पिघलता हिमालय’ का जन्म 1978 को हुआ। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती व स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया इसके संस्थापक हैं। स्व.आनन्द बल्लभ उप्रेती संस्थापक के साथ ही इसके प्रथम सम्पादक रहे जिन्होंने पत्रकारिता के मिशन के साथ इसे सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन का रूप दिया।
त्रिलोक सिंह वृजवाल से बातचीज डॉ. पंकज उप्रेती समाज को आगे ले जाने के लिये निरन्तरता जरूरी है। नियमित ठहराव के साथ जुटने वाले विशिष्ट लोगों में से श्रीमान त्रिलोक सिंह वृजवाल का नाम उल्लेखनीय है। अपने लक्ष्य को और बढ़ा करते हुए इन्होंने जिस प्रकार की संरचना अपने समाज के लिये की उसके पीछे आर्थिक सुदृढ़ता और जरूरतमंदों को सहयोग का भाव रहा है। पिघलता हिमालय परिवार के संरक्षक सदस्यों में शामिल श्री टी.एस.वृजवाल के दादा पान सिंह वृजवाल हुए। इनकी अगली पीढ़ी में राजेन्द्र सिंह, राम सिंह, रक्षपाल सिंह, तेज सिंह, विजय सिंह, केशर सिंह भाई हुए। भाईयों में सबसे छोटे विजय सिंह की अगली पीढ़ी के हैं- त्रिलोक सिंह। माता श्रीमती गंगोत्री देवी और पिता विजय सिंह के घर जन्म लिया- त्रिलोक सिंह और धीरेन्द्र सिंह ने। पिघलता हिमालय परिवार के संरक्षक रहे स्व.उमेद सिंह मर्तोलिया की बहन हुईं इनकी माता श्रीमती गंगोत्री देवी। रिश्तों के इन ताने-बाने के बीच मुनस्यारी के ग्राम राछूसैन, मल्लाघोरपट्ा में 6 अपै्रल 1952 को जन्मे त्रिलोक सिंह जी की इण्टर तक की शिक्षा मुनस्यारी में ही हुई। वह बताते हैं कि गाँव का बचपन और सयानों का संरक्षण सबके लिये कारगर हुआ। इण्टर के बाद अल्मोड़ा से उच्चशिक्षा के साथ बीएड करने वाले श्री वृजवाल जी एलटी शिक्षक हो गये। नाचनी और डोर में अध्यापक के रूप में रहते हुए इनकी तैयारी जारी थी। 1978 में कपकोट में बीडीओ के रूप में तैनात हुए। समय के साथ प्रोजेक्ट डाररेक्टर के रूप में इन्हें चमोली जाना हुआ। फिर अल्मोड़ा में इसी पद पर रहे। इसके बाद डीडीओ नैनीताल का पदभार इनके पास रहा और फिर ढाई साल तक चम्पावत में मुख्य विकास अधिकारी के रूप में रहते हुए अप्रैल 2012 में सेवानिवृत्त हुए। अपनी राजकीय सेवाओं के दौरान समाज में सजग वृजवाल जी अपने समय में बेहतरीन खिलाड़ी भी रहे हैं। बताते हैं- मुनस्यारी में खेल को उत्सव की तरह मनाने की परम्परा रही है और वह अपनी टीम के गोलकीपर बनते थे। ह्यून बर्फबारी के दिनों में भी खेल का जुनून सभी खिलाड़ियों में था। बचपन की झुंझली यादों को ताजा करते हुए बताते हैं कि व्यापार और खेतीबाड़ी ही लोगों का जरिया था। चीन के साथ 1962 के युद्ध में जब तिब्बत व्यापार टूटा तब जोहार सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। क्योंकि धारचूला के करीब नेपाल होने से और गढ़वाल में चारधम यात्रा से व्यापार की गति प्रभावित होते हुए भी रुकी नहीं जबकि जोहार एकदम अलग-थलग हो गया था। सन् 1970 से 90 तक कापफी लोग सेवाओं के लिये इधर-उधर गए। आरक्षण का यूपी में दो प्रतिशत लाभ था। पहाड़ की आर्थिक व्यवस्था तब भी मनीऑर्डर पर टिकी थी। जिन घरों में नौकरी-पेशा वाले थे, मनीऑर्डर भेजते थे। समाज के उतार-चढ़ाव को जीने और महसूस करने वाले वृजवाल जी ने अपने साथियों के साथ ‘जोहार सहयोग निधि’ की कल्पना की और अल्मोड़ा में सौ-सौ रुपये प्रतिमाह जमा करते हुए एक निधि बनाई। 2004 में जोहार सहयोग निधि अल्मोड़ा नाम से संस्था का सहकारिता एक्ट में रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया गया। यह संस्था आज कीर्तिमान के रूप में खड़ी है जिसमें दो करोड़ से अधिक की राशि होगी। इसके द्वारा मेधावी विद्याथर््िायों को सहयोग के अलावा जरूरतमंदों को अवसर के अनुरूप हाथ बंटाया जाता रहा है। अल्मोड़ा में संस्था का अपना भवन होना भी सुखद है। शुरुआत में जोहार सहयोग निधि कार्यालय के लिये किराए पर कमरा लिया गया था जिसका किराया भी इसके संचालक स्वयं ही अपनी-अपनी ओर से देते थे। आज इस निधि का एक बड़ा आकार होना बताता है कि कितनी दौड़भाग इसके लिये हुई थी, जो आज भी है। श्री वृजवाल के सामाजिक कार्यों में इनके परिवार का हरदम सहयोग रहा है। इनका विवाह गीता देवी से हुआ। हिमनगरी मुन्स्यार के दुकानदार गोविन्द सिंह पांगती व श्रीमती इन्द्रा देवी घर जन्मी श्रीमती गीता 6 बहनें व 2 भाई हैं। इस परिवार के अरविन्द पांगती संयुक्त सचिव, हरीश पांगती मर्चेन्ट नेवी में हैं। त्रिलोक सिंह जी की अगली पीढ़ी को देखें तो इनकी सुपुत्री प्रीति रावत नोएडा में हैं, जमाई श्री नवीन सिंह रावत कस्टम में हैं। वृजवाल जी के सुपुत्र राजेश सिंह और मनीष सिंह वृजवाल हैं। अपने घर और समाज में सयाने की भूमिका श्री टीएस वृजवाल में हमेशा से सुमार होना बताती है कि वह कितनी कर्मठता से तत्लीन रहते हैं। उनकी यही निरन्तरता उन्हें भीड़ से अलग करती है और दूसरों को भी प्रेरणा देती है कि किसी भी स्थिति में कर्मशील रहना है।
गोविन्द सिंह जंगपांगी से बातचीज डॉ.पंकज उप्रेती किसी भी समाज को बनाने के लिये यादों के अलावा समर्पण जरूरी है। अपने समाज के लिये ऐसे ही समर्पित हैं श्रीमान गोविन्द सिंह जंगपांगी। वरिष्ठ नागरिक के अलावा ‘बूबू’ के रूप में प्रतिष्ठि जंगपांगी जी की बात करें तो जोहार के पदम सिंह जंगपंागी के पुत्र हुए मान सिंह जंगपांगी। पिता मानसिंह और माता श्रीमती चन्द्रा देवी के घर गोविन्द सिंह व मंगल सिंह ने जन्म लिया। 3 मार्च 1949 को बुर्फू में जन्मे गोविन्द सिंह सीमान्त के जिस दुरुह क्षेत्र से आते हैं उतनी ही गहराई उनके व्यवहार में है। बचपन की पढ़ाई दरांती ग्राम में हुई। माइग्रेश के रूप में जब-जब परिवारों की यात्रा होती इनका परिवार भी बुर्फू से दुम्मर आता। बुपर्फू, दरांती के अलावा अपने मामकोट छिनका, गढ़वाल में शिक्षा दीक्षा के बाद अल्मोड़ा कालेज से पढ़ने वाले गोविन्द सिंह जी सन् 1071 में आर्मी में भर्ती हो गए। 6 साल तक सेना की सेवा के बाद ओरिएंटल इंश्योरेंश कम्पनी लि. में इनका प्रतिभा का लाभ मिला। मार्च 2009 में डिविजन मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त होने वाले ‘बूबू’ जी ने समाज में अपनी सक्रियता को बरकरार रखा है। बुर्फू से जंगपांगी परिवार मल्ला दुम्मर, भकुण्डा, इमला में रहने लगे थे। अपने बचपन की यादों में डूबते हुए गोविन्द सिंह बताते हैं- बचपन का एक खेल था केले/कदली के पेड़ की डंठ्ल में द्यार डालकर उसे जलाते हुए लालटेंन जलाते थे। परिवार ह्यून/जाड़ों में भकुण्डा आ जाता और गर्मी में बुर्फू जाता था। तिब्बत व्यापार की अवसर इन्हें नहीं मिला लेकिन वह यादें इनके साथ जुड़ी हैं जब व्यापारी तिब्बत जाते थे और वहाँ से भी आने वाले जोहार आते थे। वह बताते हैं जिस प्रकार ब्राह्मणों के जजमान होते हैं उसी तरह तिब्बती मित्रों यहाँ के लोगों से सम्पर्क था यानी अपने-अपने घनिष्ट परिवार मित्रों के पास उनका आना-जाना था और तिब्बत लौटते समय वह उपहार स्वरूप हुनकारा तिब्बती बकरी परिवार को देकर जाते थे। हुनकारा की यादें भुलाए नहीं भूलती जब लोगों में परस्पर मेल होता था। वास्तव में श्री जंगपांगी जी की बातों का मर्म यह बताता है कि दुर्गमता के रास्तों में राहें तब भावना हो और समाज के लिये कुछ करने की ललक। अपनी सेवाओं के दौरान समाज और मित्रों के लिये समर्पित रहे गोविन्द सिंह जी सेवानिवृत्त के बाद भी बेहद सक्रिय हैं और उनकी कोशिश हमेशा जोड़ने की रही है। मल्ला जोहार में होने वाली हरि प्रदर्शनी से लेकर अन्य तमाम आयोजनों पर ठोस कार्य के पक्षध्र श्री जंगपांगी जी पिघलता हिमालय परिवार के भी भी संरक्षक रूप में रहे हैं। उनसे हुई भंेटवार्ता केवल समाचार विचार तक सीमित नहीं बल्कि उन पुरानी यादों को ताजा करना भी है जिससे नई पीढ़ी को उन पुराने दिनों की याद आ सके जब गर्मी-जाड़ा-बरसात में यात्राओं के बीच निकलने वालों ने अपने रास्ते हमेशा सच के साथ बनाए और बहुत ही ईमानदारी से रिश्तों को निभाया। श्री जंगपांगी प्रतिवर्ष मल्ला जोहार हरि प्रदर्शनी के लिये भी तत्परता से जुटते हैं और यत्र-तत्र निवास करने वाले प्रवासियों की टोह भी लेते हैं ताकि वह समाज के प्रति जुड़ाव बनाए रखें। इनकी सहजता-सरलता समाज के प्रति समर्पण को बताता है। वाकेई समाज में इस प्रकार के सयानों का होना सुखदाई है जो स्थितियों को सम्भालते और रास्ते दिखाने का काम करें। इनके अनुभवों का लाभ नई पीढ़ी ने लेना चाहिये।
