लद्दाख से उत्तराखण्ड तक फैले हिमालयी दर्रों को नाप रहे हैं तीन पर्वतारोही

केशव भट्ट
भारत में हिमलयी क्षेत्रा में बसे गाँवों को पर्यटन से जोड़ उनकी आर्थिकी मजबूत करने के इरादों से से तीन युवा पर्वतारोही लद्दाख से उत्तराखण्ड तक फैले पश्चिमी हिमालयी दर्रों को नाप रहे हैं। यह दल अपने यात्र अभियान में बीस दर्रे, जिसमें 5950 मीटर उँचे कालिंदी पास को पार कर लगभग 870 किमी की पैदल यात्रा कर चुके हैं। वेस्टर्न हिमालयन ट्रेवर्स का यह दल अब अपने अभियान के अन्तिम चरण में है। अगले कुछ दिनों में नेपाल के बार्डर धरचूला में पहँुचेंगे। जहाँ इनकी ये यात्रा समाप्त होगी।
पर्वतारोही भारत भूषण ने ट्रवर्स यात्रा मार्ग में जोहार घाटी के बुंई गाँव से फोन से बताया कि वेस्टर्न हिमालयन ट्रेवर्स के इस अभियान में उनके अलावा प्रणव रावत और शेखर सिंह शामिल हैं। उन्होंने लद्दाख के मार्खा वैली में चिलिंग ब्रिज से 27 अगस्त को अपनी यह यात्रा शुरु की। रूमसे, शोकर लेक, सुमररी लेक तथा 5580 मीटर उँफचे परंगला को पार कर उनके दल ने हिमांचल की घाटी में प्रवेश किया। मुद से काफलू गाँव, करछम होते हुए सांगला निकले और लमखागा होते हुए उत्तराखण्ड के हर्षिल में पहँुचे। यहाँ से गंगोत्री होते हुए हर्षिल में आये। यहाँ से पाणा, आला, सिथेल, कनोल, वान, अली बुग्याल, हिमनी गाँव होते हुए दानपुर घाटी में सोराग होते खाती गाँव में प्रवेश किया। इसके बाद जोहार घाटी में लीलम होते हुए उनकी यात्रा जारी है। इस दल के युवा पर्वतारोही उत्तराखण्ड में हिमालय के सीमान्त गाँवों में होते हुए जा रहे हें। अपने पड़ाव में वे गाँव में रुक कर ग्रामीणों समेत स्कूलों में इस यात्रा के महत्व के बारे में सन्देश देते जा रहे हैं कि किस तरह से पर्यटकों की आवाजाही से उनकी आर्थिकी मजबूत होगी। भारत भूषण ने कहा कि विदेशों में कई तरह के हिमालयी यात्रा मार्ग हैं, जिन्हें ट्रेल कहा जाता है। नेपाल में में ग्रेट हिमालियन ट्रेल विश्व प्रसिद्ध है।

तिब्बत में हुई कहासुनी से समान छोड़कर आना पड़ा था

हरीशचन्द्र सिंह लस्पाल

पि.हि.प्रतिनिधि
भारत-तिब्बत व्यापार के पुराने दिनों में सीमान्त क्षेत्र से जाने वाले व्यापारियों और तिब्बतियों के मधुर सम्बन्ध् रहे हैं। व्यापारी अपने मित्रों को पहचानते थे और एक-दूसरे की आवाभगत में कोई कमी नहीं करते। इसके बावजूद कई ऐसे अवसर आये हैं जब किन्हीं कारणों से मनमुटाव या कहासुनी हुई तो व्यापारियों को जान बचाकर भागना भी पड़ा। इसके अलावा कज्जाकी लुटेरों की कहानी बुजुर्ग बताया करते थे।
मानसिंह लस्पाल बूबू ;बुरांठ राठ परिवार के सदस्य हरीशचन्द्र सिंह पांगती से बातचीत के बाद कुछ जानकारी यहाँ दी जा रही है। बूबू मानसिंह जी अपने जमाने के बहुत रौबीले व्यक्ति थे और घुड़सवारी में भी पारंगत। इनके तीन पुत्र नाथू सिंह, दयान सिंह और डा.एम.एस. लस्पाल तथा तीन विवाहित पुत्रियां हैं जिसमें रमेश जंगपांगी, प्रेम सिंह जंगपांगी व श्री मडवाल परिवार में हैं। पीएसी से सेवानिवृत्त दयान सिंह के पुत्र पुष्कर, तीन विवाहित पुत्रियां पुष्पा पांगती, नीरु मर्तोलिया, आशु मर्तोलिया हैं। चिकित्सा विभाग में मुख्य चिकित्साधिकारी पद से सेवानिवृत्त और सामाजिक गतिविधियों में बेहद सक्रिय डा.एम.एस.लस्पाल के पुत्रा डा.राहुल चिकित्सा सेवा में और रोहित एफसीआई में हैं।
पिता स्व.नाथू सिंह व माता श्रीमती लक्ष्मी देवी के पुत्रों में ईश्वर सिंह, हरीश सिंह, मनोज सिंह हैं। हरीशचन्द्र सिंह लस्पाल का जन्म माइग्रेसन में जाते समय बोगड्यार में हुआ था। 52 वर्षीय हरीशचन्द्र सिंह बताते हैं कि जोहार के लास्पा में उनका मूल है। साईं में रहने वाले लस्पाल परिवार छोरीबगड़ भी आ गये थे। श्री लस्पाल की बचपन की पढ़ाई छोरीबगड़ में ही हुई। जहरीखाल जाकर पढ़ने का अवसर भी मिला पिफर हल्द्वानी और अल्मोड़ा से इण्टर किया। पढ़ाई के साथ तैयारी करते हुए यह एलआईसी से जुड़ गये और वर्तमान में इसी में प्रशासनिक अध्किारी के पद पर हैं। डोटिला, कपकोट के स्व.बहादुर सिंह रावत व रुकमणि देवी की पुत्राी चित्रा से 1993 में इनका विवाह हुआ। श्रीमती चित्रा लस्पाल भी एलआईसी में हैं और उत्कृष्ट खिलाड़ी के रूप में उनकी पहचान है जो उत्तर मध्य क्षेत्र से अखिल भारतीय स्तर पर खेलती हैं। कैरम उनका मुख्य खेल है। इसके अलावा चैस, टीटी भी खेलती हैं। पिछले नौ सालों से वह नेशनल खेल रही हैं। पारिवारिक व सामाजिक दायित्व के चलते चित्रा जी ने पदोन्नति का लाभ नहीं लिया। हरीशचन्द्र सिंह लस्पाल जी से कुछ बचपन की सुनी कुछ यादगार पूछने पर वह बताते हैं कि एक बार पिता जी और चाचा दयानसिंह जी तिब्बत गये थे। व्यापारी आवत-जावत में अपने मित्रों को खोजते थे और सौदा होता था। उस बार सौदे में न जाने कौन दूसरे लोग आ गये थे और भाषाई दिक्कत भी थी। तिब्बत में हुई कहासुनी के बाद पिता और चाचा को सारा सामान छोड़कर आना पड़ा था।

तड़ागी परिवार ने सम्भाला था बेरीनाग-चकौड़ी टी-स्टेट का मैनेजमेंट

टी स्टेट की फैक्ट्री का खण्डहर

डाॅ.पंकज उप्रेती
बेरीनाग सुरम्य नगरी के रूप में विख्यात है लेकिन अब इसमें रम्य वातावरण ने इसे दूषित कर दिया है। कभी अपने चाय बागानों के लिये मशहूर रहे बेरीनाग के लोग ही अब बाहर से आने वाली चायपत्ती का इस्तेमाल कर रहे हैं। अनियंत्रित और अनियोजित दौड़भाग ने बेरीनाग की सूरत को बदल दिया है।

