्रसिद्ध मेले में इन दिनों भारी भीड़ जुटी हुई है। मान्यता के अनुसार पूर्णागिरी दर्शन करने वाले सीमा पार नेपाल ब्रह्मदेव में सि(बाबा मन्दिर के दर्शन भी जरूर करते हैं। नाचते-झूमते भक्तों के जत्थों को इन दिनों टनकपुर से लेकर मन्दिर तक देखा जा सकता है। मेले का यह क्रम पूरी ग्रीष्म रितु तक चलेगा। जिसमें लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामना लिये पहँुचते हैं।
चैत्र मास की प्रतिपदा से लेकर बैसाख के अन्त तक दूर-दूर से आने वाले नर-नारियों का जमघट यहाँ प्रतिवर्ष लगता है। पूर्णागिरी माई की जय, पहाड़ वाली माई की जय, शेरावाली की जय, सच्चे दरवार की जय इत्यादि नारे लगाते हुए यात्री दल मीलों पैदल चलकर पूर्णागिरी मन्दिर दरबार पहँुचते हैं। आरोग्य, गृहस्थ, सुख सन्तान, ऐश्वर्य तथा दर्शन की लालसा लिये यात्रियों की मान्यता है कि उनकी यात्रा से मनोवांछित इच्छाएं पूर्ण होगी। दुर्गा-सप्तष्ती में देवी की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा गया है- ‘‘जो सिंह की पीठ पर विराजमान है। जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है जो मरकत मणि के समान कान्तिवाली अपने चारों भुजाओं मे शंख, चक्र, धनुष वाण धरण करती है व तीन नेत्रों से सुशोभित होती है। जिनके भिन्न-भिन्न अंग बंध्े हुए बाजूबन्द, कंकण, हार, खनखनाती हुई करघनी व नूपुरों से सुशोभित हैं। जिनके कानों में रत्न जड़ित, कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। वे भगवती हमारी दुर्गति दूर करने वाली है।’’
पूर्णागिरी नाम क्यों पड़ा, इस बारे में कहा जाता है कि प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती द्वारा स्वयं को भस्म कर देने पर क्रुद्ध शिवजी जब सती की क्षत-विक्षत देह को आकाश मार्ग से ले चले तब मार्ग में लगभग 51 स्थलों पर देवी सती के अंग गिरे। पूर्णागिरी शिखर पर देवी का नाभि अंग गिरने से यह शिखर एक पुनीत स्थल माना जाने लगा। देवी के मन्दिर के बीच में एक बाॅबी/सुराख है। वह सती की नाभि ही है जिसका निचला छोर शारदा नदी तक गया है। कहा जाता है कि कालान्तर में काठियाबाड़, गुजरात निवासी श्री चन्द्र तिवारी सम्वत् 1621 मे यवनों के अत्याचार से पीड़ित हो कुमायूं के चन्द्रवंशी राजा ज्ञानचंद के दरबार पहँुचे। इस प्राीचन देवी-स्थल की महिमा व स्वप्न में देवी का आदेश होने पर ब्रह्मकुण्ड/बोम के निकट स्नान कर सम्वत् 1632 में माँ पूर्णागिरी की मूर्ति की स्थापना की। इस प्राचीन मन्दिर का पूजा कार्य बाद में तिवारी और बल्हेड़िया वंश के लोगों ने परस्पर बांट लिया। खिलपति में अखिलतारिणी मन्दिर, उग्रतारा व बाराही मन्दिरों की स्थापना का श्रेय भी श्री चन्द्र तिवारी को है।
ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार अन्नपूर्णा शिखर के निकट सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी में, जो शारदा नदी के दूसरी ओर स्थित थी, एक विशाल यज्ञ आयोजित किया था जिसमें सभी देवताओं सहित भगवान शिव-पार्वती भी पधारे थे। निकटवर्ती पर्वत श्रेणियों की रमणीक दृृृश्यावली ने देवी पार्वती का मन मोह लिया और उन्होंने शिव से वहीं निवास करने की आज्ञा मांगी तभी से ब्रह्माजी की प्राचीन यज्ञ स्थली ब्रह्मदेव मण्डी तथा देवी पार्वती का वास स्थल पूर्णागिरी के नाम से विख्यात हुआ।
शारदा नदी के बायें तट पर बरमदेव/बूम के ठीक सामने सि(नाथ का प्राचीन मन्दिर एवं पूर्णागिरी मन्दिर के ठीक नीेचे देवी के चरण-स्थलों पर बना मन्दिर मार्ग की जटिलता के कारण प्रायः भक्तों की पहंँुच से बाहर ही हैं चैत्र मास में शारदा नदी में नावें डालकर बूम से ठाकुर जी की सवारी असली सिद्ध बाबा मन्दिर तक जाती व पूजन आदि कर वापस लौट आती है। सिद्धबाबा एक सिद्ध सन्त व देवी के अनन्य उपासक थे जिस पर पूर्णागिरी माता की विशेष कृपा थी। शक्ति स्वरूपा देवी भगवती ही उनकी इष्ट थी। दिन रात खड़े रहकर सच्चे मन से देवी की अराधना कर उन्हें सम्पूर्ण सिद्धियां व देवी से प्राप्त साक्षात्कार व संभाषण शक्ति प्राप्त हो चुकी थी। किवदन्ती है कि देवी उपासक बाबा सदानन्द व सिद्धमणि पर्वत पर तपस्या रत बाबा सिद्धनाथ में परिचय होने पर देवी की महिमा व चमत्कारों को सुन सिद्धनाथ देवी दर्शन को अष्टमी की महारात्रि को सिंह की चिन्ता किए बिना अन्नपूर्णा शिखर की ओर चल दिये। एकान्त-विश्राम के इन क्षणों में पर पुरुष का आभास पाकर देवी क्रोधित हुए बिना न रह सकी और अपने इस भक्त को दो टुकड़ों में खण्डित कर शिखर से उछाल दिया। जिसका एक भाग शारदा नदी के पार नेपाल राज्य में व दूसरा भारत में बनखण्डी स्थान पर गिरा। देवी के इस कृत्य पर नेपथ्य आत्र्तनाद गूंज उठा- ‘‘देवी! क्या तुम्हारे भक्तों की यही दुर्गति होती है।’ देवी ने अपने भक्त सि द्ध नाथ को दर्शन दिये और आशीर्वाद देकर अन्र्तध्यान हो गई। बाबा लम्बे समय तक देवी-चरणों में सेवारत रहकर देवीधम सिधारे। अन्नपूर्णा शिखर के सामने नेपाल राष्ट्र में बाबा सि द्ध नाथ का प्राचीन मन्दिर व समाधि आस्थावानों के लिये श्र द्ध का केन्द्र है।
यात्रा की कठिन चढ़ाई-
माँ पूर्णागिरी के पुनीत स्थल की यात्रा कठिन चढ़ाई वाली है। देश-विदेश से यात्राीगण टनकपुर भाबर मण्डी में रात्रि विश्राम करते हैं। पैदल आने वाले जत्थे व वाहनों, रेल यात्रा द्वारा पहँुचे यात्राी टनकपुर से ठूलीगाड़ नामक स्थान पर पहँुचते हैं। प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी, महावली भीम द्वारा रोपित चीड़ वृक्ष, पाण्डव रसोई तथा उनकी उत्तराखण्ड यात्रा के पड़ाव स्थल इसी के समीप हैं। ठूलीगाड़ में प्रथम पड़ाव के साथ ही लगभग 5 किमी. की पथरीली पहाड़ की चढ़ाई पूरी करनी होती है। इस मार्ग पर बासी की चढ़ाई पूरी कर हनुमान चट्टी, ढलान पर लादी खोलाा, हल्की चढ़ाई पूरी कर पानी की टंकी व पर्यटक आवास दिखाई देता है। कुछ और चलने के बाद भैरोंचट्टी, पुरानी बाँवली व टुन्नास, काली मन्दिर, झूठा मन्दिर के बाद माता का दरबार मिलता है।
मान्यता है कि पहाड़ वाली माई की कृपा अबोध् बालकों, अशक्त महिलाओं तथा वृ(जनों को अपनी शरण में खींच लेती है।