एन.सी.तिवारी से बातचीज डॉ.पंकज उप्रेती यह सच्चाई है कि सुख-दुःख के साथी और समय हर हमेशा मस्तिष्क में छाए रहते हैं। वर्तमान की दिखलावटी दुनिया में भले ही बहुत रंगीन नजारे खुशनुमा दिखते होंगे लेकिन इनकी रंगीनियत वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिए। जीवन के गहरे अनुभव और समाज में हमेशा सक्रियता निभाने वाले श्रीमान नवीन चन्द्र तिवारी (एन.सी.तिवारी) जीवन के उत्तरार्द्ध में भी समाज के लिये जीवट बने रहने का जोश अपने साथियों और युवाओं को दिलाते हैं। हल्द्वानी के जगदम्बानगर निवासी तिवारी जी की यादों में अल्मोड़ा से लेकर हल्द्वानी तक लम्बा सपफर है जिसमें नजारे बदले लेकिन नजर में वही हैं। बातचीज में वह कहते हैं- ‘दुर्गा-आनन्द स्मृतियों में हर वक्त हैं।’ ‘पिघलता हिमालय’ की स्थापना के समय और उससे पहले से ही इसके संस्थापक स्व.दुर्गा सिंह मर्तोलिया और स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती के साथ जिस प्रकार की प्रगाढ़ता इनकी रही है वह परिवार के सयाने की ही हो सकती है। अल्मोड़ा के शैल ग्राम निवासी श्रीबल्लभ तिवारी के सुपुत्र थे- कृष्णानन्द तिवारी। ये परिवार मूल रूप से सोमेश्वर के बेगनिया ग्राम का हुआ। माता दुर्गा देवी और पिता कृष्णानन्द जी के परिवार में 8 सन्तानें हुईं, जिनमें सबसे छोटे थे- नवीन तिवारी। 5 भाई 3 बहिनों में एन.सी.तिवारी बेशक छोटे रहे हों लेकिन अवसरों पर आगे बढ़ते हुए इन्होंने अपने रास्ते तय किये और सन् 1971 मंे इनका विवाह निर्मल जी के साथ हुआ। इनके परिवार में दो बेटियां प्रीति, संगीता (गुड़िया) और पुत्र विजय हुए। सभी गृहस्थ आश्रम के साथ अपनी परम्पराआंे से जुड़े हैं, जो उन्होंने श्रीमती निर्मल-श्री एन.सी.तिवारी से पाया। अल्मोड़ा से बीएससी करने के बाद तिवारी जी इलाहाबाद पढ़ने गये लेकिन स्कूल-कालेज की शिक्षा से ज्यादा व्यवहारिक शिक्षा में रमने वाले एन. सी.तिवारी के भाग्य में कुछ और ही था। अल्मोड़ा में पढ़ाई के दौरान उनके साथियों में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी थे। यह विज्ञान वर्ग में थे जबकि मर्तोलिया कला वर्ग में। वह बताते हैं- ‘हमारे ग्राम शैल के प्रतिष्ठि व्यापारी नारायण तिवारी जी ने अल्मोड़ा के जिस जगह पर देवालय बनाया, उस स्थान को नारायण तिवारी देवाल बाजार कहने लगे और धीरे-धीरे एनटीडी नाम प्रचलित हो गया। इसी क्षेत्र में सीमान्त क्षेत्रा के व्यापारी आते थे और यही जोहारी भाईयों का मुख्य केन्द्र था। ज्यादातर डॉ.दरवान सिंह के आवास पर भी रहते थे। बाद में और ज्यादा विस्तार हुआ। सन् 1947 में रिफ्रयूजी भी इस क्षेत्र में आकर बसने लगे थे। इनके स्कूल के साथी गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, बीरशिवा स्कूल के संस्थापक एन.एन.डी.भट्ट, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, दरवान सिंह, उत्तम सिंह वहीं मिले थे। उस दौर में पढ़ाई के बाद ज्यादातर शिक्षक बने और फिर उच्चपदों पर आसीन रहे। हल्द्वानी दोनहरिया निवासी लक्ष्मण निवास का नाम हमेशा से अग्रणीय रहा है इस परिवार के बाला सिंह, सत्यवान सिंह जंगपांगी, सेल्सटैक्स कमिश्नर पुष्कर सिंह, जज उत्तम सिंह पांगती, दुर्गा सिंह अच्छे साथी रहे हैं।’ इण्टर के बाद इलाहाबाद पढ़ाई गये तिवारी जी अधूरी पढ़ाई से जब लौटे तो कुछ महीने कौसानी में अध्यापकी करने लगे। इसके बाद बिड़ला मिल सिरपुर कागजनगर, आन्ध्रप्रदेश मेें अपने बड़े भाई के पास चले गये जो बिरला कागज फैक्ट्री में थे। 1938 में स्थापित भारत की सबसे पुरानी यह पेपर मिल्स को हैदराबाद मिर उस्मान अली खान द्वारा स्थापित किया गया था। 1950 में बिरला परिवार ने इसका अधिग्रहण किया और 2018 में जे.के. पेपर लि. ने इस मिल का अधिग्रहण कर लिया। बिरला की इस फैक्ट्री में एन.सी.तिवारी क्वालिटी कन्ट्रोल का काम देखने लगे, कुछ समय बाद पेपर मैकर बन गये। सन् 1968 में मशीन में दुर्घटना होने के बाद इन्होंने विचार बदला और अपने गाँव से इतनी दूर आ चुका हँू, भाई भी यहीं है, क्यों न घर चल जाउँ। फिर से शैल ग्राम अल्मोड़ा आ गये। कुछ दिन रुकने के बाद हल्द्वानी का रुख किया। अल्मोड़ा में जहाँ इनकी मुलाकात दुर्गा सिंह मर्तोलिया से हुई थीं वहीं हल्द्वानी में आनन्द बल्लभ उप्रेती से हुई। तब तक ‘पिघलता हिमालय’ अखबार के बारे में चिन्तन नहीं हुआ था। हल्द्वानी में स्वरोजगार के क्रम में यह अपने को आजमाते रहे और सफल नहीं हो रहे थे। खुली चाय का कार्य भी किया लेकिन इसका प्रचलन न होने से उसे छोड़ पेपर एजेंसी ले ली। अनुभव तो था लेकिन दूर-दूर तक उधरबाजी से इस काम को भी बन्द कर दिया। उन दिनों में आनन्द बल्लभ उप्रेती का छापाखाना ‘शक्ति प्रेस’ खुला और वह पत्रकारिता में पहले से सक्रिय थे ही। तिवारी जी बताते हैं कि युवाओं और गपोड़ियों के बैठने का अड्डा कालाढूंगी रोड स्थित ‘शक्ति प्रेस’ हुआ करता था। दाँतों के डाक्टर बी.सी.पन्त, वकील जीवन जोशी, सत्यवान सिंह जंगपांगी, पुष्कर सिंह जंगपांगी, लक्ष्मण सिंह डसीला तमाम लोगों का मिलना जुलना बराबर था। कुछ अन्तराल में दुर्गासिंह मर्तोलिया भी ‘शक्ति प्रेस’ में आए और उप्रेती जी के साथ एक प्रण सा हो गया कि अपना अखबार निकालना है। 1978 में ‘पिघलता हिमालय’ की शुरुआत हो गई। जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव सभी साथियों ने देखे और एक-दूसरे की परेशानियों को समझा-महसूस किया। तिवारी जी बताते हैं कि स्वरोजगार के क्रम में उन्होंने पहली बार सोपस्टोन इन्डस्ट्रीज की स्थापना कर डाली। छोटी मुखानी हल्द्वानी में 1973 में इसे स्थापित किया गया। बागेश्वर में खड़िया कार्य के शुरुआती दिन थे। बहुत मुश्किलों से तब खड़िया कारोबार का बाजार बना था, एक प्रकार से इसका परिचय ही हुआ। कुछ सालों तक सपफल कार्य करने के बाद तिवारी ने इस कारोबार को समेट दिया। आज भी छोटी मुखानी का वह क्षेत्र खड़िया फैक्ट्री नाम से ही जाना जाता है। अपने कारोबार और घर-परिवार के साथ कदम से कदम आगे बढ़ रहे तिवारी जी ने अपने साथियों और समाज की भलाई के लिये भी कदमताल कम नहीं की। होली हो या दीपावली उसकी रंगत बनी रहे इसके लिये इनका ध्यान पूरा था। वह बताते हैं कि हल्द्वानी में छोटा सा बाजार और दूर-दूर तक छिटके आवास थे। साइकिल से आना-जाना होता था और होली मिलने के लिये एक दूसरे के वहाँ अनिवार्य रूप से जाते थे, एक बार जेलरोड में पत्थरबाजी की घटना ने माहौल खराब किया था। पहाड़ की होली के लिये हीराबल्लभ पन्त जी के वहाँ सभी जुटते थे। रामपुर रोड में बालमुकुन्द तिवारी के घर में बैठकी होली के अलावा जगदम्बा नगर में इनके अपने आवास पर होली की बैठक जमती थी। रेंजर हीरा बल्लभ जी, रमेश चन्द्र, अल्मोड़ा से तारा प्रसाद ‘तारी मास्साब’, जगदीश उप्रेती ‘जग्गन’ से रातभर रागों में भरी होलियों सुनने को मिलती थीं। सामाजिक सरोकारों से जुड़े एन.सी. तिवारी जी जनमुद्दों को लेकर हमेशा अगुवाई करते रहे हैं। जमरानी बांध बनाने के आन्दोलन के क्रम में श्री नवीन चन्द्र वर्मा के साथ मिलकर इन्होंने पीआईएल तक डाली जिसमें विभाग को जुर्माना पड़ा था। व्यापारी हितों के लिये भी इनकी भागीदारी कम नहीं रही। वह बताते हैं कि सन् 1992 में अलीगढ़ में व्यापार मण्डल का सम्मेलन हुआ, तब बाबूलाल जी को कुमाउँ का प्रभारी बनाया गया और उन्हें कोषाध्यक्ष। पृथक पर्वतीय राज्य के बाद सन् 2001 में उ.प्र. से अलग होकर उत्तराखण्ड का व्यापार मण्डल बना। इसके लिये गाजियाबाद में यूपी के अध्यक्ष श्याम विहारी एमपी सहित तमाम साथी थे। उत्तराखण्ड व्यापार मण्डल के लिये रीषिकेश के यशपाल अग्रवाल अध्यक्ष, हल्द्वानी से बाबूलाल गुप्ता कार्यकारी अध्यक्ष, देहरादून से अनिल गोयल महामंत्री, नवीन वर्मा उप महामंत्राी, एनसी तिवारी कोषाध्यक्ष बने। राज्य आन्दोलन के दौरान अगुवाई करने वाले एन.सी.तिवारी कहते हैं- मुलायम सिंह का जमाना था और पुलिस का सख्त पहरा। आरक्षण विरोधी आन्दोलन में सुलग रहे युवाओं को जेल भेजा जा रहा था तब हल्द्वानी में छात्र अभिभावक संघर्ष समिति का गठन हुआ जिसमें वह सह संयोजक बने। इस बीच अज्ञात उत्तराखण्ड मुक्ति मोर्चा द्वारा इन्हें जान से मारने की ध्मकी तक दे दी गई। मानसिक तनाव व अन्य प्रकार से दबाव देने वाले तिवारी जी के पीछे लगे रहे लेकिन ये विचलित नहीं हुए बल्कि और सूझबूझ से कमान संभाली। राज्य आन्दोलन का स्वरूप बढ़ता गया और सारे सरकारी संगठन इस समिति से जुड़ गये। जब दिल्ली में प्रदर्शन की बात हुई तो शासन-प्रशासन का पहरा था। जाने की अनुमति नहीं थी, ऐसे में कोर्ट से चालीस बसों को ले जाने की अनुमति ले ली गई। वह कहते हैं कि पुलिस का इरादा था आन्दोलनकारियों को हल्द्वानी से आगे ही न बढ़ने दिया जाए। गढ़वाल में भी ऐसा ही हुआ और दिल्ली जा रहे आन्दोलनकारियों के साथ रामपुर तिराहा काण्ड हुआ था। हल्द्वानी मे भी रामपुर तिराहा काण्ड कराने की पूरी साजिश थी लेकिन किसी प्रकार पूरे आन्दोलन को सही दिशा दी गई और आन्दोनकारी युवाओं को बचाया गया। बातचीज में तिवारी जी पुराने दिनों को याद कर भावुक हो जाते हैं और कहते हैं- जितना किया बहुत था, अब नई पीढ़ी ने इस शहर और प्रदेश को संवारने में जुटना चाहिए। पिघलता हिमालय परिवार में संरक्षक की भूमिका रखने वाले श्री तिवारी के सुपुत्र विजय तिवारी भी सुलझे हुए युवा उद्यमी हैं और उन पुरानी परम्पराओं को अपने बचपन से समझते हुए आगे बढ़ रहे हैं। कामना है उनकी चाह सफल रहे।