अंग्रेजों के जमाने में यहाँ से चाय की सप्लाई विलायत तक होती थी। दानसिंह मालदार परिवार के कारोबार ने बेरीनाग और चकौड़ी तक को विस्तार दिया था और इस स्टेट का मैनेजमेंट संभाल रखा था तड़ागी परिवार ने। अब सबकुछ बदल सा गया है, बागान के पास चाय फैक्ट्री का खण्डहर दिखाई देता है और पास ही में तड़ागी परिवार का आशियाना। मालदार परिवार के वटवृक्ष की शाखाएं जितनी ज्यादा फैलती गई, यहाँ की जमीन भी उतनी ही बंटती चली गई और स्टेट की खूबसूरती कम होती रही।
वर्तमान में तड़ागी परिवार की सदस्या श्रीमती नर्मदा तड़ागी यहाँ रहती हैं और बातचीत में पुराने समय के बेरीनाग का स्मरण कर यादों में खो जाती हैं। वह समय जब दानसिंह जी थे और उनके ससुर और पति ने कारोबार को सम्भाला। वह कहती हैं कि चारों ओर दूर-दूर तक चाय के बागान थे और गुलबहार, अप्रैलिया सहित तरह-तरह के फूल खिलते थे। खुमानी, पुलम, नारंगी कई प्रकार के फल होते थे। ऐसे प्राकृतिक वातावरण को देखने के लिये बाहर से लोग बेरीनाग आया करते थे।

अब बात तड़ागी परिवार की ही कर लेते हैं। मूल रूप से चम्पावत के इस परिवार का ताल्लुक मालदार परिवार से है। मोहनसिंह जी के सालेसाहब गोविन्द सिंह जी हुए। कुंवर महिराज की माता सरस्वती बिष्ट गोविन्द सिंह तड़ागी की दीदी थीं । अपने समय में कानपुर विश्वविद्यालय से बीकाॅम पढ़े तड़ागी जी को मालदार साहब ने चकौड़ी-बेरीनाग टी-स्टेट का मैनेजर नियुक्त किया। पढ़े-लिखे होने के  साथ ही पूरी स्टेट की गतिविधियों को जानने-समझने वाले तड़ागी जी ने 25 साल नौकरी के बाद अपना चार्ज पुत्र  हर्षबद्र्धन तड़ागी को दे दिया और टी-स्टेट का गतिक्रम बना रहा लेकिन समय के साथ बहुत कुछ इतिहास बन चुका है। गोविन्द सिंह के ज्येष्ठ पुत्र राजकिशोर आर्मी में भर्ती हो गये,  हर्षबद्र्धन तड़ागी ने 35 साल  तक टी-स्टेट को सम्भाला, पुत्री रजनी हल्द्वानी और रीता बरेली में अपने परिवार के साथ है। पिता के बाद 35 साल तक स्टेट को सम्भालने वाले हर्षबद्र्धन के पुत्र कीर्तिबद्र्धन आसाम टी कम्पनी  में मैनेजर हैं। इन्होंने सिलगुड़ी में कोर्स और ट्रेनिंग कर बेरीनाग में चाय कारोबार को बढ़ाने की सोची थी किन्तु संयोग से आसाम में चाय कम्पनी में जुड़ गये। तड़ागी जी की पुत्री दीप्ति ने जयपुर से संगीत विषय में एमफिल किया है जबकि ज्योति ने बायोटेक किया। परिवार के ताने-बाने पर चर्चा के साथ ही श्रीमती नर्मदा जी बताती हैं कि सन् 1982  में उनका विवाह हर्षबद्र्धन जी के साथ हुआ। उस समय बेरीनाग में इण्टर कालेज का भवन के अलावा दूर-दूर कुछ नहीं था। कुछ अंग्रेजों के समय के बने भवन थे। चाय फैक्ट्री को ससुर गोविन्द सिंह जी देखते थे, जिसमें 80 लोगों का स्टाफ था, सीजन के समय ग्रामीण आ जाते थे और 250 लोग तक हो जाते थे। फैक्ट्री के पास गेटपास जरूरी था, तीन प्रकार के इंस्पेक्टर जाँच के लिये आते थे और चाय विलायत तक को जाती थी। गाड़ी व यातायात के साधन नहीं थे, श्रमिक पीठ में चाय के बाक्स लादकर चम्पावत, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ ले जाते थे। घोड़ों में भी सामान दूर-दूर तक जाता था। स्वास्थ्य खराब होने के बाद ससुर जी ने हर्षबद्र्धन जी को स्टेट का कारोबार देखने को कह दिया। समय बीतता गया और स्टेट की ओर पुरानी पीढ़ी की तरह ध्यान देने वाले नहीं रहे। फैक्ट्री की मशीनें खराब हो गई और चाय  के बाग कुम्हला से गये। अप्रैल की चाय अच्छी मानी जाती थी, पर  सम्भालना कठिन होता जा रहा था। स्टेट के हालातों को देखकर पति हर्षबद्र्धन जी भी उदास रहने लगे थे। यही नहीं मालदार परिवार के सम्वेदनशील सदस्यों को भी स्टेट के वर्तमान हाल देखकर जरूर दर्द होगा, क्योंकि जिस बेरीनाग की चर्चा इनके बिना अधूरी रह जाती है, उसमें नई पीढ़ी के बच्चे इन बातों को नहीं जानते हैं। कुछ लोगों ने सूझबूझ कर कुंवर महिराज की मूर्ति जरूर बाजार के चैराहे पर लगा दी है।

बेरीनाग और चकौड़ी की खूबसूरती को संवारने में यहाँ के लोगों और मालदार परिवार के सदस्यों को ही ध्यान देना होगा। केवल शहर बसा देना ही विकास नहीं होता है। साथ ही कोई रहे या न रहे, नियंत्रित व नियोजित कार्यों की महक जरूर रहती है।

पिघलता हिमालय 12 सितम्बर 2016 अंक से

झुप्पू में सामान लादकर तिब्बत से गरुड़, सोमेश्वर, दूनागिरी जाते थे

गंगा सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
तिब्बत व्यापार के दौर की कई यादों के साथ कई लोग हमारे समाज में हैं। वह व्यापार चाहे सीमा पार जाकर तिब्बत होता था या आन्तरिक शहर-कस्बे-गाँव में, उनकी स्मृतियाँ हमेशा मधुर रहेंगी। ऐसी ही मधुर स्मृतियों को सजो कर रखा है ध्रमघर में रहने वाले गंगा सिंह पांगती ने।

1951 में दरकोट, मुनस्यारी में पिता रतनसिंह माता रूमा देवी के घर जन्मे गंगासिंह का बचपन बहुत ही संघर्षमय रहा है। इनकी दो बहिनें- कोकिला देवी ;पंचपाल और प्रेमा;मर्तोलिया हैं। पिता के निधन के बाद 5-6 साल की उम्र में बालक गंगा अपने नाना दलीप सिंह पंचपाल;सयाना के घर सिमगड़ी, नाकुरी पट्टी आ गये। पिथौरागढ़-बागेश्वर जनपदों की सीमा क्षेत्रा ध्रमघर नामक स्थान में इनका परिवार रहता है।

गंगासिंह बताते हैं कि इनके नाना जी चार भाई थे- दलीप सिंह, उत्तम सिंह। व्यापार के दिनों में यह लोग अपने जानवरों सहित इधर-उधर जाते थे। झुप्पू में समान लादकर दूर तक इनकी यात्राएं होती थीं। झुप्पू याक से छोटे नश्ल का जानवर है। झुप्पू भी दो तरह के होते हैं- एक तो छोटे कद और छोटे सींग वाला और दूसरा बड़े शरीर वाला। नाना जी लोग सिमगड़ी में रहते हुए ही जोहार के पांछू और तिब्बत तक जाते। जब वे लोग नमक इत्यादि सामान लेकर वापस आते थे तब बचपन में कमेड़ीदेवी, गरुड़, बिन्ता, सोमेश्वर, द्वाराहाट जाने का मौका मिला। नाना जी के साथ दूनागिरी, पाण्डुखोली ;द्वाराहाट भी गया। सोमेश्वर, बिन्ता से वापसी में चावल लाते थे। वस्तु विनिमय में नमक इत्यादि सामान के बदले चावल मिलता था। अपने बचपन को याद करते हुए पांगती जी बताते हैं कि जिला पंचायत के अन्तर्गत माइग्रेशन का प्राइमरी स्कूल पांछू नाम से जाना जाता था। बाद में इसका नाम सिमगड़ी स्कूल हो गया और माइग्रेशन व्यवस्था नहीं रही किन्तु उन्होंने पुराने रिकार्ड खुलवाये और इस आवाज उठाई। बाद में एक और प्राइमरी स्कूल शौक्यूड़ा नाम से खुल गया। बचपन की पढ़ाई के बाद गंगासिंह मुनस्यारी पढ़ने चले गये। चाचा सत्यवीर सिंह पांगती सहित कई लोगों ने आगे पढ़ाई के लिये सहयोग किया लेकिन कक्षा आठ की पढ़ाई करते हुए ही गंगा सिंह सीआरपीएफ में भर्ती हो गये। 1980 में हरतोला के झुब सिंह पंचपाल ;मल्ला राठ की पुत्री से इनका विवाह हुआ। अपनी स्थिति-परिस्थिति से घिरे गंगा सिंह का संघर्ष चलता रहा। नौकरी के दौरान ही अस्वस्थ्य माता जी के इलाज के लिये वह अपने अधिकारियों से तक भिड़ जाते थे। चूंकि उनकी हर आवाज उनके अन्तःकरण की थी, सो वह सपफल ही रहे। सेवानिवृत्त होने के बाद गंगासिंह जी सिमगड़ी के ग्राम प्रधान बन गये। जनहित के मुद्दों को उठाने के साथ ही एक पफौजी अनुशासन के लिये चर्चित पांगती जी को पंचायतीराज संगठन का ब्लाक अध्यक्ष बना दिया गया। संगठन के जिला, मण्डल अध्यक्ष के बाद अब वह प्रान्तीय अध्यक्ष हैं।

