अद्भुत है एकहथिया मन्दिर

पि.हि. प्रतिनिधि
थल/मुवानी। उत्तराखण्ड के हजारों गाँवों में हजारों प्रकार की ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व की चीजें हैं, जिनके बारे में कथाओं, गाथाओं, किस्से, कहानियों में जानकारी मिलती है। ऐसी ही ऐतिहासिक महत्व की चीज थल से करीब दो किमी दूर स्थित है। ‘एकहथिया मन्दिर’ के रूप में स्थापित इस प्राचीन मन्दिर के बारे में कई प्रकार की चर्चाएं रही हैं और कहा जाता है कि किसी ने एक ही रात में एक हाथ से इस मन्दिर को एक ही पत्थर काटकर बनाया था।
वाकेई मन्दिर की कृति थल के ऐतिहासिक मन्दिर जैसी है किन्तु इसे एक विशाल पत्थर को काटकर ही बनाया गया है। मन्दिर में खूबसूरत नक्कासी के साथ ही पानी का छोटा सा कुण्ड बनाया गया है। पानी आने के लिये रास्ता बनाया गया है। शिवलिंग भी है लेकिन उल्टी दिशा में होने के कारण यहाँ दिया-बाती नहीं की जाती है। एकहथिया मन्दिर के बारे में जानकारी लेने व देखने के लिये दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं। पर्यटन विभाग की ओर से एक टिनशैड इसके पास बनाया गया है लेकिन इस ऐतिहासिक मन्दिर को बचाये रखने के लिये सुरक्षा दीवार अतिआवश्यक है अन्यथा भविष्य में इसे खतरा उत्पन्न हो सकता है।
बलतिर गाँव में स्थित एकहथिया मन्दिर के पास भेलियागाड़ के कारण पहाड़ में काफी जमीन भीतर की ओर कटी हुई है। जंगल और खेतों के बीच यह ऐतिहासिक महत्व की चीज फिलहाल सुरक्षित है लेकिन इसे सौन्दर्यीकरण के साथ संवारना चाहिये। गाड़ के पार अल्मिया गाँव स्थित है। थल से करीब दो किमी की दूरी पर स्थित बलतिर और अल्मिया गाँव कृषि के लिये अग्रणीय हैं किन्तु इनकी सुध् लेने के लिये शासन-प्रशासन ने हाथ हलकाने चाहिये। हाल यह है कि अपने आप से ग्राम संवारने वालों में इतनी उर्जा नहीं है कि वह बजह होने के बाद भी नेताओं को पकड़ कर अपनी समस्याएं हल करवा ले जाएं। न ही जनप्रतिनिधि ध्यान दे रहे हैं। गाँव में पलायन की मार अलग से है। रामगंगा घाटी की इस उपजाउ भूमि में भेलिया गाड़ और सालीखेतगाड़ के कारण पर्याप्त पानी भी है लेकिन कृषि आधारित छुटपुट कार्यों के सिवाय कुछ नहीं हो रहा है।
इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि कभी रामगंगा इसी जगह से होकर जाती थी जिसने बाद में अपनी दिशा बदली होगी। एकहथिया मन्दिर वाले क्षेत्रा में पाये जाने वाले पत्थरों से आसानी से अनुमान लग जाता है कि वह नदी के साथ रहे होंगे।
बलतिर ग्राम में तो दूर-दूर तक खेतों को देखकर प्रसन्नता होती है। यहाँ कुछ प्राचीन पेड़ हैं, जिन्हें पूज्य के रूप में माना गया है। काई इन्हें सतयुगी भी कहते हैं। इन पेड़ों के नीचे प्राचीन मूर्तियां और तराशे गये पत्थर भी रखे गये हैं। बलतिर की आवादी करीब डेढ़ हजार होगी, यहाँ एक प्राइमरी स्कूल है। इसके अलावा विकास के पत्थर नहीं लगे हैं। एकहथिया मन्दिर तक जाने के लिये थल से पैदल चढ़ाई वाला मार्ग तो है ही। थल मुवानी मोटर रोड से एक पक्की सड़क का मार्ग भी कटता है जो बलतिर गाँव पहँंुचाता है। इस प्रकार सड़क से आसान पहँुच वाले इस क्षेत्रा के विकास में अभी बहुत कुछ होना है।

बन्द पड़ा उन-कालीन का कारोबार

बलतिर ग्राम में श्रीमती तुलसी देवी मर्तोलिया ने उफनी कारोबार की जोरदार शुरुआत की थी लेकिन उनके अस्वस्थ्य होने के बाद से यह कारोबार लड़खड़ा गया। मूल रूप से आमथल के रहने वाले मर्तोलिया परिवार ने थल में रहते हुए ग्राम बलतिर में भूमि ली और भवन बनाया ताकि कृषि के साथ साथ उनी वस्त्र, दन-कालीन का कारोबार चलाया जाए। इसके लिये श्रीमती तुलसी मर्तोलिया ने प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाया और लोगों को इससे जुड़ने के लिये प्रेरित किया किन्तु उनके अस्वस्थ्य होते ही यह कारोबार रुक गया। श्रीमती मर्तोलिया आज भी कभी कभार बलतिर अपने मकान पर जाती हैं लेकिन स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनी कारोबार को चला पाना कठिन है। सरकार की ओर से लघु उद्योग के लिये बहुत सी योजनाएं चलाई जा रही हैं। काश बलतिर में एक परिवार द्वारा छेड़ी गई इस मुहीम को जिन्दा रखने में मदद मिलती।

पिघलता हिमालय 28 दिसम्बर 2015 अंक से

बृजेन्द्र लाल साह ने लोकधुनों को लेकर तिकसैन में तैयार किया था रामलीला नाटक

भूपाल सिंह पांगती

डाॅ.पंकज उप्रेती
अल्मोड़ा निवासी रंगकर्मी स्व.बृजेन्द्र लाल साह को लोक संस्कृति के क्षेत्र में कार्य के लिये याद किया जाता है। विख्यात रंगकर्मी स्व.मोहन उप्रेती के सखा बृजेन्द्र लाल ने कुमाउनी रामलीला नाटक रचकर जो प्रयोग सीमान्त क्षेत्रा में किया, वह अवस्मरणीय है। उन पुरानी यादों को सहेजे हैं- भूपाल सिंह पांगती।
85 वर्षीय श्री भूपाल सिंह पांगती, नानासेम, मुनस्यारी के रहने वाले हैं। बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि माइग्रेसन के पुराने दौर में जब मल्ला जोहार, मुनस्यारी और भैंसखाल में उनका परिवार आवत-जावत करता था, तब भैंसखाल में वह जन्मे। तब मुनस्यारी बाजार को तिकसैन के नाम से ही ज्यादा जाना जाता था। सन् 1952-54 की बात है जब कपकोट और बैजनाथ में दो ब्लाक खुले थे और बड़े भाई कल्याण सिंह पांगती डिप्टी एजूकेटिव आपिफसर के रूप में कपकोट ;वर्तमान में जिला बागेश्वर में नियुक्त हुए। इनके साथ एक सहायक के रूप में श्री साह जी कपकोट आये। जब सन् 1956-57 में मुनस्यारी में ब्लाक खुला तो उस समय बृजेन्द्र लाल साह जी के लिये नया पद सृजित किया गया। वह पद कल्चरल डेवलपमेंट आफिसर का था। तत्कालीन स्थितियों में ब्लाक भवन और रहने के लिये आवासीय सुविधा न होने के कारण साह जी पांगती भवन में ही रहने लगे। भवन के ‘गोठ’ वाले कमरे में बृजेन्द्र साह रहते थे और वहीं लेखन इत्यादि करते। कल्चरल आर्गनाइजर दुर्गा सिंह पांगती और भूपाल सिंह जी के साथ बृजेन्द्र लाल नित चर्चा करते ताकि कोई नाटक लोकभाषा में बने। तब रामायण के ध्नुष यज्ञ प्रसंग का नाटक तैयार किया गया। गीतों के लिये पहाड़ी शब्दों को पिरोया गया और तिकसैन बाजार में हुए किसान मेले में इसका मंचन हुआ। इसी तैयारी को बाद में दुम्मर हरि प्रदर्शनी में भी दिखाया गया, जिसे लोगों ने बहुत सराहा। नाटक में भूपाल सिंह जी राजा जनक बने और बृजेन्द्र लाल जी परशुराम।
भूपाल सिंह जी यादों का स्मरण करते हुए बताते हैं कि बृजेन्द्र लाल साह लोक धुनों के माहिर थे और उन्हें कुमाउॅ गढ़वाल की कई धुनों का ज्ञान था। उन्हीं धुनों में पूरा रामलीला नाटक तैयार किया गया। जिसे बाद में डाॅ.शेर सिंह पांगती ने पुस्तक आकार में लिखा।
लेखक ने अपने शोध् कार्य के दौरान 1998-99 में कुमाउनी रामलीला पर एक अध्याय ही लिखा है। बृजेन्द्र लाल साह जी के साथ लोक धुनों पर शास्त्रीय रागों के सिलसिले में लम्बी वार्ता के बाद इन धुनों की रिकार्डिंग भी की है।