टुन्नास से पवित्रा होकर यात्राीगण काली मन्दिर से आगे लगभग एक किमी की दुर्गम चढ़ाई, जो अब सीढ़ियाँ बनने तथा लोहे के पाइप लगने से सुगम हो गई है, प्रारम्भ करते हैं। इस मार्ग में झूठा मन्दिर, काली मन्दिर इत्यादि के दर्शन के साथ ही नैसर्गिक शोभा को निहारते यात्राी माता के नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। सामने की पर्वत श्रृंखला में मित्रा राष्ट्र नेपाल की सीमा पर देवी के अनन्य उपासक सि द्ध बाबा के प्राचीन मन्दिर के दर्शन भी यात्राी जरूर करते हैं। इसके बिना यह यात्रा अपूर्ण मानी जाती है।
टुन्नास बनाम इन्द्रभवन-
देवराज इन्द्र द्वारा गौतम ट्टषि की पत्नी अहिल्या से छलपूर्वक मिलने की कथा सर्वविदित है। कुपित ट्टषि के शाप से मुक्ति पाने के लिये भगवान शिव के परामर्श से इन्द्र ने जिस स्थान पर यज्ञ किया वही प्राचीन स्थल इन्द्रभवन या टुन्नास के नाम से जाना जाता है। जो इस मनोहारी यात्रा का मुख्य पड़ाव है। यात्राीगण आते-जाते समय यहीं विश्राम करते है। व बालकों का मुण्डन, पूजा-पाठ व हवन आदि कराते हैं।
झूठे मन्दिर की कहानी-
वर्षों पहले एक सम्पन्न दम्पत्ति सन्तान की कामना लेकर माँ के दरबार में पधरा और सन्तान प्राप्ति पर देवी को सोने का मन्दिर चढ़ाने का वचन दिया। मनोकामना पूर्ण होने पर सेठ ने तांबे का मन्दिर बना उपर से सोने का पानी चढ़वा दिया। कई किमी से बनवाकर लाया गया यह मन्दिर सच्चे दरबार तक नहीं आ सकता और लाख प्रयत्न पर भी नहीं उठा। देवी ने सेठ की भेंट अस्वीकार कर दी, जिसे आज भी झूठे मन्दिर के रूप में जाना जाता है। टुन्नास के निकट रखा यह मन्दिर सच्चे दरबार की महिमा का बखान कर रहा है।
काली मन्दिर व भैरों बाबा-
झूठे मन्दिर से कुछ आगे चलकर काली देवी तथा भैरों बाबा का प्राचीन स्थल है। इसकी स्थापना कूर्मांचल नरेश राजा ज्ञानचन्द के विद्वान दरबारी पण्डित श्री चन्द्र त्रिपाठी ने की थी। राजा ने पण्डित को 6 गाँव उपहार में दिये थे। आज भी इन बिल्हा गाँव के निवासी बल्हेड़िया तथा तिराही गाँव के निवासी त्रिपाठी कहलाते हैं। मन्दिर का समस्त पूजा-कार्य इनके द्वारा किया जाता है। भैरों चट्टी पर देवी के अनन्य उपासक महाकाल भैंरो का प्राचीन स्थल व काली मन्दिर के निकट देवी के काली का रौद्र रूप धरण कर तूर्णा राक्षस का वध् स्थल भी है।
सिद्ध बाबा की समाधि-
एक दिन जब रात्रि में देवी सिंह की सवारी पर निकली तो निर्जन स्थल पर किसी पुरुष की उपस्थिति का आभास पाकर शेर ने गर्जना की और देवी ने समाधिस्थ बाबा सिद्ध मणि के दो टुकड़े कर पफंेक दिये। एक तो नीचे जाकर बनखण्डी नामक स्थान पर गिरा जहाँ आज भी मेला लगता है, दूसरा टुकड़ा सामने पहाड़ पर जाकर गिरा जहाँ समाधि स्थल सिद्ध बाबा का प्राचीन मन्दिर विद्यमान है। देवी के वरदान के कारण ही सिद्ध बाबा के दर्शन किये बिना पूर्णागिरी की यात्रा अपूर्ण समझी जाती है। इस कारण यात्राीगण देवी के दर्शन के बाद सिद्ध बाबा के दर्शन करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं।
