
डाॅ.पंकज उप्रेती
‘‘संग्राम जिन्दगी है, लड़ना इसे पड़ेगा…..।’’ इस प्रकार के गीतों को गुनगुनाने वाली हमारी ईजा अब सिर्फ याद आती रहेगी। वह सपने नहीं सच्चाई को जीती थी। बीमारी, अस्पताल, मौत तो उसके निकट थे लेकिन अचानक वह चल देगी ऐसा पता नहीं था।
मुझे याद है पिता के साथ घोर संघर्षों में साथ देने वाली माता ने कितनी परीक्षाएं मौत के लिये दी। अपनी 66 साल का आयु में उन्होंने सौ प्रतिशत संघर्ष किया जिसमें मौत से संघर्ष भी था। बचपन में हम तीन भाई बहन ;पंकज, ध्ीरज, मीनाक्षी सोचते माँ कब ठीक होगी, उसे भवाली सेनेटोरियम में भर्ती करवाना पड़ा। ईजा की बीमारी के समय दैनिक पिघलता हिमालय को बन्द करना पड़ा था। पहाड़ टूट पड़ा था। मुनस्यारी में दुर्गा चाचा ;दुर्गा सिंह मर्तोलिया अपने जीवन संग्राम में बुरी तरह टूट चुके थे। थके-हारे पिता आनन्द बल्लभ ने छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ को बिकाउ होने का विज्ञापन दे डाला था। लेकिन नहीं, परमात्मा को यह मंजूर नहीं था। ईश्वर को हमारा लड़ना ही पसन्द है। पूरा परिवार छिन्न-भिन्न हो गया। 6 साल का मैं और 4 साल का भाई ध्ीरज गाँव गंगोलीहाट चले गये। छोटी बहन को नैनीहाल रानीखेत भेज दिया गया। माँ अस्पताल और पिता हल्द्वानी में। संघर्षों के उन सालों में जितने टोने-टोटके, पूजा-पाठ हो सकते थे सब किये पिता ने। ताकि हमारा परिवार बन सके। दो साल के अन्तराल में बिखरा हुआ पूरा परिवार एक हो गया लेकिन कुछ समय बाद ईजा फिर से बीमार हो गई। हम तीनों बच्चे रोते थे। पिफर से दो साल तक घोर संग्राम। पिता भी परेशान थे लेकिन ‘शक्ति प्रेस’ हमारी धुरी था। ‘उप्रेती ज्यू’ को मानने वाले, उनकी ईमानदारी को पहचानने वालों की कमी नहीं रही। ईजा ठीक होकर घर आ गई लेकिन बीमारियों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। पिघलता हिमालय को पिता ने फिर से जीवन दिया और टेªेडिल मशीन के जमाने की मशीनों पर जूझते रहे। खून में व्यापार तो था नहीं, हाँ उनकी कलम की ताकत और ईमानदारी ने परिवार को सम्मान के पद पर खड़ा रखा। बीमारियों और संघर्षों ने हम बच्चों को भी बहुत कुछ सिखाया। हमें सिखाया की दुर्दिन कैसे होते हैं, दुनिया के मेले में कितने प्रकार के चेहरे होते हैं, अपना पराया क्या होता है………..।
मुपफलिसी में दवाईयों तक को पैसे नहीं होते थे लेकिन अखबार निकालना प्रतिब(ता थी। संकल्प ले रखा था इसे चलाने का। ईश्वर कभी कोई दूत भेज देता और उम्मीदें जग जाती। एक दिन हल्द्वानी बेस अस्पताल में ईजा को बाहर रख दिया गया और डाक्टरों ने कह दिया था कि भगवान ही बचा सकता है। हम बच्चे रात्रि में रोते हुए यह कहकर नींद की गोद चले गये- ‘‘हे भगवान! हमारी मम्मी को ठीक कर देना।’’ अगले दिन पता चला कि ईजा ठीक हो गई है। पिता जी अपने कुछ साथियों के साथ रातभर अस्पताल में मौत से जूझ रही ईजा के पास थे। अस्पताल में जाने से पहले मुंह का ग्रास तक छोड़कर जाना पड़ा था उन्हें। उस दिन मेरा जनमबार था और पिता ने तय किया था बहुत दिनों बाद आज ढंग से खाना खायेंगे। उन्होंने खाना पकाया और हम लोग खाना खाने बैठे ही थे कि हमारे पड़ौसी लाला दाउ दयाल जी बताने आ गये कि अस्पताल में चलो, हालत खराब है।