पिघलता हिमालय 28 नवम्बर 2016 अंक से

नारायण स्वामी का पहाड़ आगमन और कैलास यात्रा

मोहन सिंह मर्तोलिया

नारायण स्वामी जी का पहाड़ भ्रमण 1935 में हुआ जब वह कैलास यात्रा पर गये। इस महान सन्त के योगदान को इतिहास हमेशा याद रखेगा। इनकी विरासत को सम्भालना आज चुनौती बना हुआ है। इस दिशा में सभी को जागरुकता दिखानी चाहिये।
स्वामी जी का जन्म 2 दिसम्बर 1914 को उच्च महाराष्ट्रीय गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार में दत्त जयन्ती के दिन बुधवार रोहिणी नक्षत्रा में हुआ। कर्नाटक में जन्मे इस शिशु का नाम राघवेन्द्र रखा गया। पिता जी का नाम माध्वराव था, जो मैसूर राजा के वहाँ दीवान थे। स्वामी जीे बीएससी तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद घर से निकल गये और आश्रम-मठों में भ्रमण करने लगे। माता-पिता को पता नहीं चला कि उनके पुत्र को वैराग्य आ गया है। स्वामी जी को भ्रमण करते हुए मन में आया कि उत्तराखण्ड चारधाम यात्रा की जाए। वह अपने गुरु योगी रामानन्द जी के साथ निकल पड़े और जुलाई 1935 में अल्मोड़ा पहँुचे। यहीं से उन्होंने कैलास जाना तय कर लिया। नारायण स्वामी और योगी रामानन्द पैदल यात्रा करते हुए जोहार घाटी पहँुच गये। वहाँ से आगे चलकर उटाधूरा, किगड़ी- बिंगड़ एवं जयन्ती को पार कर 16000 फिट पठार तिब्बत के तीर्थपुरी पहँुचे। भस्मासुर पर्वत के तलहटी में स्नान कर आगे बढ़े और 19000 फिट उफंचाई डौल्पा ल्हा टाॅप फिट आगे 18000 फिट में गोरी कुण्ड पहँुचकर स्नान किया।
उन्होंने सुना था और स्कन्द पुराण मानस खण्ड से जाना था कि कोई महात्मा वर्षों से कैलास पर्वत में सिद्ध अवधूत लम्बे केश वाला यदा-कदा मिल जाता है। उसी सि( अवध्ूत सन्त के दर्शन इन सन्तों को हुए। इसके वाद वह अवधूत अन्र्तधान हो गये।
नारायण स्वामी जी ने 1952 तक 13 बार कैलास यात्रा की। 1940 में धरचूला के पांगू सोसा में नारायण आश्रम का वृहद स्तर पर निर्माण किया। जिसमें यात्रियों के रहने व अन्य सुविधओं जुटाई गईं। यहाँ 4-5 कर्मचारी व एक मैनेजर रहता है।
सन् 1938 में दिगतड़ पड़ाव ;डीडीहाट में एक कपड़े की दुकान शेर सिंह जंगपांगी ने खोली। जंगपांगी के साथ मुनस्यारी के उनके पुरोहित का पुत्रा दयाकृष्ण लोहनी दुकान में कार्य करता था। कैलास मानसरोवर यात्रा 1946 में श्री नारायण स्वामी के साथ गुजरात-बंगलौर बड़ौदा के उद्योगपति लोग हरीभाई देसाई, विठ्ठल भाई व अन्य साधू-सन्त दिकतड़ ;डीडीहाट पहँुचे। यहाँ नारायण स्वामी ने जंगपांगी जी व लोहनी जी से कहा कि इस क्षेत्र में एक हाईस्कूल होना चाहिये। आगे चलकर यह स्कूल महाविद्यालय तक होगा। यह बात सबको भली लगी और अस्कोट के रजवार एवं डीडीहाट के थोकदार लोगों को बुलाया गया। बैठक में एक कमेटी का गठन किया गया जिसमें पाँच लोग इसके सदस्य बनाये गये। जिसमें मदन सिंह कन्याल मनड़ा गाँव, दयाकृष्ण लोहनी, नारायण सिंह कफलिया बिष्ट थोकदार हाट ग्राम, मेजर लक्ष्मण सिंह पाल अस्कोट, लक्ष्मी दत्त अवस्थी गरखा अस्कोट। बैठक की अध्यक्षता शोबन सिंह जीना वकील साहब अल्मोड़ा द्वारा की गई।
इस बैठक के बाद स्वामी जी के साथ पूरी कमेटी अस्कोट रजवार के पास गये। तब अस्कोट में 1946 जुलाई में धर्मशाला में कक्षा पाँच तक स्कूल शुरु किया गया। 1948 में ध्रमघर नामक जगह में हाईस्कूल भवन तैयार हुआ। 1952 में इसे इण्टर तक कर दिया गया। नारायण नगर इण्टर कालेज का नाम ‘बापू महाविद्यालय इण्टर कालेज’ रखा गया। यह इसलिये रखा गया क्योंकि स्वामी जी की इच्छा थी कि इसे शीघ्र ही महाविद्यालय का दर्जा दिया जायेगा। किन्तु स्वामी जी का 1956 में स्वर्गवास हो गया। ऐसे में विद्यालय को चला ले जाना कठिन हो गया और 1958 में राज्य सरकार ने इसका सरकारीकरण किया, जो रा0इ0कालेज नारायणनगर नाम से जाना जाता है।
इसके अलावा भी स्वामी जी ने कई प्रयास इस पहाड़ के लिये किये। आज जरूरत है उनके प्रयासों को संजोने के अलावा उनके कार्यों को आगे बढ़ाया जाए, जो चुनौती के रूप में है। स्वामी जी के भक्त किसी न किसी रूप में आज भी दूर-दराज से यहाँ आते हैं और पांगू के आश्रम को निहारते हैं। जरूरत उन कार्यों को बढ़ाने की है।

भवानसिंह धर्मशक्तू व कुन्दन सिंह धर्मशक्तू स्वामी से प्रभावित हुए
जोहार मिलम निवासी भवान सिंह धर्मशक्तू स्वतंत्रता सेनानी एवं कुन्दन सिंह ध्र्मशक्तू स्वतंत्राता सेनानी नारायण स्वामी से बेहद प्रभावित हुए और समाज सेवा में जुटे। स्वामी भगवतानन्द का 1980 में स्वर्गवास हो गया। कैलासानन्द वर्तमान में सरस्वती आश्रम गढ़ीकैन्ट, देहरादून में हैं।
उल्लेखनीय है कि स्वामी के भक्त विद्यानन्द स्वामी ने 1944 के बाद मुनस्यारी जोहार के रास्ते कैलास गये। 1945 में मुनस्यारी में समाजसेवी रामसिंह पांगती के शान्तिकुन्ज आवास में निवास करने लगे। तब भजन-कीर्तन-सत्संग में आस-पास के लोग जुटा करते थे। भवानसिंह व कुन्दन सिंह भी यहीं रमने लगे थे। 1950 में विद्यानन्द स्वामी हरिद्वार चले गये। तब दोनों धर्मशक्तू भी हरिद्वार गये और सन्यास ले लिया।

हरीभाई देसाई का योगदान रहा है
उद्योगपति हीराभाई देसाई स्वामी जी के अनन्य भक्त थे। सीमान्त में नारायण आश्रम एवं नारायण नगर में आश्रम व जहाँ भी स्वामी जी ने स्कूल इत्यादि स्थापित किये, हीराभाई उनमें संरक्षक की भूमिका में रहे। उन्होंने नारायणनगर में वृदह मन्दिर अपने योगदान से 1975 में बनवाया और 1977 में यहाँ मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा कार्यक्रम आयोजित किया गया। उस आयोजन में बंगलौर, गुजरात, बड़ौदरा के उद्योगपति मय संगीत मण्डली के पधारे थे। अस्कोट, डीडीहाट के भक्तजन भी आयोजन में उपस्थित हुए। बाहर से आई कीर्तन मण्डली ने जाने समय अपने बजाने वाले मार्दल/मदृंग को डीडीहाट के संगीत रसिक परसीलाल वर्मा को दिया था। उस दौर में सन् 1975 से 1977 तक धन सिंह पांगती और लेखक ;मोहनसिंह प्रत्येक रविवार को नारायण नगर निरन्तर जाया करते थे। तब हरीभाई व उनकी पत्नी भी नाराणनगर में रहती थीं।

