तय हुआ कुछ करो यारो और बन गया ‘दिगड़ी’ ग्रुप

 

 

डाॅ.पंकज उप्रेती

अपनी जन्मभूमि के प्रति कुछ करने की ललक हो तो बहुत कुछ किया जा सकता है। बच्चों को दिशा दी जा सकती है और बेसहाराओं को सहारा। जोहार-मुन्सयार का ‘दिगड़ी’ग्रुप भी कुछ करने
की ललक के साथ बना है। इस चर्चित ग्रुप का उद्देश्य भी अपनी जन्मभूमि और अपनों के लिये कुछ करना है।
इसके बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं है। तय हुआ कुछ करो यारो और बन गया दिगड़ी ग्रुप। दिगड़ी किस प्रकार से अपने कार्यों को अंजाम देता है इससे जोहारवासी भली भांति परिचित हैं। इसके सदस्यों के नाम उन्हें मौखिक याद रहते हैं। इस ग्रुप का शुभारम्भ होने की कहानी नवराज पांगती बेहतर बता सकते हैं। बातचीज मे वह बताते हैं कि सन् 1995 में वह बरेली आये थे। नरेन्द्र जंगपांगी भी 1997 में बरेली आ गये। एक सायं हम लोग बैठे थे और मन में आया कुछ करें। गर्मी के दिनों में मुनस्यारी में टूर्नामेंट हुआ करता है। उसके लिये फुटवाल, पम्प सहयोग के रूप में दिये। तब तक ‘दिगड़ी’ नाम का ग्रुप नहीं था। 1999 में एक ग्रुप बनाने की सोची गई। सुरेन्द्र मर्तोलिया, भूपेन्द्र पांगती, कैप्टन भूपेन्द्र पांगती को इस ग्रुप से जोड़ा गया। यह पूरा ग्रुप आपसी तालमेल और विश्वास पर आधारित है। किसी एक की बात पूरे ग्रुप की होती है। उस दौरान डाॅ.शेरसिंह पांगती बरेली आये हुए थे और डाॅ.प्रहलाद पांगती भी बरेली में थे। सबने आपस में बैठक ग्रुप का नाम सोचा। दोस्त से दिगड़ी, दगड़ी जैसे नाम सोचते-सोचते ‘दिगड़ी प्रफाम जोहार’ बन गया। जोहार के दोस्तों
का यह ग्रुप पर्यावरण सन्देश को जोड़ते हुए अपने कार्य करने लगा। सन् 2000 के नववर्ष पर जोहार सांस्कृतिक संगठन बरेली का आयोजन करते हुए ‘उत्तराखण्ड में शौकाओं का भविष्य’ विषय पर परिचर्चा भी की गई। उस समय तक ग्रुप के सारे सदस्य लगातार मुनस्यारी जाते थे। सीमान्त क्षेत्र के दो स्कूलों में जाकर बच्चों को ड्रेस, कापी-किताब बांटने का अभियान चलाया। प्रधान, अध्यापकों के साथ मिलकर यह कार्य किया जाता था। बाद में एक स्कूल गोद लेने का निर्णय लिया गया। चूंकि दरकोट में पूरे ग्रुप का मिलना आसान था इसलिये उसे केन्द्रित करते हुए कक्षा में प्रथम बच्चे को 500, द्वितीय को 300 व तृतीय को 200 देने का प्रावधन किया। यह सारे कार्य ग्रुप के सदस्य अपने स्वयं के सहयोग से करते हैं। बाद में ग्रुप के सदस्यों को लगा हम काफी दूर-दूर हैं इसलिये स्थानीय प्रतिनिधि रखे गये ताकि तत्काल के लिये उनसे सम्पर्क कर मदद की जा सके। ग्रुप ने आपदा में फंसे लोगों को तत्काल सहायता दी है। क्वीरीजिमिया के आपदा प्रभावितों को तत्काल सहायता के रूप में चाय-चावल-माचिस इत्यादि का पैकेट ग्रुप ने बंटवाया। दिगड़ी की कोशिश रही है कि जरूरतमंद को तत्काल और अतिआवश्यक सामग्री उपलब्ध् हो। श्री नवराज पांगती बताते हैं कि 2007 में उनके पिता जी का निधन हुआ, वह गाँव गये हुए थे। नवम्बर मास का समय था। एक दिन वह बालासिंह जी की कपड़े की दुकान पर बैठे थे, वहीं पर उषापति  द्विवेदी भी थे। उस बीच एक परेशानहाल को उन्होंने देखा और पंडित जी कहने पर तुरन्त एक कम्बल और रुपये उस व्यक्ति को दे दिया। कम्बल और उसके उपर रखा सौ का नोट लेने के बाद उस परेशान व्यक्ति की आँखों से आँसू छलक पड़े। तब पंडित जी ने कहा यह आदमी आपको दिल से दुआ दे रहा है। श्री पांगती कहते हैं कि समाज की ऐसी घटनाएं समझने की होती हैं और सिखाती हैं कि किस प्रकार मदद की जा सकती है। वह बताते हैं कि इसके बाद दिगड़ी ने माउण्टेन मैराथन का आयोजन किया। 2007 में इस ग्रुप के साथ पुष्कर सिंह पंचपाल भी जुड़ गये। क्षेत्र के ख्यातिप्राप्त खिलाड़ी या अन्य को सम्मान देने की बात हो अथवा ‘पठौन’ के रूप में अपने पहाड़ की यादों को एक झोले में भेंट स्वरूप देने का रिवाज हो ‘दिगड़ी’ ने किया है। दिगड़ी ग्रुप के सदस्य अपने सेवाकाल के दौरान किसी प्रकार समय निकालकर
कार्य कर रहे हैं और उनका सपना है कि सेवानिवृत्ति के बाद इस कार्य को और भी वृहद रूप से संचालित किया जाये। इसके लिये उनका प्रेम-विश्वास- सहयोग बड़ी ताकत है। सीमान्त वासियों को एक आशा और उम्मीद इस ग्रुप से हो गई है और इसे सपने को साकार करने में वह तत्पर रहेंगे।