अपने बचपन की यादों में लौटते हुए वह बताते हैं कि उनका मूल घर तो मिलम ही है। पिता जी दरकोट आते समय बोगड्यार से टांटरू, बाख ले आते थे। टांटरू की सब्जी और बाख का आचार खूब याद आता है। संगठन की भावना के साथ सबको जोड़ने वाले श्री पांगती कहते हैं- ‘विषम परिस्थितियों में भी खुश रहना आता है पर्वतवासियों को।

पिघलता हिमालय 15 अगस्त 2016 से

सीधे और सच्चे पत्रकार थे ललितमोहन कोठियाल

उमेश डोभाल ट्रस्ट के महासचिव व वरिष्ठ पत्रकार का 7 अक्टूबर 2018 को हृदयगति रुकने से निधन हो गया। मिशन की पत्रकारिता में लगे रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान रखने वाले भाई एम.मोहन कोठियाल को पीड़ा होने पर पौड़ी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें श्रीनगर के लिये रेफर कर दिया। अस्पताल, दवाईयाँ, सड़क, बिजली जैसी आम जरूरतों की मांग के लिये लड़ने वाले कोठियाल जी इतनी जल्दी हमसे विदा हो जाएंगे, किसी ने सोचा ही न था। पौड़ी की समस्याओं के साथ ही उत्तराखण्ड के हर भले आन्दोलन में उनकी किसी न किसी रूप में भागीदारी थी। चकबन्दी को लोगों का हथियार बनाने की आवाज उठाने का काम उन्होंने किया। उमेश डोभाल ट्रस्ट के महासचिव होने के साथ ही उन्होंने एक कार्यकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाई और हर किसी के सुख-दुःख में सम्मिलित हुए। उन्हें पत्रकारिता की सूझ और समझ थी तभी तो वह कुरेदने वाले सवाल उठाते थे और पहाड़ के दर्द को पहचानते थे। पिघलता हिमालय स्व.कोठियाल को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करता है कि दुःख की इस घड़ी में उनके परिवार को साहस-शक्ति प्रदान करे।

देशज: ऐसी छटपटाहट का अहसास था

डाॅ.पंकज उप्रेती
इस बार उत्तराखण्ड के हल्द्वानी महानगर में 2 से 4 अक्टूबर 2018 ‘देशज’ उत्सव का आयोजन बहुत कुछ सिखाने वाला था। इसमें ऐसी छटपटाहट देखने को मिली, जिसका पहले से अहसास था। आयोजनों को लेकर कलाकारों में थिरकने और दर्शकों में उत्साह की फड़पफड़ाट अच्छी लगती है लेकिन जब अनुशासन न मानने वाले आयोजन में अपने जिद कर दें तो ऐसा महसूस होता है जैसे उन्हें उनके जीवित होने का प्रमाण पत्र लेना हो। ऐसा ही देशज में भी हुआ।
दरअसल इस आयोजन का क्षेत्रीय समन्वयक मुझे बनाया गया था और हिमालय संगीत शोध् समिति के युवा कार्यकर्ताओं की टीम पूरी व्यवस्था को सम्भाले हुए थी। संगीत नाटक अकादमी की अधिकारी-कर्मचारी पैनी नज़र रखते हुए चारों ओर जुटे थे। ऐसे में आयोजन का भव्य होना तय हो चुका था। हुआ भी ऐसा कि तीन दिन तक कार्यक्रम स्थल पर सैकड़ों की तायदात में भीड़ उमड़ पड़ी। लद्दाख से लेकर कर्नाटक तक का लोक संगीत श्रोताओं के कानों में रस घोल रहा था और बहुत से सजीव प्रसारण देख रह थे। देश की 18 टीमों ने जितनी आकर्षक प्रस्तुतियां दीं उससे भी ज्यादा संयम दर्शकों ने बनाया। इसके बावजूद उन तत्वों के लिये क्या कहा जाए जो अनुशासन तोड़ने पर आमदा थे। वह तो ईश्वर की कृपा ही थी कि सब कुछ कुशलता से हुआ। पूरे आयोजन को यथा समय शुरु करने से लेकर उसकी मर्यादा बनाये रखने के लिये हिमालय संगीत शोध् समिति के युवा जुटे रहे।
आयोजन के दौरान मैं स्वयं एक क्षण के लिये भी कुर्सी पर नहीं बैठा और चक्कर लगाते हुए व्यवस्थाओं को देख रहा था। मैंने देखा ढलती उम्र में भी कुछ सिर्फ इसलिये अनुशासन तोड़ने वाले सक्रिय हो उठे क्योंकि मंच से उनका नाम नहीं लिया जा रहा था। कलाकार होने का दम्भ भरने वाले कतिपय युवा भी उच्छृंखलता करते रहे। समारोह स्थल की प्रथम कुर्सी घेरने से लेकर मंच संचालक तक बार-बार चक्कर लगाने की होड़ इनमें थी परन्तु मंच का अनुशासन बनाये रखने के लिये इन्हें तीन दिनों तक रोके रखा गया। इनकी छटपटाहट बढ़ने लगी और पिछले दरवाजे से घुसकर अराजकता करने वाले फिर भी सक्रिय थे लेकिन सजीव प्रसारण के भय के कारण मंच तक नहीं फटक सके। हे प्रभु! सबको सद्बुद्धि दे। किसी भी आयोजन की मर्यादा को बनाये रखना बहुत जरूरी है

