शिक्षाविद् इन्द्रा पांगती

जिनका ध्येय ही समाज को उठाना रहा हो
डॉ. पंकज उप्रेती
दुनिया में जन्म लेने वाली भीड़ भरपाई मात्र है लेकिन जो लोग अपने समाज को संवारने के लिये समर्पित हों वह विशेष होते हैं। ऐसे ही विशेष परिवारों में से खड़क राय पांगती का परिवार रहा है। इस परिवार की शाखाओं ने समाजसेवा के अलावा शिक्षा के क्षेत्र में जिस प्रकार का योगदान दिया वह हमेशा याद किया जाता रहेगा। इसी परिवार की वरिष्ठ सदस्य हैं- शिक्षाविद् इन्द्रा पांगती। उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली में इनकी सेवा की धुरी रही लेकिन अपने समाज खासकर बालिकाओं के उत्थान के लिये वह हमेशा अग्रणीय रही हैं।
सामाजिक कार्यों में अग्रणीय रहने वाले खड़क राय पांगती इनके (इन्द्रा पांगती) दादा जी थे। जनहित में इनके कार्यों को देखते हुए अंग्रेज शासकों ने इन्हें राय की उपाधि दी थी। इनके दो पुत्र भगत सिंह और जगत सिंह हुए। सेठ भगत सिंह भारत-तिब्बत व्यापार के बड़े व्यापारियों में से थे, इनका 45 लोगों का परिवार और अनगिनत पालतु पशुओं की बहार थी। ‘सेठ जी’ जिस प्रकार व्यापार में अग्रणीय थे उसी प्रकार अपने परिवार की रुचियों को समझने वाले थे। शिक्षा के क्षेत्र में जोहार से अग्रणीय भागीरथी पांगती इन्हीं की सुपुत्री थीं। दया पांगती, भूपेन्द्र पांगती, कर्नल बहादुर सिंह सहित इस परिवार की शाखाएं चारों ओर फैली हुई हैं। समाज को समर्पित और उदार उस दौर का व्यापारी परिवार होते हुए शिक्षा के क्षेत्रा में इसके सदस्य सर्वाधिक आगे रहे हैं। सेठ भगत सिंह जी जिस प्रकार से व्यापार के लिये समाज में मान्यता रखते थे उसी प्रकार उनके भाई जगत सिंह जी समाजसेवा के लिये जाने जाते थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जगत सिंह जी आजीवन समाजसेवा में जुटे रहे। इन्हीं की सुपुत्रा हैं- इन्द्रा पांगती।
एक व्यापारी, समाजसेवी और शिक्षित परिवार की सदस्य इन्द्रा जी ने बचपन से जिस प्रकार के संस्कारों को देखा वह भी उसी अनुरूप अक्खड़ बनकर रहीं। वह अपनी बुआओं का बार-बार स्मरण करती हैं कि किस प्रकार महिलाओं का समाज में हमेशा से योगदान रहा है। वह बताती हैं कि भैंसखाल में रहते हुए वह पढ़ाई के लिये अल्मोड़ा आया करते थे, तब चार दिन का समय लग लग जाता था। यह पैदल सफर साल में एक बार दिसम्बर के महीने में होता था। अल्मोड़ा में बुआ कला पांगती ने हम सभी बहनों को अपने पास रखकर शिक्षित किया। बुआ जी इलाहाबाद से पढ़ी थीं। अल्मोड़ा में उनका घर पठन-पाठन वालों से ही गुलजार था। इन्द्रा पांगती की सबसे बड़ी बुआ मर्तोलिया लॉज वाले उम्मेद सिंह मर्तोलिया की पत्नी श्रीमती रुकमणि हुईं। यह परिवार पिघलता हिमालय परिवार का प्रमुख परिवार भी है। दूसरे नम्बर की बुआ अम्बिका का विवाह पद्मश्री लक्ष्मण सिंह जंगपांगी के छोटे भाई से हुआ। तीसरे नम्बर की बुआ कला पांगती शिक्षिका थीं। चौंथी दमयन्ती थीं जिन्होंने पर्दा प्रथा पर लिखा था। पांचवी बुआ हेमलता थीं जिनका विवाह इमला के जंगपांगी परिवार में हुआ।
बात जब जगत सिंह जी की करते हैं तो इनके दो पुत्र लक्ष्मण सिंह व इन्द्र सिंह हुए। इन्हीं की आगे की पीढ़ियों में त्रिभुवन सिंह, प्रशान्त, मनीष पांगती, दिनेश, मनोज, तरुणा। धाम सिंह जी की सुपुत्री खिला पांगती हैं। कुल मिलाकर इस बड़े परिवार की शाखाओं का श्रमसाध्य देखते ही बनता है, हर कोई किसी न किसी जगह उच्च पद पर है लेकिन अपनी जन्मभूमि अपने समाज के लिये कुछ करने का जज्बा भी उतना ही ज्यादा है।
बातों में बात निकलती है तो इन्द्रा पांगती उन पुरानी बातों में खो जाती हैं जब वह पैदल रास्तों से होते शिक्षा के जिस सफर में निकली थीं वह बहुत दूर तलक था। बनारस से लेकर तमाम जगह एक शिक्षक और अधिकारी के रूप में उनकी भूमिका रही है। उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जैसे उनके कई शिष्य हैं। देश की राजधनी दिल्ली में शिक्षा अध्किरी के रूप में इन्द्रा जी ने नवाचार को बढ़ावा दिया। उत्तराखण्ड में शिक्षा व्यवस्था को लेकर चिन्तित रहने वाली इन्द्रा जी वह बताती हैं कि एक बार वह काण्डा निरीक्षण में गई। तब प्रौढ़ शिक्षा के अभियान का जोर था। निरीक्षण में पाया गया कि शिक्षित को बैठाकर यह दर्शाया जा रहा है कि उन्हें साक्षर किया गया है। इस प्रकार के मामलों को हाथोंहाथ ठीक किया गया। वह मानती हैं कि शिक्षा जैसा विषय कह कर नहीं बल्कि अपने अन्दर से होता है। जिसने पढ़ने और जानने की इच्छा रखी उसे कोई नहीं रोक सकता।
जीवन के उत्तरार्ध में इन्द्रा पांगती आज भी उतनी ही सक्रिय हैं जो पहले थीं। अपनों के बीच उनका सफर प्रेरणादायक है। वह दुनियादारी के हर रिश्ते-नाते को भली प्रकार जानती हैं और नई पीढ़ी के बच्चों को भी उनके बुजुर्गों से जोड़ते हुए यही उम्मीद करती हैं कि दुनिया के झमेले में अपनी पगडंडी कोई न छोड़े। अपनी ओर से जितना बेहतर हो सके उसे हमेशा करना चाहिये। समय बीतता जाएगा और हमारा बोया लहराएगा।
दुर्लभ फाइल फोटो। बाएं से खड़े- मनीष, दिनेश, विक्रम।
बैठे- इन्द्रा पांगती, मनोज, मिश्रा जी की सुपुत्री, स्व.जगत सिंह पांगती

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