पिघलता हिमालय 16 माचर्व 2015 के अंक से

कर्ण की तप स्थली है अलकनन्दा और पिण्डर नदी का संगम कर्णप्रयाग

ललित नैनवाल
जनपद चमोली का कर्णप्रयाग तीर्थों का तीर्थ है। अलकनन्दा और पिण्डर नदी के संगम स्थल पर बसे कर्णप्रयाग को कर्ण की तपस्थली के रूप में जाना जाता है। यहाँ कर्णशिला ;कर्ण मन्दिर में श्रद्धालु जाते हैं। उमाशंकर मन्दिर समिति द्वारा पूर्व में इस मन्दिर का सौन्दर्यीकरण किया गया था किन्तु उसके बाद से आज तक इसमें एक पत्थर भी नहीं लगना हमारे विकास की पोल खोलता है।
कर्णप्रयाग के बाजार क्षेत्र में ही कर्ण का मन्दिर है जिसमें कर्ण की मूर्ति के साथ ही कृष्ण की मूर्ति है। स्थानीय देवता की पूजा भी यहाँ की जाती है। कर्णप्रयाग तीर्थ के महात्म्य को जानें तो पता चलता है कि गंगा और पिण्डर के संगम पर शिव के क्षेत्र में देवालयों में महाराज कर्ण ने यहाँ दीक्षा ग्रहण की। यहाँ तप करके महादेव के मंत्र से तपकर देवी भवन ;वर्तमान उमा मन्दिर में ठहर गये थे। यहाँ ;वशिष्ठ वामदेव, व्यास देव, शुक, पैल, वैशम्पायन, नारद, तुम्बरु, भृगु अश्वसथामा, सदेव, रन्ति देव, महाहनु कश्यम तथा नदो, गालब, दलभक्षक, पॅर्णशत, महानाद, कुमधन्य, तपोनिधेश शनः, शेफ, भारद्वाज, गौतम, गणरात्रिप ये तथा बहुत से ब्रह्मवादी मुनि एवं सैकड़ों ट्टषि कर्ण के यज्ञ में आये थे। सुन्दरि यजमान राजा ;कर्णद्ध ने यज्ञ में सूर्य की अराधना की। तब कुछ दिनों में ;सूर्य ने महात्मा कर्ण को वर दिया तथा अवेद्य कवच और अक्षय तरोण ;तरकश दिये। महावीरो अजेय ;न जीते जाने योग्य होने का वर दिया तथा उसी के नाम पर उस क्षेत्र का नाम रखा गया तभी यह क्षेत्र कर्णप्रयाग के नाम से स्मरण किया जाता है।

पिघलता हिमालय 23 नवम्बर 2015 अंक से

हंसेश्वर महादेव मठ: अस्कोट के राजा पुष्कर पाल के शासन काल से स्थापित है

पि.हि. प्रतिनिधि
जौलजीवी/पिथौरागढ़। भारत-नेपाल सीमा लगे हंसेश्वर धम को महन्तों की लम्बी श्रृंखला ने व्यवस्थित कर संभाल रखा है वर्ना तो इसे अतिक्रमणकारियों की नज़र लग जाती। जौलजीवी के निकट स्थित हंसेश्वर महादेव मठ तितरी अस्कोट का क्षेत्र समस्त अस्कोट गर्खा तल्लाबगड़ धूरा दौ बास है। यह अस्कोट के राजा पुष्कर पाल के शासन काल से स्थापित है। जिसके संस्थापक महन्त हंसगिरि महाराज थे।
बहुतों को आश्चर्य हो सकता है कि इस निर्जन में मठ के पास घेराबन्दी की 500 नाली भूमि है। आश्रम में महन्तों की परम्परा लम्बी है, इसकी पुष्टि यहाँ बनी हुई 14 समाधियां करती हैं। एक बड़े क्षेत्र की आस्था का केन्द्र हंसेश्वर को नेताओं का आश्वासन मिलता रहा है किन्तु कोई सुध् लेने वाला नहीं है। आश्रम में आज भी एक 92 साल और एक 72 साल की माई रहती है किन्तु इन्हें वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिल पाई। बताया जाता है कि इनकी पेंशन के लिये फाइल तैयार की गई लेकिन कागज पूरा करने के पच्चड़ अड़ंगे वाले हैं, इन माईयों से भी आय प्रमाण पत्र मांगा जाता है। मठ में रहकर अपने दिन गिन रही वयोवृद्ध माइयां क्या कर सकती हैं? चुनाव में आशीर्वाद लेने आने वाले नेतागणों को अपनी कथनी-करनी में फर्क नहीं दिखाई देता है। पिथौरागढ़ के तेजतर्रार विधयक मयूख महर ने इस इलाके को स्वर्ग बनाने की बात कही थी तो काशीसिंह ऐरी ने गोवा बनाने की। विधयक विशन सिंह चुफाल भी आश्वस्त करते रहे। जिला पंचायत अध्यक्ष प्रकार जोशी भी कुर्सी मिलने के बाद कम आ पाते हैं। यानी की आशीर्वाद लेने बहुत आते हैं लेकिन सुध् लेने वाला कोई नहीं है। मठ के संचालक परमानन्द गिरी कहते हैं कि धर्मिक पर्यटन का बहुत शोर है किन्तु इस प्राचीन मठ की सुध् विरसा चुकी व्यवस्था से क्या उम्मीद की जाए? मठ के पाास 372 नाली 14 मुट्ठी नाप भूमि है जबकि घेरीबन्दी 500 नाली है। 2013 की आपदा में 50 नाली भूमि को नुकसान हुआ। नदी के कटाव से आश्रम की भूमि बर्बाद हुई जिसमें फलदार वृक्ष आम, लीची, कटहल के लगे थे। पूर्व में कई बार तटबन्ध् की मांग की गई थी लेकिन भूमि कटाव होता रहा लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।
उल्लेखनीय है कि पैदल यात्रा और कम साध्नों के जमाने में कैलास यात्रा पर जाने वाले साध्ु-सन्यासी कई पड़ावों में रुकते हुए यहाँ से जाया करते थे। इन्हीं में से शंकर गिरी और नागा प्रेम गिरी भी इलाहाबाद से घूमते हुए हंसेश्वर पहँुच गये। ये दोनों काली नदी के सूरज कुण्ड ;गरम पानी के स्रोतद्ध के पास रुके थे, इन्हें खाने के लिये वेर की झााड़ियां भी मिल गई। जंगली फल और वेर खाकर अपनी दिनचर्या यहीं बीतानी शुरु कर दी। वह समय 18वीं सदी का था जब अस्कोट के राजा पुष्कर बहादुर पाल थे। बताया जाता है कि नदी किनारे शवदाह के लिये आने वाले यदि अधजले शव को छोड़ गये तो ये गुरुभाई शव को ही भोजन के रूप में ग्रहण कर लेते। तब राजा से इस बात की शिकायत हुई। एक दिन राजा ने अचानक छापा मारकर इनसे प्रसाद मांगा। राजा ने सुना था कि मांस पकाया जा रहा है। बाबा ने पक रहा भोजन पूड़े में परोसा तो वह खीर थी। राजा ने बाबाओं से यहीं रहने को कहा और भूमि देने की बात कही।फिर पूड़े में बालू भर दी और कहा जहाँ इस पूड़े की बालू गिरेगी वह सारा क्षेत्रा हंसेश्वर का होगा। मौखिक रूप से हुए इस दाननामे में काली नदी के पार नेपाल के उक्कू ग्राम में शहपालमाणो शिवालय है, वह भी इसी मठ के अधीन है। यह भी बताया जाता है कि 1890 में जब जब शंकर गिरी के शिष्य हंसगिरी आश्रम में थे तब पुष्कर बहादुर के पुत्रा गजेन्द्र पाल गद्दी में थे। गजेन्द्र पाल को स्वप्न आया कि पिता पुष्कर पाल जी की आत्मा को रोक लिया गया है और वह मठ के लिये दी भूमि का निर्धारण की बात कह रहे हैं। सवाल था कि मठ की भूमि कितनी है, इसका निर्धारण कैसे हो? तब महन्त ने एक रात्रि का समय राजा से मांगा। उस रात्रि में भूतों ने मठ के चारों ओर दीवार बना दी और खेत बना दिये। अगले दिन राजा ने यह चमत्कार देखा और लिखित दाननामा किया। भारत की आजादी के बाद इस भूमि की किसानबही बनी। आज भी हंसेश्वर मठ की दीवार को भूतों की दीवार कहा जाता है और कोई भी उसे क्षति नहीं पहुँचाता है।
हंसेश्वर की पूरी कथा को कोई श्रद्धा, कोई चमत्कार और कोई रोमांच के रूप में देखता हो परन्तु यह तो सच है कि राज्य का यह अनूठा मठ है जिसके पास काफी अचल सम्पत्ति है। महन्तों की पूरी श्रृंखला ने यहाँ श्रम कर इसे बचाया। इनके हाथों बनी गूल से खेतों में रोपाई होती थी। इसमें आज भी अन्न उगाया जाता है। ऐसे मठ और आश्रम को संरक्षित करने के लिये सभी को ध्यान देना चाहिये।