स्वर्गीय त्रिलोक सिंह बृजवाल हमारे क्षेत्र के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका जन्म 17 सितम्बर 1903 को बिल्जू, जोहार के गाँव में श्री हिम्मत सिंह बृजवाल के घर में हुआ था। जो बचपन से ही जुझारू व समाज के प्रति समर्पित रहते थे। सेवा की भावना उनमें कूट कूट कर भरा हुआ था। ज़रूरतमंदों के लिए वे हमेशा तत्पर तैयार रहा करते थे। श्री त्रिलोक सिंह बृजवाल ने सन् 1936 में कांग्रेस संगठन में प्रमुख भाग लेना आरम्भ किया, सार्वजनिक सुधार-कार्यो में भी भाग लेते रहे। एक पुस्तकालय की स्थापना की। जिला कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। जिन्होंने 2 फ़रवरी 1941 को अंग्रेजों के खिलाफ तिरंगा उठाकर, स्थान तेजम में तहसील पिथौरागढ़ के नामक जगह से हमारे पहाड़ों में स्वतंत्रता आन्दोलन की नींव रख कर इस आंदोलन की अलख जला, प्रथम सत्याग्रही के रूप में सत्याग्रह किया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजवाल की हिम्मत व हौसला को देखकर एकबारगी अंग्रेज भी सकपका गये। उन्होंने इनको समझाने की बहुत कोशिश की पर वह नहीं माने। श्री त्रिलोक सिंह बृजवाल को देखने के लिए तेजम नामक स्थान में जन सैलाब उमड़ पड़ा था, अंग्रेजों ने त्रिलोक सिंह बृजवाल के हाथों से तिरंगा छुड़ाने की अथक कोशिश की पर वे छुड़ा नहीं पाये। लिहाज़ा उन्होंने बृजवाल को बुरी तरह से लाठी, डंडों व बूटों से पीट पीटकर अधमरा कर दिया। तत्पश्चात् गिरफ़्तार कर अपने साथ ले जाकर अल्मोड़ा जेल में डाल दिये। अल्मोड़ा जेल में उनको काफ़ी यातनायें दी गयी, जहाँ पर वे 7 जून 1941 तक रहे, तत्पश्चात् उनको बरेली जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। जहाँ वे 25 अगस्त 1941 तक रहे। उनके ऊपर आर्थिक दंड के रूप रुपया 150/- भी लगाया गया। तभी से तहसील सत्याग्रह संचालक का कार्य करते रहे। थल में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की। जब वे युवाओं को जागरूक करने के उद्देश्य से क्षेत्र के भ्रमण कर रहे थे व “अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन” को सफल बनाने के उद्देश्य से नामिक से दानपुर होते हुए अल्मोड़ा के राह में खाड़बगड़ स्थान पहुँचे थे तब उन्हें 10 अक्तूबर 1942 को खाड़बगड़ से गिरफ्तार कर पुनः जेल में डाल दिया गया था। वे 13 अक्तूबर 1942 से 22 जून 1943 तक अल्मोड़ा जेल में रहे उसके बाद उनको सीतापुर कारागार में स्थानांतरित किया गया, जहाँ वे 23 जून 1943 से 23 मई 1944 तक रहे, और उनको काफ़ी यातनायें देकर शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनपर अर्थदण्ड के रूप में जुर्माना भी लगाया गया था। वे जेल में रहते हुए भी नियमित रूप से सुबह ही सुबह स्नान इत्यादि कर, व्रत रखते थे। जेल में ही हर रोज गीता का पाठ नियमित रूप से किया करते थे। जो देश आजाद होने के पश्चात भी नियमित रूप से जारी रखा था। अल्मोड़ा ज़िले में तब उनका क्षेत्र जोहार मुनस्यारी आता था, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण, अल्मोड़ा में तब त्रिलोकी दिवस को बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। देश आज़ाद होने के पश्चात भी उन्होंने अपना पूरा समय व ध्यान समाज सेवा करने में ही लगा दिया। मुख्यतः वे युवाओं को शिक्षा की ओर आकर्षित करने की कोशिश करते थे। उन्होंने क्षेत्र में अनेक विद्यालय खुलवाये उनमें प्रमुख था मुनस्यारी का राजकीय इण्टर कॉलेज। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाकर ही दम लिया। राजकीय कन्या इंटर कालेज, नमजला पिथौरागढ़ भी उन्हीं के कोशिशों की देन है। उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए भी अहम भूमिका को निभाया जिसमें मुख्य है। तेजम मोटर मार्ग, शामा मोटर मार्ग, कपकोट डाकखाना, सुरिंगगाढ़ में झूला पुल एवं सुरिंगगाढ़ में पन बिजली योजना। वे भ्रष्टाचार को रुकवाने के लिए भी लड़ते रहते थे। युवाओं को शिक्षित करना व नशा मुक्ति के लिए लगातार आवाज उठाते रहते थे। तराई में जगह जगह आश्रम पद्धति विद्यालयों को खुलवाने में भी उन्हीं का हाथ होता था, जहाँ वे समय समय पर जाकर विद्यालयों के हालातों का जायज़ा लिया करते थे। प्रदेश गये अपने बच्चों से रूबरू होकर उन सभी से एक अभिभावक के रूप में मिलते थे। संग में उन बच्चों का हौसला अफजाई भी किया करते थे।
बाला सिंह मर्तोलिया से बातचीज डॉ.पंकज उप्रेती भारत-तिब्बत व्यापार और माइग्रेशन होने वाले ग्रामों के पुराने दिन कितने कठिन और रोमांचक थे, उन यादों को समेट लोग आज भी हमारे बीच हैं। अपने बचपन की ऐसी की रोचक यादों के साथ बाला सिंह मर्तोलिया की आँखों में पुराने दृश्य तैरते हुए महसूस किये जा सकते हैं। वह बताते हैं कि उनके परिवार का मुख्य कार्य व्यापार और भेड़-बकरी पालन था। देवीबगड़ में उनका बचपन बीता, जहाँ पशुपालन का मस्त कारोबार था। जोहार के खीम सिंह मर्तोलिया के परिवार में माधे सिंह और मेघ सिंह हुए। माधो सिंह के सुपुत्रों में रघुनाथ सिंह, स्व. ईश्वर सिंह ओर त्रिलोक सिंह जबकि मेघ सिंह के सुपुत्र बाला सिंह जी हैं। गर्मियों में जोहार मर्तोली और जाड़ों में देवीबगड़ ;बागेश्वरद्ध में यह संयुक्त परिवार जाता था। मुनस्यारी तो इसके बीच हुआ ही। अपनी इन्हीं सारी यादों को ताजा करते हुए बाला सिंह मर्तोलिया बताते हैं कि परिवार के साथ बचपन में इधर-उधर जाने का उन्हें जो अवसर मिला वह बच्चों के लिये खेल सा था। रेड़गाडी, बोगड्यार, रिलकोट यात्रा के पड़ाव थे और जब एक स्थान से दूसरी जगह पूरा परिवार अपने सैकड़ों जानवरों के साथ जाता था, वह सब छोटे बच्चों के लिये खेल ही जैसा था। पड़ाव में रुकते ही कोई पानी की व्यवस्था में जुटता तो कोई रसोई संभालता। बच्चे खेल में मस्त हो जाते। चलते समय जिन महिलाओं या बुजुर्गों को दिक्कत होती उनसे कहा जाता भेड़ के पीछे-पीछे चलें, भेड़ धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। पड़ावों में खूब चहल-पहल होती थी। बाला सिंह जी बताते हैं कि उनके ताउ माधे सिंह जी को लोग माधे सिंह ‘जाज’ कहते थे। वह जड़ीबूटियों के जानकार थे और हड्डी आदि के बारे में भी ज्ञान था। किसी व्यक्ति या जानवर की किसी कारण कोई हड्डी टूट जाए तो वह सफल इलाज करते थे। लोग दूर-दूर उनके पास आया करते थे। एक बार श्यामाधुरा में भैस काफी गहरे में गिर गया उसे ताउ ने ही ठीक किया। बाला सिंह जी बताते हैं कि पिता मेघ सिंह को होनी-अनहोनी का अससास काफी पहले से हो जाता था, कई घटनाएं इस प्रकार की हैं जब उन्होंने पहले ही पहचान लिया। एक बार उनकी भेड़ बकरी चुरा ली गई थीं लेकिन पिता जी ने उसका पता लगा लिया। जबकि उन भेड़ बकरियों के तीन-चार पुश्त तक हो चुके थे, उन्होंने सबको पहचान लिया। वर्तमान में हल्द्वानी में रहने वाले बाला सिंह मर्तोलिया का बचपन देबीबगड़ में बीता और वहीं उन्होंने प्राइमरी की पढ़ाई की। हरसिंगिया बगड़ के उपरी क्षेत्र में यह प्राइमरी स्कूल है। इसके बाद इण्टर तक की पढ़ाई मुनस्यारी और पिफर बीए की शिक्षा के लिये नैनीताल आए। तक पाइन्स, नैनीताल में आईटीआई की जानकारी होते ही उसमें प्रवेश ले लिया। टाइपिंग-शार्टहैंड के अभ्यासी बाला को 150 में से 125 नम्बर मिले और वह प्रथम श्रेणी में पास हो गये। पास होते ही हनुमानगढ़ी, नैनीताल की वेध्शालामें उनकी नौकरी लगी। इसी समय रामनगर डिग्री कालेज में स्टेनों की पोस्ट निकली वह उसमें चयनित हो गये। सन् 1984 तक रामनगर में नौकरी की लेकिन बैंक का फार्म भर दिया। सन् 84 में फैजाबाद जगदीशपुर में नियुक्त हो गये। सन् 1985 तक लीड बैंक में क्षेत्रीय प्रबन्धक रहे। इसके बाद पन्तनगर सिडकुल शाखा में वरिष्ठ प्रबन्धक पद से सेवानिवृत्त हुए। अपने बचपन की पहाड़ से लेकर अभी तक की तराई की यादों के साथ मर्तोलिया जी सद् कार्यों में संलग्न हैं। तल्ला दुम्मर के वृजवाल परिवार में इनका विवाह हुआ था। श्रीमती माया देवी, पुत्र राहुल, गणेश सहित यह भले ही हल्द्वानी में निवास कर रहे हों लेकिन इनका मन हिमालय की वादियों में रमता है।