माँ का दरबार-
चट्टान के उपर-नीचे रास्ते पार कर उँची चोटी पर पूर्णागिरी माता का दरावार है। जिसकी प्रधन शक्ति पीठों में गणना की जाती है। चबूतने पर नाभि, त्रिशूल व मूर्ति आदि चिन्ह हैं, जिसकी पूजा की जाती है। मन्दिर के पाश्र्व भाग में अति प्राचीन पत्रा, पुष्प फल रहित सूखा वृक्ष है। जिस पर अनेकों घंटियाँ व ध्वज पताकायें बंध्ी हैं और पास में त्रिशूल गढ़े हैं। नाभि स्थल ढका है।

महान जनसेवक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. जगत सिंह पांगती

लक्ष्मण सिंह पांगती
स्व.जगत सिंह पांगती का जन्म 30 जून 1908 को भारत-तिब्बत सीमान्त गाँव मिलम के एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था। उनके पिता स्व.खड्गराय पांगती, आर्य समाजी विचारधारा के प्रबुद्ध एवं कांग्रेस पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता थे, जिन्होंने 1929 में लाहौर कांग्रेस अधिवेशन में भाग लिया, उनके ज्येष्ठ भ्राता स्व. भगत सिंह पांगती जोहार के प्रसि द्ध व्यापारी एवं उदार प्रकृति के व्यक्ति थे, जिनके पूर्ण सहयोग से ही वे सामाजिक क्षेत्र में एकाग्र होकर कार्य कर पाए।
जगत सिंह पांगती की प्रारम्भिक शिक्षा जोहार घाटी में सम्पन्न हुई। सन् 1923 की मिडिल स्कूल परीक्षा में पूरे प्रान्त की मेरिड में प्रथम स्थान पर रहे। सन् 1927 की हाईस्कूल परीक्षा में राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए तथा सम्पूर्ण कुमाउँ मण्डल में सर्वश्रेष्ठ छात्र घोषित हुए। इतना ही नहीं वे हाईस्कूल परीक्षा 1927 में सम्पूर्ण प्रान्त की मैरिट सूची में तृतीय स्थान पर भी रहे। राजकीय इण्टर कालेज अल्मोड़ा के सम्मान-पट्ट;आॅनर बोर्ड में अंकित आपका नाम आज भी देखा जा सकता है।
जगत सिंह पांगती के हृदय में प्रारम्भ से ही आजादी के लिए तड़प थी। मेरिट छात्रवृत्ति प्राप्त होने के बावजूद वे छात्र जीवन को वहीं छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े तथा राष्ट्र को समर्पित होने वाले जोहार के प्रथम तरुण बने। सन् 1928 में ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ आन्दोलन तथा विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार आदि जैसे देशभक्ति के कार्यों में सक्रिय रहे।
यह उनके जीवन का सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहला पड़ाव था। सन् 1929 में लाहौर अधिवेशन में भाग लेने की प्रबल इच्छा होते हुए भी वे सामाजिक कार्य में व्यस्त रहने के कारण उक्त अधिवेशन में न जा सके और उनके पिता स्व. खड्गराय पांगती ने लाहौर अधिवेशन में भाग लिया। इस अधिवेशन में स्व. खड्गराय पांगती के साथ स्व. दुर्गा सिंह रावत, स्व. राम सिंह पांगती तथा स्व. हरिमल सिंह बुर्फाल ने भी भाग लिया। लाहौर अधिवेशन में पारित ‘पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव’ को गाँव गाँव मंे उल्लास से कार्यानवयन में आपका महत्वपूर्ण सहयोग रहा। सन् 1934 तक क्षेत्रा में सार्वजनिक रचनात्मक कार्यों जैसे ग्राम सुधार, ग्राम स्वच्छता, पुस्तकालयों की स्थापना एवं शराबबन्दी आदि जैसे सामाजिक कार्यों में लिप्त रहे। सन् 1935 में कांग्रेस स्वर्ण जयन्ती को सफलतापूर्वक मनाने में पूर्ण सहयोग दिया। 