पिघलता हिमालय 27 फरवरी 2017 के अंक से

हरि प्रदर्शनी की तैयारी

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि

मुनस्यारी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरि सिंह जंगपांगी की याद में मल्ला दुम्मर में प्रतिवर्ष होने वाली हरि प्रदर्शनी इस बार ठीक दीपावली के मौके पर होनी है। इसके लिये हरि स्मारक समिति ने तैयारी कर ली है। आयोजन को लेकर ग्रामीणों में उत्साह है। ऐसे में दीपावली के पटाखे फूटेंगे और प्रदर्शनी में ग्रामीण थिरकेंगे।
उल्लेखनीय है कि आजादी के बाद से मल्ला दुम्मर में हरिसिंह ज्यू की याद में होने वाली इस प्रदर्शनी पर जोहार घाटी के समस्त स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण किया जाता है। साथ ही ग्रामीण प्रतिभाओं को खेलकूद, सांस्कृतिक मंच के माध्यम से अवसर मिलता है। घरेलू एवं कुटीर उद्योग प्रदर्शनी ग्रामीणों को उत्साहित करने वाली है। जिसमें घरेलू उत्पाद, कृषि, पुष्प, उनी वस्त्र, दन-पंखी कालीन, जड़ी-बूटी की प्रदर्शनी लगाई जाती है। जानकारों द्वारा इनका निरीक्षण कर विजेताओं को पुरस्कृत किया जाता है। मुख्य रूप से जंगपांगी बन्धुओं द्वारा इस आयोजन को मनाया जाता है परन्तु क्षेत्र के सभी लोगों को इसमें सादर निमंत्राण होता है और सभी के सहयोग से इस प्रदर्शनी को विस्तार दिया जाता है। आजादी के बाद से निरन्तर बिना किसी सरकारी सहायता के इस प्रदर्शनी को करवाना साहस की बात है। अपने बुजुर्गों, स्वतंत्रा सेनानियों का स्मरण के साथ युवा प्रतिभाओं को सम्मान और आपसी भाईचारे के लिहाज से यह अनुकरणीय उदाहरण भी है। समय के साथ कई प्रकार के उत्सव-महोत्सव शहरी ढब में रंगे आयोजन हो रहे हैं लेकिन अपने लोक की खुशबू के साथ होने वाली हरि प्रदर्शनी का सानी नहीं। जिसमें मल्ला दुम्मर, तल्ला दुम्मर, दरकोट, दरांती, रांथी, जलद, तिकसैन से लेकर दूर-दूर तक के लोग पहुंचते हैं। महिला मंगल दलों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देखने लायक होती हैं। यह प्रस्तुतियां उन कलाकारों से ज्यादा उम्दा होती हैं जिन्हें स्टार नाइट का ठेका शहरों में दिया जाता है या जो ग्लैमर के साथ शो करने के आदी हो चुके हैं।
हरि प्रदर्शनी को लेकर समिति के अध्यक्ष ललित सिंह जंगपांगी, गंगा सिंह जंगपांगी, किशन सिंह जंगपांगी, लोकबहादुर सिंह जंगपांगी, नरेन्द्र सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह पांगती, प्रधान पंकज बृजवाल, देवेन्द्र सिंह, हरीश धपवाल, मनोज धर्मशक्तू, गोकर्ण सिंह मर्तोलिया, चन्द्र सिंह लस्पाल, मंगल सिंह मर्तोलिया, मनोज जंगपांगी, राजेन्द्र सिंह मर्तोलिया, शंकरसिंह धर्मशक्तू, लक्ष्मण राम स्थानीय स्तर पर जुट हुए हैं।

इमला से निकला दल गोरी के किनारे किनारे तम्बू लगाते हुए पहुंचता था बुर्फू

पि.हि.प्रतिनिधि 
कल्पना करिये वह दृश्य कैसा होगा जब यात्री पैदल हों और नदी किनारे-किनारे यात्रा चल रही हो। कई दिनों की इस यात्रा में कई स्थानों पर रुकना पड़ेगा और पड़ाव डालना होगा। जब रुकना ही है तो विश्राम के लिये अपने तम्बू लगाने पड़ेंगे। ऐसी साहसिक यात्राएं अब नहीं होती हैं। संसाधनों की कमी के उन दिनों में लोगों में साहस और कर्मठता अधिक थी। नदी के किनारे-किनारे तम्बू लगाकर विश्राम और फिर आगे की यात्रा का सुख-दुःख भोग चुके इमला के उत्तम सिंह जंगपांगी जी आज पिघलता हिमालय की इस भेंटवार्ता में हैं।
जोहार घाटी में बुर्फू गाँव के नाथू सिंह, मान सिंह, पदम सिंह तीन भाईयों के बड़े परिवार से बात शुरु करते हैं। इन मेहनती भाईयों में नाथू सिंह जंगपांगी के दो पुत्र हुए- माधो सिंह और शेर सिंह। फिर माधो  सिंह जी के पुत्र हुए इन्द्र सिंह ;इनके पुत्र हैं हयात सिंह और उमेश सिंह, उत्तम सिंह ;इनके पुत्र हैं संदीप, प्रहलाद सिंह  ;इनके पुत्र हैं आयुष। शेर सिंह जंगपांगी जी के पुत्र हुए मंगल सिंह ;इनके पुत्र हैं देवेन्द्र सिंह देबू। माइग्रेस में मल्ला जोहार से नंगर यानी गर्म घाटियों को आने के क्रम में जंगपांगियों के ये परिवार ‘इमला’ आया करते थे। मदकोट से 2 किमी चढ़ाई चढ़ते ही खूबसूरत ग्राम इमला है।
पिता स्व.माधोसिंह व माता श्रीमती सुशीादेवी के घर जन्मे उत्तम सिंह जंगपांगी अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि बुर्फू से जंगपांगियों के परिवार कई जगह गये जिसमें से उनके बुजुर्ग इमला आया करते थे। मूल से व्यापारी उनके दादा जी अपने भाईयों के साथ तिब्बत व्यापार में सक्रिय थे। इसी परम्परा को उनके पिता व चाचा ने बनाये रखा। प्रकृति और मौसम के साथ सामंजस्य बनाते हुए इनका परिवार हर साल बुर्फू जाता और इमला आता था। गोरी नदी के किनारे-किनारे तम्बू लगाते हुए पूरा परिवार एक स्थान से दूसरे स्थान जाता। इस दस में बड़े-बूढ़े, बच्चे और पशु धन के साथ गृहस्थ का सामान होता था।
63 वर्षीय उत्तम सिंह जी ने प्राइमरी शिक्षा इमला से ही ली। इण्टरमीडिएट मुनस्यारी से करने के बाद पिथौरागढ़ डिग्री कालेज पढ़ा। स्नातक की पढ़ाई के दौरान इनका चयन बैंक के लिये हो गया। सन् 2015 मई में लीड बैंक चम्पावत से अग्रणीय जिला प्रबन्ध्क के पद से यह सेवानिवृत्त हुए। इमला ग्राम से ज्यादातर जंगपांगी परिवार बाहर निकल चुके हैं जो पूजा व कार्यविशेष में अपने ग्राम जाते हैं। यहाँ रहने वाले इमलाल परिवार क्षेत्रा में सक्रिय हैं। ग्राम में जंगपांगियों ने स्थानीय देव सहित अपने इष्ट को स्थापित किया है। जिसे पंचधाम के रूप में जानते हैं। पहले से ग्राम के लोग जौलजीवी मेले के लिये भी सक्रिय रहते थे और अपने उत्पदों के साथ दुकान सजाते थे।
मल्ला दुम्मर हरिप्रदर्शन में सक्रियता से जुड़े उत्तम सिंह बताते हैं कि प्रदर्शनी में व्यवस्थाओं को रूप देने के लिये उनके पिता बेहद सक्रिय थे। नरसिंह जंगपांगी जी मुख्य लोगों में रहे हैं। सन् 1977 में स्टेट बैंक मुनस्यारी में लगने के समय से उत्तम सिंह जंगपांगी स्वयं भी इस प्रदर्शनी के लिये सक्रिय हो गये और आज भी युवाओं को मार्गदर्शन कर रहे हैं।

नारायण दत्त तिवारी: वह हलचल भरी जिंदगी से घिरे रहे

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
राजनीति के क्षेत्र में दिग्गज रहे  वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी का 18 सितम्बर 2018 को दिल्ली के मैक्स अस्पताल में निधन हो गया। 1935 में इसी तारीख को जन्मे तिवारी जी पहले ऐसे नेता थे जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री बने। तिवारी 1976-77, 1984-85, 1988-89 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। 2002- 2007 तक वे उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री एवं 2007 से 2009 तक आन्ध््र प्रदेश के राज्यपाल रहे।

