
डाॅ.पंकज उप्रेती
आजादी से पूर्व जब भारत-तिब्बत खुला व्यापार चलता था तब व्यापारियों के आन्तरिक व्यापार का नेटवर्क भी जबर्दस्त था। व्यापार के उन दिनों की चर्चा में अक्सर तिब्बत व्यापार की बात होती है जबकि कुमाउॅ-गढ़वाल के बीच होने वाले व्यापार का अपना महत्व था। व्यापार की इन रोचक जानकारियों के साथ 74 वर्षीय मोहन सिंह धर्मशक्तू बताते हैं कि व्यापार के दिनों में एक व्यापार तिब्बत की ओर होता था, दूसरा गढ़वाल की ओर। बरसात में तिब्बत जाते थे ;जुलाई से नवम्बर तक फिर गढ़वाल में व्यापार होता था।
जब माइग्रेशन में परिवारों के पड़ाव लगते थे तब मिलम, दरकोट, लोधिया बगड़ ;टिमटिया, तेजम के प्रसिद्ध इन धर्मशक्तू परिवार का आना-जाना होता था। माता केसी देवी व पिता हीरा सिंह के घर जन्मे मोहन सिंह, भूपेन्द्र सिंह, स्व.प्रद्युमन सिंह की वाल्यकाल का पढ़ाई दरकोट;मुनस्यारी हुई। पठन-पाठन के बाद सभी नौकरी-पेशा में इधर उधर रहे। मोहन सिंह धर्मशक्तू ने रेमजे अल्मोड़ा से हाईस्कूल, नैनीताल से इण्टर और लखनउ से डिप्लोमा करने के बाद विद्युत विभाग में अपनी नई शुरुआत की। गढ़वाल में उन्हें नौकरी का अवसर मिला और चमोली में कई अनुभवन उन्हें हुए। वह बताते हैं कि जब वह गढ़वाल में थे, स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया से चर्चा होती रहती थी। और बात निकल कर आती- ‘हमारा हिमालय पिघल रहा है।’ पिघलता हिमालय के शुरुआती दिनों में इसके नाम को लेकर चर्चा में सुमार था।
श्री धर्मशक्तू व्यापार के दिनों की पुरानी यादों पर लौटते हुए बताते हैं कि गढ़वाल में उनका व्यापार ज्यादा होता रहा है। कार्तिक माह में जब व्यापारियों का मुनस्यारी निवास होता था, तब गढ़वाल को जाते थे। गढ़वाल में ज्यादातर काला उफन की मां थी क्योंकि वहां काला कम्बल-लवादा पहनने का रिवाज है। तब जोहार के व्यापारियों की कई दुकानें भी गढ़वाल व्यापार के लिये थीं। ग्वालदम, थराली, देवाल, मीनगदेरे, उज्जवलपुर, सिमली, आदीबद्री, तिलवाड़ा, रुद्रप्रयाग, भुनारघाट, महलचैरी, चैखुटिया में जगह-जगह इनकी दुकानें थीं। अक्टूबर से अप्रैल तक व्यापारी इनमें दुकानदारी करते थे। तब तिब्बत से सीधे बकरियों द्वारा सामग्री पहुंचती थी। दुकानदार सम्पर्क कर इन सामग्री को पहुंचाते। भेड़-बकरियों की पीठ में सामान लादने का ‘बिल्च्या’ ;फांचा निकाल कर इनके द्वारा आलू, कोयला, चूना इत्यादि ढुलान करतवाते थे। तब दानसिंह मालदार के कारोबार भी काफी फैलता जा रहा था और व्यापार का सामान लेकर आये भेड़-बकरी पालक मालदार का सामान भी लदवाकर ले जाते थे। तब घोड़े वाले हल्द्वानी, रामनगर भाबर की मण्डी को जाते थे और भेड़-बकरी से समान ढोने वाले गढ़वाल की ओर ज्यादातर आते। व्यापार में उधारी भी होती थी और वसूली/उघाई करने वाले को ‘पगाली’ कहते थे। इस प्रकार गढ़वाल व्यापार का वृहद इतिहास रहा है। ;श्री मोहनसिंह जी से निवेदन भी है कि इस बारे में वह विस्तृत लेखन करेंगे
पिघलता हिमालय 5 दिसम्बर 2016 के अंक में प्रकाशित