1936 में कांग्रेस का सदस्य बनकर कांग्रेस के संगठनात्मक कार्यों में सक्रिय हो गए। सन् 1938 में प्रदेश के कांग्रेस मंत्रिमण्डल ने आपको ग्राम सुधार संयोजक;आर्गनाइजर नियुक्त किया और 1940 तक आपने इस पद पर रहकर कुशलतापूर्वक कार्य सम्पादित किया।
सन् 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह आन्दोलन का संचालन करते हुए स्थान ‘लाबगड़’ में 1 मई 1941 को आपको अन्य साथियों के साथ कैद कर तीन माह का सशक्त कारावास तथा रु. 50/- का आर्थिक दण्ड दिया गया। 12 मई से 2 अगस्त 1941 तक जिला कारागार अल्मोड़ा में आप बन्दी रहे और जेल से मुक्त होने के पश्चात जिला सत्याग्रह का संचालन करने लगे। 24 अगस्त 1942 को मुनस्यारी के दरकोट, देवीधार के मेले में हाथ में तिरंगा झण्डा लेकर आप तथा स्वामी भागवतानन्द जी के साथ पं.बचीराम जोशी के सभापत्तित्व में विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में शामिल हुए। 25 अगस्त 1942 को आन्दोलनकारियों के समूह के साथ मल्ला जोहार गोरीफाट में सत्याग्रह का प्रचार करते हुए मिलम से मुनस्यारी, तेजम आदि स्थानों से होते हुए 28 सितम्बर को अन्य 30 सत्याग्रहियों सहित बांसबगड़ में अंग्रेज पल्टन द्वारा गिरफ्रतार किए गए, जिसके फलस्वरूप उन्हें ग्राम थल में दो वर्ष का कठोर कारावास का दण्ड सुनाकर 11 अक्टूबर से 20 नवम्बर 1942 तक अल्मोड़ा एवं 21 नवम्बर से 5 अगस्त 1943 तक बरेली कारागार में में रखा गया। 6 अगस्त को उन्हें कैम्प जेल लखनउ में स्थानान्तरित कर दिया गया। बाद में आपको 26 जून 1944 को कारागार जीवन से मुक्ति मिली। इसके पश्चात वे अपने क्षेत्र में सहकारिता, कुटीर उद्योग और समाज सुधर जैसे विकास कार्यों के साथ-साथ कांग्रेस संगठन को मजबूत करने का कार्य करने लगे। उन्होंने पूज्य गांध्ी जी के वर्धा आश्रम के अनुरूप कुटीर उद्योगों की स्थापना की और जोहार में सहकारी संघ समितियों के द्वारा जनता को सहकारिता का लाभ दिलाया। इस प्रकार जोहार में सहकारी संघ समिति की स्थापना में आपका प्रमुख योगदान रहा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जोहार मण्डल कांग्रेस कमेटी के अनुरोध् पर शासन से पूज्य महात्मा गांध्ी जी के एक ‘अस्ति कलश को मानसरोवर में विसर्जित करने की स्वीकृति सरकार से प्राप्त की। स्व. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में जोहार के अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधि मण्डल लेकर आप अस्थि कलश के साथ मानसरोवर गए। जोहार के लोगों ने अस्थि कलश का जोदरार स्वागत करते हुए पूज्य बापूजी को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