हलचल भरी जिन्दगी से घिरे रहने वाले तिवारी जी का जन्म नैनीताल जिले के बल्युटी ग्राम में 18 अक्टूबर 1925 को हुआ था। इनके पिता पूर्णानन्द तिवारी का विवाह हरिदत्त जोशी की पुत्री के साथ हुआ था। श्रीमती जी के आकस्मिक निधन व अन्य कष्टों से घिरे पूर्णानन्द जी ने संभलते हुए दूसरा विवाह 24 वर्ष की आयु में मातीराम बल्युटिया की पुत्री चन्द्रावती के साथ किया। पिता पूर्णानन्द जी और माता चन्द्रावती के घर 18 अक्टूबर 1925 को नारायण ने जन्म लिया। इनके छोटे भाई प्रोफेसर रमेश तिवारी हैं। नारायण/नरैण की आरम्भिक शिक्षा नैनीताल के आसपास ही हुई। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. करने वाले एन.डी. 1947 में इलाबाद विवि छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये। 1947 से 1949 तक वह आॅल इण्डिया स्टूडेंट कांग्रेस के सचिव रहे। 1952 में प्रजा समाजवादी पार्टी के टिकट पर नैनीताल से चुनकर यूपी की विधानसभा में सबसे कम उम्र 27 वर्ष के विधायक बनने का सौभाग्य तिवारी जी को मिला।
तिवारी जी का 1954 में सुशीला तिवारी से विवाह हुआ। 14 मई 2014 को उन्होंने उज्जवला से 88 साल की आयु में विवाह किया। एन.डी.तिवारी उज्जवला के पुत्रा रोहित शेखर के जैविक पिता थे।
1957 में दूसरी बार नैनीताल विस जीतकर यूपी विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने एन.डी. 1962 में चुनाव हार गये थे। 1963 में कांग्रेस में शामिल होकर 1965 में काशीपुर से विधायक चुने गए। 1969 के मध्यावधि चुनाव में जीतकर यूपी सरकार में पहले श्रम, योजना व पंचायतीराज मंत्री बने। यूपी में 1976 में पहली बार, 1984 में दूसरी बार, 1985 में तीसरी बार और चैथी बार मुख्यमंत्री का पद संभाला। 1980, 1996 और 1999 में वह सांसद चुने गये। 1981 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे। 1987 को केन्द्र सरकार में वित्त एवं वाणिज्य मंत्री रहे। 1989 में आम चुनाव में हल्द्वानी सीट जीती लेकिन 1991 में भाजपा के बलराज पासी से नैनीताल लोकसभा सीट हारे। 16 मई 1993 को पत्नी डाॅ.सुशीला तिवारी का न्यूयार्क में कैंसर की बीमारी से निधन हो गया। 23 अगस्त 1994 को यूपी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने 1997 में फिर से अध्यक्ष नियुक्त किये गये। 1998 में नैनीताल से चुनाव हारे और कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दियो। 2002 से 2007 तक उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रहे। केन्द्र में योजना, उद्योग, पेट्रोलियम, विदेश मंत्राी रहे एन.डी. की चर्चा प्रधन मंत्री पद तक होने लगी थी।
मृदुभाषी, मिलनसार, विपक्षियों के भी चहेते तिवारी जी ने तराई में औद्योगिक विकास के लिये श्रम किया और रानीबाग की एचएमटी फैक्ट्री को बनाये रखने के लिये श्रमिकों के साथ खड़े रहे। इस महान नेता को पि.हि.परिवार की श्रद्धांजलि।

तिवारी कांग्रेस बनाकर भी देख ली
राजनैतिक पारी खेलते हुए नारायणदत्त तिवारी ने अपने बल पर चुनाव लड़ने के लिये 1994 में अर्जुन के साथ मिलकर पार्टी भी खड़ी की थी। कांग्रेस;तिवारीद्ध के रूप में जनता के बीच उम्मीदवार भी खड़े किये गये लेकिन उसका कोई प्रभाव चुनाव में नहीं पड़ सका था।

निरन्तर विकास समिति के संस्थापक
राजनीति के दांवपेंच में काफी आगे बढ़ने के बाद झटका खा चुके एन.डी.तिवारी निरन्तर विकास समिति के संस्थापक भी रहे। इसके लिये उन्होंने युवाओं के साथ सम्पर्क अभियान चलाया और जगह-जगह सभाओं को सम्बोधित किया।

पर्वतपुत्र-धरती पुत्र की दोस्ती
एन.डी.तिवारी को कई प्रकार की संज्ञाएं दी जाती रही हैं। हिमालय पुत्र, पर्वत पुत्र, विकास पुरुष और भी कई नामों के साथ आदर दिया जाता रहा है। दूसरी ओर यूपी के दिग्गज समाजवादी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को धरती पुत्र की संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार पर्वतपुत्र-ध्रती पुत्रा की दोस्ती घनिष्ठ रही है। एन.डी.तिवारी का हर प्रकार से साथ देने के लिये मुलायम सिंह यादव हमेशा तैयार रहे।
नौछमी नरैणा
अपने मिजाज के कारण हमेशा चर्चा में रहने वाले तिवारी जी को लेकर नरेन्द्र सिंह नेगी का गाया हुआ ‘नौछमी नरैणा’ गीत बहुत चर्चित हुआ। अपने जीवन के कई पन्नों में तिवारी जी वाद-विवाद में रहे लेकिन आन्ध््र प्रदेश का राज्यपाल रहते हुए बुरी तरह पफंस गये और उनका राजनैतिक भविष्य ध्ुंध्ला होता चला गया। बाद में रोहित शेखर के साथ कोर्ट-कचहरी हल्ले के बाद उन्होंने स्वीकार कि वह उनका पुत्रा है। तिवारी जी को चारों ओर से घिरा देख कांग्रेस ने उनसे दूरी कर ली। उनके करीब रहने वाले भी एक-एक कर कन्नी काट गये।
स्वार्थियों ने बुरी तरह घेर लिया था
जिस समय एन.डी.तिवारी की तूती बोलती थी, उन्हें स्वार्थियों ने घेर लिया था। विद्वता से भरे एन.डी. भी पता नहीं किन कारणों से उन स्वार्थियों को नहीं छोड़ पाते थे। आम लोगों में नारे लगने लगे थे- ‘एन.डी. तेरे चारों ओर, लीसा-लकड़ी-पत्थर चोर’। तिवारी जी का नाम लेकर अरबपति बन चुके लोगों ने लाभ लेने तक उन्हें बुरी तरह घेर लिया था और बाद में एकदम छोड़ दिया। तिवारी जी बिना एक कदम भी नहीं चलने वाले ऐसे लोगों ने उन्हें धेखा ही दिया।
के.सी.पन्त को नहीं पचा पाये
राजनीति के दांवपेंच में माहिर एन.डी.तिवारी भारत रत्न पं.गोविन्द बल्लभ पन्त के सुपुत्रा के.सी.पन्त को नहीं पचा पाये। चुनाव के दौरान पं.तिवारी व पं.पन्त के नाम पर कांग्रेस की गुटबाजी सापफ दिखाई देती थी। के.सी.पन्त की विद्वता और नम्रता अपनी जगह थी लेकिन तिवारी जी के दबदबे के आगे उन्हें कांग्रेस छोड़ भाजपा की सदस्यता लेनी पड़ी। उनकी पत्नी श्रीमती ईला पन्त ;भाजपाद्ध ने एन.डी. तिवारी ;कांग्रेसद्ध को नैनीताल लोकसभा सीट पर हरा दिया।

बसपाल बूढ़ा के वंशज रहते हैं मगरबला में, यहाँ होती है खुदा पूजा

पि.हि.प्रतिनिधि
गाँवों की सैर में आपको आज थल- मुनस्यारी रोड स्थित ‘बला’ ग्राम के बारे में बताते हैं। ग्राम पो. मगरबला में मर्तोली के मर्तोलिया रहते हैं। सीमान्त के मर्तोली से कई ग्रामों में जाकर लोग बसे जिसमें सुरिंग, आमथल, चुड़ियाधर, गुलेर, कारीखेत, मल्लादेश इत्यादि। इसी प्रकार मगरबला में भी एक राठ बस गया। पुराने जमाने में व्यापार के साथ घुमन्तु जीवन बसपाल बूढ़ा को यहाँ ले आया। बला ग्राम में रहने वाले बसपाल बूढ़ा के बंशज हैं। यह वह ग्राम है जहाँ खुदा पूजा का रिवाज है। गोरखा राज में अला-बला से बचाव के लिये की जाने वाली इस विशेष पूजा को अभी तक किया जाता है। मर्तोलियाओं के अलावा धमी, राणा, वृथवाल परिवार ग्राम में हैं। गाँव अधिकांश लोग बाहर हैं, वर्तमान में 35 परिवार यहाँ रह रहे हैं।
बला के पास से ही नामिक को जाने वाला पैदल रास्ता है। 27 किमी के इस मार्ग का प्रयोग पशुचारक, ग्रामीण और विदेशी पर्यटक करते हैं। नामिक में रहने वाले जैम्यिाल परिवार इस रुट से काफी आवागमन करते रहे हैं क्योंकि उनके रिश्ते हरकोट, बोना, तूनी, क्वीरिजिमिया आदि ग्रामों में होने से यही पैदल रास्ता निकट रहा है। बला से करीब 3 किमी दूरी पर विर्थी झरना है। ग्राम के बुजुर्ग दुर्गा सिंह मर्तोलिया उन उद्यमियों में से हैं जो आज भी मिलम तक जाते हैं, जिस कारण इन्हें पुराने और नये इतिहास की खासी जानकारी है। पिघलता हिमालय में इनके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। जगह सिंह मर्तोलिया अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि एक बार नामिक जाते समय उन्होंने गाय के गोबर में धूप/अगरबत्ती की सी खुशबू लगी। एक टुकड़ा जेब में डाल लिया, वह सुगन्ध् कई दिनों तक महकती रही। वह कहते हैं कि यह इलाका जड़ी-बूटियों का भण्डार है। जब गाय-बकरियां जड़ी-बूटी खायेंगी तो वह पौष्टिक दूध् देंगे। विदेशी छात्रों को शोध् के लिये भ्रमण पर खूब देखा है। एक बार एक दल मौसम में फंस कर उनके वहाँ रुका। वह लोग पेड़ पौधें जड़ी-बूटियों के बारे में जानकारी जुटा रहे थे। वनस्पति विज्ञान के छात्र जिस तल्लीनता के साथ जुटे थे, वैसा यहाँ नहीं हो रहा है। उपेक्षा के चलते सीमान्त को नहीं संवारा जा सका है। आज भी विदेशियों को इस इलाके के बारे में अच्छी जानकारी है क्योंकि वह पर्यटन के नाम पर केवल कूड़ा फैलाने नहीं बल्कि नामिक ग्लेश्यिर सहित अन्य सुरम्य ग्लेश्यिर व स्थानों का भ्रमण व अध्ययन करते हैं। ऐसे स्थानों को विकसित करने की दिशा में कार्य होने चाहिये।
ग्राम के रतन सिंह मर्तोलिया प्राइमरी स्कूल के बारे में बताते हैं कि व्यापार के उन दिनों में स्कूल भी माइग्रेसन के हिसाब से चलता था। मर्तोली के बाद सुरिंग फिर बला में। कई बार पढ़ाने वाले गुरु भी अलग-अलग होते थे। समय के साथ जो जहाँ रुके वहीं बस गये। अब माइग्रेसन का यह स्कूल सरकारी प्राइमरी पाठशाला के रूप में है। वह कहते हैं कि पहले समय के अनपढ़ भी ज्यादा सूझ वाले होते थे। नई पीढ़ी तो जानती भी नहीं है कि अद्ध-पव्वा-डेढ़ो- ढाम। व्यापारी लाखों का हिसाब मौखिक ही कर दिया करते थे। अब जोड़-घटाने के लिये मशीन का सहारा ले रहे हैं।
वाकेई कितना अच्छा होता हमारी शासन-प्रशासन की मशीन ग्रामों की भावनाओं को समझते हुए इनके विकास की ओर ध्यान देती। प्रत्येक ग्राम के बसने के पीछे कोरे किस्से-कहानी नहीं बल्कि सच्चाई है।