औपनिवेशिक शासन से आंखिर भारत ने 15 अगस्त 1947 को निजात पा ही लिया था,किन्तु आजादी के पंद्रह वर्ष बीत जाने पर भारत पर चीन के आक्रमण तथा तिब्बत पर अधिपत्य जमा लेने के बाद सीमा प्रांत क्षेत्र के निवासियों का सदीयों का व्यापार झटके में समाप्त हो गया,उसी में जोहार घाटी में निवास करने वाले शौका जनजाति समुदाय का भी जीवन गति थम सी गई, जिसके कारण कयी गर्खा (जाति )समुदाय के लोगों का जीवन भी प्रभावित हो चला था. शौका जनजातियों के घुमक्कड़ी जीवन में स्थिरता आ गई ,जो मौसम के अनुसार अपना प्रवास बदलते रहते थे. अब एक ही स्थान पर रहने के लिए मजबूर हो गए. अफ़रा-तफ़री की स्थिति बन गई, जिनके व्यापार,व्यवसाय का संबंध हिमालय के वार-पार जन-जीवन से था, जीवन ठहर सी गई,अब लोग स्वयं अपनी तरह जीवन जीने को मजबूर थे. जोहारियों के गांवों में भी लोगों की स्थिति दयनीय ही थी. जमीन बंदोबस्त में ‘जिसका जोत उसी का खेत’ के तहत जीमदारों( जिन्हे खेतीबाड़ी का जिम्मा था)के पास चला गया था.बस अब ऊनी कारोबार, पशुपालन, मेहनत मजदूरी से लोग जीवन व्यतीत कर रहे थे.देश को गुलामी से बाहर आए कम ही समय हुआ था,देश में ग़रीबी, बेरोजगारी,कष्टमय जीवन जीने को लोग मजबूर थे, वही स्थिति शौकाओं के गांवों की भी थी. शौका बहुल गांव में सेठ,सौकार (धनवान) व्यक्ति जिन्हें विरासत में धन-दौलत प्राप्त था इने-गिने ही थे.उन्ही के पास छोटा-मोटा व्यापार, आर्थिक सम्पन्नता, प्रतिष्ठा भी थी, अन्य लोगों का जीवन अति कष्टमय, सुबह शाम का गुजारा करना भी मुश्किल था, परिवार भरा -भरा, शिक्षा का प्रचार प्रसार भी न थी. सेठ जगत सिंह गांव का धनी, प्रतिष्ठित व्यक्ति था.जिनकी दो पत्नी,एक पुत्री तथा परिवार में धर्म भाई नैन सिंह भी रहता था. सेठ जी आदर्श चरित्रवान, मृदुभाषी, परोपकारी, संवेदनशील, सामाजिक, धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान थे ; उन्हें चिंता थी तो केवल अपने उत्तराधिकारी पुत्र प्राप्ति की जिनके लिए, पुजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, सभी टोना-टुटका समय -समय करते रहते थे, किंतु व्यक्ति जो सोचता, होता नहीं.वही सेठ जी के साथ भी हुआ. जीवन के अंतिम समय मानसिक संतुलन भी खो बैठे, तथा जो मृत्यु का कारण भी बना था. सौकार (धनवान ) जगत सिंह की सेठियत- “गांव के विशिष्ट व्यक्ति, धन-दौलत की चमक -दमक, गांव का एक मात्र व्यापारी, बासमती चावल की महक पास-परोस तक आना, औरतों के पहने आभूषणों का आकर्षण, गरीबों के हितेषी, पूजा -पाठ,ज्ञान -ध्यान,गीता ग्रंथ का नियमित अध्ययन,सरल व्यक्तित्व, धार्मिक प्रवृत्ति, सामाजिक व्यक्ति व बच्चों से प्रेम भाव आदि सेठ जी की ‘सेठियत’ ही थी.” सन् 1960-70 में गांव के अधिकांश लोगों की माली हालत ठीक नही कहीं जा सकती हैं, जोहारियो के गांव में मुख्यतया -ऊनी कारोबार, पशुपालन, मेहनत मजदूरी, आंशिक कृर्षि करके ही जीवन यापन करते थे, गांव में खेती-बाड़ी सिर्फ दो ही जिमदार (सामान्य जाति) परिवार के पास ही अधिक थी. थोड़ी बहुत कुछ परिवार ही करते थे.किन्तु उनकी भी स्तिथि ठीक न था. 1967 में में आरक्षण आरक्षण मिलने पर यहां के युवाओं ने पढ़ाई लिखाई के पश्चात सरकारी नौकरी में जाना प्रारंभ किया तभी स्थितियां बदलती गई. सेठ जगत सिंह जी अपने घर में बने बरामदे में बैठकर कुछ लिखत- पढ़त का काम कर ही रहा था, तभी बड़ी पत्नी सोबली देबी ने आवाज लगाई. सोबली देबी – ” सेठ जी से- सुनिए ! “अगले महीने जौंलजीबी का मेला आने वाली है, तैयारी करनी पड़ेगी,” सेठ जी – ‘ठीक है, “हमारे पास सामान कितने है- देख लेना.” सोबली देबी – ” तीन दन, चार चुटका, छः पंखी,चार कोट के पट्टु,(ऊनी कपड़े) दो,तीन आसानच भी है बहुत है एक, दो और तैयार हो रहा है.’ सेठ जी – सोबली ! “थोड़ा मडुवा का सत्तू व खजिया धान का खाजा (भूना चावल) भी तैयार कर देना, नास्ते में अच्छा रहता है.” सोबली देबी – ” मडुवा व खजिया धान बक्से में है कल परसों भूनकर तैयार करती हुं, हो जाएगा.” सेठ जी – सोबली! हमें दो आदमी सामान इधर-उधर करने के लिए भी चाहिए,आज से ही बात करनी पड़ेगी.’ सोबली देबी – ” शेर सिंह व नैन सिंह जी मेरे खयाल से अच्छा रहेगा,आप बताइए.” सेठ जी – ” तुमने तो मेरी मुंह की बात कह दी, मैं भी यही सोच रहा था.घोडे वाले तो सामान पहुंचाकर आ जायेंगे,उतने दिन वहां रूकना बेकार हुआ, फिर आ जायेंगे.” सोबली देबी – ” तैयारी शुरू कर देते हैं.” ठीक ही होगा. जौलजीबी का ऐतिहासिक व्यापारी मेला सदीयों से गोरी-काली के संगम पर लगता है जहां दूर-दूर से क्रेता -बिक्रता आकर अपने सामाग्री का आदान-प्रदान नगद धनराशि या वस्तु विनिमय के माध्यम से करते थे.पशु मेला भी लगता था.जोहारीयो के लिए बहुत महत्वपूर्ण मेला,यहां के व्यापारी अपनी-अपनी दुकानें सजाते थे. जिसकी आज यादें भर रह गई है. “मेले की तैयारी हमारे गांव के लोग कैसे करते थे ?” हस्तशिल्प -ऊनी वस्त्रों का कारोबार,जोहार के हर परिवार में किया जाता था.मेले में वस्त्रों की बिक्री से नगद धन की लालसा लोगों में रहती थी. कयी माह पूर्व से लोग मेले में अपने सामान बेचने हेतु तैयारी करने लगते थे.गांव में घर-घर में ध्वाच – ध्वाच ( लकड़ी का हत्था तथा उसमें लगे पांच लोहे के पत्ते,पंजा जो:ताना-बाना’ को ठोंकने की आवाज है ),कटम-कटम ( थल्ल- चौड़ा लकड़ी के तख्त से बना यंत्र,’ताना-बाना’ को ठोकने की आवाज), बच्चे से लेकर बुजर्ग तक कुछ-न -कुछ ऊनी कारोबार में संलिप्त दिखाई देते थे, भरा परिवार, मेहनत कश लोग, अभावग्रस्त जिंदगी, जहां सभी मिलजूलकर परिवार का सहयोग में योगदान देते हैं.” सेठ जगत सिंह का नित्य कार्य सुबह प्रातः काल उठकर दूर निवृत्त होना, स्नान, ज्ञान -ध्यान पूजा पाठ के बाद अपने रोजमर्रा के कार्य में संलग्न हो जाना है, तभी बाहर से आवाज आती है. धनुली देबी – ” सौरा,सौरा (ससुर जी) मेरा भी दो-तीन पंखी जौलजीबी मेले में बेचने हेतु ले जाने का कष्ट कर दिजिएगा.” सेठ जी – ” दाम तय कर लेना” धनुली देबी – “क्या करूं? आप बेच दिजिए.” सेठ जी – ” दाम तय ठीक रहता है, आपको भी अच्छा लगेगा.” धनुली देबी – “सौरा बस ! “70,या80 रूपए तक बेच देना , हो गया.” सेठ जी -, “ठीक है, कोशिश पूरी रहती है, नहीं बिकने पर ही वापस लाना पड़ता है. बहू!” मेले जानें की तैयारी, छोटी पत्नी से कहती हैं – पानुली,”नास्ता हेतु सत्तू,व खाजा (भूना चावल) बना लिया है क्या? पानुली देबी- जी, ” सब कुछ तैयार है.” “शेर सिंह,सेठ जी के घर आकर कब चलना है, बता दिजिएगा.”सेठजी. सेठ जी – ” शेरू, परसों सभी साथ चलेंगे,नेनू को भी बता देना.” ठीक! शेर सिंह – ठीक है, “सेठ जी अब मैं घर जाता हूं.” सेठ जी – अच्छा,” ठीक है.” सेठ जगत सिंह जी अपने गांव दुम्मर से अपने कांरवा के साथ जौलजीबी मेले के लिए चलते हैं गांव के लोग घोड़े की हिनहिनाहट,खांकर (घंटीयां) की खनखनाहट,पास-परोस के लोगों की शोर शराबा, मेलार्थियों को दूर धार (अदृश्य पहाड़ के पार) तक जाते देखते हैं,प्रथम दिन छोरीबगर तक का लक्ष्य तथा दुसरे दिन मेले में पहूंच जाते हैं, सदियों से अपने पैतृक निर्धारित स्थान पर दुकान सजाते हैं, महिनों दिनों बिताने के पश्चात ही वापसी होती है, सामान बेचने के पश्चात कुछ आवश्यकता अनुसार खरीददारी-गुड,घी, कपड़े, जूता-चप्पल आदि घोड़े में रखकर घर पहुंचते हैं, गांव के मेहनतकश लोगो को सेठ जी के वापिस का इंतजार भी रहता है.उन्हे अपने सामान बिकने से नगद धन की प्राप्ति की चाह,आंनदानूभूति की हिलोरे दिल में उठने का आभास होता है, दूर धार से ही घोड़ों की गले में बधी घंटीयों की खनखनाहट आवाज का आभास होता है, बच्चे एकदम सचेत हो जाते, तथा नजदीक पास आते देख सेठ जी के घर पर इकट्ठा हो जाते हैं ,आशा जरूर एक टुकड़ा बाल मिठाई प्राप्त हो ही जायेगी.” दुसरे, तीसरे दिन से सेठ जी के बुलावे से लोग घर पर पहुंचते रहते हैं. कुछ के चहरे खिले हैं, तो कुछ उदास भी दिखते है. जिनका सामन बिक न सका था. सेठ जी अगले थल,या बागेश्वर में बेचने का आश्वासन देते हैं.” अब सेठ जी फ़ुरसत के कुछ क्षण प्राप्त हुए हैं आराम तथा भगवान भक्ति में लगा देना चाहते हैं, बहुत दिनों से ” गीता ” का अध्ययन भी नहीं किया गया है. तभ बाहर से एक आवाज आती है पोस्टमैन- सेठ जी..सैठ जी,नमस्ते ! आपका पत्र आया है.’ सेठ जी- नमस्ते. ” बैठो,चाय पी लिजिए.” पोस्टमैन – ” ठीक है, चाचाजी.” यह लिजिए पत्र. सेठ जी पत्र को लेकर बाहरी पता देखकर समझ जाते है कि मर्तोली के स्वामी जी का पत्र प्राप्त हुआ है.” सोबली- ” पत्र कहा से आया है?” सेठ जी – स्वामी जी का पत्र, है लिखा है. “लिखा है,मित्र जगत,अबके जब जोहार जाएंगे,तो आपके घर पहुंचकर साथ चलेंगे.” कैसा रहेगा? “ सोबली- ” बहुत अच्छी बात, स्वामी जी के साथ जाकर कयी बरस से छोडे चुके घर की देख रेख भी हो जाएगी.” समय बितने के माह मई में ‘स्वामी जी’ का संदेश पत्र सेठ जी को मिलता है- मित्र ! “जगत परसों आपके घर पहुंच रहे हैं.” जोहार साथ -साथ चलेंगे. सेठ जी – “स्वामी जी को देखते,आइए.. आइए, निकट जाकर प्रणाम किया, उनके संग साथ में शिष्या राधा बहन का भी सत्कार करते है. ‘सेठ जगत सिंह जी स्वामी जी के परम मित्र में से एक है.’ स्वामी जी – ” मित्र ठीक-ठाक, परिवार सहित कुशल मंगल से हो.” सेठ जी – “स्वामी जी, आपकी कृपा से सब ठीक-ठाक ही है.” जी, आप पहले हाथ -मुंह धो लिजिए. चाय बनने तक. “स्वामी जी तथा राधा बहन ने हाथ-मुंह धोकर , चाय-पानी ग्रहण किया. स्वामी जी ने थोड़ी देर आराम करने के पश्चात सेठ जी से गपशप करते हैं, तभी सेठ जी को कुछ पिछला खयाल आता है, तो वह स्वामी जी से कुछ मन की बात पुछने का अनुरोध करते हैं.” स्वामी जी – मित्र! बेझिझक कहिए, क्या कहना है?” सेठ जी – स्वामी जी, ” सोच रहा हूं, इस बार श्री पुर्ब्याल देवता के मंदिर में भागवत कथा का आयोजन रखने को सोच रहा हू,आप सुझाव देने का कष्ट करें.” कैसा रहेगा?” स्वामी जी – वाह मित्र ! आपके नेक कार्य करने बिचार , बहुत अच्छा है, बस ! मुझे कुछ दिन पहले बता दिजिएना अवश्य आ जाऊंगा.’ सेठ जी का जोहार से वापसी के बाद गर्मी के मौसम का आगमन होने पर अपने कुल पुरोहित स्व० बच्ची राम जोशी को भागवत कथा शुभमुहूर्त दिन बार निकालने के लिए सलाह मशविरा किया गया. आज भी मंदिर के आंगन में निर्मित होम अग्निकुंड दिखाई देती है,अतीत की “सेठ जी के सेठियत” की कहानी को बयां करती है. भागवत कथा प्रारम्भ कू पश्चात दूर -दूर से लोग श्री पुर्ब्याल देवता के मंदिर मंदिर में भक्ति भावना से पहुंचते गये, श्रृद्धा भक्ति अर्पित कर प्रफुल्लित मन से घर वापसी भी करते हैं. सेठ जगत सिंह जी की सेठियत की कहानी को संक्षिप्तता में वर्णित करते हैं-उच्च चरित्रवान, समाजोपयोगी व्यक्ति,सरल व्यक्तित्व लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत थे .सेठ जी की नेक नियत, जीवन कहानी को स्मरण करते हृदयतल से कोटिश: नमन करते हुए अन्तरात्मा से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं. ✍️ जगदीश सिंह बृजवाल
चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है….। चार-छः जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल के बच्चे समवेत स्वरों में गाकर सरकार द्वारा आवंटित क्वाटर से बाहर मुझे समाचार पत्रा पिघलता हिमालय देने के लिए खड़े थे। मैंने पूछा कि तुम आज पंकज उदास की गज़ल क्यों गा रहे हो? बच्चों ने कहा कि सर आपको आपकी वतन की चिट्ठी आई है। मैं आश्चर्यचकित था मेरी चिट्ठी!! तब बच्चों ने पिघलता हिमालय दिखाते हुए कि सर आप इसे चिट्ठी ही तो कहते हैं। ये चिट्ठी ही हमें गाँव गोठार, मेले ठेले, बांज बुरांश, सुख-दुःख, तीज त्यौहारों की खबरें/निमंत्राण लेकर आती हैं। तब मुझे याद आया कि एक दिन मैं अपने वार्डन रूम के बाहर पिघलता हिमालय पढ़ रहा था कि बच्चों ने पूछा कि सर आप कौन सासमाचार-पत्र पढ़ रहे हो तो प्रत्युत्तर मैने चिट्ठी- पाती कहा।और बताया कि यह हिमालय की आवाज है, यह सीमांत लोगों की सांसें है। तब से मेरे स्कूल के बच्चे भी कहने लगे कि सर हम भी चिट्ठी – पाती पढ़ेंगे। मैने बताया यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र है जो सप्ताह में नियमित रूप से पोस्टऑफिस से आता है पहले आप लोग पढ़ लेना फिर मेरे पास भिजवा देना। मुझे भी तो पढ़ना है! तब से बच्चे हर सप्ताह चिट्ठी के इंतजार में रहते हैं। जैसे ही पोस्टमैन विद्यालय में डाक देने पहुंचता है तब विद्यालय के छात्र पिघलता हिमालय के लिए दौड़ लगाते है वैसे भी छात्र जो घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करते हैं वे सब अपने आसपास गांव घरकी आदिल कुशल जानने के लिए बेताब होते हैं।आज के सोशल मीडिया के दौर में भी पिघलता हिमालय अपनी पाती द्वारा लोगों को अपनेपन की भावों से जोड़े रखने के प्रयासों की बच्चे खूब सराहना करते हैं। वेदांग ढौंढियाल जो कक्षा 11वीं का छात्र है पिघलता हिमालय के बारे में विचार देते हुए बताता कि यह समाचार पत्र नहीं हमारे संस्कृति की संवाहिका है। प्रणव कुमार कक्षा 11वीं छात्र को झकरुवा भूली के फ़सक बहुत पसंद है। कक्षा 9 वीं के छात्र श्रेष्ठ सिंह को हमारे संरक्षक/ बुजुर्ग पर आलेख बहुत पसंद है। तन्मय ध्यानी कक्षा 10 वीं के छात्र को हमारी संस्कृति विरासत फीचर/प्रसंग बहुत भाता है। कक्षा 9 वीं के छात्र यशपाल पर्यटन स्थलों की जानकारी से संबंधित लेख पढ़ने के लिए उत्सुक रहता है। विनय कुमार को हमारे प्राकृतिक संसाधनों की उपेक्षा पर प्रसंग रुचिकर व ज्ञानवर्धक लगता है। कक्षा 12 के छात्र मोहित सती पिघलता हिमालय की मुहिम हमारी संस्कृति हमारी विरासत संरक्षण के लिए धन्यवाद ज्ञापित करता है। विद्यालय के छात्र गौरव को ज्वलंत विषयों पर दाज्यु की लेखनी बहुत पसंद है। इन बच्चों के बाइट्स सुनकर/जानकार मैं सहसा अपने अतीत में खो गया। मैं भी सन् 1987/88 में इन्हीं बच्चों की तरह राजकीय इंटर कॉलेज मुनस्यारी काछात्र था मैं गांव से दूर मुनस्यारी के एक धुएंवाली एक छोटी सी कोठरी किराए पर रहकर पढ़ाई करता था। जिसका मासिक किराया 10 रुपए था । मुनस्यारी बाजार में सबसे कम किराए का यही कमरा था। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।मुनस्यारी बाजार मेरे लिए कनॉटप्लेस से कम नहीं था। जिस कमरे में रहता था उसके नीचे होटल था।जिसमें जलेबी, बालूशाही, समोसे अरजी व भुटुवा बनता था।सुबह बांज बुरांश की गीली लकड़ी से चीची आवाज व धुएं से कमरा रहने योग्य नहीं रहता था।पर क्या किया जाए इससे अधिक सुविधा वाले कमरे का किराया देना सामर्थ्य में नहीं था।सोमवार से शनिवार तक स्कूल ,दोस्तों के डेरे में समय व्यतीत होता पर रविवार को अपने कमरे के आसपास बैठा करता। मेरे डेरे के पास देव सिंह पाना जी की चाय की टपरी थीं।दुकानदार रविवार को सुबह की धूप के साथ आनंद लेते थे। मैं भी उन्हीं के आसपास बैठा रहता था एक दिन कुछ दुकानदार पिघलता हिमालय पर छपी खबरों के बारे में चर्चा कर रहे थे।कह रहे थे कि उप्रेती जी ने क्या बढ़िया लिखा है। वे सब पिघलता हिमालय पर छपी वर्ष वा साप्ताहिक खबरों पर विमर्श कर रहे थे।मैं भी पढ़ने के लिए उत्सुक था। पर मैं शर्मीले स्वभाव कारण उनसे जानकारी प्राप्त नहीं कर सका।सभी दुकानदार अपनी अपनी दुकानों में चले जाने के बाद बिंद्रा (शु-मेकर) और मैं हम दोनों बैठे धूप सेक रहे थे। बिंद्रा (शु-मेकर) पढ़ा लिखा था, दुनियादारी देखी थी। मैने पूछा यह पिघलता हिमालय पढ़ने को कहां मिलेगा? तो उसने बताया कि श्री आनंद वल्लभ उप्रेती जी हल्द्वानी वाले और श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया आपस में मिलजुलकर अखबार छपवाते हैं। और कहा यदि तुम श्री दुर्गासिंह जी से बात करो तो वे तुम्हें पढ़ने के लिए दे देंगे ।वे भले और नेक इंसान हैं। उस दौर में अमर-उजाला तीसरेचौथे दिनमुनस्यारी पहुंचता था।उस पर भी कुछ संभ्रांत लोग ही पढ़ पाते थे। साथ ही सोरघाटी प्रिंटिंग प्रेस से छपने वाली पर्वत- पीयूष साप्ताहिक समाचार – पत्र आता था। जिसमें कुछ अभिजात्य वर्ग का ही कब्जा था। जो मुझे बात मेंप ताचला।श्री दुर्गा सिंह मर्तोलिया जी बहुत सहृदय, विनोदप्रिय, मिलनसार व्यक्तित्व के धनी थे। सबसे मिलजुल कर रहते थे। जनप्रिय थे इसलिए लोग उन्हें नेता जी कहते थे। शायद शनिवार का दिन था। कोई सार्वजनिक अवकाश के कारण आज बाजार मेंखास चहल-पहल नहीं थीं। मैने देखा एक सामान्य कद-काठी, पर हिमालय जैसे धीर गंभीर ,घनी मूंछें , गोल चेहर , हरे रंग की पारका जैकेट पहने श्री दुर्गासिंह मर्तोलिया जी अपनी दुकान के आगे लोहे की एक फोल्डिंग कुर्सी में बैठकर पिघलता हिमालय पढ़ रहे थे। मुझे प्रथम बार दूर से पिघलता हिमालय समाचार पत्र और संस्थापक संपादक के दर्शन हुए। मैने इससे पहले कोई क्षेत्रीय ,सांस्कृतिक मुद्दों पर छपने वाली समाचार पत्र नहीं पढ़ा था। मैने हिम्मत जुटाई और मर्तोलिया जी के पास उनके दुकान में पहुंचा। उन्होंने एक ग्राहक समझकर पूछा क्या चाहिए। मैने कहा समान तो कुछ नहीं चाहिए, पर मैं पिघलता हिमालय पढ़ना चाहता हूं। तो वे मुस्कुराते हुए बोले यह कल ही डाक से मिली है। आज मैं पढ़ लेता हूं कल सुबह दुकान खुलने पर आना। तब लेकर पढ़ लेना। जी कहकर मैं वापस लौट आया। दिन किसी तरह बीत गया, रातभर उत्सुकता में नीद नहीं आई। आज रविवार था, मैं सुबह से ही दुकान खुलने का इंतजार में था। आज कमरे में धुआं अत्यधिक था। इस लिए बाहर एक लकड़ी के बैंच में बैठा उनकी राह देख रहा था। सुबह दोनों भाई दुकान में पहुंच गए थे। तब उनकी दो दुकानें थी। एक किराना दूसरा रेडिमेड जनरल स्टोर था। छोटे भाई मंगल सिंह मर्तोलिया जी ज्यादातर किराना संभालते थे श्री दुर्गासिंह जी दोनों में बैठते थे। दूसरे