भारत की लोक, जनजातीय एवं पारम्परिक अभिव्यक्तियों का उत्सव देशज

चन्द्रशेखर जोशी
संगीत नाटक अकादमी भारत सरकार द्वारा इस बार 2 से 4 अक्टूबर 2018 हल्द्वानी महानगर में ‘‘देशज’’ भारत की लोक, जनजातीय एवं पारम्परिक अभिव्यक्तियों का उत्सव मनाया गया। गांधी जी की 150वीं जयन्ती पर तीन दिन चले इस उत्सव ने कलाकारों और दर्शकों को उत्साहित किया। महोत्सवों बाढ़ में यह अलग प्रकार का आयोजन था। उत्तराखण्ड में महोत्सवों के नाम पर बाढ़ सी आ चुकी है लेकिन अभिव्यक्तियों का ऐसा संगम जिसमें सबकुछ अनुशासन के साथ हो करना कठिन है। बावजूद ऐसा उत्सव इस बार हुआ। क्षेत्राीय समन्वयक  और हिमालय संगीत शोध् समिति की पूरी टीम दिन-रात इसमें जुटी रही जबकि नाटक अकादमी के अधिकारियों, कर्मचारियों की टीम निरीक्षण के साथ हर पल चैकस थी। आयोजन से पूर्व पत्रकार वार्ता में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग उत्तराखण्ड के उपनिदेशक डाॅ.योगेश मिश्रा ने लोक कलाओं और संयोजन कर रहे डाॅ.पंकज उप्रेती ने जनजातीय कला पर विचार रखे। अकादमी की ओर से सलाहकार अमित सक्सेना ने ‘देशज’ आयोजन पर विस्तार से जानकारी दी। हिमालय संगीत शोध् समिति के वरिष्ठ सदस्यों में डाॅ.नवीन तिवारी युवाओं की टीम में धीरज उप्रेती, संगीत बिष्ट, योगेश उपाध्याय, तनुज उपाध्याय, देवेन्द्र पाण्डे, पूजा लटवाल, मनमोहन वर्मा, आशुतोष सहयोगी रहे।
देश के विभिन्न प्रान्तों की पारम्परिक संस्कृति और कला अपना वजूद खोती जा रही है। टीवी और सोशल मीडिया पर फैल रही संस्कृति ने इस संकट को और बढ़ा दिया है। रंगमंच, नृत्य वाद्य, गीत-संगीत की अनमोल ध्रोहर को बचाने और विकसत करने के लिये यह अनूठा प्रयास था, जिसके तहत उत्तराखण्ड में पहली बार देशभर की विविध् लो संस्कृतियों का संगम हुआ।
उल्लेखनीय है कि संगीत नाटक अकादमी पिछले 66 सालों से देश के विभिन्न इलाकों में लोक संस्कृति का प्रदर्शन कर रही है। प्रदर्शन कला की यह शीर्षस्थ संस्था विविध् सांस्कृतिक विरासतों, लोक कलाओं, अमूर्त परम्पराओं को जीवित करने व उन्हें आगे बढ़ाने के लिए संगीत उत्सव कराती है। पाँच साल पहले अकादमी द्वारा देश के लोक एवं जन जातीय संगीत, नृत्य और नाट्य के विविध् रूपों से जुड़े कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए देशज महोत्सव शुरू किया। संस्था अब तक दिल्ली, पटना, हैदराबाद, जमशेदपुर दरभंगा, आजमगढ़, इम्पफाल, कानपुर, कुरुक्षेत्रा समेत दर्जनों स्थानों पर देशज महोत्सव आयोजित कर चुकी है। इसी क्रम में हल्द्वानी में यह विराट आयोजन किया गया।
इस तीन दिवसीय आयोजन का उद्घाटन लोकगाथाओं पर जबर्दस्त कार्य कर चुके डाॅ.प्रयाग जोशी द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया। आकदमी के सलाहकार अमित सक्सेना, कंसलटेंश मनीष ममगई, नरेंद्र पांथरी, हिमालय संगीत के अध्यक्ष धीरज उप्रेती मंच पर थे। कार्यक्रम में पहले दिन उत्तराखण्ड, राजस्थान, पंजाब, मणिपुर, हरियाणा के कलाकारों ने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। विभिन्न राज्यों से आए कलाकारों की प्रस्तुति देख दर्शक झूम उठे। इस दौरान टिहरी गढ़वाल के नत्थीलाल नौटियाल ने घस्यारी नृत्य प्रस्तुत किया। जयपुर की मीना सपेरा ने कालबेलिया नृत्य, पटियाला के रवि कुमार की टीम ने भांगड़ा नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी। मणिपुर के प्रदीप सिंह के दल ने थाॅग-टा और ढोल चोलम की आकर्षक प्रस्तुति दी। रोहतक के सलीम कुमार की टीम ने फाग नृत्य प्रस्तुत किया। उत्तराखंड नरेंद्र पांथरी के दल ने झोड़े की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम के द्वितीय दिवस पर कुशल भण्डारी के नेतृत्व में कलाकारों ने आयोजन सलूड़-डुंग्रा के परम्परागत पूजा-अनुष्ठान का अद्भुत प्रदर्शन किया। भूम्याल देवता की यह पूजा गढ़वाल क्षेत्र में प्रचलित है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के कलाकारों ने पफरवाई नृत्य पेश किया। आजमगढ के राजकुमार शाह के दल ने बोलों के साथ शानदार प्रस्तुति दी। असम के बीहू नृत्य ने खूब वाहवाही बटोरी। गुवाहाटी से निलिकांत दत्ता के साथ आए कलाकारों ने पैंपा, बांसुरी, ताल, ढोल के साथ पर्वते-पर्वते बोगाबो पारू मोय, लौता नु बोगाबोलय ताव गीत पर जनजातीय संस्कृति की छटा बिखेरी। तेलंगाना के राम चंद्रुडडू के दल ने की प्रस्तुति दी। हिमाचल के जोगिंदर हबबी के दल ने सिरमौरी नाटक प्रस्तुत किया। तीसरे दिन उत्तराखंड की छपेली सामूहिक नृत्य से हुई। अल्मोड़ा से आए प्रकाश बिष्ट के दल ने मसहूर छपेली नृत्य प्रस्तुत किया। इसके बाद लेह लद्दाख के लुंडब दौर्जे की टीम ने जम्मू कश्मीर का जनजातीय बोनोन लोक गीत और नृत्य की प्रस्तुति दी। उत्तराखंड के देबू पांगती के दल ने सीमांत का दुस्का नृत्य प्रस्तुत किया। त्रिपुरा का धमाइल और बीजू नृत्य संतोष सूत्रधर के दल ने प्रस्तुत किया। कर्नाटक के कलाकारों ने महालिंगप्पा के नेतृत्व में करडी मजलू जनजातीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया। अंत में उत्तराखंड के शिवदत्त पन्त की टीम ने नन्दा राजजात की आकर्षक प्रस्तुत दी। इस मौके पर सुरेन्द्र महरा, आरती जोशी, बाबूलाल गुप्ता, उमेश पांडे, प्रो. अतुल जोशी, ओ.पी.पाण्डे, हरीश पन्त, जगमोहन रौतेला, भाष्कर उप्रेती, डाॅ.दीपा गोवाड़ी, डाॅ.जयश्री भण्डारी सहित सैकड़ों की तादात में दर्शक मौजूद थे। इस तीन दिनी आयोजन से बहुत कुछ सीखने को मिला है हल्द्वानी शहर व इस प्रदेश को।

 

देशज: सबसे कमजोर मंचीय प्रदर्शन उत्तराखण्ड का रहा

पि.हि.प्रतिनिधि
हल्द्वानी में हुए ‘देशज’ उत्सव में देश भर के लोक कलाकारों ने अपने फन का जादू बिखेरा और लोक के शास्त्र को इस प्रकार उकेरा कि शास्त्रीय संगीत के जानकार  दातों तले अंगुली दबा रहे थे और उनकी लय पर झूम रहे थे। कर्नाटक के लोक कलाकारों ने ‘रघुपति राघव राजा राम’ की की कर्णप्रिय धुन पर घनवाद्य झांझ, सुषिर बाद्य शहनाई, चर्म वाद्य ढोल नगाड़ों में चमत्कृत करने वाली लयकारियों की करामात दिखाई। तिहाई, पल्टे, रेले, चक्करदार……क्या कुछ नहीं था उसमें। तिहाईयों के साथ सम पर आते ही दर्शक वाह कर रहे थे। लद्दाख के नर्तकों ने परम्परागत वेशभूषा में अपने त्यौहार का जो नृत्य प्रस्तुत किया वह तो अद्भुत था। आसाम का बिहू नृत्यगीत उसकी लचक और चलक को समझाने वाला था। मणिपुर मिजोरम के कलाकारों ने नृत्यकला के साथ उनके रहन-सहन का समझाया। उन्होंने परम्परा का निर्वहन करते हुए समझा दिया कि प्रकृति के बीच वह कितने सजग हैं और आत्मरक्षा के गुर नृत्यगीत के साथ जानते हैं। बात करें उत्तराखण्ड की तो यहाँ के कलाकारों ने बेहद निराश किया। गढ़वाल से आये दल को लेकर बहुत उत्साह था लेकिन दल नायक ने दर्शकों को समझाने के लिये जो लम्बा भाषण दिया वह दर्शक सहन नहीं कर पाये। जोहार की टीम अच्छा कर रही थी लेकिन निर्धरित संख्या से अध्कि कलाकारों की भीड़ मंच पर थी। अल्मोड़ा से आये दल ने झपेली नृत्य का वही स्वरूप दिखाया जो आजकल पंजीकृत दल सामान्यता करने लगे हैं। दिल्ली से आये उत्तराखण्डी दल दल ने बहुत ही निराश किया। शिवदत्त पन्त की टीम नन्दा राजजात प्रस्तुति में कुछ सफल रही।