स्व. दुर्गा सिंह
पिघलता हिमालय के संस्थापक स्व. दुर्गा सिंह मर्तोलिया का जन्म बला में ही हुआ था। आज जिस स्थान पर मन्दिर स्थापित है, उस स्थान उमेंदसिंह-दुर्गासिंह-मंगल सिंह इसी परिवार द्वारा ग्राम के लिये दिया गया।

पिघलता हिमालय 27 जून 2016 अंक से

‘तरकेब’ लगाकर होती थी हरि प्रदर्शनी

गोविन्द सिंह जंगपांगी

पि.हि.प्रतिनिधि
सीमान्त के महान स्वतंत्रता सेनानी हरिसिंह जंगपांगी की याद में प्रतिवर्ष होने वाली प्रदर्शनी इस बार भी नवम्बर में होगी। इस प्रदर्शनी को आजादी के बाद से लगातार मल्लादुम्मर मुनस्यारी में मनाया जा रहा है। इसे बनाये रखने में क्षेत्रावासियों की श्रद्धा और लगन है। प्रदर्शनी के शुरुआती दिनों में जब कोई साधन नहीं थे ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर लोग जुटते थे। उन पुरानी यादों को बताने के लिये 69 वर्षीय गोविन्द सिंह जंगपांगी जी से बातचीत के बाद यह प्रस्तुति है-
जंगपांगियों का गाँव बुर्फू में हुआ। बूबू पद्मसिंह के पुत्रा हुए मान सिंह, पान सिंह और विजय सिंह। इन्हीं मान सिंह के पुत्र हैं- गोविन्द सिंह और मंगल सिंह। विजय सिंह के पुत्र हैं- शेरसिंह और माधे सिंह। पिता मानसिंह माता चन्द्रा जंगपांगी के घर बुर्फु में जन्मे गोविन्द सिंह ने जीवन के कष्टकर दिनों को बचपन में गुजारा है। छोटी उम्र में पिता के निधन के बाद मामा जी संरक्षण में शुरुआती शिक्षा गढ़वाल में हासिल की। लौटकर मुनस्यारी में फिर अल्मोड़ा से शिक्षा ली। 1971 में आर्मी में भर्ती होने के बाद आठ साल नौकरी की और ओंरिएटल इंश्योरेंशन में सेवा के लिये आ गये। यहीं से मण्डलीय प्रबन्धक पद से 2009 में सेवानिवृत्त हुए।
जंगपांगी परिवार भी सीमान्त के अन्य परिवारों की भांति माइग्रेशन में एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहे हैं। इनका परिवार बुर्फू, मल्लादुम्मर और भकुंडा;नाचनी के पास में क्रमवार रहता था। अपनी लगन और परिश्रम से मुकाम हासिल करने वाले गोविन्द सिंह जी का विवाह जोहार की महान विभूति रामसिंह पांगती की नातिनी तारा से हुआ। श्रीमती तारा जंगपांगी अध्यापिका होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में शुरु से ही बेहद अभिरुचि रखती हैं। सेवानिवृत्ति के बाद यह दम्पत्ति जोहार नगर, हल्द्वानी में निवास कर रहा है और दुम्मद की हरिप्रदर्शनी सहित सभी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय है
अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए गोविन्द सिंह जी बताते हैं कि साधन नहीं के बराबर थे लेकिन हरि प्रदर्शनी का उत्साह लोगों में बहुत था। इलाके की एकमात्र अलग तरह की इस प्रदर्शनी में लोग ‘तरकेब’ ;तम्बू लगाकर जुट जाते थे। तब लगभग सभी परिवारों के पास तरकेब हुआ करते थे, क्योंकि मल्लाजोहार से लेकर गर्म घाटी तक यात्रा करते समय इनकी आवश्यकता होती है। पुराने लोगों में प्रेम सिंह जंगपांगी, नरसिंह जंगपांगी का नाम उल्लेखनीय है। सक्रियता की इस परम्परा को महेन्द्र सिंह ‘महन्त’ जंगपांगी ने भी निभाया। पुराने समय में नेत्र सिंह ल्वाल सांस्कृतिक प्रस्तुति और बच्चों को सिखाने के लिये आते थे। बम्मई में रहकर शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा ले रहे नेत्रसिंह जी प्रत्येक वर्ष इस मौके पर दुम्मर आते थे। उनके भाई प्रताप सिंह भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में साथ देते। प्रदर्शनी के लिये घरेलू उत्पादों का बहुत सामान आता रहा है। श्री जंगपांगी चाहते हैं कि परम्परा बन चुकी यह प्रदर्शनी हमेशा चलती रहे और नई पीढ़ियां इससे सीखें।

आर.एस.टोलिया के कार्यों को सम्मान देना चाहिये

वाई.एस.पांगती
प्रदेश सरकार द्वारा विधनसभा के विश्वकर्मा भवन के सभागार जिसका नाम डाॅ.आर.एस.टोलिया के नाम पर था, उसे बदल दिया गया। समझ नहीं आ रहा है कि किन कारणों से ऐसा किया गया जबकि स्व.टोलिया के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। उनके कार्यों को सम्मान देना चाहिये।