सन् 1949 से सन् 1952 तक आप पंचायत राज इंस्पेक्टर के पद पर रह कर आपने देश सेवा की परन्तु सामाजिक सेवा कार्य को अपना जीवन का परम लक्ष्य मानते हुए तथा इस समाजसेवा के कार्य में इस पद को बाधा मानते हुए आपने इस पद को त्याग कर समाज के सामने एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। सरकारी सेवा से पदमुक्त होने के बाद जिला कांग्रेस नियोजन समिति अन्तरिम जिला परिषद अल्मोड़ा के सदस्य तथा विकासखण्ड मुनस्यारी के अध्यक्ष बने। सन् 1962 से से 1971 तक के विधान सभा चुनावों तथा ग्राम सुधार कार्यक्रमों में आपने अपने को व्यस्त रखते हुए उत्तरी सीमान्त की समस्याएं लेकर तथा डेलीगेशन के प्रबन्धकर्ता बनकर दिल्ली तथा लखनउ जाकर कई सुविधाएं प्रदान करवायीं। आप अत्यन्त दूरदर्शी थे। सन् 1962 में भारत चीन युद्ध के कारण सीमान्त क्षेत्रा जोहार, दारमा तथा गढ़वाल नीति-माणा आदि के निवासियों का तिब्बत व्यापार ठप हो गया जिसके कारया तीनों घाटियों के प्रबुद्ध एवं जागरुक समाजसेवियों को साथ लेकर तत्कालीन माननीय प्रधानमंत्री स्व. पं.जवाहरलाल नेहरू जी से मिले, उन्हें सूत से बनी माला पहना कर उनका अभिनन्दन किया तथा उन्हंे ज्ञापन प्रस्तुत किया। जिसमें इन सभी क्षेत्रों की आर्थिक समस्याओं की ओर ध्यान दिलाते हुए इन सभी इलाकों को जनजाति क्षेत्रा घोषित करने का अनुरोध् किया गया था। परिणामस्वरूप ये क्षेत्र जनजाति क्षेत्रा घोषित हुए और तब से आज तक उन्नति की ओर अग्रसर हैं। इस महत्वपूर्ण भूमिका के लिये पूरा सीमान्त क्षेत्र हमेशा आपका आभारी रहेगा।
भोटिया पड़ाव हल्द्वानी की जमीन की लीज को ‘जोहार संघ’ के नाम स्थानान्तरित करने का पूर्ण श्रेय भी आपको जाता है। भोटिया पड़ाव को आदर्श पड़ाव बनाने का आपका सपना था जो अब एक विकसित आवासीय काॅलोनी बन चुकी है। यह स्वर्गीय जगत सिंह पांगती जी की प्रतिष्ठित सामाजिक धरोहर के रूप में याद की जाती रहेगी। इस प्रकार आप आजीवन जनसेवा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित रहे। स्व. जगत सिंह पांगती जी का देहावसान 6 मई 1977 को नई दिल्ली में हुआ।

संघर्षमय रहा जिनका पूरा जीवन

पत्रकारिता के मिशन को जिस लगन से स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती-स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया ने शुरू किया था, उसे बनाये रखने वाली कमला उप्रेती की 15 सितम्बर 2019 को प्रथम पुण्यतिथि है।
जिन्दगी को आन्दोलन बना चुके आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलते हुए आपने किसी से कोई शिकायत नहीं की। जिन्दगी के सफर में रोग-शोक से लड़कर भी बच्चों को हौंसला दिया। घर-परिवार और गाँव के सारे लोगों को आपका ममतामयी स्पर्श हमेशा बांधे रहा। अपने सीमित साधनों में घर-गृहस्थी चलाते हुए सामाजिक आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका आपने निभाई। बहुत विपरीत स्थितियों में भी आपके बोल संस्कारों से भरे थे। ‘जशौदा मैया तेर कन्हैया बड़ो झगड़ी, झन लगाया गोरु-ग्व्ाला हमन दगड़ी’ जैसे भजनों से लेकर होली के आशीष तक के गीत गाने वाली इस माँ ने जीवन की सच्चाई को हमेशा सामने रखा और गुनगुनाया- ‘संग्राम जिन्दगी है लड़ना इसे पड़ेगा….।’