रामसिंह जागरुक जनों की धुरी थे, एनटीडी अल्मोड़ा को बनाया केन्द्र

लक्ष्मण सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
जोहार के इतिहास-भूगोली की समग्र जानकारी के लिये याद किये जाने वाले रामसिंह पांगती के बारे में पिघलता हिमालय डाॅ.आर.एस.टोलिया का कालम नियमित रूप से प्रकाशित हो रहा है। इस अंक में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का हवाला दिया जा रहा है। परिवार के वरिष्ठ सदस्य लक्ष्मण सिंह पांगती से बातचीत के आधार पर यह जानकारियां हैं। 80 वर्षीय लक्ष्मण सिंह पांगती भी हमेशा सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं। इन्होंने मिडिल मुनस्यारी से करने के बाद हाईस्कूल अल्मोड़ा से किया। आईबी में नौकरी करते हुए नैनीताल, इलाहाबाद, लेह-लद्दाख, लखनउ रहे। असि0डायरेक्टर आईबी से सेवानिवृत्त होकर अब हल्द्वानी में रह रहे हैं। अपनी सरकारी सेवा के दौरान भी सामाजिक मेल-मिलाप में रहने वाले लक्ष्मण सिंह जी ने लखनउफ में काफी समय व्यतीत किया और पहाड़ की संस्कृति से युवाओं को जोड़ने के लिये लेखन भी करते रहे। पिघलता हिमालय में भी आपके द्वारा लेख व उपयोगी सामग्रियां उपलब्ध् करवाई गई।
पिता रामसिंह पांगती व माता हिरमा देवी के कनिष्ठ पुत्रा लक्ष्मण सिंह जी बताते हैं कि उनके पिता ने परिवार से ज्यादा समय समाज के लिये दिया। रामसिंह जी जागरुक जनों की धुरी थे, उन्होंने सीमान्त क्षेत्रा के लोगों को मदद के लिये एनटीडी अल्मोड़ा में केन्द्र बनाया। 8 जून 1884 को राडागाडी तहसील मुनस्यारी में जन्मे रामसिंह मिडिल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी और 17 अगस्त 1906 में सर्वे आपफ इण्डिया देहरादून में सर्वेयर के पद पर नियुक्त हुए। कुछ वर्षों बाद नौकरी भी छोड़ दी। सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आन्दोलन चलाने के साथ ही कई पुस्तकें उन्होंने लिखी। उनकी प्रकाशित पुस्तकों में- जोहार का इतिहास व वंशावली ;सन् 1936 ई.द्ध, आत्म कहानी, स्त्री शिक्षा ;1910द्ध, जोहारीय उपकारक;भाग 1, भाग 2द्ध हैं। हस्तलिखित पुस्तकों में- होली का अखबार ;सन् 1935, महिला सुधर ;जोहारी बोली में 1936द्ध, देशोपकारक ;जिसमें शौका सेवक मण्डल, जोहार पंचायत, सुधरकों को आदेश, अछूतोद्धाार और मनोभिलाषा शामिल हैद्ध, भूत शंका निवारण है। इन दिनों उनकी हस्तलिखित पुस्तकों के आधर पर जोहारी बोली में ‘छितकू की कथा एवं ऐतिहासिक कथाएं’ पुस्तक तैयार हो रही है। पिता जी ने अल्मोड़ा के लाला बाजार में दुकान भी ले ली थी लेकिन वह नहीं कर सके। रामसिंह जी ने जोहार उपकारिणी महासभा, जोहार सोसाइटी ;सम्वत 1969, नौजवान पांगती पुस्तकालय, जोहार कांग्रेस मण्डल सामाजिक तथा राजनैतिक संस्थाओं के गठन में सक्रिय सहयोग दिया। महिला उत्थान के लिए 1900 से ही प्रयास करते रहे। बाल विवाह, कन्या विक्रय, अशिक्षा व महिलाओं में पर्दे का प्रचलन रोकने के लिए प्रचार तथा प्रयास किया। 1910 में महिलाओं में जागृति के लिए स्त्रीशिक्षा नामक पुस्तक का प्रकाशन किया। 12 जुलाई 1951 को जोहार भवन, नारायण तेवाड़ी देवाल ;एनटीडी अल्मोड़ा में उनका निध्न हुआ था।
इस पांगती परिवार की बात करें तो सोबन सिंह, रामसिंह और नरसिंह तीन भाई थे। दरकोट में रहते हुए इन्होंने मुनस्यारी में शान्तिकुन्ज में आसियाना बनाया। शान्तिभवन नाम से बने आवास में कांग्रेस कार्यकर्ताओं और वंशावली तैयारी के लिये दूर-दूर से लोग आते थे। जागरुक जनों की बैठकें और सामाजिक चेतना के लिये बनने वाली रणनीति के बीच परिवार के छोटे बच्चे लोकरंग में रंगते हुए काफी जागरुक हो चुके थे। रामसिंह के परिवार में पुत्र-पुत्री- मोहनसिंह, उत्तमसिंह, गोविन्द सिंह, तुलसी देवी, लक्ष्मण सिंह हुए। यही वंशावली आगे बढ़ते हुए मोहन सिंह परिजनों में कमला, राजकुमारी पांगती, हरीश, भगवान, राजेन्द्र सिंह। उत्तम सिंह जी के परिजनों में मुन्नी देवी, तारा जंगपांगी, पूरन सिंह। तुलसी रावत के पति श्रीराम सिंह रावत जी हैं। लक्ष्मण सिंह के पुत्र- जयन्त व तनुज पांगती।

पिघलता हिमालय 29 अगस्त 2016 अंक से

उनकी ‘प्रेरणा’, उनका सर्जन, हमेशा हमारा और हमारे समाज का पथ आलोकित करता रहेगा…….