डाॅ. आर.एस. टोलिया, आईएएस उत्तराखण्ड मूल के प्रथम मुख्य सचिव व उत्तराखण्ड राज्य के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त का उत्तराखण्ड राज्य में किये गये उल्लेखनीय कार्यों का संक्षिप्त विवरण- जब उत्तराखण्ड राज्य का शीघ्र निर्माण होना था, तो उ.प्र. में चर्चा हुई कि कौन राज्य की व्यवस्थाओं को सम्भाल सकेगा? सर्व सम्मत्ति से डाॅ. आर.एस. टोलिया को दायित्व सौंपने पर विचार हुआ और 23 अक्टूबर, 1999 को मुख्य सचिव, उ0प्र0 का आदेश आया, तब डाॅ. टोलिया उप्र प्रशासनिक अकादमी नैनीताल में कार्यरत थे। उनके द्वारा तुरन्त 24 अक्टूबर, 1999 का प्रमुख सचिव उत्तराखण्ड शासन का पदभार ग्रहण किया गया और उसी रोज बैठक कर राज्य का कार्य सचिवालय में कार्मिकों को सम्ब( कर प्रारम्भ किया गया। उनके द्वारा सचिवालय से सभी प्रकार के कार्यों के साथ-साथ राजभवन, हाई कोर्ट, विभागों के निदेशालयों का ढांचा, लोक सेवा आयोग, विधान सभा आदि स्थापित करने के कार्य किये गये।
प्रथम अन्तरिम सरकार को डाॅ. टोलिया द्वारा शपथ ग्रहण कराया गया और नव राज्य का संचालन उनके द्वारा रात दिन कड़ी मेहनत व लगन से प्रारम्भ किया गया। अन्य आवंटित अधिकारीगण राज्य की पूर्ण जानकारी लेकर आराम से 2001 के बाद ही जब सभी कार्यालय कर्मचारियों को सम्ब( कर रूटीन कार्य प्रारम्भ कर दिया गया तभी कार्यभार ग्रहण करना प्रारम्भ हुआ। उप्र से उत्तराखण्ड आवंटित कार्मिकों को यथाशीघ्र मुक्त करने हेतु लिखा गया और आवंटित आईएएस/पीसीएस अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से पफोन कर कार्यभार ग्रहण करने की अपेक्षा की गयी, परन्तु लचर शासन की कार्य प्रणाली के कारण जो इच्छुक थे, उनके द्वारा उत्तराखण्ड में योगदान दिया गया और जिनकी रुचि नहीं हुए और उप्र सरकार ने भी उदारता दिखा दी और तो और पर्वतीय मूल के आईएएस/पीसीएस व अन्य विभागों के अध्किारियों ने आज तक कार्यभार ग्रहण नहीं किया और शक्ति करने पर कोर्ट से स्टे लेकर योगदान नहीं दिया। जब 9 नवम्बर 2000 के दिन नजदीक आने लगा अस्थाई राजथानी के निर्माण कार्य पूर्ण नहीं हो पाये, जिसका दायित्व आयुक्त बीएन वोहरा को दिया गया था। कार्य की गति को धीमी देखकर अन्तिम क्षणों में डा.टोलिया को दायित्व सौंपा गया। उन्होंने चुनौती स्वीकार करते हुए रात-रात भर बैठकर स्वंय निर्माण कार्य को 8 नवम्बर तक पूर्ण कराया। जब टोलिया बैठते थे तो अन्य अधिकारियों की हिम्मत नहीं थी कि कोई बहाना बनाकर जाये एवं अधिकारीगण जिनकी ड्यूटी लगायी गयी थी उनको भी रात भर बैठाकर निर्माण कार्य में योगदान देना पड़ा। पर्वतीय क्षेत्र में वन क्षेत्रा अधिक होने के कारण उनके द्वारा कृषि उत्पादन आयुक्त के समकक्ष पद एफआरडीसी बनवाया गया, जिसके अधीन 23विभाग आते थे, जिसकी भूमिका जनपद में मुख्य विकास कार्यालय व विकास खण्ड कार्यालय जो सामुदायिक विकास विभाग के रूप में कार्य करते थे। अब तो एफआरडीसी का स्वरूप समाप्त करने से एकीकृत ग्राम्य विकास विभाग छिन्न भिन्न हो गया और अन्य विभाग सिंगल विण्डो सिस्टम में चल रहे है। वर्तमान में विकास खण्ड केवल ग्राम्य विकास विभाग रह गया है। जहाँ आज की तारीख में अन्य विभाग की न सूचना है व न विकास के आंकड़ों का रखरखाव है। जब उत्तराखण्ड में अध्किारियों में टोटा होने से डाॅ. टोलिया के पास 20-25 विभाग थे वे अकेले सम्पादित करने में सफल रहते थे। बायोफ्रयूल योजना ;जैट्रोपफा को प्रारम्भ करने का श्रेय उन्हीं को जाता है जो आज ईधन के रूप में हवाई जहाज संचालित करने से देश में उसके महत्ता को समझा जा रहा है। जिसको आगे बढाने की आवश्यकता थी। उक्त के अलावा हल्द्वानी मेडिकल काॅलेज की स्थापना, बीज प्रमाणीकरण विभाग, लाईफ स्टोक अभिकरण, एससीएपी/टीएसपी योजनाओं का बजट का काट कर समाज कल्याण विभाग को सौंपा गया। डाॅ. टोलिया द्वारा पर्वतीय क्षेत्रा के गाँवों को सड़क मार्ग से जोड़ने हेतु भारत सरकार की महत्वपूर्ण योजना पीएम वीआई का प्रदेश में गठन कर केन्द्र सरकार से राज्य सरकार को मिलने वाली सहायता राशि प्राप्त कर कई सड़कों के प्रस्ताव भारत सरकार को भिजवाये।
उत्तराखण्ड विकल्पधरियों के पदोन्नति हेतु उप्र से प्रवष्टियां प्राप्त न होने से पदोन्नतियां प्रभावित हो रहे थे। डाॅ. टोलिया के संज्ञान में बात लाते ही उन्होने शीघ्र आदेश दिया कि जिन कार्मिकों की गोपनीय प्रविष्टियों उप्र से उपलब्ध् नहीं है उनसे एक शपथ पत्र प्राप्त करें, जिसमें अपने विरूद्ध कोई ऐसा तथ्य नहीं है, जिससे पदोन्नति प्रभावित हो। अतः उस आदेश के आधार पर निरन्तर पदोन्नतियां हुई। यहीं नहीं उनके द्वारा कार्मिकों के हित में यह आदेश पारित किया कि नित्य मुझे 5 बजे बाद देख लिया जाय यदि में उपलब्ध् हूँ तो डीपीसी की जाय, ताकि पदोन्नतियां प्रभावित न हो सकें। जबकि यह काम कार्मिक विभाग का था। बीस सूत्राी कार्यक्रम के योजनाओं के भौतिक लक्ष्य को प्रत्येक माह मानकों के अनुसार पूर्ति व उनके गुणवत्ता को कायम रखने के लिए उनके द्वारा कड़े निर्देश व गहनता से अनुश्रवण कर क्रियान्वयन कराया गया जिससे उत्तराखण्ड राज्य देश में लगातार 3 वर्ष बीस सूत्राी कार्यक्रम में प्रथम स्थान प्राप्त करने में सपफल रहा और सरकार द्वारा राज्य स्तर पर एक आयोजन कर उत्सव के रूप में मनाया गया और प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले जनपदों के अध्किारियों को ट्राफी व प्रशस्ति पत्रा देकर सम्मानित किया गया। और डाॅ. टोलिया ने एक रनिंग ट्राफी को भी चलवाया था जिसका उददेश्य में जो जनपद प्रथम आयेगा उसको यह ट्राफी प्रदान किया जायेगा। और सचिव, नियोजन को बीस सूत्री कार्यक्रम का विभागाध्यक्ष नामित किया गया था, जिससे शासन स्तर पर निरन्तर अनुश्रवण किया जाता था, परन्तु अब एक सचिव नियोजन ने बीस सूत्राी कार्यक्रम के विभागाध्यक्ष का पद अपने स्तर से निदेशक, अर्थ एवं संख्या को सौंप दिया है। तब से शासन स्तर पर बीस सूत्राी कार्यक्रम की समीक्षा नहीं हो पा रही है।
मुख्य सचिव रहते हुए सभी विभागों में निरीक्षण करना उनकी समस्याओं को सुनना व विकास कार्यों में तेजी लाने के सम्बन्ध् में निर्देश दिये गये। मुख्य सचिव रहते हुए पूरे प्रदेश का भ्रमण कर विकास कार्यों की प्रगति का जिला स्तर पर बैठक कर उनमें आ रही कठिनाईयों को वहीं पर हल किया गया। डाॅ. टोलिया जब 1991 में गन्ना आयुक्त थे, वित्तीय अनियमितता पर एक संयुक्त आयुक्त को निलम्बित कर दिया था, बाद में उन पर सरकार का दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा कि मैंने राज्य हित में निलम्बन किया है, परन्तु सरकार का दुबारा दबाव डालने पर उन्होंने 2 वर्ष के लिए अध्ययन अवकाश ले लिया 6 माह बाद मुख्य सचिव टीएसआर सुब्रमन्यम जो कैबिनेट सेक्रेटरी भारत सरकार से सेवा निवृत्त हुए, उनके द्वारा कार्यभार ग्रहण करने के लिए आग्रह किया गया, तो डाॅ. टोलिया ने पर्वतीय क्षेत्र में ही सेवा करने की इच्छा व्यक्त की गयी। और मुख्य सचिव ने तत्काल उनको सचिव पर्वतीय विकास नियुक्त किया। जबकि यह विभाग वरिष्ठ प्रमुख सचिव को सौपी जाती थी, परन्तु उनकी योग्यता, ईमानदीरी व क्षमता के आधार पर पर्वतीय विकास विभाग का दायित्व सौंपा गया था। सर्वप्रथम उन्हांेने जनपदों के जिला योजना संरचना जो बनायी गयी थी उन सभी का स्वयं अध्ययन कर विभागवार कमियां निकालकर प्लान जनपदों को लौटा दिया गया और कड़े निर्देश के साथ पुनः प्लान बनाने हेतु कहा गया शायद ही ऐसा मेहनत कोई अधिकारी करता हो। इससे पूर्व पर्वतीय विकास विभाग में काफी भ्रष्टाचार चल रहा था, बिना दिये फण्ड रीलिज नहीं होता था, अधिकारी स्वयं पत्र लेकर लखनऊ से फण्ड अवमुक्त करने जाते थे। यह बात टोलिया जी के संज्ञान में आते ही उन्होंने सारे वित्तीय अधिकार स्वयं के पास रखा और उन्होंने समय पर प्लान बनाने के साथ-साथ वार्षिक बजट पारित करते हुए प्रत्येक वर्ष 4/12 बजट अप्रैल प्रथम सप्ताह में फैक्स के माध्यम से जनपदों को विभागवार/मदवार/रिलीज कर दिया इस प्रकार योजनाओं की धन राशि जनपद के अधिकारियों को फण्ड रिलीज करने हेतु शासन में आने के लिये रोक लगा दिया गया, जिससे पर्वतीय विकास विभाग में एकदम भ्रष्टाचार पर विराम लग गया। पर्वतीय विकास विभाग के नोडल अधिकारियों को बिना अनुमति के शासन में जाने का अधिकार नहीं था और उनके द्वारा उप्र के अधिकारियों को भी पर्वतीय क्षेेत्रा में शासकीय कार्य हेतु केवल गर्मियों में ही दौरे में नहीं आने की हिदायत दी थी। उनके द्वारा प्लान/नाॅनप्लान/जिला सेक्टर/राज्य सेक्टर व केन्द्र पुरोनिधनित योजनाओं का मदवार पृथक-पृथक विकास पुस्तिका योजनावार/लक्ष्यवार प्रकाशित किया गया ताकि किसी को योजना की जानकारी लेने व रिपोर्ट देने में दुविधा न हो।