सीमान्त ग्रामों का विकास सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम से सम्भव

वाई.एस.पांगती

भारत सरकार ने सीमा क्षेत्र के विकास के लिये बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम चलाया है। सरकार की गाईड लाइन में स्पष्ट किया गया है कि सीमा क्षेत्रा में रहने वाले लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति ग्रामवार प्राथमिक शिक्षा, चिकित्सा केन्द्र, सामुदायिक केन्द्र, सड़क, बिजली, सम्पर्क मार्ग, नालियां, पीने का पानी आदि व रोजगार के साध्न उपलब्ध् कराने के लिये प्रस्ताव मांगकर उनको अन्तिम रूप देने के लिये खण्ड विकास कार्यालय के माध्यम से सम्बन्ध्ति विभागों को प्रशिक्षण करने के लिये भेजा जायेगा। यदि विभाग में गाँव की योजना पूर्व से प्लान में है तो सीध् विभाग द्वारा कार्यक्रम को संचालित करने के लिये प्लान में वजट पास करेगा और जो योजना प्लान में नहीं है उसको बी.ए.डी.पी. के माध्यम से प्रस्तावित करेगा।

इस प्रकार की योजनाओं को विकास खण्ड स्तरीय कमेटी बजट के अनुसार अनुमोदन हेतु जिला विकास कार्यालय के माध्यम से शासन को भेजेगा। शासन भारत सरकार मंत्रालय से अनुमोदन प्राप्त कर ग्रामों में योजनाओं का क्रियान्वयन करेगा। इस प्रकार की कमेटी के अध्यक्ष उपजिलाध्किारी, सचिव खण्ड विकास अध्किारी और सदस्य क्षेत्रा प्रमुख के अलावा विभागों के अध्किारीगण व चयनित ग्राम प्रधन व ग्राम पंचायत के अध्किारी सदस्य नामित हैं जो प्रत्येक त्रौमास में समीक्षा/बैठक करेंगे।

हमें यह भी जान लेना चाहिये कि केन्द्रीय गृह मंत्राी भारत सरकार द्वारा अभी हाल में ही जनपदवार बी.ए.डी.पी. की समीक्षा बैठक की गई। उनके द्वारा कहा गया कि सीमान्त में रहने वाले लोग देश के लिये सामरिक लिहाज से कापफी अहम हैं और सुरक्षा की भी अहम कड़ी हैं। जिसके कारण इन इलाकों के विकास को सरकार सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। सरकार द्वारा देश के सीमावर्ती ग्रामों को माॅडल के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया गया है और भविष्य में बी.ए.डी.पी. कार्यक्रम की आनलाइन मानीटरिंग  के साथ ही गाँवों के लिये चयनित योजनाओं को सीध्े आॅनलाइन सिस्टम में डालकर अनुमोदन, राज्य को बजट की अवमुक्त किया जायेगा।

पूर्व अनुभव के आधर पर बी.ए.डी.पी. योजनाओं के बजट का बन्दरबांट किया गया, जिसके कारण ग्रामों का समुचित विकास नहीं हो पाया है। जो चिन्ता का विषय है। जोहार के दुर्गम 14 ग्राम, धरचूला के दुर्गम ग्राम, चमोली, उत्तरकाशी के सीमान्त ग्रामों की टोह लेते हुए जागरुक हो जाना चाहिये। मल्ला जोहार में तो जितनी सुविध मिल पाई है उसका श्रेय मल्ला जोहार विकास समिति को जाता है, जो जागरुक रहकर कार्य कर रही है। यह जागरुकता प्रत्येक नागरिक में होनी चाहिये।

अपेक्षा है सभी लोग जागरुक रहकर विकास के लिये भागीदार होंगे। जिला विकास कार्यालय से सम्पर्क कर पूर्ण जानकारी लेकर बी.ए.डी.पी. के अन्तर्गत आने वाले गाँवों का समुचित विकास में योगदान करेंगे।

पिघलता हिमालय 30 जुलाई 2018 के अंक से

दीर्घकालीन वर्षा जल संरक्षण हेतु वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता

पि.हि. प्रतिनिध्
मुनस्यारी। जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक संगठन देहरादून व मल्ला जोहार विकास समिति द्वारा ग्रीष्मकालीन आयोजनों के दौरान दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। जिसके मुख्य अतिथि केन्द्रीय राज्य मंत्राी अजय टम्टा थे। आयोजन का शुभारम्भ करने मुख्यमंत्राी त्रिवेन्द्र रावत को आना था लेकिन उनके स्थान पर श्री अजय टम्टा पहँुचे थे। संगठन के अध्यक्ष डाॅ.भगत सिंह बरपफाल ने आयोजन समिति की ओर से सरकार का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि दीर्घकालीन जल संरक्षण हेतु वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता है। इसके अन्तर्गत सभी मुख्य तथा उप जलधराओं के जल प्रवाह निर्वहन का दीर्घकालीन अध्ययन ;कार्यवाही- जल संस्थान एवं जल निगमद्ध, लम्बी अवध् ितक जलवायु मापन के डाटा ;कार्यवाही- जलवायु विज्ञान निदेशालयद्ध, भू-भौतिकीय अध्ययन ;कार्यवाही- वाडिया संस्थान आपफ हिमालयन जियोलोजीद्ध, भू-गर्भीय जल विज्ञान का अध्ययन ;कार्यवाही- उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्रद्ध, वन जल विज्ञान का अध्ययन ;कार्यवाही- राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्था रुड़कीद्ध जरूरी है।
उल्लेखनीय है कि सीमान्त क्षेत्रा मुनस्यारी के जल व जैवविविध्ता को ध्यान में रखते हुए जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक समिति ने एक रूपरेखा बनाई और इस बार कार्यशाला का आयोजन करते हुए चाहा है कि इस दिशा में ठोस कार्य हो ताकि जल और जैवविविध्ता की दिशा में वैज्ञानिक विध् िसे कार्य होने के साथ ही इसका सभी को लाभ हो।
भौगोलिक दृष्टिकोण से मुनस्यारी एक अन्तन्त दुर्गम एवं दूरस्थ क्षेत्रा में चीन/तिब्बत सीमा पर स्थित है। वर्ष 196. के आसपास भारत-तिब्बत व्यापार बन्द होने के बाद मुनस्यारी एवं मल्ला जोहार का क्षेत्रा अपने असतित्व को बनाए रखने के लिये अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। जिनमें वन एवं जैव- विविध्ता में त्वरित गति ऐ हो रहे ह्रास, निरन्तर बढ़ रही जल संकट, जीवन-यापन के लिये संसाध्न एवं रोजगार की कमी, यातायात सुविध की चिन्ताजनक स्थिति, समुचित एवं उचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, शिक्षा के स्तर में गिरावट आदि मुख्य है। इन्हीं कारणों से इस क्षेत्रा से ध्ीरे-ध्ीरे पलायन हो रहा है और कई गाँव या तो खाली हो गए हैं या पिफर उनमें बहुत ही कम परिवार रह गए हैं।
चीन/तिब्बत सीमा पर बसे सामरिक दृष्टिकोण से अत्यन्त महत्वपूर्ण मुनस्यारी एवं मल्ला जोहार क्षेत्रा से पलायन रोकने व पुनर्वास करने के लिये यह आवश्यक है कि इस क्षेत्रा का पर्यावरण संरक्षण के साथ दीर्घकालीन सर्वांगीण एवं सतत विकास की रूपरेखा बने और पिफर उसी के अनुरूप विकास के कार्य अमल में लाये जाएं। इसी उद्देश्य से स्थानीय लोगों की सहभागिता से यह कार्यशाला आयोजित की गई। जिसका विषय- ‘ मुनस्यारी क्षेत्रा के जल स्रोतों एवं जैवविविध्ता के संरक्षण के परिप्र्रेक्ष्य में भू-गर्भीय पर्यावरण तथा वन-जल विज्ञान की भूमिका’ है।
जोहार शौका वरिष्ठ नागरिक संगठन देहरादून द्वारा मल्ला जोहार विकास समिति मुनस्यारी एवं उच्चतर माध्यमिक विद्यालय मुनस्यारी पूर्व स्टूडेंट्स ऐसोसिएशन की सहभागिता से आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े दो सौ लोगों ने प्रतिभाग किया।
पिघलता हिमालय 18 जून 2018 के अंक में प्रकाशित रपट