स्व.आनन्द बल्लश्रभ उप्रेती

प्रो0देवसिंह पोखरिया
‘प्रेरणा’ स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती ;संस्थापक/सम्पादक पिघलता हिमालयद्ध की कविताओं का संग्रह है। ये उनकी 1965 से 1995 के बीच लिखी गई कविताएं हैं। विश्व प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डाॅ.हेम चन्द्र जोशी के सानिध्य में रहे उप्रेती जी अक्सर नैनीताल में उनके साथ का उल्लेख करते थे। डाॅ.जोशी को गुरु के रूप में मानने वाले उप्रेती जी उनसे पर्याप्त प्रभावित हुए थे, वे उनके प्रेरणा स्रोत थे। सुमित्रानन्दन पन्त जैसे महान कवि का जीवनवृत्त व कृतित्व उनकी साहित्यक अभिरुचि को गहरा करता रहा है। युवावस्था में अपने मित्रा अच्छेलाल ‘पथिक’ के साथ रुद्रपुर में ‘प्रेरणा’ नामक कविता संग्रह प्रकाशित करने वाले उप्रेती जी ने इससे पूर्व अल्मोड़ा में अपने शिक्षार्जन के दौरान काव्य रचनाकारों  की संगत की। अल्मोड़ा से आगरा और फिर लौटकर तराई के दानपुर-रुद्रपुर तक के सफर में काका हाथरसी जैसे कवियों का साथ उन्हें लगातार लिखने को उकसाता रहा। हल्द्वानी में भी कविता-पाठ का दौर चलता रहा और उन्होंने इस बीच कई कविताओं की रचना की।
स्व. आनन्द बल्लभ उ्रप्रेती जी के सुपुत्र डाॅ.पंकज उप्रेती ने उक्त कालखण्ड में लिखी गई उनकी कविताओं को ‘प्रेरणा’ के दो खण्डों में विन्यस्त कर इस संग्रह को रूपाकार दिया है। खण्ड-एक में 25 तथा खण्ड-दो में 23 कविताएं संगृहीत हैं। आनन्द उप्रेती बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार थे। कहानी, उपन्यास,व्यंग्य, कविता और पत्रकारिता कोई भी विध उनकी कलम से अछूती नहीं रही। एक पत्रकार की पैनी दृष्टि सम्पूर्ण कटाक्ष के साथ हमेशा हर विध में उनके साथ चलती उसी में अंतरनुस्यूत मिलती है। उप्रेती साहित्य को ईमानदारी से जीते हुए एक भुक्तभोगी के यथार्थ में लपेट कर उसे प्रस्तुत करते हैं।
इस संग्रह के खण्ड-एक की कविताओं में प्रकृतिपरकता, भावुकता, स्वाभाविकता, जिज्ञासा, सुकोमलता, मनुष्य मात्रा को उद्बुद्ध करने के भाव व्यक्त हुए हैं। दुख ही सुख को मापने का पैमाना है। कहीं जयशंकर प्रसाद जैसी भावाकुलता है, तो कहीं ‘मैं बजरी की बेटी हँू’ कविता निराला की ‘तोड़ती पत्थर’ कविता की याद ताजा कर देती है, इसमें मानवीय सम्वेदना की चरम परिणति परिलक्षित होती है-
‘‘माँ बजरी ने बजरी मैं पैदा कर बजरी बना दिया,
बजरी में ही खेल-खेल कर बजरी कूटा करती हँू।
‘जंगल और वीरानों में’ कविता में अध्किारियों से लेकर संसद तक की देश की बदहाल स्थिति का चित्राण हुआ है। कवि दुखी है कि समाज के असली लुटेरे अब जंगलों में नहीं समाज के बीच ही रह कर सभ्यता का मुखौटा पहन कर उसे लूट रहे हैं।
‘सब कुछ लिख कर भेजना भाई’ जैसी कविता ग्रामीण जीवन के अभावों और समस्याओं को सिद्दत से चित्रित करती है। बेशर्मों पर कवि ने निर्मम एवं निष्ठुर व्यंग्य किया है-
‘‘मेरे दरवाजे के ठीक सामने
नंग धड़ंग प्रजातंत्र लेट गया है
उसकी नाक पर उग आया दरख्त
अपनी बाहें फैलाता…..’’
कवि कहीं सरस्वती के वरद् पुत्रा सुमित्रानन्द पन्त को नमन करता है और कहीं नये काव्य और छन्द ज्ञान शून्य अकवियों पर व्यंग्य करता कहता है-
‘‘जब से नागपफनी घर आई, तुलसी का विरवपा जंगल में
तब से मेरी चुभन नई है, उखड़ी सी हर सांस नई है
नागफनी पर गीत लिख रहे, छन्द लिख रहे नये अकवि हैं
तुलसी का सूना बृन्दावन, नई उदासी नया दर्द है….।’’
हताशा, निराशा, अभाव और संघर्षों के बीच भी उप्रेती दुधर््र्ष जिजीविषा के साथ कुछ नया करने की चाह रखते हैं। उनके इस दर्शन को ‘मेरा हर दिन नया वर्ष है’ कविता रूपायित करती है।
मुक्तिबोध् की फंतासी और नागार्जुन का लोक जीवन का चित्राण कवि की अंधेरे ने निगल लिया’ कविता में एकत्र एकसाथ अन्तर्भूत-सा लगता है। और यह भी कि दलित-दुर्बल-दीन-हीन के साथ सूरज भी छल करता है-
‘‘लाख मशालें लिये ढूंढता रहा आसमान
रमजनियां बरसतिया की झोपड़ी में
फुटपाथ पर लेटे
अनाम दुदमुंहे छोरे के सूखे होंठो में
किसी बहसी दरिन्दे द्वारा
उघेड़ी लिजलिजी टागों में
उसे सूरज नहीं मिला
मशालें बुझा कर
थका-हारा सोने को ही था आसमान
ठगिनी के अड्डे से सूरज बाहर निकल आया….’’
पर सूरज के उगने की बलवती आशा कवि को कमजोर नहीं पड़ने देती। ‘वातायन के बंद न कर तू द्वार बावरी’ कविता गीतात्मकता एवं ग्राम्य चित्रण की दृष्टि से नागार्जुन की कविताओं की टक्कर की है। ‘बिदका हुआ सांड’ में कवि ने सांड को निद्र्वंद्व अराजक गुण्डे के और तितली को आम आदमी के नव्य प्रतीक के रूप में चित्रित किया है। कुछ कविताएं स्वार्थलिप्सु, अपना घर भरने वाले लोभी डाॅक्टरों पर लिखी गई हैं। कुछ समर्थ लोग ‘दिशाहीन सूरज’ को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं। कुछ कविताएं सम्वाद करती-सी लगती हैं। इनमें ‘कब्र का हाल’, ‘आसमान कहाँ है?’ आदि उल्लेखनीय हैं। सामयिक परिवेश के जीवंत चित्राण की दृष्टि से ‘बोलना छोड़ दिया है’ कविता छोटी होते हुए भी प्रभावशाली है। बसंत में मिनिस्टर के दौरे के कारण कोयल तक बोलना छोड़ देती है। असहिष्णुता के माहौल में दहशतजदा लोग व्यर्थ की अफवाहों से खौपफ के मंजर में जिन्दगी बसर करते हैं, पर कवि हताश नहीं होता। आक्रोश है, किन्तु आशा भी कम बलवली नहीं, कवि को हँसती धूप का जमीन में उतर आने का इंतजार है।
कवि नए प्रतीकों के द्वारा वन बिल्लों के शाकाहारी होने और तुलसी के वृंदावन में नागफनी के पलने की बात स्वीकार करता है। वह पत्रकार के व्यंग्य-कौशल को कविता में प्रविष्ट करा कर उसे और धरदार बना देता है। प्रजातंत्रा में वैयक्तिक स्वातंत्रय और अध्किारों के बदले सौदेबाजी को लेकर वह तंज है, आज शेरों के बाड़े में ‘कुत्तों का पहरा’ है। भगतसिंह को याद करते हुए वह वर्तमान प्रजातंत्र पर सवाल खड़े करता हुआ कहता है कि आज भगतसिंह होते, तो वे डाकू और आतंकी घोषित होते और जेल में होते। आज लोग जिन्दा लाश हो गए हैं। उनमें दीन-ईमान शेष नहीं रह गया है, न प्रतिरोध् की कोई ताकत रह गई है। ‘भ्हगत सिघा’ कविता में आज के नेताओं पर व्यंग्य किया गया है। खण्ड-एक की कविताओं में श्रृंगार तिरोहित-सा है।
खण्ड-दो की पहली कविता ‘प्रेरणा’ है। इस कविता के आधर पर ही प्रस्तुत संग्रह का नामकरण किया गया है। गीत-योजना एवं विरहाकुल भावाभिव्यंजना की दृष्टि से यह कविता महादेवी वर्मा की कविताओं का स्मरण दिलाती है। प्रिय की पे्ररणा दग्ध्-अंगारों में चल कर कवि के कर्मपथ की राह प्रशस्त करती है। इस खण्ड की कविताओं में भावप्रवणता का अतिरेक दिखता है। प्रकृति में कवि मिलन के दृश्य देखता है, उसके कल्पना-प्रसून प्रकृति के उपवन में ही खिलते हैं, वह ‘प्रेम का भूखा’ है। ‘हलचल’ आदि कई कविताओं में छायावादी भावाकुलता दिखती है, साथ जीवन-सत्यों का उद्घाटन भी होता है। मांसलता और भोग के प्रति सावधनी भी बरती गई है। ‘कौन यह बाला’ एक लम्बी प्रेमपरक प्रबन्धात्मक कविता है। इसमें इंदु-बाला का रूपक बांधते हुए कवि ने सूर्य और इंदु के प्रेम को व्यंजित किया है, चाँदनी के पट से नभ रूपी सेज पर वह प्रिय सूर्य को निहारा करती है। वसुध, उषा, संध्या, रात्रि आदि का मानवीकरण कर कवि द्वारा इन सबका मनोहारी वर्णन किया गया है। कवितांत में नित्य मिलन की आशा में दो प्रेमी हृदय नित्य प्रतीक्षा में रहते हैं। क्या इन प्रेमियों का कभी मिलन होगा? क्या सूर्य का आत्म-समर्पण सार्थक होगा? इसका उत्तर पूरी कविता को पढ़कर ही मिलता है। कवि का विश्वास है कि जीवन में प्यार ही सब कुछ है, संसार की सम्पूर्ण शान्ति प्यार में ही निहित है। यह प्यार केवल प्रिय-प्रिया का प्यार नहीं अपितु प्यार के वृहत्तर अर्थ को व्यंजित करता है। विछोह, प्रियतम से मिलन की आकांक्षा, नयनों का व्यापार- उन्मीलन- निमीलन सुखद प्रेम की मध्ुर स्मृति की व्यक्तिनिष्ठता समष्टिगत प्रेम में पर्यवसित होकर उदात्त रूप ग्रहण कर लेती है। तब कवि ओज और वीरता के भावों से ओतप्रोत होकर ‘होइए तैयार’ कहता राष्ट्र प्रेम के गीत गा उठता है-