पर्वतीय विकास सचिव रहते हुये उन्होनें विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रा में जितने भी भवन व योजनायें बनायी गयी थी, उनकी स्थिति की पूर्ण जानकारी लेकर अपूर्ण कार्यों को पूर्ण कराने के उपरान्त सम्बन्धित विभाग को हस्तान्तरित करने के लिये निरन्तर समीक्षा करते थे क्योंकि व्यवहार में विभाग में छोटी-मोटी कमियों के कारण हस्तान्तरण करने में विलम्ब करते थे जिससे भवन/योजनाओं उपयोग न करने पर पुनः क्षतिग्रस्त हो जाते थे। वे प्रायः जन समस्याओं का निदान अविलम्ब करते थे। इसी प्रकार उनके कार्यशैली को देखते हुये वर्ष 92-93 में चैखुटिया क्षेत्रा अल्मोड़ा में जन समस्याओं से सम्बन्धित एक बहुत बड़ा आन्दोलन हुआ। क्षेत्रवासियों की मांग थी कि सचिव टोलिया ही हमारी बातें सुनें, अन्य पर भरोसा नहीं था और उन्होने चैखुटिया समय पर पहुंच कर पूरे दिन व रात भर बिन्दुबार समस्याओं का निराकरण करते- करते सुबह चमोली को रवाना हो गये जबकि रातभर अधिकारियों को नींद आते रहे परन्तु टोलिया जी रात भर नहीं सोये। इस प्रकार सचिव उत्तराखण्ड का कार्यकाल पर्वतीय क्षेत्रा के लिए अच्छा रहा। जब वे दौरे में रहते थे तो नित्य लखनऊ से डाक का बक्शा मंगाते थे और कार में सफर करते समय फाईल करते थे और उसी शाम को डाक बक्शा लखनउ भेजते थे और फैक्स से लखनऊ निरन्तर फील्ड से ही आगे क्या कार्य करना है, निर्देश भेजते थे और पर्वतीय क्षेत्र के नोडल अधिकारियों को अपने सम्पर्क में रखते थे। ताकि क्षेत्रा के कार्य में तेजी लाये जा सके। जब टोलिया बनारस के डीएम थे उनके द्वारा विकास भवन की परिकल्पना कर सर्व प्रथम विकास भवन वाराणसी में बनाया गया और तत्पश्चात उप्र राज्य के प्रथम ग्राम्य विकास आयुक्त पद का कार्य भार सम्भालकर उन्होंने पूरे प्रदेश में विकास भवन बनाने का प्रस्ताव दिया। आज प्रदेश के विकास भवन बनाने का श्रेय उनको जाता है। उनके द्वारा ग्राम्य विकास विभाग के निरीक्षण सम्बन्धी विस्तृत प्रारूप पूर्ण रूप से तैयार कर मण्डल/जनपद/विकासखण्ड स्तर पर परिपालन हेतु लागू करवाया गया। यदि आज भी उनके निरीक्षण प्रारूप का उपयोग किया जाय तो भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं रहेगी। विभिन्न विश्व विद्यालयों में भी उन्होंने विभिन्न विषयों पर समय-समय पर आयोजित गोष्टी व सेमीनार में प्रतिभाग कर अनेक शोध् पत्र तैयार कराकर प्रकाशित करवाये गये। गढ़वाल विश्वविद्यालय के बुद्धीजीवी वर्गों द्वारा उनके कार्यों से प्रभावित होकर मरणोपरान्त उनके परिवार को शौर्य पुरस्कार भेंट किया गया। पर्वतीय विकास सचिव रहते हुये उन्होनें ग्राम बलढौढी अल्मोडा कुष्ठ आश्रम में डाॅ.रीच द्वारा उनके उपयोगार्थ एक हैण्डपम्प स्थापित करवाया जो सपफल रहा। इस प्रकार उनके द्वारा डाॅ.रीच के तकनीकि व साहित्य को समस्त पर्वतीय क्षेत्र के सम्बन्ध्ति अध्किारियों को प्रेषित कर उनसे प्राप्त प्रस्ताओं को शासन से मंजूरी देकर पर्वतीय क्षेत्र में हैण्डपम्प को स्थापित करवाया।डाॅ. टोलिया ने निदेशक, ग्राम्य विकास प्रशिक्षण संस्थान, बंक्शी का तालाब लखनउ के दौरान उनके द्वारा भारत सरकार को कपाट योजना की 5 करोड़ लागत तक के अधिकार मांगने का प्रस्ताव भेजकर निदेशक, ग्राम विकास को प्रशासनिक व वित्तीय अधिकार प्राप्त करा कर मध्यप्रदेश व उत्तर प्रदेश राज्य को लिये इस योजना से लाभान्वित कर रोजगार मुहैया कराये गये।
कौशिक समिति द्वारा डाॅ. टोैलिया को उत्तराखण्ड राज्य की राजधनी स्थापित करने का कार्य सौंपा गया था उनके द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों के बुद्विजीवियों से प्रश्नावली तैयार कर उनकी राय के अनुसार रिपोर्ट तैयार कर सरकार को सौंपी गयी। जब प्रशासनिक अकादमी नैनीताल में कार्यरत थे उनके द्वारा अन्य राज्यों के अध्किारियों को भी समय समय पर विभिन्न विषयों पर प्रशिक्षण हेतु आमंत्रित किये और अपने राज्य में केवल प्रशासनिक अधिकारियों व अन्य राजपत्रित अधिकारियों की ही नहीं अपितु अराजपत्रित अधिकारियों की भी समय-समय पर सेमीनार व गोष्ठी आयोजित कर आवश्यक प्रशिक्षण दिया गया। उनके द्वारा अकादमी में क्षेत्रा प्रमुख, ग्राम प्रधन, ग्राम पंचायत सदस्यों, स्व सहायता समूह, वन पंचायत के सरपंचों व स्वैच्छिक संस्थाओं व अन्य जन अधिकारियों को भी विभिन्न विकास कार्यों से सम्बन्धित समय-समय पर प्रशिक्षित किया गया ताकि वे जागरूक होकर अपने क्षेत्रा के विकास कार्यों में भली-भाॅति कर्तव्यों का निर्वहन कर सकें।
प्रशासनिक अकादमी में कार्यरत रहते हुए विश्व बैंक की ग्राम स्वजल योजना का संचालन पर्वतीय क्षेत्रा में किये जाने हेतु ध्नावंटन का कार्य किया गया तथा उक्त योजना में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था करायी गयी।
निदेशक प्रशासन अकादमी रहते हुए उनके द्वारा महत्वपूर्ण पुस्तकें/लेख एवं विभागों में अधिकारियों के उपयोगार्थ कई प्रकाशन किये गये जो आज भी प्रशासन अकादमी नैनीताल में उपलब्ध् है। मुख्य सचिव रहते हुए उनके द्वारा कई पुस्तकें लिखी गई जो आज भी व्यावहारिक हैं।विभिन्न पदों पर रहते हुए उनके द्वारा विभागों द्वारा किये जा रहे महत्वपूर्ण कार्यों का डाक्यूमेंटेशन कराया गया। उ.प्र. में दुग्ध् आयुक्त रहते हुए उनके द्वारा राज्य में डेरी विभाग एवं महिला डेयरी का गठन कर प्रदेश को डेयरी उद्योग के क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाया गया। उत्तराखण्ड राज्य में जड़ी बूटी का प्रचार एवं प्रसार कर राज्य की वित्तीय स्थिति को देखते हुए उनके द्वारा राज्य में स्थापित जड़ी बूटी शोध् संस्थान को सशक्त बनाया गया तथा किसानों को प्रशिक्षित करने हेतु सेलाकुई में एक सेंटर की व्यवस्था भी करायी गई। डा. टोलिया द्वारा उत्तराखण्ड में चाय बगान विकास को पुर्नजीवित कर प्रारम्भ किया गया जिससे हजारों लोगों को आज रोजगार प्राप्त हो रहा है। वन एवं ग्राम विकास आयुक्त रहते हुए उनके द्वारा भारत सरकार को हिमालयी राज्य की परिकल्पना का प्रस्ताव भी भेजा गया। डाॅ.टोलिया की नियुक्ति सचिव भारत सरकार में होने पर तत्कालीन सरकार द्वारा उनको मुख्य सूचना आयुक्त का कार्य सम्भालने का आग्रह किया गया। उनके द्वारा अविलम्ब सचिव भारत सरकार के पद से त्याग पत्रा देकर राज्य के प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यभार ग्रहण कर प्रदेश के जनता को सूचना के अध्किार के महत्व की जानकारी विभिन्न स्तरों पर गोष्ठी व अनेक पुस्तकें प्रकाशित कर और प्रचार-प्रसार के माध्यम से दी। यहीं नहीं प्रत्येक विभाग में विभागीय सूचनाओं व शासनादेशों के रख रखाव के लिए मैनयुल तैयार करवाया गया, जिससे विभागों को भी शासनादेशों का संकलन व विभागीय सूचना प्रत्येक स्तर पर रखने व उसका उपयोग करने की सुविध हुई, यहीं नहीं उनके द्वारा आयोग के सचिव को प्रत्येक विभाग के कार्यालय का निरीक्षण कराकर सूचना का अध्किार 2005 का निर्देशों के परिपालन व मूल्यांकन करा कर विभागों के कार्यों के स्तर के आधर पर विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया। और अच्छे कार्यों करने वाले विभागों का प्रशस्ति पत्रा प्रदान किया गया। इस प्रकार राज्य में सूचना के अधिकार 2005 का आम जन को सरकारी सूचनाओं का लाभ पहुँचाने से राज्य में ही नहींे अपितु देश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कराने से राज्य गौरवान्वित हुआ। उन्होंने सेवाकाल में दक्षिण एशिया में आयोजित सेमिनार बालश्रम ;आईएलओद्थाईलैण्ड, सहकारिता की पुनः संरचना;आईसीए द्जापान और कोरिया, संतुलित पर्वतीय विकास ;आईसीमोड नेपाल, जनसंख्या नियंत्राण ;वीकेके  इण्डोनेशीया, प्रशिक्षण केन्द्रों का प्रबन्धन, थाईलैण्ड में आयोजित सेमीनारों में तथा प्रफांस एवं कनाडा स्थित राष्ट्रीय व अन्र्तराष्ट्रीय प्रशिक्षण अकादमियों का अध्ययन भ्रमण किया। डाॅ.टोलिया की अभिरुचि के क्षेत्रा ग्राम विकास प्रसार, समन्वित पर्वतीय विकास, सहकारिता, प्राकृतिक संसाध्न, प्रबन्ध, लोक प्रशासन और मानव संसाध्न विकास एवं प्रशिक्षण था। डाॅ.टोलिया के प्रथम नियुक्ति संयुक्त मजिस्टेट उत्तरकाशी, एडीएम पौडी, आयुक्त कुमायूं मण्डल, सचिव/प्रमुख सचिव पर्वतीय विकास विभाग, निदेशक उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अकादमी नैनीताल और राज्य के प्रमुख सचिव, एपफआरडीसी, मुख्य सचिव व प्रथम मुख्य सूचना आयुक्त रहें। इस प्रकार डाॅ. टोलिया ने शासकीय कार्य पूर्ण लगन व तत्परता से निर्वहन किया। उनके द्वारा हिमालयी राज्यों के विकास, राज्य योजना आयोग व नीति आयोग, भारत सरकार और विभिन्न क्षेत्रों के विकास कार्य व शोध् कार्यों में विशेष योगदान दिया गया।