पिघलता हिमालय 14 दिसम्बर 2015 अंक से

सीराकोट: ऐतिहासिक स्थल

सीराकोट का प्राचीन मुख्य प्रवेशद्वार

डाॅ.प्रयाग जोशी

डीडीहाट के भाष्कर स्वामी के ‘वैकुण्ठ धाम’ आश्रम में पहँुच कर सीराकोट का ऐतिहासिक परिदृष्य दिमाग में कौध् जाता है। जब छपनटा की निर्जल पहाड़ी के उपर वह आश्रम बन रहा था, मुझे उधर से होकर सीराकोट जाने के अनेक मौके मिले थे। आज स्वामी जी के अनुसायियों की उगाई हुई सघन बनाली में पानी के स्रोतों के फूट आने से फिजा ही बदल गई है।
पहले उक्त स्थान से सैकड़ों मीटर नीचे था पानी का पाँच सौ वर्ष से भी पुराना एक नौला जिसमें से कलसी या गगरी भरकर पुजारी पनेर-पोडौ मलैनाथ के मन्दिर की विकट चढ़ाई में सीढ़ियों के सहारे ढो-ढो कर ले जाते थे। इसी भाँति श्रद्धालु जन भी ले जाते थे। खाली हाथ जाना बुरा माना जाता था। कैसे-कैसे शाके सुनते थे उस नौले के पानी के। 1585 ई. में उसी नौले पर पहरा बिठाकर पुरखूपन्त ने, पानी के लिये लड़ाई छेड़ी थी। सीरा के दुर्ग को जीतने की रणनीति का हिस्सा हो गया था ‘छनपटा’ का नौला जिस पर कामयाबी हो जाने से राजा रुद्रचंद्र ने उसे सेनापति का पद दिया। कैसी जबर्दस्त कूटचाल थी आज की ही जैसी उस जमाने के पानी की भी। जबकि पानी, हवा, धूप व आकाश जैसा प्रकृति द्वारा प्राणिमात्रा को मिला वरदान माना जाता था। उसको, बेचने और खरीदने की वस्तु बनाने की कल्पना भी नहीं हो सकती थी। पुरुखूपन्त के चैगर्खिया कटकुओं से, पैसौं के महंगे मोल पानी खरीदते-खरीदते राजा का कोष खाली हो गया और हरिमल्ल राजा ने, चन्दराजा के लड़ैतों के सामने हाथ खड़े कर दिये। कोटपाल, पहरी, उघाईदार, नेगी, बजनियाँ, साहूकार, पुरोहित, धर्माध्यक्ष सबको दुर्ग खाली करके युद्ध-विराम करना पड़ा था। राजा डोटी भागा और और सीरा का सम्पन्न राज्य मल्लों के हाथ से चन्दों के हाथ में चला गया। राज रुद्रचन्द सोर और गंगोली अधिराज्यों को पहले ही अपने में मिला चुका था।
अब सीरा के हाथ आ जाने से जोहार-दारमा से लेकर जुमली-हुमली तक के सीमान्तों तक व हिमालय के नाकों के उस पार तिब्बत की मण्डियों से लेन-देन की नीति बनाने की सहूलियत थी। चम्पावत के ‘छोटे कुमाउँ’ से निकल कर अल्मोड़ा के ‘वृहत्तर कुमाउँ’ बनने की बड़ी उपलब्धियों के पीछे, एक तरफ 1585 ई. की, वहाँ दुर्लभ पानी के विक्रय की तुच्छ-टुच्ची सी सैतानियत का योगदान है तो दूसरी तरफ है उस दुरारुढ़ विकट काँठे पर एक तहसील के बराबर के भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित सीरा अधिराज्य की ‘राज्यबूंगी’ से, गंगोली, सोर, अस्कोट-उक्कू से लेकर डोटी दिपायल, जुमला-हुमला आदि बाईसी व चैबीसी राज्यों तक के समस्त राजाओं को अपनी मातहती स्वीकार कराकर हिन्दू राष्ट्र राज्य के बड़े शासक कहलाने की आनन्द मल्ल व संसारमल्ल जैसे राजाओं की सफल महत्वाकांक्षा। बहुत शानदार और व्यवस्थित राजतन्त्र रहा है मल्लों का। कृषि कर के की, उनके समय विकसित हुई प्रणाली और उसकी वसूली का प्रबन्धन्त्र तो अदुतिय ही है।