देखंे कौन हमारे सन्मुख
अब पल भर भी टिकता है।
हम सपूत, इस पावन-भू पर-
बलिदानी बेड़ा उठता है।
इस हरित-धरा के शुभ्र-क्रीट पर
आघात वक्ष पर झेले हैं।
बलिदानों के खिलवाड़ हुए नित
तन मिट्टी से मिले हुए हैं।
मनुष्य के विकास की कहानी केवल भौतिकजन्य ही नहीं, सचेतन भी है। अपने समाज के चैतन्य का जागरूक प्रहरी साहित्यवेत्ता ही होता है। वह मनुष्य मात्र को जागरण संदेश देता है, साथ ही मनुष्य की अन्तर्दृष्टि जगाने का आह्वान करता है। उप्रेती की ‘खोल रे कपाट खोल’ कविता इसी सत्य को समुद्घाटित करती है। कवि प्रकृति के आलम्बन चित्राण को माध्यम बना कहता है-
‘‘खोल रे कपाट खोल
रे मनुज कपाट खोल,
लाल हो उठे कपोल-
भोर के विभोर छोर।
तम दिया झकोर घोर
नागरी उषा विभोर।’’
क्षणभंगुरता यदि क्षणिक और सुगंध् प्रफुल्लता प्रदान करे तो वह आनन्द कई जन्मों से भी श्रेष्ठ है। कवि की खण्ड-दो की कविताएं गम्भीरता, उदादत्ता, संप्रेषणीयता एवं भाव-सौंदर्य की दृष्टि से अधिक अर्थपूर्ण हैं। ‘तम हृदय कगार पर’ जलद-नयन उमड़-घुमड़ कर विद्युत दीप बुझा देते हैं, पर ‘बचपन की याद’ अल्हड़ता की सुमधुर स्मृतियों का स्मरण करा जाती हैं। ‘कलियों की चाह’ के बहाने किशोर और युवा हृदय खिल उठता है, मन-भ्रमर पिंग पराग के लिए पुष्प-पुष्प पर जाकर डोलने लगता है। ‘जैसे सैंध् लगाने चल बैठा हँू’ थोड़ी लम्बी कविता है। इसमें सूर्य का मानवीकरण और आलम्बन चित्राण हुआ है। निशि सूर्य से उषा सुन्दरी की माँग भरवाती है। शशि, उषा पात्रा के रूप में कविता चित्रित है। कविता में सम्वाद, अलग-अलग स्थान, स्थितियां और बिम्ब चलचित्र की भाँति देखते ही बनते हैं।
वस्तुतः कविता मानव के सुख-दुखात्मक जीवन की जीवित अनुभूति का मूर्त रूप होती है, सम्वेदन ही व्यक्ति के अंतःकरण से सामंजस्य स्थापित कर उसे हृदयग्राही बनाते हैं। ‘एक भारतीय सैनिक की आत्मा’ कविता इसी प्रकार के संवेदनों से संवेदित है। यह राष्ट्रीयता एवं देशभक्ति से परिपूर्ण एक प्रभावशाली कविता है। चीनी चैकी पर तैनात सैनिक अपनी परिवेशगत स्थिति का चित्रण करता अपनी वृद्ध माँ को एक भावपूर्ण पत्रा लिखता है। यह कविता सैन्य-जीवन की एक बलिदान गाथा है। एक सैनिक किन विषम परिस्थितियों में सीमा पर अटल प्रहरी बन कर देश की रक्षा करता है, इसका चित्रण करते कवि लिखता है-
‘‘पर्वत की चोटी पर
छोटा सा टैण्ट है
बहता समीर झकझोर कर-
जाड़ों का,
हिलता है टैण्ट तो,
हिल जाता दिल भी
काँपते हैं हाथ
काँप जाती लेखनी भी।
वह वृद्ध माँ, तरुणी पत्नी को अपना अन्तिम बलिदानी ओजपूर्ण सन्देश इस प्रकार भेजता है-
‘‘होगा कलंकित
कैसे तुम्हारा दूध्,
जब तक तुम्हारा पूत
जीता जगत में।
यह एक उदात्त प्रबन्धत्मक लम्बी कविता है, जिसे भाषा, भाव और वर्णित लय की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद की ‘शेर सिंह का शस्त्र समर्पण’ कविता के समकक्ष रखा जा सकता है।
‘कविते तेरा साथ न होता’ इस खण्ड की एक अन्य महत्वपूर्ण कविता है, जिसमें काव्य की व्यापकता और उसका महत्व प्रतिपादित करते हुए कवि कहता है- फूलों में मध्ु व सुवास, शशि में प्रकाश, वन में मध्ुट्टतु, कलियों में विकास, सरिता में लहर, सागर में उछाह, निर्झर में नीर, यौवन में सौन्दर्य, वनस्पतियों व फूलों में रंग, पपीहे की ‘पिउ’, कोयल की मल्हार सब कविता के कारण ही- उसके सानिध्य में ही सम्भव हुई है। कविता न होती, तो विहँसती भोर, सरसों का स्पंदन, सम्पूर्ण जगत का व्यापार और मनुष्य में मनुष्यता कुछ भी न होती। इस कविता में जीवन की समग्रता में कविता का मूल्यांकन हुआ है।
‘किसान बाला’ सुमित्रानन्दन पन्त की ग्राम्य बाला जैसी सुन्दर, सरल हृदय युवती का चित्राण है। यह एक लम्बी प्रबन्धत्मक कविता है। अभावग्रस्त होने पर भी कवि ने जीवन को सबसे मध्ुमय, सबसे सुखमय माना है। कवि ‘किसान बाला’ का चित्राण इन शब्दों में करता है- ‘‘गेहँू की बाली बोल उठी-
‘तू सजल सरोवर में विकसे,
मकरन्द, कुमुदनी की सारी,
तू बता कौन है इस जग में,
तुम सी पुनीत सुन्दर नारी?
फूलों की शैय्या पर सोना,
क्या इस को ही कहते जीवन?’’
कली खिल कर जैसे फूल बनती है, वैसे ही उस युवती का स्वप्न तब साकार होता है, जब वह एक सैनिक की पत्नी बनती है। उसके समस्त अभाव भावों और सारे दुख, सुखों में पर्यवसित हो जाते हैं। ‘नयनों का व्यापार यहाँ’ कविता में कवि ने जहाँ एक ओर छलना एवं प्रवंचना को चित्रित किया है, वहीं यह भी प्रतिपादित किया है कि समस्त भोगलिप्साएं इहलोक तक ही सीमित रह जाती हैं। ‘ताजमहल’ कविता में प्रगतिवादी जीवन मूल्यों का चित्राण करते हुए कवि साहिर लुधियानवी की तर्ज पर कहता है कि यह पे्रम का प्रतीक नहीं शोषितों के खून पसीने के गारे और बेगारी से बना भवन है, जिसमें सैकड़ों गरीबों की आह दबी है। शाहजहाँ के इस कथन में कविता अपनी चरम परिणति को प्राप्त करती है-
‘‘ताज को बना करके,
मैंने जो पाप किया,
मुझ सा अधम-नीच
जग में न कोई है,
मेरी मुमताज आज
ताज में ही सोई है,
दिल में यदि होती तो
ताज क्यों बनाता मैं?’’
कविता में शाहजहाँ और मुमताज के सम्वाद उसे गत्यात्मक और नाटकीय बना देते हैं। ‘हे पूज्यनीय’ कविता विश्वप्रसिद्ध भाषाविद् डाॅ.हेमचन्द्र जोशी को समर्पित है। व्यक्तिनिष्ठ होने पर भी इस कविता में डाॅ.जोशी का स्मरण करते हुए कवि ने भाषाविद् और आलोचक का क्या दायित्व है, इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि सच्चा समीक्षक ही लूले-लँगड़े साहित्यकारों को सहारा देकर उन्हें चलना सिखाता है। आलोचना की मध्ुरिम छाया में ही साहित्यकार भाषा की औषधीय घुट्टी पीकर बड़े होते हैं।
कविता न दार्शनिकों के दर्शन का विषय है,न अर्थशास्त्रिायों का यथार्थ। सत्य के समुद्घाटन, सौंदर्य के प्रस्थापन के साथ ही वह शितत्व का मार्ग प्रशस्त करती है, ‘आ अब उजली राह बना दे’ कविता मेें इसीलिए कवि प्रकाश को पुकारता है, जिससे मानवता की राह उज्जल हो सके।
‘प्रेरणा’ संग्रह के काव्य-शिल्प पर कुछ कहना प्रासंगिक होगा। इस संग्रह की कुछ कविताएं गीतात्मक हैं और कुछ मुक्त एवं गद्यच्छंद में निब( हैं। सरसी, ताटंक, वीर, पदपादाकुलक, मनोरमा आदि पारम्परिक छन्दों और उनकी लयों में कविताएं विन्यस्त हैं। गद्यच्छंदों में पद-मैत्राी और अर्थलय निहित है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि सादृश्यमूलक अलंकार कविताओं में प्रकृतितः समाविष्ट हो गए हैं। भाषा तत्समबहुला है, पर जन-प्रचलित अरबी-फारसी के शब्द भी प्रयुक्त हुए हैं। लाक्षणिकता भी पर्याप्त है। अवसरानुकूल मुहावरों और कहावतों का सटीक प्रयोग हुआ है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उप्रेती जी ने जितनी ईमानदारी से अन्य विधाओं में सर्जना की है, उतनी ही ईमानदारी कविता रचना में भी दिखाई है। यश और अहंमन्यता से परे उनका समग्र व्यक्तित्व ही इन कविताओं में प्रतिफलित होता लगता है। वे एकाएक इतनी जल्दी और खड़े-खड़े हमारे बीच से चले गए, पर उनकी ‘प्रेरणा’, उनका सर्जन, हमेशा हमारा और हमारे समाज का पथ आलोकित करता रहेगा। उनकी रचनाओं के बहाने इन शब्दों में श्रद्धा-सुमन व्यक्त करते हुए मैं इस अवसर पर उन्हें नमन करता हँू। डाॅ.पंकज उप्रेती को साधुवाद देता हँू कि ‘प्रेरणा’ संग्रह के रूप में स्व.उप्रेती जी की कविताओं का विग्रह सम्मुख आया। आशा करता हँू, यह कविता संग्रह हिन्दी जगत में समादृत होगा।