अस्पताल में बहुत समय अकेले ही काटा है ईजा ने। वह हिम्मती थी तभी इतने साल तक उसका शरीर बचा रहा। बीमारियों से लड़ते-लड़ते वह थकी नहीं बल्कि परेशान इसलिये थी कि उनका परिवार परेशान है। वह कहती थी- ‘‘मैं एमबीबीएस हो चुकी हँू। बीमारियों के कारण सारी दवाईयों के नाम और बीमारियों के बारे में जान चुकी हँू।’’ कई बार मरते मरते बची ईजा बताती थी- ‘‘यमराज के वहाँ आधे रास्ते से लौट कर आई हँू।’’ संघर्षों के इन घोर दिनों को कई जगह किराये के मकान में हमने काटा। इसके अलावा ‘शक्ति प्रेस’ तो हमारा केन्द्र ही रहा। इस पुराने मकान में छापाखान, आन्दोलनकारियों की बैठकें, प्रेस वार्ता, जुलूस-आन्दोलन वालों की भीड़, बच्चों की पढ़ाई और संगीत सबकुछ एकसाथ चलता रहता था। ईजा का शरीर रोग से घिर चुका था लेकिन उसने संघर्ष नहीं छोड़ा। अपनी और अपने परिवार की परेशानियों के बावजूद वह पिता जी के साथ बराबर की हिस्सेदार थी। बैठकों में भाग लेना, अखबार की तैयारी, आने-जाने वालों का तांता सबकुछ मेला सा लगा रहता था। इतना ही नहीं, गंगोलीहाट इलाके के सभी लोगों का अड्डा उस जमाने में हमारा शक्ति प्रेस था। अब तो होटलों में रहने की परम्परा हो चुकी है और फैलते हल्द्वानी में कई लोगों के परिवार-रिश्तेदार हो चुके हैं। मुनस्यारी-धरचूला के कौने-कौने से आने वाले ‘पिघलता हिमालय’ परिवार के सदस्यों को ईजा अच्छी तरह पहचानती थी। घर में रोटी की समस्या बनी रहती लेकिन ईजा-बाबू के लिये आन्दोलन और अखबार जरूरी था। हल्द्वानी के कालाढूंगी रोड में घनी आबादी के बीच प्राइवेट बस अड्डे को हटाने के आन्दोलन में ईजा ने कई बसों के सीसे तोड़ डाले। हम बच्चे भी पत्थर मारकर बस के सीसे तोड़ने को खेल मानकर तोड़ डालते। दरअसल उस समय कई खूंखार लोग अड्डे से जुड़ चुके थे और वह बस अड्डे को वहीं रखना चाहते थे जहाँ पर हमारा छापाखाना था। उन्होंने लोभ भी दिया कि टिकट बुक आपके छापेखाने में ही छपवायेंगे। हल्द्वानी थाने के सीओ पुष्कर सिंह सैलाल जो बाद में एसपी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। ईजा को समझाने आते थे- ‘भाभी जी बस अड्डा हट जायेगा, इनके सीसे मत तोड़ना।’ हल्द्वानी में होने वाले उत्तरायणी मेले का संचालन ही हमारे ‘शक्ति प्रेस’ से हुआ करता था। बीमार ईजा ने मेले के झण्डे तक सिले थे। पर्वतीय सांस्कृतिक उत्थान मंच के उस दौर के प्रबुद्धजनों की बैठक वहाँ हुआ करती थी। लोक चेतना मंच से जुड़कर ईजा ने कई जगह प्रतिभाग किया। सीखने की इच्छा में ईजा ने ट्राइसेम योजना के तहत पीपुल्स कालेज में सार्टहैंड भी सीखा। गायत्री परिवार के अभियान में जुड़कर उन्हें सहयोग किया। ईजा को राजनैतिक पार्टियों की ओर से लगातार पार्टी में शामिल होने के निमंत्राण मिलते रहे लेकिन वह कभी किसी से नहीं जुड़ी। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने लखनउ में ईजा को पार्टी से जुड़ने का निवेदन किया लेकिन वह टाल गई। कठोर संघर्षों के बाद एक दिन हमारा छोटा सा घोंसला बना और सारा परिवार एकजुट हो गया। जैसे-तैसे हम भाई-बहिन ने भी अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर ली। बीच-बीच में बीमारी का सफर भी चलता रहता। सन् 2004 में हल्द्वानी में हमने अपना एक आशियाना बना लिया था- जे.के.पुरम् छोटी मुखानी हल्द्वानी में। इस छोटे से मकान में अपनी नई-पुरानी यादों के साथ पड़ाव डाल दिया। सालों साल की परेशानी के बाद पटरी में आते परिवार को झटका लगा लगा जब बाबू आनन्द बल्लभ जी 22 पफरवरी 2013 को अचानक चल दिये। उनके निधन के 6 माह में ईजा को फालिश/लकवा पड़ गया। अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद ईजा अपने पैरों में खड़ी कर दी गई लेकिन पहले से ही कमजोर शरीर के कारण वह अस्पताल-दवाईयों से बधी रही। इतने के बाद भी ईजा तो ईजा थी। उसकी उपस्थिति हमारे लिये सबकुछ था। 15 सितम्बर 2018 को प्रातः उसने प्राण त्याग दिये। उसे अहसास हो गया था अपने जाना का। सच्चाई की यह कहानी बहुत लम्बी है, फिर कभी……

उनका जाना, केवल उनके पार्थिव शरीर का अंत होना मात्र था. वह जो थीं, और उनसे जुडी यादें , अनश्वर है ! सदा बनी रहेंगी .
विनम्र श्रद्धांजलि !
दे.नै.
नैनवाल साहब, नमास्कार। आनन्द बल्लभ और कमला उप्रेती के संघर्ष की गाथा किसी से छिपी नहीं है। फिर आपने बहुत निकट से सब देखा है। आपका प्यार बना रहे।