बैकुण्ठधम आश्रम की बायीं पहाड़ी के उच्चतम शिखर पर मल्लों के ‘देवकोट’ में मलैनाथ का मन्दिर है। जिसे राजा पापनेश्वर के विरूद से पूजते थे। वहाँ आज भी नित्य पूजा होती है। आठबीसी, बारबीसी, माली-कसाण, डीडीहाट, वगला-पोखरी, परगड, कौली-गराली, चुफालदेस, खेतार-महरगों आदि गरखों के इष्ट देवता हैं मलैनाथ स्वामी। मल्लों के बखत मन्दिर-परिसर में ही ‘दिव्य’ प्रथा से न्यायिक-दण्ड के मामलों का सम्पादन होता था। मन्दिर के बायंे, उससे अपेक्षाकृत कमतर उँची पहाड़ी के समतल शिखर पर ‘राजकोट’ था। देवता का मन्दिर होने से ‘देवकोट’ तो आज भी गुलजार है पर ‘राजकोट’ का नामलेवा तक कोई नहीं मिलता।
सीराकोट तीन तरफ से दर्गम्य चट्टानों से रक्षित होने से स्वयं दुर्ग है तथापि चारेक नाली के खेत के बराबर उपलब्ध् उस स्थान को पत्थरों की दीवार देकर प्राचीरवत घेरा गया था। किले जैसे उस राजघर का नामोनिशान मिटाने के इरादे से रुद्रचन्द ने उसे बरबाद करवाया। माल-असवाब, दस्तावेज, कोष-जेवरात जो भी रहे हों, रामगंगा के उस पार गंगोली पहँुचाये गए, कि कहीं मल्लों की फौज डोटी से चलकर उसे फिर से कब्जिया न ले। वीरान हुए राजकोट के निवासों का उपयोग बाद के वर्षों में राजद्रोह के अभियुक्तों को रखने के जेलखाने के रूप में होता रहा। वर्षाती बाटों के रख रखाव के बिना, सीढ़ियों- खडंजों व पटालों के रड़ते खिसकते और बहते जाने से सब कुछ वीरान- खण्डहर होता चला गया। आज सीरा के साथ जुड़े शब्द ‘कोट’ पर किसी का ध्यान नहीं जाता तो नयी पीढ़ी के बच्चों को इतिहास पर यकीन करना कैसे सिखाया जाय? उस गौरवशाली राजकोट में प्रवेश करने के मुख्य गेट का आध हिस्सा भर बचा हुआ है जिसका फोटो आप इस लेख के साथ छपा हुआ देख सकते हैं। उसकी पुरातत्त्व विभाग से मरम्मत कराई जानी है। सीराकोट का एक समृद्ध ऐतिहासिक स्मारक के रूप में पुनर्निर्माण होना जरूरी है।
सन् 1353 ई. से लेकर 1585 ई. तक के 232वर्षों तक आदित्यमल, निरैपाल, नागमल्ल, रिपुमल्ल, कल्याण मल्ल, आनन्द मल्ल, संसार मल्ल, पूरन मल्ल, अर्जुन मल्ला, भूपति मल्ल और दो बसेड़ा राजाओं ने सीरा अधिराज्य पर राज किया। उनकी शासन पद्धति और कार्य संस्कृति पहाड़ों के भूगोल व जीवन संधरिणी स्थितियों के अनुकूल थी। उनकी नागरिक नीतियों में प्राकृतिक संसाधनों को बनाये रखने की प्रेरणा है। जंगल, गौचर, गाड़ गधेरों के निर्मम इस्तेमाल की कोई सूचनाऐं नहीं हैं। जमीनों के वर्षवार बन्दोबस्त, वेतन-विहीन जागीरदारी शासन-प्रबन्ध्,विनिमय आधारित मुद्राविहीन अर्थ व्यवस्था, स्थानीय उत्पादों के उपजन, भण्डारण व उपभोग की पंचायती व्यवस्था और उनके स्वायत्त अर्थशास्त्र की बहुत सी चीजें आज के समय भी प्रासंगिक लगती हैं। उनका, बकरियों, घोड़ों और भार वाहियों पर निर्भर परिवहन रोजगार पैदा करने वाला है। कमाई करने की खातिर गाँव व प्रदेश से पलायन का विरोध् करता है। बंजर पड़े गाँवों को पुनः आबाद करने के सरकारी प्रोत्साहनों की चमत्कृत सूचनाएंे मल्लों के इतिहास में खोजी गई हैं।
मौखिक ख्यातों, बहियों व ताम्रपत्रों के अध्ययनों से सीरा के तत्कालीन सूक्ष्म इतिहास की अपूर्वियत को समझने की गम्भीर कोशिश के साथ उस ‘गढ़ी’ को हरियाली से भरने के लिये भाष्कर स्वामी जैसे समर्पित प्रकृति प्रेमियों को भी मुहिम में लगाने की जरूरत है।