पिघलता हिमालय 22 फरवरी 2016 के अंक में ‘पेरणा’ पुस्तक की समीक्षा

तिब्बत के दर्चिन में थी हमारी छोटी सी दुकान

कैप्टन रतन सिंह टोलिया से बातचीत

पिघलता हिमालय प्रतिनिधि
यदि लगन हो तो हम किसी भी कार्य में सफलता पा सकते हैं और समाज में योगदान लायक बन सकते हैं। पहले जब साधन नहीं थे, लोग ज्यादा परिश्रम करते थे। उनका श्रम उन्हें लक्ष्य तक पहँुचाता। ऐसे ही श्रमशील परिवार के सदस्य हैं 79 वर्षीय कैप्टन रतन सिंह टोलिया। मूल रूप से टोला, जोहार के टोलिया जी का जन्म भैंसकोट ;नाचनी के निकटद्ध में हुआ था। इनके पिता जीत सिंह जी 6 भाई हुए- मानसिंह, किशनसिंह, नैनसिंह, जीतसिंह, हयातसिंह माधे सिंह। अपने इलाके में 32 लोगों का संयुक्त परिवार मुख्यतः व्यापारियों का परिवार था। तिब्बत व्यापार के साथ आन्तरिक व्यापार के लिये परिवार के बुजुर्गों ने मजबूत नींव डाल रखी थी।
जोहार नगर, भोटिया पड़ाव, हल्द्वानी निवासी रतन सिंह जी अपने बचपन का स्मरण करते हुए बताते हैं कि माइग्रेसन में उनका स्कूल भी साथ-साथ चलता था। भैंसकोट, साईं, टोला में उनका प्राइमरी स्कूल चलता था। कक्षा चार की पढ़ाई नाचनी में दी, पंडित बासुदेव जी ने परीक्षा ली थी। मीडिल की पढ़ाई शेर सिंह टोलिया के संरक्षण में डीडीहाट से की। वह बताते हैं- ‘‘कक्षा आठ की पढ़ाई करके अपने ग्राम टोला गया था। व्यापारी परिवार का होने के कारण बड़े व्यापार में जुटो, तिब्बती भाषा का ज्ञान भी लो। मेरा मन पढ़ाई का था। एक दिन घर के सब सयानों के सामने मैंने झोला पकड़ा और जाने की बात करते हुए निकल पड़ा। टोला से पैदल बोगड्यार पहुंच कर रात काटी। शान्त एकान्त रात में डाक लिया हलकारा पहुंचा, वही मेरा साथ था। अगले दिन बरम रुका और फिर नारायण नगर पहुंच गया। जहाँ मेरे मित्र दलजीत सिंह वृजवाल ;स्वतंत्राता सेनानी त्रिलोक सिंह के सुपुत्र और भीमसिंह वृजवाल ;पांखू में निवास कर रहे हैं। मिल गये। नारायणनगर से हाईस्कूल किया’
रतन सिंह जी का सन् 1954 में नानासेम मुनस्यारी के माधो सिंह पांगती की सुपुत्री नन्दा से विवाह हुआ।
टोलिया जी व्यापार के पुराने दिनों की बताते हैं- ‘‘सन् 1954 में पिता के साथ तिब्बत गया। दर्चिन में हमारी छोटी सी दुकान थी। 2-3 माह के लिये वहाँ जाया करते थे। हमारे तिब्बती मित्रा व्यापार के लिये इन्तजार करते थे। दर्चिन में अपनी दुकान से आगे तिब्बती मित्र के गोम/घर वहाँ जाकर उन काटने का काम भी किया। उनका टैंट वाला घर चवर गाय के वालों का बना था, जो गर्म था। वहाँ से उन लेकर अपनी दुकान पर लौटा। बाद में सामान जमा होते ही हम लोग टोला वापस आ गये।’’
व्यापार के इस अनुभव के बाद रतन सिंह पुलिस में भर्ती हो गये। इनके ताउ रतन सिंह टोलिया ने देहरादून में इन्हें भर्ती में मदद की। लेकिन इस समय सन् 55-56 में एक दिन इन्हें टेलीग्राम आया कि पिता जीतसिंह और बड़े भाई उमराव सिंह लकड़ी काटने गये थे, भूस्खलन से मौत हो गई है। इस दुखभरे समाचार के बाद टोलिया जी नौकरी छोड़ घर आ गये। बाद में नौकरी की तलाश में निकले और चकराता में पफौज के एक धर्मगुरु से भेंट हुई। गोरखा बटालियन में कर्नल मानसिंह से उन्होंने रतन सिंह के बारे में बताया और यह भर्ती हो गये। सिपाही से भर्ती होेकर अथक श्रम करते हुए प्रमोशन पाने वाले टोलिया जी बटालियन के ट्रेनिंग सेंटर में शिक्षक की भूमिका में भी रहे। सन् 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई के समय इनकी तैनाती स्यालकोट थी। अपने परिवार के साथ यह लोग स्यालकोट थे। ट्रेनिंग के बहाने इन्हें युद्ध में भेज दिया गया। इनका और इनके जैसे अन्य फौजियों के परिवारों ने काफी नजदीक से सीमा पर गोलाबारी की आवाजें सुनी और धुंआ देखा। इनकी कार्यशैली को देखते हुए आनरेरी कैप्टन के रूप में इन्हें सम्मान मिला। टोलिया जी अपनी यादों के साथ स्वस्थ्य रहें, कामना है।

पिघलता हिमालय 17 सितम्बर 2018 से