66 वर्ष की आयु में अन्तिम सांस तक अपने मिशन के लिये जिस साहस से आप लड़ीं वह चिंगारी बुझ नहीं सकती है। पिघलता हिमालय का यह अंक आपको समर्पित।

पत्रकार ऐसे ही नहीं बन जाते हैं

स्व.कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि पर सम्पादकीय
आज जब पत्रकारिता की बात होती है तो इसे बहुत हल्के में लिया जाता है, कारण इसे बना ही ऐसा दिया गया है। पत्र और पत्रकार जन चेतना के अग्रदूत होते हैं। उनसे आन्दोलन और आन्दोलन से वह होते हैं। उनका पठन-पाठन और उनके संस्कार उनकी कलम में दिखाई देते हैं। वर्तमान में जब समाचार-संदेश देने के लिये द्रुतगामी व्यवस्थायें हैं पत्रकारिता जगत में हलचल मच चुकी है। होड़ में जल्द से जल्द समाचार परोसने और कारोबार को बढ़ाने के लिये विज्ञापनों के लिये सर माथा पीटने का अभियान चल पड़ा है। समाचार पत्रों की दयनीयता इससे ही समझी जा सकती है कि उन्हें बाजार में स्थापित होने के लिये नित नये अभियान चलाने पड़ रहे हैं। प्रबुद्ध पाठक चर्चा करने लगा है कि अखबार में समाचार पढ़ें या विज्ञापन। कई पेजों के विज्ञापन का पुलिन्दा और उपर से सैकड़ों नामों से भरी कोई सूचना या चटपटी प्रस्तुति को आज का युवा पत्रकार पत्रकारिता बता रहे हैं। यदि कोई पत्रकारिता के ज्ञान को लेकर प्रयोग करना चाहे तो उसके लिये शायद ही किसी मीडिया घराने के दरवाजे खुलें, क्योंकि भीड़ में अपनी मुंडी उपर निकालने के लिये सार्टकट रास्ता तलाशा जा रहा है। ऐसे में साहित्य की पत्रकारिता वाली धारा की बात हो ही नहीं सकती है। यदि कोई अपने आप से हिम्मत करता है तो वह छोटे या मझले समाचार पत्रों की श्रेणी में है। ऐसे समाचार पत्रों के सामने चुनौती ज्यादा हैं। तुरन्त लाभ के लिये कोई भी सरकार उन समाचार पत्रों को चुनने लगी है जिसे वह तत्काल विज्ञापन देकर अपनी बात मनवा सके। ऐसा ही लाभ निजी संस्थान व धन्धेबाज भी चाहने लगे हैं। यदि नहीं चाहते हैं तो उन्हें विज्ञापन के लिये मजबूर किया जा रहा है। सोचनीय है कि आजादी के 70 साल बाद भी भीड़ में खड़े रहने के लिये इतना ही साहस बटोर सके हैं हम।

पत्र और पत्रकारिता के लिये मिशन का होना जरूरी है। इस मिशन को यदि हम स्वीकारते हैं तो पूरी ईमानदारी जरूरी है। लेकिन क्या हमारी व्यवस्था का ढांचा ऐसा होने दे रहा है? वह कागजों में उलझाये रखना चाहता है और सारे मीडिया घराने चिल्लाते हैं- ‘नम्बर वन’। इन सबके बाद भी पत्रकारिता के मिशन को बनाये रखने के लिये दुनिया में बहुत से महानुभाव संकल्पित हैं। उन्हीं में से थीं- कमला उप्रेती। किसी की जिन्दगी पूरी तरह संग्राम बन जाती है और इस संग्राम में जो लड़ता है वह योद्धा है। ऐसी ही योद्धा थी ईजा। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती अब हमारे बीच नहीं है लेकिन उसने जुड़ी अनगिनत यादें हैं। ‘पिघलता हिमालय’ को बनाने में ईजा का घोर संग्राम रहा है। यह कहानी 1964 से शुरु हो जाती है जब स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती जी ने छापाखाना खोला। पहले छापाखाने की बहुत इज्जत हुआ करती थी। ‘शक्ति प्रेस’ नाम से खुले छापाखाना में बाईडिंग, परफेटिंग, रूलिंग, कम्पोजिंग, प्रिंटिंग हर प्रकार का काम होता था। इसी छापेखाने में बहुत बड़ी टेªडिल मशीन हुआ करती थी, पूरे ट्रक के बराबर। जिसमें दैनिक पिघलता हिमालय भी छपा। बाद में छोटे आकार की टैªडिल मशीन वगैरह भी प्रेस में लगाई गईं। इन मशीनों में अनगिनत मशीनमैन, कम्पोजिंग में अनगिनत कम्पोजिटर रहे हैं। छापाखाने मे प्रतिस्पद्र्धा नहीं थी और शादीकार्ड, बिलबुक इत्यादि के ग्राहकों के अलावा लिखने-पढ़ने वालों का अड्डा छापाखाने ही हुआ करते थे। आजकल तो प्रिंटिंग प्रेस लिखना आसान हो चुका है। और प्रतिद्वंद्वी अपने ग्राहकों को ढूंढने के लिये दौड़ते हैं, सरकारी काम के लिये तिकड़मबाजी करनी पड़ती है। पहले पोस्टर, पर्चे, कार्ड छपवाने वालों में आन्दोलनकारी, समाज सेवी, पुस्तकें-फोल्डर-पर्चे छपवाने के लिये लेखक, कुछ खास-खास लोग शादीकार्ड छपवाने के लिये छापेखाने तक आते थे। प्रेस की बड़ी जिम्मेदारी थी और लोगों को भरोसा था कि उनकी गलतियों को भी सुधर कर छापा जायेगा। तब एफएस, एफोर, एथ्री जैसे कागज साइजों को नहीं जानते थे बल्कि रिमों के साइजों के बाद कागज कटिंग होती थी। आज भी बड़े छापेखानों में यही होता है। खैर, बात पिघलता हिमालय की हो रही थी। 1978 में पिघलता हिमालय शुरु हुई, बहुत उत्साह था आनन्द बल्लभ उप्रेती जी और दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी में। इनका जोश अखबार को दैनिक में तक बदल गया। लेकिन जीवन के संग्राम में यह उलझ कर रह गये। दुर्दिनों की वह कहानी बहुत लम्बी है………….

कमला उप्रेती ने अपने पति के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर छापाखाना और अखबार सींचा। लोहे की उन भारी मशीनों की खटखट आवाजों में कागज को मशीन में लगाने और उठाने में सावधनी चाहिये। कई ऐसे अवसर थे जब कमला जी मशीनमैन आनन्द बल्लभ जी के साथ हैल्पर बनी। तब आजकल की तरह सुविधाएं और साधन भी नहीं थे। डाक से जाने वाले अखबारों में पते लिखने में भी वह सहायक थी। अखबार की प्रूफरीडिंग का काम भी वह करती और कभी लिखने बैठ जाती। पत्रकार बनने की शुरुआत ही पठन-पाठन के अलावा कम्पोजिंग से होती थी जैसे आजकल कम्प्यूटर की जानकारी जरूरी है। उप्रेती जी के निधन के बाद उन्होंने पत्र का सम्पादन किया। समय बदला है लेकिन हमारे मूल्य और संस्कार बने रहने चाहिये। पत्रकारिता के कोई मायने होते हैं। इसकी पवित्रता बनी रहे, इसका मिशन बना रहे, इसका आन्दोलन चलता रहे। इसके लिये आम पाठकगण को भी विचार करना चाहिये। आज ईजा स्व. कमला उप्रेती की प्रथम पुण्यतिथि में उनका स्मरण हमें खुशी और आँसू के साथ साहस दे रहा है। उसकी जिद, उसकी लगन, उसका संघर्ष हमें याद दिलाता रहेगा कि योद्धा संग्राम में विचलित नहीं होते।