पिघलता हिमालय 3 जुलाई 2017 के अंक से

चंद राजाओं के वीरों के ग्राम करक्यूड़ा को अब खर्ककार्की के नाम से जानते हैं

गाँव का पुराना नौला

पि.हि.प्रतिनिधि
चम्पावत जिले के मुख्यालय से लगे गाँव खर्ककार्की में अब कंक्रीट का जंगल विस्तार लेने लगा है। करक्यूड़ा नाम के इस ग्राम को खर्ककार्की नाम से जाना जाता है। कार्कियों के परिवार यहाँ बहुतायत से हैं। दरअसल चंद शासक के समय कार्की उनके वीरों में सम्मलित थे। चंद शासनकाल में उनके चार बड़े मंत्रियों में कार्की, चैधरी, तड़ागी, बोरा थे। आज भी चम्पावत में चार भागों में इनकी बसासत है। कार्की आल, चैकुनी आल, बोरा आल, चैधयाली। संग्राम कार्की नाम इतिहास में है जो पराक्रमी योद्धा के रूप में जाने जाते हैं।
खर्ककार्की से कई स्थानों पर कार्की परिवार जाकर बसे। इनमें से पुंगराउ घाटी में भी यह बसे। इसी गाँव में शक्टा परिवार इनके आचार्यों के रूप में स्थापित हैं। संस्कृत के विद्वानों शक्टा परिवार आज भी स्वाध्याय व अपने संस्कारों के साथ सामाजिक भागीदारी में संलग्न हैं।
खर्ककार्की गाँव आलू की खेती के लिये भी प्रसिद्ध रहा है लेकिन आजकल सुअरों के आतंक से खेतों को नुकसान होने के कारण क्षेत्रवासी परेशान हैं। गाँव में आज भी पुराने भवन दिखाई देते हैं लेकिन अब अधिकतर सीमेंट-गारे के बनने लगे हैं। पुराने नौलों को भी सौन्दर्यीकरण के सजाया गया है।
चम्पावत मुख्यालय से लगे इस गाँव से कई परिवार अब बाहर जा चुके हैं लेकिन फिर भी उम्मीद है कि कई लोग लौटेंगे। अपने समृ( इतिहास का स्मरण करते हुए अपनी जड़ों को टटोलते हुए वापसी करेंगे। आने जिस प्रकार चम्पावत मुख्यालय फैलता जा रहा है उस अनुपात में खर्ककार्की भी घिरता जायेगा। इसलिये भी जरूरी है यादों को सहेजा जाए।

पिघलता हिमालय 12 फरवरी 2018 अंक से

बायांगढ़ को बौंगाड़ कहने लगे, कभी चन्द राजाओं का कोट था

पि0हि0प्रतिनिधि
थल। पुंगराउ घाटी का खूबसूरत गाँव है- बौंगाड़। पांखू कस्बे से आधा किमी दूरी पर स्थित इस ग्राम पर कभी बायांगढ़ कहा जाता था। इलाके के बड़े-बुजुुर्ग बताते हैं कि चन्द राजाओं के समय में यहाँ कोट था। आज भी एक टीले के उपर कोट के निशान हैं और मान्यता है कि पुराने समय में अपने विरोधियों को साधने के लिये राजा टीले से हमला कर देते थे। गाँव में कार्की परिवारों की बहुलता है। कई परिवार बाहर बस चुके हैं लेकिन ग्राम की परम्पराओं को शानदार तरीके से बनाया हुआ है।
सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती हरिप्रिया कार्की बताती हैं कि उन्होंने भी अपने बड़े-बुजुर्गों से सुना है कि उनके पूर्वज नेपाल से यहाँ आये थे। चार भाई बौंगाड़, लोहाथल, दंतौला, चैंसला में रहने लगे। वैसे भी इलाके में शुरु से ही कहा जाता है- ‘‘चार राठ पाठक, चार राठ कार्की।’’
पहले इस ग्राम में प्राचीन ताम्रपत्र प्रधान त्रिलोक सिंह जी के वहाँ पाया जाता था। वर्तमान में व अन्यत्र है। बौंगाड़ की आवादी करीब चार सौ है। प्रधनमंमंत्री सड़क से जुड़े गाँव में शौचालय, कूड़ेदान, पेयजल की उचित व्यवस्था है। इस गाँव के 33 परिवार हल्द्वानी बस चुके हैं। फौज के अलावा अन्य क्षेत्रों में यहाँ के लोग हैं।
इस ग्राम पंचायत में 6 ग्राम आते हैं जिसमें खंडार, नायल, उप्रेतीखोला, बौंगाड़, बोकलकटिया, बंतोला। ग्रामपंचायत से लगा हुआ फल्याटी, तोराथल ग्राम है जहाँ से पैदल रास्ते होते हुए चकौड़ी घूमा जा सकता है। पांखू क्षेत्र के कई ग्रामों में जोहार के वृजवाल परिवार रहते हैं। तिब्बत व्यापार के दिनों में पैदल यात्रा के समय कई परिवार यत्र-तत्र बस थे जो यहाँ भी हैं। पास के इलाके ध्ररमघर में भी जोहार के काफी परिवार हैं। माइग्रेशन के दौरान स्कूल भी यहाँ चलता था, जो वर्तमान की स्थितियों में सरकारी स्कूल के रूप में जारी है।
बौगाड़ ग्राम से थल के लिये पुराना रास्ता भी है, जिसमें अब आवागमन नहीं होता है। पहले ग्रामवासी नियमित रूप से श्रमदान कर मार्ग की सफाई और रख-रखाव करते थे। सर्वोदय संस्था भी यहाँ बहुत सक्रिय रही है। राध बहिन, गोपाल सिंह सहित तमाम लोग बराबर ग्राम विकास के लिये कार्य करते रहे हैं। वर्तमान में युवा प्रधन द्वारा भी लगातार कार्यों किये जा रहे हैं। धन- धन्य से भरपूर इस ग्राम की उन्नति होती रहे और यह दूसरों के लिये भी प्रेरणा बने, ऐसी कामना है।