तुलसी देवी का उनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है

हीरा सिंह पंचपाल से बातचीज

पि.हि. प्रतिनिधि
ग्वालदम। तुलसी देवी मर्तोलिया ऐसा नाम है जिसने उनी कारोबार और उद्यमिता को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उपेक्षित लोगों को अवसर दिलाने के लिये उन्होंने अपनों का विरोध् भी सहन किया था। इन्हीं तुलसी देवी की याद में आज मूर्ति स्थापित है और लोग उनकी कर्मठता को याद करते हैं।
अपनी पुरानी यादों के साथ बातचीत करते हुए 70 वर्षीय हीरा सिंह पंचपाल बताते हैं कि करीब 1936 में जोहार के व्यापारी गरुड़ में आकर रहने लगे। ठण्डे स्थान में रहने वाले इन व्यापारियों को गरुड़ में भी गर्म लगने लगा और 1946 में ग्वालदम आ गये। इसमें उनके नाना मोहन सिंह रावत भी थे, जो पौड़ी-चमोली जिले के सम्मानित व्यक्तियों में थे। पिता स्व.राजेश सिंह पंचपाल भी व्यापार के सिलसिले में यत्र-तत्र जाते थे। देवाल, वाण, थराली, नारायणबगड़ दूरस्थ क्षेत्रों तक तत्कालीन ढुलान का कारोबार इन लोगों के पास था। श्री पंचपाल बताते हैं कि उनकी बुआ जी बेटी तुलसी देवी के पति की भाबर में मृत्यु के बाद वह असहाय सी महसूस करने लगी थी। तब नाना मोहन सिंह जी उन्हें ग्वालदम ले आये और वह उनी कारोबार करने लगी। तुलसी दीदी के साथ माँ गंगादेवी पंचपाल भी उनी फैक्ट्री में सहयोगी थी। 1954 में यू.पी. स्मोल स्केल इंडस्ट्रीज में पांचवे नम्बर का रजिस्ट्रेशन इनकी फैक्ट्री का ही था। तब उनी कपड़ों का बहुत चलन था और गढ़वाल के दूर-दूर क्षेत्रों तक इनकी धाक थी। तुलसी दीदी जिला बोर्ड की सदस्य के अलावा महिला कांग्रेस चमोली की संयोजिका थी। भारत सरकार के प्रोग्राम कल्याण विस्तार परियोजना के 16 स्थानों में चलने वाले स्कूलों को वह देखती थी। आगनबाड़ी में कताई-बुनाई जैसे कार्य भी सिखाये जाते थे। उस समय यह लोग अवैतनिक कार्यकर्ता होते थे। मात्र यात्रा भत्ता इन्हें मिलता था।
तुलसी दीदी ने कई धर्मिक अनुष्ठान यहाँ करवाये। साथ ही उपेक्षित लोगों को आगे बढ़ाने के लिये जुटी रहीं। बच्चों की रुचि पढ़ाई-लिखाई की ओर करने, ग्रामीणों को स्वावलम्बी बनाने, किसानों को कृषि औजार दिलाने जैसे कार्य में वह लगी रहती थी। 1985 में उन्होंने विद्याभारती संस्था को अपनी फैक्ट्री दान कर दी, जिसमें आज सरस्वती स्कूल चल रहा है। 1985 में तुलसी देवी का निधन हुआ। उनकी प्रेरणा से प्रेरित कई लोग आज काफी आगे हैं। ऐसी प्रेरणादायक की याद में स्कूल के पास ही उनकी मूर्ति स्थापित की गई है।
हीरा सिंह जी पुरानी शिक्षा व्यवस्था को गुणवत्तायुक्त मानते हुए बताते हैं कि तब हर कोई नहीं पढ़ता था। लगनशील बच्चे आगे बढ़ते थे और श्रम करते थे। तब पढ़ाने वाले पण्डित जी बहुत कम मेहनताने में योग्य शिष्यों को तैयार करते थे। समाज का भी उत्तरदायित्व गुरु की ओर ध्यान देने का था। स्कूल जाते समय बच्चे एक लकड़ी जरुर ले जाते थे और गुरुजी की घर के पास डाल देते, ग्रामीण महिलाएं उनके घर की लिपाई-घिसाई कर देती, कोई घी-सब्जी देता, कोई पानी ला देता। यानी कि बड़े ही शुद्ध भाव से गुरु सेवा होती थी और गुरुजन भी समाज को बनाने और सुधारने के लिये समर्पित थे। उनकी इलाके भर में प्रतिष्ठा होती थी, वह स्कूल की छुट्टी के बाद गाँव में घूमकर बकायदा बच्चों के बारे में उनके माता-पिता से बातचीत करते थे। गुरुजी पिटाई भी बहुत करते थे, जो हमें सुधार के लिये ही थी।

कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं डीआईजी पंचपाल

आईटीबीपी में डीआईजी रहे हीरा सिंह पंचपाल दो बार राष्ट्रपति पुरस्कार सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं। 1968 में भर्ती हुए श्री पंचपाल 2009 में सेवानिवृत्त हुए। सेवा के दौरान श्रीनगर में युद्धभूमि में यह काफी घायल हो गये थे लेकिन हौंसला नहीं छोड़ा और लड़ते हुए जीते। इकोलाॅजी के लिये कार्य करते हुए इन्हें सन् 2000 में ‘मैती’ पुरस्कार से भी नवाजा गया। श्री पंचपाल आज भी सैन्य अकादमी में पढ़ाने मसूरी जाते हैं। साथ ही सामाजिक गतिविधयों में सक्रिय हैं।

पिघलता हिमालय 11 जुलाई 2016 के अंक से