
डाॅ. मनीषा पाण्डे
इन दिनों पूरा उत्तराखण्ड लोक उत्सवों के रंग में रंगा है। आठूं-सातूं के अलावा जगह जगह होने वाले स्थानीय मेले व बड़े त्यौहारों में लोक कलाकारों के दर्शन हो रहे हैं। सीमान्त में नन्दा पूजन, अल्मोड़ा-नैनीताल सहित अन्य जगह नन्दा-सुनन्दा पूजन, अस्कोट में हीरन-चीतल नृत्य, डीडीहाट में ठुल खेल, चमोली उत्तरकाशी में जात्राओं के आयोजनों के अलावा लोेक देवताओं के पूजन का यह यह समय है। केदारघाटी के बणसू जाखधर में माँ राजेश्वरी की देवयात्रा हुई। देवर, रुद्रपुर, सांकरी, गुप्तकाशी, नाला, नायणकोटी समेत कई जगह भक्तों को आशीर्वाद मिला। 18 साल के अन्तराल में यह यात्रा होती है। उत्तरकाशी के गोपाल मन्दिर में अनुष्ठान जारी है। रुद्रप्रयाग जिले में उफखीमठ देवरियाताल महोत्सव का भव्य आयोजन हुआ। इसम उफखीमठ के ओंकारेश्वर मन्दिर, सारी के भूतनाथ मन्दिर तथा नागराज मन्दिर तक झांकियां निकाली गई। इस इलाके में बहुत प्राचीन मेला है। गंगोलीहाट क्षेत्रा में कई ग्राम पतारबाड़ा, पुनोली, कोठेरा इत्यादि में बच्चों से लेकर बूढ़े तक झोड़े चांचरी की मस्ती में हैं। चम्पावत जिले के देवीध्ुरा का प्रसि( बग्वाल मेला हो चुका है परन्तु स्थानीय स्तर के कई महोत्सवों का क्रम बना हुआ है। तराई भाबर क्षेत्रा में भी पहाड़ से आकर बस चुके लोगों ने अपने ईष्ट-मित्रों के साथ खेलों ;झोड़े-चांचरीद्धका आयोजन किया। लोकमंच का यही असल उत्सव है। लोक उत्सव के क्रम में सोर घाटी के नाम से प्रसि( पिथौरागढ़ शहर में भी अगस्त-सितम्बर के महीने मनाए जाने वाले अनेक मेलों से वातावरण लोक रंजित हो जाता है। यहाँ के गाँव घरों में सातूं-आठूं का पर्व बड़ी ध्ूमधम से मनाया जाता है। इस पर्व में विशेष रूप से गौरा महेश्वर की पूजा की जाती है और उनकी गाथा गाई जाती है। सातूं आठूं की तैयारी पंचमी तिथि से हो जाती है। पंचमी के दिन सभी महिलाएं सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर विरुड़ भिगाती हैं। इसके बाद सप्तमी-अष्टमी को गौरा महेश्वर की पूजा की जाती है। यहाँ ऐतिहासिक रामलीला मैदान में 17 से 22 अगस्त तक यह मेला ध्ूमधम के साथ मनाया गया। सातूं के दिन पित्रौटा गाँव की महिलाओं द्वारा गौरा का विग्रह बनाकर उसे ढोल-नगाड़ों के साथ नगर में शोभा यात्रा के रूप में घुमाया गया। उसके बाद गौरा के विग्रह को रामलीला मैदान में स्थापित करके पूजा-अर्चना हुई। अगले दिन महेश्वर का विग्रह बनाकर उसे भी गौरा के विग्रह के साथ स्थापित किया गया। आठूं में प्रतिदिन अनेक कार्यक्रम देखने को मिले। हुड़के की थाप पर झोड़ा, चांचरी, न्योली-छपेली के अलावा स्थानीय विद्यालयों ने रंगारंग प्रस्तुतियां दीं। छह दिन तक चले इस मेले के अन्तिम दिन गौरा-महेश्वर का विदाई समारोह ध्ूमधम से हुआ। वर्तमान में गाँवों से पलायन के कारण पहाड़ की यह अद्भुत संस्कृति सिमटती जा रही है। ऐसे में आठूं मेले जैसा भव्य कार्यक्रम रामलीला कमेटी द्वारा कराना सराहनीय है। जो लोेग अपने ग्राम से दूर शहर में बस चुके हैं और उनकी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को नहीं जान पा रही है। उनके लिये यह आयोजन संस्कृति का परिचय पाठ भी है। सोर रामलीला प्रबन्ध् कारिणी के सभी सदस्य बहुत बधई के पात्रा हैं क्यांेकि पिछले नौ वर्षों से उन्होंने इस आयोजन को शहर में करवाकर सबको एकसूत्रा में बांध् दिया है। जिसमें नई पीढ़ी ने भी अभिरुचि ली है।
सोर के कुमौड़ गाँव में मनाया जाने वाली हिलजात्रा ध्ूमधम से मनाई गई। यहाँ कई ग्रामों में हिलजात्रा मनाई जाती है परन्तु कुमौड़ की हिलजात्रा में ‘लखिया भूत’ नामक पात्रा आकर्षण का केन्द्र होता है। इसके भगवान शिव का बारहवां गणमाना गया है, जो भगवान शंकर के क्रोध् से उत्पन्न हुआ था। कहा जाता है कि यह भयानक भूत का मुखौटा नेपाल के राजा ने महर भाइयों को उनकी वीरता से प्रसन्न होकर दिया था। जो व्यक्ति विशेष लखिया भूत का मुखौटा है उसके शरीर पर लखिया अवतरित हो जाता है। इस बार भी भयानक मुखौटा पहने, शरीर पर घंटियों सहित श्रृंगार किये लखिया भूत ने जब ऐतिहासिक हिलतात्रा मैदान में प्रवेश किया तो दर्शकों के रौंगटे खड़े हो गये। लखिया महाराज की जय और लटेश्वर महाराज की जय के नारों ऐ गूंजते मैदान का वातावरण एक बार पिफर से लोक की अपनी मान्यताओं पर सोचने को मजबूर कर देता है। इस आयोजन को कृषि से जोड़ कर भी देखा जाता है। लखिया भूत के अलावा बैलों की जोड़ी, गल्या बल्द का मुखौटा लगाकर, हुक्का पीता व्यक्ति, कमेड़ लगाने वाला, मछुआरे आदि पात्रों भी मैदान में आते हैं। यह सब आस्था के अलावा लोगों का भरपूर मनोरंज भी है।
चम्पावत जिले के पाटन-पाटनी में 14 सितम्बर से चार दिवसीय झूमाध्ूरी कौतिक होना है।
चमोली जिले में बधण और दशोली की मां नन्दा को भक्तों ने कैलास के लिये विदा किया। जागर लगाई गई।