कार्की समाज के इतिहास व वंशावली पर पुस्तक
बौगाड़ निवासी लोकमान सिंह कार्की ने कार्की लोगों के इतिहास पर पुस्तक लिखी है। चम्पावत जिले में गाँव के नाम तक खर्ककार्की, मंचकार्की सुनाई देते हैं। तमाम रोचक जानकारियों के साथ बनी पुस्तक में 1970 से कार्की उपजाति का इतिहास इसमें दिया गया है। साथ ही इनकी बंशावली। बताया है कि कार्की कोंकण रिसायत के राजा थे। 12वीं शताब्दी में कार्की लोग नेपाल चले गए। कुमाउॅ मंे लोगों के आदि पुरुष को वह संग्राम सिंह बताते हैं। संग्राम सिंह नेपाल में गोरखा शासन से तंग आकर चम्पावत और लोहाघाट के मध्य कन्यूरी गाँव में रहने लगे। संग्राम सिंह के दो विवाह थे। उनके वंशवृक्ष के लोग बौगाड़, चैसाला, लोहाथल, दंतोला, बैराजुबर, मसूरिया, थर्प, चनकाना, भूलधरा, जजोली, ससिखेत, मुवानी, गणाई, रानीखेत, मनान, गगास समेत कई गाँव में कार्की रहते हैं। कार्की कुमाउँ के राजपूत हैं।
पुस्तक का विगत दिवस जिलाधिकारी पिथौरागढ़ डाॅ. रंजीत सिन्हा ने विमोचन किया। लोकमान सिंह का कहना है कि उक्त पुस्तक नई पीढ़ी को उनकी जड़ों को जानने में मददगार होगी। पुस्तक सामग्री पहले एकत्र हो चुकी थी किन्तु धनाभाव के कारण यह देरी से बन पाई।

पिघलता हिमालय 27 मार्च 2017 अंक से

यज्ञ स्थली था जगथली गाँव

पि.हि.प्रतिनिधि
गाँव की ओर स्तम्भ में आज हम आपको ग्राम जगथली का परिचय करवा रहे हैं। पहाड़ के खाली होते गाँवों की तरह इसकी भी पीड़ा है। महानगर में बस चुके कुछ परिवार अपनी मातृभूमि के लिये सजग हैं किन्तु अधिकांश पलायन का दर्द दिखाई देता है। थल से 14 किमी और बेरीनाग से 15 किमी दूरी पर स्थित है गाँव जगथली। इस ग्रामसभा की बात करें तो लगभग ढाई हजार की आबादी है। गाँव में प्राइमरी और इण्टर कालेज है। वर्तमान में सड़क बनने से यहाँ रहने वालों में उम्मीद जगी है।
जगथली के बारे में कहा जाता है कि यह यज्ञ स्थली हुआ करती थी और दूर-दूर से लोग एकत्रित होकर यज्ञ में भाग लेते थे। यहाँ प्राचीन शिवालय है, बाद में जिसका जीर्णेद्धार कर दिया गया है। मन्दिर के पास वाले खेत को ‘कुन’ ;कोना कहा जाता है और पास में ही ‘ज्यूनारपाट’। कहते हैं ज्योनार बनाकर कुन उतारने के के कारण इनका नाम रखा गया। यह भी मान्यता है कि मन्दिर के पास खेतों के बीचोंबीच विशालकाय पत्थर से शंखध्वनि होती थी, जिसे आज भी ‘बिलाड़ीढंुग’ कहा जाता है।
जगथली में चन्दोला परिवार सहित कई जातियां रहती हैं। बताते हैं चन्दोला लोग गढ़वाल से आकर यहाँ बस गये थे। इन परिवारों में अधिकांश अब शहरों में यत्रा-तत्रा रहने लगे हैं। गाँव के 53 वर्षीय केवलानन्द चन्दोला बताते हैं कि काण्डे में रहने वाले पन्त, लालुका के बिष्ट और उनके बुजुर्ग एकसाथ इस स्थान पर आये थे। जगथली ग्राम सभा में गराउॅ के शाह, उडियारी के महरा, कालिटी के कार्की, किरौली के पन्त, काण्डे के पन्तों की जमीनें हैं। कभी सभी के पूर्वज यज्ञ के लिये यहाँ आते रहे होंगे।
जगथली के सूनेपन को चीरते हुए दुलखोला-सकनोली-गराउॅ तक सड़क बन रही है जो देवीनगर तक मिलेगी, इससे आवत-जावत में राहत मिलेगी। उम्मीद की जानी चाहिये कि बन्द पड़े कई घरों में फिर से चहल-पहल होगी। ग्राम में 12 प्रकार की जातियों का निवास रहा है। जिसमें से खौला गाँव के जोशी परिवार अब हल्द्वानी के पास बिन्दुखत्ता बस चुका है। महरौड़ी का बसखेती परिवार था, जिसमें एकमात्र बुजुर्ग के निधन के बाद कोई नहीं बचा है। जगथली के पहले पूर्वज के रूप में घंघोला जाति यहाँ है। चन्दोला, भट्ट, नौर्की;जोशी लिखने लगे हैंद्ध, कार्की, मेहता, पन्त, बोरा, दुनखोला के जोशी, बिष्ट, मनराल, लोहार, शिल्पकार सभी हिलमिल इसे संवारते रहे हैं। आशा है बनने वाली सड़क रौनक लौटायेगी।

पिघलता हिमालय 26 सितम्बर 2016 अंक से

बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण स्थान का नाम पड़ा टिमटिया