दिन मैं हिम्मत करके अखबार मांगने गया। अरे! हां……कहते हुए मुस्कुराए, पहले मेरे बारे में जानकारी ली, कौन सी कक्षा मे पढ़ते हो तुम्हारा ना क्या है? कहां के रहने वाले हो? मैने सबकुछ बताया बहुत खुश हुए। और कहने लगे कि एक गांव का लड़का इतना पढ़ने के लिए लालायित है। मैं अखबार लेकर अपने कमरें में चला गया। होटल से धुआं कम हो गया था। मैने अच्छी तरह देखा पलटाया और एक एक खबर को पढ़ने लगा। उस दिन आकाश साफ था पंचाचुली की धवल श्वेत शिखरों से सूर्य की स्वर्णिम किरणें चमक रही थी। उस साप्ताहिक में भिटोली पर कहानी छपी हुई थी किस तरह एक भाई भिटौली के पर्व पर अपनी बहिन गौरीधाना मिलने जाता है। ननद और सास द्वारा कुचक्र रचना, एक अंतहीन कहानी पढ़कर मेरे आंखों से अविरल अश्रुधारा बहने लगी। उस दिन मैं खूब रोया। यह थी मेरे पिघलता हिमालय से प्रथम साक्षात्कार। मैने पढ़ने के बाद सही सलामत अखबार वापस कर दिया। मर्तोलिया जी बोले जब भी पढ़ने का मन हो मुझसे मांग लेना और पढ़ते रहना। फिर दो चार बार ही लिया होगा। वे अपने कार्यों में ही व्यस्त रहते थे। यदि वे आज होते और मैं ये प्रसंग सुनता तो उन्हें अच्छा लगता। पर वह विराट हिमालय समय से पूर्व पिघल गया उनसे पिघली अमृतधारा आज भी पिघलता हिमालय रूप में निरन्त प्रवाहित है। नारायण सिंह धर्मशक्तू जवाहर नवोदय विद्यालय सुयालबाड़ी, नैनीताल।
जीवन सिंह दुग्ताल श्रदेय पिता श्री पर यह कहावत सही बैठता है :-“कभी हार न मानने की आदत ही, आप एक दिन जीत के कारण बनते है” पिता स्व. ऊपर सिंह दुग्ताल पुत्र स्व. तिका सिंह एक नेक इन्सान, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, अपने काम के प्रति बहुत कठिन मेहनत, निडर छवि के व्यक्तित्व रहे है I यद्यपि बचपन बहुत गरीबी से गुजरा था क्युकि दादा जी स्व. तिंका सिंह का महामारी के दोरान अल्पायु में स्वर्गवास होने के कारण बेसहारा का कारण बना I माता जी का भी देहान्त होश संभालने से पूर्व हो चुका था I जिस वजह से पढाई के प्रति गहन लगाव रखने के बाबजूद घर की गरीबी के कारण स्कूल जाने में असमर्थ रहे I उनके सहपाठी गाव के रहे थे श्री शेर सिंह दुग्ताल, श्री दोलत सिंह दुग्ताल, श्री जगत सिंह दुग्ताल इत्यादि I पिता जी बताते थे- परिवार को इस स्थर में पहुचाने में काफी समय लग गया था I बहुत ही अल्प आयु से ही रोजी रोटी के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ा था I बाल्यावस्था में भेड़ बकरी चुकाने का काम किया करता था थोडा जब बड़ा हुआ और होश सभाला फिर अपने कुछ बकरियों से काम काज किया लेकिन उसमे भी कोई खास लाभ नहीं हुआ था विवाह के बाद चाय के अपने दुकान से रोजी रोटी खुशहाल बनाने का भरसक प्रयास लेकिन यह कार्य भी विफल ही रहे I पिता जी आगे बताते है कि हमारे घर के पास पड़ोस में ही एक पटवारी जी रहते थे नाम याद नहीं आ रहा है जो कि हमेशा दुकान में आया जाया करते थे I उन्होंने पिता जी के मेहनतऔर कार्य के प्रति लगन को लम्बे समय से देखा था एक दिन अपने कमरे में बुलाया और कुछ अहम् बात बताया कि भारत सरकार ने भेड़ पालकों को एक बिशेष योजना प्रदान की है जो इस कार्य में कठिन परिश्रम और मेहनत करेगा उसे बहुत फायदा हो सकता है यह कार्य आप सकते है मैंने आपके मेहनत और कठिन परिश्रम को साक्षात् देखा है इसी कारण आपके अपने भविष्य को देखते हए भेड़ पालन के लिए सरकारी योजना के लिए आपका फार्म मैंने भर दिया है अब इसमें केवल हस्ताक्षर ही करने बाकी है I सोचकर बता देना फार्म को आगे भेजना है I यह सुनकर पिता जी को फिर से भेड़ पालन के दल दल में जाने का विचार से मना करने का विचार आया था फिर सोचा कि एक बार घर परिवार से भी विचार बिमर्श किया जाये I घर में इस विषय में काफी विचार किया गया लेकिन अंतिम फेसला करना काफी कठिन था I फिर भी इस कठिन फैसले को स्वय की जिम्मेदारी लेते हुये फार्म को भरवा दिया I यही फ़ेसला पिताजी का टर्निंग पॉइंट रहा I उसके बाद सरकारी भेड पालन का कार्य दो साल से अधिक समय तक अपने जिंदगी के सारे मेहनत, कठिन परिश्रम इसी कार्य में लगा दिये I दारमा से गाव निगाल्पनी और उसके बाद टनकपुर भेड पालन के लिए लगातार आना पड़ा तब में शायद दो ढाई साल का रहा होगा, मुझे धुधली यादे है अभी भी है लेकिन दो साल में अपने तथा परिवार के द्वारा कड़ी मेहनत ने अपना फल देना शुरु कर दिया था 45 भेड़ से 120 तक पंहुचा दिया था I सरकारी नियम से अनुसार 50 भेड़ वापस लिया गया फिर भी काफी भेड़ अपने पास बच गये थे यही पूंजी पिता जी की भविष्य सवर गयी I इसी भेड़ से बाद में पिता जी ने नेपाल में भी व्यापार कर अपने सम्पति में इजाफा किया और मुझे पढाई में कोई कमी नहीं की I जिसकी वजह से आज इस मुकाम तक पहुच पाया हु I भेड़ पालन के दोरान काफी कुछ पिता जी ने सीखा और अपने लगन के कारण ही बाद में व्यापार हिसाब किताब में भी पारंगत हुए थे I अपने दुग्तू गाव का सबसे बड़े बुजुर्ग पिता जी को 95 साल से ऊपर होने का गर्व हासिल कर चुके है अंतिम समय तक अपने पुराने यादो को हमेशा ताजा करने का भरसक प्रयास किया करते थे और हर कथा को नये सिरे से शुरू कर अंतिम छोर तक ज्यों का त्यों सुनाया करते थे हमेशा की तरह बहुत संतोष नजर आते थे I पिता जी ने कभी भी हार नहीं मानी थी कठिन से कठिन स्थिति पर भी डटकर सामना किया था I मेहनत, कठिन परिश्रम ईमानदारी का ही उनका मूल मन्त्र था हमे उन्ही से सीख मिली है I पिता जी के अपने जीवन काल में अपने पारिवारिक कार्य के अलावा समाज को बहुत भी बहुत योगदान दिये है I कतिपय घटनाओ को कर्मानुसार करने एक प्रयास मात्र है; . • वनों से विशेष लगाव:- पिता जी ग्राम सभा दुग्तू के लगभग 20 साल लगभग बन पंचायत की देखरेख की जिम्मेदारी उनके कड़क स्वाभाव् व् ईमानदारी के कारण दिया गया था I जिसे उन्होंने बड़े जिम्मेदारी से निभाया था I गाव की सुन्दरता एवं बुनियाद को मजबुत करने के लिए पेड़ को बचाना बहुत जरुरी था उन्होंने भरसक प्रयास किया और सफल भी हुआ I यह काम उतना आसान भी नहीं था जैसा कहने और सुनने में लगता है I रोज सुबह 4 बजे निस्वार्थ भाव से जंगल का भ्रमण कर अनावश्यक पेड़ जो कटे है चेक करना और कटे हुए पेड़ को गिनना और पता लगाना एक महत्वपूर्ण कार्य था I गाव पंचायत में दण्ड में वसुल किये गये धनराशी को जमा करना हर एक रोज का काम था I इसमें गाववासियो का भी सहयोग सराहनीय होता था I गाव के ठीक पीछे जंगल जो आज काफी बड़े रूप में देखते है I उस पर भी काफी पाबंधी कर रखी थी जिससे यह सभी पेड़ो को पनपने का मोका मिला था I आज इसी पेड़ के कारण गाव काफी सुरक्षित लगता है I आज जो छवि गाव दुग्तू सोन गाव जंगलो का जो सोंदर्य हम देखते है उसके पीछे पिता जी ने वन पंचायत पद में रहते हुए काफी मेहनत किया गया था I मुझे याद है यह बन पचायत का काम पिता जी ने 2014 को इस पद से त्याग पत्र देकर गांव के अन्य लोगो को यह सोप दिया था I तत्पश्चात गाव वासियों ने बिना पाबन्दी के देवदार के लगभग सारे बड़े पेड़ काटकर आज पूरा जंगल खाली कर दिया है l अब मात्र भोज पत्र के पेड़ ही दिखते है I मैंने भी इस बात को रखने का प्रयास किया कि पेड़ के बदले नये पेड़ भी तो बोया या लगया जा सकता है इस पर अभी किसी का ध्यान नहीं है बाद में गाव वासियों को चिंतन मनन करना ही होगा I • कृषि एवं भेड़ पालन पर विशेष लगाव :- गाव दुग्तू काफी उपजाऊ भूमि पहले से ही रहा है I पिता जी को कृषि कार्य व् भेड़ पालन में हमेशा से ही विशेष लगाव रहा है I अपने समय में अपने खेतो में बहुत परिश्रम किया करते थे जिसे देख देखी में हम लोग भी बचपन में कोशिश करते थे I गाव दुग्तू में बर्फ काफी देर तक टिकने के कारण मिटटी में नमी काफी रहती है तथा पूर्व में भेड़ बकरिया, गाय, बेल, झुपू, घरेलु जानवर काफी मात्र में होने के कारण खेतो में पर्याप्त मात्र में खेत खलिहान में खाद भी पहुच जाता था I जिसके कारण पुरे दारमा घाटी में कुट्टू के खेती सबसे बढ़िया पैदावार अपने गाव दुग्तू- सोन में होती थी I मेरे विचार में पिता जी के समय 70-80 का दशक कृषि के लिए स्वर्ण युग कहना उचित होगा I क्युकि सभी परिवारों का खेती के प्रति विशेष लगाव मेहनत, पशुपालन पर विशेष रूचि ने गाव के कृषि को नई उच्चाई मिली I जिसे मैंने भी साक्षात् रूप में देखा था तब में गाव के जूनियर हाई स्कूल दुग्तू- गोठी में कक्षा 6 से 8 तक पढ़ा करता था I उस समय गाव में काफी परिवार थे गाव के चारो तरफ कट्टु के पोधे व् फाफ़र के पोधे गुलाबी तथा पीले रंगों से खेत दंग्तो गबला मेला अगस्त के महीने के दोरान रंगीन दिखाई देता था इसके अतिरिक्त आलू, मूली का पैदावार भी काफी मात्र में होता था I पैदावार इतना कि जमीन के अंदर विशेष रूप से बनाये गये कोल्ड