पि.हि.प्रतिनिधि 
थल-मुनस्यारी मार्ग पर स्थित तेजम का टिमटिया क्षेत्र माइग्रेसन काल में धर्मशक्तूओं का पड़ाव हुआ करता था। मिलम, दरकोट और नंगर यानी गरम घाटी में तीन-तीन माह करीब यह लोग रहा करते थे।
केदार सिंह धर्मशक्तू बातचीत करते हुए बताते हैं कि मिलम में मूल रूप से रावत, पांगती, सयाना हुए जिन्हें मिल्मवाल कहते हैं। धर्मशक्तू में से ही सयाने को सयाना कहा गया। तिब्बती में इन्हें च्यूंवायारता कहते हैं। तिब्बत व्यापार के समय से जब व्यापारियों का आना-जाना होता था तब मौसम के अनुसार वह अगल-अलग स्थानों पर रहते थे। नंगर यानी की गरम घाटी के रूप के रूप में नाचनी का यह क्षेत्र भी चुना गया होगा। बकरियों की प्रिय टिनटिन घास के कारण इस स्थान का नाम टिमटिया पड़ गया। पहले से इसी प्रकार से कई नाम पड़ गये। भैंसखाल में तालाब सा है जिसमें भैंसें जाती थीं, नाम पड़ा भैंसखाल। बुजुर्गवार के नाम पर स्थान का नाम पड़ा- जब्बूखरक। श्री धर्मशक्तू बताते हैं- तेजम तो कोट रहा है, जहाँ रावत लोगों के हाथ में न्याय व्यवस्था थी।
अपने बुजुर्गों से कहे-सुने के अनुसार श्री केदार सिंह जी बताते हैं कि किसी समय टिमटिया में आसा जसपाल आये थे। इन्हीं के बंशज विभिन्न राठों के नाम से जाने जाते हैं। बाद में कुछ लोग माले चले गये और कुछ टिमटिया रह गये। टिमटिया रहने वालों को टिमटिया राठ कहने लगे। पाँच भाईयों का एक राठ हुआ जो शामा के पास ढोलढूंगा गये थे। माले राठों में गिरधर सिंह धर्मशक्तू के परिवार जन आदि हैं। टिमटिया राठों में डाॅ.नारायण सिंह धर्मशक्तू परिवार जन आदि हैं। पाँच भाई राठों में बलवन्त सिंह धर्मशक्तू परिजन आदि हैं।
श्री केदार सिंह बताते हैं कि किन्हीं कारणों से यत्र-तत्र जाकर रहने लगे राठों की नई पीढ़ी भी नौकरी-पेशा के सिलसिले में दूर-दूर तक निकल चुकी है किन्तु अवसर विशेष पर सभी मिलते जुलते हैं। आज भी टिमटिया में अपनी यादों के साथ बने हुए श्री धर्मशक्तू चाहते हैं कि उनके परम्परागत हुनर को नई पीढ़ी बचाये रखे।

पिघलता हिमालय 7 दिसम्बर 2015 के अंक से

चैती गायन का परम्परा ही सिमट चुकी है

डाॅ.पंकज उप्रेती
थल-बेरीनाग मार्ग के बीचोंबीच का प्रसिद्ध इलाका है- काण्डेकिरौली। काण्डे, किरौली, जगथली कभी एक ही ग्रामसभा हुआ करती थी, अब यह तीन ग्राम सभाएं हैं। इसी काण्डे के मूल निवासी पनीराम परम्परागत कलाकर हैं। नागों में मुखिया पिंगलीनाथ के दास के रूप में अपनी परम्परा को आज भी पनीराम और इनता परिवार निभा रहा है। लोक गायन की कई विधाओं को जानने वाले 72 वर्षीय पनीराम के शिक्षित पुत्र राजन, गोपाल, महिपाल भी इन विधओं को जानते हैं और मेलों के असल रंग में झूमने के लिये जाते हैं।
पनीराम के दादा रुद्रराम और पिता गुलाबराम जागर व अन्य गायन की अन्य लोक विधाओं के जानकार थे, इन्हीं से सीखे हुए पनीराम आज भी नित्य प्रातः और सायं अपने घर में ढोल बजाकर पिंगलीनाथ का स्मरण करते हैं। ग्रामीण भी इनके मान-सम्मान में कसर नहीं छोड़ते हैं। लोक की यह अद्भुत परम्परा में कोई भेदभाव नहीं है, सब लोग एक-दूसरे का ध्यान रखते हैं। जिसके घर में जो नई फसल का जो होता है उसका हिस्सा अनिवार्य रूप से इस परिवार को भी दिया जाता है। ऐसा सामाजिक तानाबाना हमारी कला-संस्कृति को जोड़ने वाला रहा है लेकिन सरकारी धन से कला-कलाकारों के संरक्षण के नाम पर हो रहा खेल दिल दुःखाता है।
पनीराम गंगनाथ की जागर लगाते हैं, जिसे हुड़के पर गाया जाता है। गोल ज्यू, नौलिंग, बजेंण, छुरमल, कालसिन की बंशावली को गाते हैं, जिसे ढोल की संगत में गाया जाता है। ढोल में पिंगलनाथ का स्मरण किया जाता है। वह बताते हैं कि नागों की वंशावली नहीं गाई जाती है, अन्य देवी-देवताओं के भांति नागों के डांगर नहीं होते हैं।
ढोल-जागर के अलावा पनीराम चैती गायन में माहिर हैं। इस गायकी में ट्टतु का रंग, रोमांच और उदासी के स्वर गूंजते हैं। पहाड़ में गाई जाने वाली यह गायकी अब सिमट चुकी है। बातचीत के दौरान वह ढोलकी के साथ सुनाने लगते हैं-
‘रितु औंछे पलटि बरस का दिना
ज्यूना भागी जी रौला,
सौभागी सुणला बरस की रितु……
मालो जानी गबड़ी पलटी आला,
खेवी जानी मौनू पलटी आला,
चैतोलिया मासा भाई भिटोली आला।
जाको न छि भाई, कौ भिटोली आला,
दैराणी-जैठाणी का भाई भिटौली आला,
गोरीध्ना रौतेली, कौ भिटोली आला,
छाजा बैठी गोरी आँसुवा ढोललि……..।’
इसमें चैत मास का वर्णन करते हुए गायक कहता है बर्ष में यह रितु भी अपने समय से आयेगी, सभी राजीखुशी रहें, सौभाग्यवती सुनेंगी, भाबर जाने वाले ग्रामीण लौट आयेंगे जैसे मधुमखी रस लेकर अपने स्थान पर लौट आती है। इस वर्णन में गायक आगे कहता है- चैत के मास में भाई मिलने आयेगा। बहुत ही कारुणिक वर्णन इसमें है जब वह कहता है- गोरीधना का तो भाई ही नहीं है, कौन भिटोली लेकर आयेगा। वह छज्जे में बैठकर आंसु गिरायेगी।
चैती का यह वर्णन बहुत लम्बा है जिसमें आगे बताया गया है कि गोरीधना का भाई नहीं था। उसके विवाह के उपरान्त घर में एक भाई हुआ, जो बाद में उसके लिये भिटौली लेकर आया। इस प्रकार पुराने समय में रितु के रंग, रोमांच के साथ करुणरस के स्वरों को घोलता हुआ चैती गीत गाया जाता है। वर्तमान में इसके गायक गिनती भर के हैं, जो गाँवों में घर-घर जाकर इसे सुनाया करते थे और सुनने वाले भी बहुत ही भावपूर्ण ढंग से इसे सुनते और कलाकार को पुरस्कार स्वरूप कुछ देते थे। काण्डे के पास ही बैठोली के दलीराम और उड्यारी के चनरराम भी चैती गायकी के अच्छे जानकार थे। इन्हीं परिवारों में से दलीप राम और मोहनराम ने गणतंत्रत दिवस के अवसर पर सबसे पहले छोलिया नृत्य किया था। यहाँ की धनीराम एण्ड पार्टी नैनीताल, लखनउ, दिल्ली तमाम जगह में जाया करती थी। सनेेती, सनगाड़, भनार, नागमन्दिर बेणीनाग में कभी जबर्दस्त झोड़ा-चांचरी के आयोजन होते थे और परम्परागत कलाकार अपने गाँवों से ढोल-दमुवा बजाते हुए जात्रा के रूप में जाते थे। हुड़कीबौल सामन्यतः धन रौपाई में लगाई जाती है किन्तु यहाँ मडुवा गोड़ाई के समय इसे लगाया जाता था। समय बदला और अब पनीराम के ढोल की स्वर सुनाई देते हैं।

पिघलता हिमालय 19 सितम्बर 2016 अंक से

बीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट का है इतिहास

इन्द्र सिंह नेगी
नैनीताल। नैनीताल का बीरभट्टी क्षेत्र अतीत से ही अपने इतिहास में कई पन्ने जोड़े हुए है किन्तु त्रासदी तो यह है कि बलियानाले के ट्रीटेमेंट के नाम पर आज तक कोई ठोस कार्य नहीं हो पाया है। जिस कारण गन्दगी फैलने के साथ-साथ रानीबाग से सीधे इस इलाके को जोड़ने वाला मार्ग भी लुप्त हो चुका है और मुख्य हाइवे पर बना पुल भी मजबूत बनने के लिये मजबूर सा बना हुआ है। बलियानाले के ट्रीटमेंट के नाम पर हो रहे कार्यों को आज तक शासन-प्रशासन ने गम्भीरता से लिया होता तो इलाके में खतरा नहीं मंडराता और प्राचीन यात्रा पथ भी यहाँ के इतिहास की परख के लिये सुलभ होता।
जरा इतिहास की ओर नज़र दौड़ायें तो पता चलता है कि इस क्षेत्रा को ब्र्रेवरी कहा जाता था। अंग्रेजों के शासन काल में यहाँ वियन बनाने की भट्टी थी। 1987 में मनोरापीक के भूस्खलन का मलवा वीरभट्टी में आया, जिसमें 27 अंग्रेजों की मौत हो गई थी। अस्तबल, होटल, डाकखाना, पशु भी मलवे में दफन हो गये। तब वीयरभट्टी को भवाली खोल दिया गया। बाद में सिलीगुड़ी;आसाम में उसे शिफ्रट कर दिया गया था। यह इलाका नीमकरौली महाराज की कर्मस्थली भी रही है। पं. नेहरु सहित कई दिग्गज यहाँ आये हैं। पं.गोविन्द बल्लभ पन्त जी तो इसे घर ही मानते थे। ऐसे स्थान को मालदार परिवार ने अपनी कर्मस्थली बनाया। ठाकुर देव सिंह बिष्ट के पुत्र- दानसिंह-मोहनसिंह भाईयों ने जिस तल्लीनता के साथ वीरभट्टी क्षेत्रा में कार्य किये उनकी यादें आज भी हैं। दानसिंह जी की 6 पुत्रियां हुई और मोहन सिंह जी के तीन पुत्र 10 पुत्रियां। इनके ज्येष्ठ पुत्र पृथ्वीराज सिंह थे। इस बड़े कुनबे के परिजन यत्र-यत्र के साथ वीरभट्टी स्थित बिष्ट स्टेट में भी रहते हैं। मोहन सिंह जी बहु रमा बिष्ट, पृथ्वीराज जी की पुत्री दीप्ति बिष्ट अपने बुजुर्गों की यादों को संजोये हुए हैं।
बिष्ट स्टेट वह क्षेत्र हैं जहाँ से उन्नति कर कई लोगों ने अपने भविष्य को संवारा है। इस प्रकार की धरोहरों को संवारने के लिये व्यक्तिगत प्रयासों के साथ सामूहिक कृत्य भी होने चाहिये। 1897 से लेकर 1922 तक यहाँ रामलीला मंचन भी हुआ है। इतिहास के गवाह इस इलाके के विकास की बात छोड़ शासन-प्रशासन अपने में ही उलझा है। यह क्षेत्रा बलियानाले का मुहाना है और रानीबाग तक दस हजार परिवार इससे प्रभावित हो रहे हैं। क्षेत्रवासी चाते हैं कि वृटिश कालीन पुराने मार्ग के सौन्दर्यीकरण सहित बलियानाले का ट्रीटमेंट कार्य ठोस हो।

पिघलता हिमलाय 22 फरवरी 2016 के अंक से