स्टोरेज में कुट्टू के अनाज रखे जाते थे और घर में लकड़ी के तख्तो से बनाये गये अलमारी जिसे र भाषा में बजम कहा जाता था रखने का व्यवस्था किया गया था I बकरी का बोझ कुन्चा आने से पूर्व कुट्टू का अनाज व् आलू धारचूला पहुंचाया जाता था I • गाव के आय बढ़ाने के साधन:- गाव के हितार्थ आय के साधन के लिए पिता जी के समय गाव में विचार विमर्श कर तिब्बत से याक का ले आना जिससे यहाँ घर -2 में याक के बच्चे जुप्पू जुमो, तलभो का बहुत अधिक मात्र में कई सालो तक प्रचार प्रसार हुआ I जिस कारण प्रत्येक परिवार से कुछ शुल्क लिया जाता था जिससे गाव के आय में इजाफा होता था I खेतो को घरेलु जानवरों से देखभाल के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त किया गया था जिसका काम रोज खेतो में जाकर घरलु जानवरों को देखना था जिससे खेती को कोई नुकसान न हो यदि कोई जानवर खेत में मिलता तो लाकर बंद में किया जाता था दंड के रूप में रूपये देने के बाद ही छोड़ा जाता था I इसके अलावा गाव की सुरक्षा के लिए कुन्चा जाने के दोरान एक परिवार को गार्ड या चोकीदार के तोर पर रखा जाता था जिसे गाववासी राशन कुछ धनराशि दिया जाता था जिससे गाव में सभी के सम्पति सुरक्षित रहे I • खनन पर रोक:- गाव निगाल्पनी जो कि काली नदी के एकदम किनारे टापू पर स्थित है गोठी गाव कि तरह हमेशा काली नदी के तेज वेग से गाव हमेशा खतरे में दिखता है अतः जब भी पिता जी गाव में रहे थे गाव के निचले भाग में रेता, बजरी खनन रोकने का लगातार भरसक प्रयास किया गया था यदि समय पर खनन नहीं रोका जाता, तो आज यह गाव गोठी कि तरह आधा गाव का बाढ़ में बह जाता I गाव के किनारे पेड़ बोने का आइडिया भी उन्ही का था जो कि आज जगल के रूप में पेड़ विकसित हो रहे है I भविष्य में भी गाववासियो से भी इस तरह के नेक कार्य निस्वार्थ भाव से करने की ढेर सारे उम्मीदे है I गाव में पीपल का पेड़ भी 1972-1973 में लगाया था I जो आज विशाल वृक्ष्य का रूप घारण कर चुका है I उन्ही के प्रयास से पीपल के पेड़ के नीचे बैठने का चबूतरा बनाया गया है जो कि कोई भी पथिक छाये का आनन्द ले सके I सन 1970 के आसपास निगाल्पनी में खोला के पानी में बादल फटने के कारण बाढ़ ने विशाल रूप लेकर आधे गाव को बहा ले गया जिसमे हमारा घर भी था I • उपरोक्त के अलावा गाव पंचायत में भी पिता जी का बहुत नाम था स्पष्टवादी, सत्यवादी महापुरुष के कारण ही गाव के न्याय पंचायत में पिता जी का उपस्थित होना तत्कालीन समय में आवश्यक होता था I पिता जी के सदगुण आज भी गाव वासी याद कर भावुक हो जाते है I पिघलता हिमालय पत्र में दो शब्द लिखकर श्रदेय स्वर्ग्रीय पिता श्री को सादर विनम्र श्रद्धांजलि देना चाहता हूं।
जगदीश सिंह बृजवाल ✍️ हिमालय क्षेत्र के प्राचीन आदम जाति किरात, पुलिंद, तंगण तथा विष्णु पुराण, महाभारत के वनपर्व, वाराहसंहिता में भी भारतवर्ष के किनारे-किनारे हिमवंत क्षेत्र में सकास,नाग, गंधर्व, यक्ष भिल्ल, आदि आदम जाति रहते आ रहे हैं.आज भी निवास करने वाले उन प्राचीन जातियों से जो संबंध रखते हों, किंतु कयी अन्य बाहरी जातियों का यहाँ आकर इन जाति के साथ घुल-मिल जाने से पहचान की भ्रामकता दिखती है. बरपटिया जनजाति के विषय में सही -सही बता पाना कठिन है.क्या ये खस, शक, या पौराणिक जाति किरात पुलिन्द, तंगण संबंध रखते होगें ? इनसे जानकारी प्राप्त करने पर वे अपने को बाहरी क्षेत्र नेपाल, पाली पछांऊ, दानपुर आदि क्षेत्रों से आने की बात बताते है.पर यह सिद्ध है कि कुछ बाहरी जातियाँ, आदम प्राचीन जातियों के साथ यहाँ आकर घुल-मिल गये हैं. जिसमें संदेह नहीं. हिमालय क्षेत्र के ही जनजाति जोहार के शौका घुमंतू, पशुचारक, अर्द्धयायावरी जीवन व्यतीत करते थे, इनके विषय में इतिहासकारों की खोज, किवदंती, जनश्रुति, मत-मतांतर देखने को मिलते हैं.जोहार घाटी में भी समय-समय पर बाहरी जातियों का प्रवेश तथा रक्त संबंध स्थापित के चलते जोहार के समाज में पूरातन समय से अर्वाचीन तक सामाजिक उथल-पुथल चलता ही रहा है. शौका जनजाति मौसम के अनुसार जोहार परगना, गौरीफाट, तल्लादेश में प्रवास करते रहे थे. इन्ही के आस-पास, बीच एक और छोटा – सा जनजाति समुदाय बरपटिया बारह पट्टी (बारह गाँव) में रहने वाले, जिनका अपनी संस्कृति, सांस्कृतिक पहिचान भी थी.जोहारियो के प्रभाव से इनके अस्तिव पर विराम लगता रहा है. गोरीफाट (मुनस्यारी) तथा बरपटिया जनजाति समुदाय जो मुख्य रूप से कृषक तथा पशुपालक थे.जो स्थाई निवास कर माल क्षेत्र में शौका व्यापारीयो के लिए अनाज, आदि सामाग्री की आपूर्ति करके मैत्री भाव का संबंध शौकाओ के साथ बनाये रखते थे. जोहार के मध्यकाल के पंज्वारीयों का माल अनाज भंडारण क्षेत्र बरपटिया क्षेत्र ही था; प्रसिद्ध पूरूष, धनाढ्य व्यक्ति सुनपति शौका का सौकाट क्षेत्र बरपटिया क्षेत्र में ही है. बारह पट्टी- जैंती गाँव ( बरनियागांव) पापड़ी, चौन-हरकोट, इमला, गोल्फा, सुरिंग, जीमीया, रिंगू-चूलकोट, गोल्फा, तोमिक, नामिक आदि क्षेत्र में निवास करते थे.इनकी उपजाति अधिकांशतः गाँव के नामों से आते हैं: बनिगों के , बर्निया, पापड़ी के पापड़ा, हरकोट के हरकोटिया,कोटाल गाँव के कोटाल, इमला के इमलाल, बोथी के बोथयाल, चूलकोट के चूलकोटिया, गोल्फा के गोलफियाल, तोमिक के तोमकियाल, जीमी के जीमीयाल, रिंगू के रिगंवाल, पछाई, सेमीया, कलझुनिया भी बरपटिया जनजाति ही है.सदियों से यहाँ निवास करते हैं. बरपटिया जनजाति में पूर्व में बर्निया , पापडा , चूलकोटिया जाति का प्रभुत्व रहा है बाद में अपने -अपने क्षेत्र में शासक के रूप में भी देखा जा सकता हैं. “बनिया माने” स्थान आज भी बेटूली धार के पास पत्थर स्तम्भ सीमा का प्रतीक चिह्न मौजूद हैं जिनका अधिपत्य गोरीनदी के किनारे किरकुटियागार, बछेपूर तक बताया जाता है उसी प्रकार पापडा, चूलकोटिया जाति भी अपने क्षेत्र सीमा तक के स्वामी थे. बर्नियो का अतीत का इतिहास जो दोधर (दो भाग) में बटे कौम एक अपने को तातर देश (हुणदेश) के निवासियो से संबंध होना बताते हैं, दूसरा धर अन्य जाति का बर्नियो के साथ घुल- मिल जाना है. मेसर देव पूजन में हुमला-जुमला पलायन कर चुके बर्निया आज भी अपने मूल गाँव जैंती (बर्निया गाँव) पहुचते हैं.जो जोहारियो के प्रभाव चलते अपने मुल्क जैंती गाँव छोड़कर नेपाल में जा बस गये थे. बर्निया जाति से जुड़ी प्रसिद्ध कथा-कहानी रूपवती कन्या का हरण जो मेसर व रूपवती कन्या के सामाजिक असमनता का कारण, दोनों के स्वाभाविक मानव स्वभाव मिलन में अवरोध की कहानी दिखती है.मेसर देव जो नागवंशी व बर्निया कन्या तातर देश के हुण जातिसे संबंध रखते थे. हिमालयी दर्रे से टिड्डी के दल की तरह भारत पर हुण आक्रमण मैदानों तक भी होते रहे है.रूपवती कन्या को सामाजिक विरोध के कारण अपना प्राण गंवानी पड़ी थी. बर्निया गाँव का उत्तर दिशा की ओर स्थित मेसर देव का जिसमें शिवशक्ति प्रतिष्ठापित मंदिर है,जिसमें नौर्त (जागरण) देवतरण के कार्यक्रम चलता है तत्पश्चात् गाँव से पश्चिम दिशा की और घने जंगलों के बीच नागपंचमी के दिन मेसर कुण्ड में मेसर देव की पूजा-अराधना की जाती है, जिसमें महिषि बलि प्रथा बौन, बौद्ध पूजा विधि विधान का स्पष्ट संकेत भी देती है. बरपटिया जनजाति में पूर्व में प्रभुत्व बर्नियाओ का रहा था, धीरे-धीरे पापडा, चूलकोटिया, गोल्फियाल जाति भी प्रभाव में दिखाई देते है यदपि यह प्रभाव अपने क्षेत्र तक सीमित हो. पापडा तथा बर्नियों में सदैव प्रतिद्वंद्विता बनी रही. आज भी वह मल्लयुद्ध स्थान, रास्ता झुगरू गौ्र,( लड़ने-झगडने हेतु खेत की उपलब्धता )झुगरू बौ्ट( झगडे वाले रास्ते में मिलना )उन्ही बातों की याद दिलाती है. आज से कुछ वर्षों पूर्व डांडाधार, जैती गाँव के मेलों में जब गाजे-बाजे के साथ दोनो गांवों से लोग मंदिर में प्रवेश करते थे तब भी तना-तनी का माहोल अतीत का स्मरण कराती थीं. बर्निया गाँव से प्राप्ति जानकारी से मालूम पड़ता है कि आज भी 10,15 बर्निया जनजाति परिवार तथा 20,25 परिवार अनुसूचित जाति के लोग भी गाँव में रहते हैं,जिनका पारस्परिक संबंध सदियों से बना है.धार्मिक,सामाजिक मान्यताए जनजातीय के अतिरिक्त हिंदू संस्कृतिकरण की तरह है. गाँव के लोग सरकारी नौकरी पैशा तथा कुछ अच्छे पदों में भी आसीन है.गाँव में रहन वाले लोग कृषि,पशुपालन, मजदूरी कर अपने आजिविका चलाते हैं.पूर्व के पधानचारी प्राप्त पद पधान राठ श्री किसन सिंह बर्निया का परिवार भी गाँव में रहता है, गाँव के लोग पढ़े लिखे सौहार्दता से मिल-जुल कर रहते हैं मोटर मार्ग ही निर्मित मेसर देवता पूजा-पाठ सामाग्री, बर्तन रखने का मंदिरनुमा छोटा सा कमरा बना है.बरपटिया जनजाति के संस्कृति, सांसकृतिक इतिहास को जानने की जिज्ञासा स्वयं बरपटिया समाज के लोगों को भी है.
वर्तमान समय में जोहार घाटी के तिब्बत व्यापार तक जाने वाले लोगों की गिनती अंगुली में की जा सकती हैं. घाटी की चहल-पहल, प्रत्येक गाँव से तिब्बत जाने वाले छोटे- बड़े व्यापारीयों को लोग गाँव से वलकिया (गाजे-बाजे के साथ स्वागत ) कुछ दूर तक जाकर विदा करते थे. यहाँ के व्यापारी भी अन्य घाटी यों की व्यापारीयों की तरह हिमालय के वार-पार क्षेत्रों मे दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुओं की आपूर्ति करते थे. तिब्बत व्यापार के लिए माल वाहक के कार्य भेड़-बकरी,घोड़े-खच्चर, जूबू,, चौंर (याक) ही प्रमुखतया थे.निर्यात- कपड़ा, अनाज, किराना सामान, भेली (गुड़) वस्तु विनमय के अतिरिक्त नगद धनराशि देकर भी किया जाता था. मंडी तथा मित्र तक पहुचाकर वस्तु विनमय का व्यापार प्रमुखतया था. आयात- नमक, ऊन, सोना- सूहागा, चंवर पूंछ आदि किया जाता था.व्यापार का इतिहास पुराणों में भी तंगण-पतंगण के उल्लेख के रूप में देखी जा सकती हैं. चीन द्वारा तिब्बत राज्य पर अपना अधिपत्य के चलते सन् 1962 में शौकाओ के सदीयों से चलती आ रही व्यापार पर विराम लग चुका था तभी से जोहार के समृद्धशाली इतिहास तथा जोहार के बर्बादी की कहानी लिखना प्रारंभ हो गया था. जोहार के शौकाओं को भारत तिब्बत एजेंट गरतोक द्वारा 1955 में व्यापार करने की अनुमति मिलने के पश्चात अपने युवा काल 19 वर्ष के उम्र में श्री भीम सिंह बृजवाल जी तिब्बत व्यापार जाने हेतु उत्सुक, अपने हम उम्र साथी लछम सिंह बृजवाल, रतन सिंह बृजवाल,बड़े भाई प्रेम सिंह बृजवाल के साथ अपने पिता जसौद सिंह बृजवाल के आज्ञा से तिब्बत जाने के लिए तैयार हो गये. जो आज नब्बे बंसत पार कर चुके अपनी मुह जबानी बताते हैं. बिल्जू ग्राम से व्यापारी दल को गाँव के लोग वलकिया (गाजे-बाजे से स्वागत) कर गाँव से कुछ दूर तक विदा करते थे. हम भी उसी तरह विदा हुए, हम केवल घोड़ा-खच्चर में जौं, उवा लेकर एक याक (चंवर) याक के साथ तिब्बत यात पर थे. सबसे आगे याक तथा उसकी विशिष्ट विशेषता, कुदरत की देन यह जानवर चलते समय रूकने का नाम नहीं लेता है्.आगे- आगे मार्ग दर्शक का काम कर रही थी.पहला पडाव दुंग नामक स्थान पर रहा.कठिन कंकड़-पत्धर, पथरिली, बर्फ के रास्ते भी अति कठिनाइयों भरा राह भी सुखद अनुभूति ही करा रही थी. जो उनका प्रथम व अंतिम यात्रा थी. तीन धूरा (चोटी) जहाँ जान गंवाने में भी देर नही लगती थी. ऊंटाधूरा, जयंती, किंगरी-बिगंरी जिसे किसी भी रूप में एक दिन में पार करना अनिवार्य था. जिसे हम डेथ पांइट भी कह सकते है. एक ही दिन में पार कर लिया गया, उसी बीच गंग पानी से किंगरी-बिगंरी , दुंग, छिरतिंग, चिलमता, मानीथंगा, खिमलिंग, गुरगम, मिसर, बम्बाडोल ज्ञानिमा तक रास्ते, पडाव दुर्गम,बफीले रास्ते जहाँ चलते काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. जहाँ भेड- बकरियाँ का बर्फ में डुबने तक की स्थिति आ सकती थी. किंतु हमारे पास सिर्फ घोड़े,खच्चर ही थे.बस अंतिम चोटी किंगरी-बिगंरी पहुचकर कैलाश पर्वत दर्शन का मनोरम दृश्य दृष्टिगत नज़र आने लगी. सभी गर्खाओं के मित्र की तरह बृजवालों के मित्र खिमलिंग स्थान पर डेरा डाले थे.चंवर गाय के बालों से बनाया तम्बू जिसमें अत्यधिक गरम रहता था. वहाँ बौद्ध मठ (गुम्फा) का दर्शन व पूजा- पाठ करके आगे का रास्ता भी तय किया गया. रास्ते में हमें अन्य गर्खा(जाति) के लोग जोहार के समाजसेवी व्यक्ति धरम राय के बड़े सुपुत्र बाला सिंह पांगती, हयात सिंह पांगती, उन्हीं के साथ साथ उमेद सिंह निखुर्पा भी मिल गये थे. तिरछापुरी,सिसर से दायीं तरफ की ओर बगल में हमें अपने मित्र मिल गये थे. जिन्होने चंवर गायों के बालों से बने मोटे तम्बू बनाकर डेरा डाला था. जो हमारा ही इंतजार कर रहे थे.ज्ञानिमा मंडी में पहले से पिताजी जसौद सिह, दीवान, सिंह तथा गोबर्धन सिंह,(बड़ा व्यापारी)जसवंत सिंह, जगत सिंह,(सेठ) मोहन सिंह धूरा वाले अपनी दुकान सजाऐ बैठे थे. दोनों ओर से मित्रजनों का मिलन स्यो-ढोक (प्रणाम) का आदान-प्रदान के बाद थोड़ी देर आराम करने के पश्चात हुनिया मित्र द्वारा आवाभगत में समक्ष सभी के लिए थाली में पकाया हुनकारा भेड़ का गोस्त व सत्तू परोसा था, हम सभी ने सहर्ष स्वीकार कर ग्रहण किया. अपने मित्र साथियों से मिलकर हम सभी ने तिब्बती बकरी हुनकारा,से बाल उतारने में सहयोग भी किया, 120 बिल्ची तैयार कर रूपये ढ़ाई (2=5०) की दर से नगद खरीदा था. दो- तीन दिन ठहरने के पश्चात जब घर वापसी की सोच रहे थे तभी तीन दिन भारी बर्फबारी के कारण यही रूकना पड़ा. ज्ञानिमा व्यापारी मंडी में याक का आराम दायक आंनदित सवारी, घुमते- फिरते रहना जिसकी यादें भुले नहीं भुलाया जा सकता है,कुछ दिन रूकने के पश्चात अपने गाँव बिल्जू वापसी हुई.जोहार से तिब्बत आने -जाने में लगभग आठ-दस दिन का समय अवश्य लगता है. श्री भीम सिंह बृजवाल जी से उनके तिब्बत यात्रा के विषय में बातचीत, जिक्र करने पर भावुक हो जाते है, वे तिब्बत यात्रा की सुखद अनुभूति को संजोये रखना, कभी भूलना नही चाहते हैं.आज वे स्वयं सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त है तथा दोनों सुपुत्र श्री गिरीश सिंह व श्री प्रकाश सिंह बृजवाल जी अच्छे सरकारी नौकरी पेशा उच्च ओहदे पद पर आसीन है.शहरों में निवास करते है.किंतु भीम सिंह बृजवाल जी का पैतृक भूमि प्रेम, पुरखों के विरासत को खोना किसी प्रकार से नागवार है.शहर का जीवन उन्हें रास नहीं आता है वे अपनी धर्मपत्नी श्रीमती तुलसी देबी बृजवाल संग पुंगराव घाटी के फ्लांटी गाँव में रहते है इसी घाटी में एक और बुजुर्ग व्यक्ति श्री नारायण सिंह बृजवाल जी भी ग्राम मुसरिया में भी रहकर अपनी थाती प्रेम का मिसाल दे रहे हैं. और तिब्बत जोहार घाटी के विषम में अच्छी जानकारी रखते हैं.आज हमारे जीते- जागते धरोहरों, बुजुर्गों को सदैव नमन करता हूँ. जगदीश सिंह बृजवाल