शौका बोली व भाषा

गजेन्द्र सिंह पांगती
जोहार से विस्थापन के बाद शौका संस्कृति जिस तरह विलुप्ति के कगार पर पहुँच गयी है उससे युवा व वृद्ध सभी शौका चिन्तित है। अन्य लोगों की तरह मैं भी मौका मिलते ही शौका संस्कृति के संरक्षण और समवर्धन की आवश्यकता पर अपने विचार प्रकट करता रहता हूँ। लेकिन अभी तक इस विषय में कुछ जागरूकता पैदा होने के अतिरिक्त कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पायी है। इसका बहुत बड़ा कारण भी है। यह कार्य उतना ही दुरूह है जितना सूखे जड़ वाले पेड़ को पुनर्जीवित करना लेकिन यह असम्भव भी नहीं है। आवश्यकता है तो केवल इस बात की कि प्रयाश सुनियोजित हो और उसमें निरन्तरता हो, प्रयास सार्थक हो इसके लिए यह जानना आवश्यक है कि संस्कृति के वे मूल तत्व और कारक कौन है जिनके छूटने से संस्कृति बिलुप्त हो गयी/हो जाती है।
संस्कृति के मूल तत्व है भाषा, धर्म, परम्पराएं, आस्थाएं, रीतियाँ, कुरीतियाँ, विश्वास, अंधविश्वास, आर्थिक क्रिया कलाप, पहनावा, खानपान आदि आदि। ऐतिहासिक कारणों से शौका भाषा जहाँ कुमाउंनी की सहोदर रही है वहीं शौकाओं का धर्म वैदिक धर्म का सरलीकृत रूप रहा है। तिब्बत व्यापार बन्द हो जाने से शौकाओं का परम्परागत आर्थिक क्रियाकलाप पुनर्जीवित करना असम्भव है। जोहार की ठण्डी आबोहवा में उपयोगी पहनावे का अनुपयोगी हो जाना भी स्वाभाविक है. परम्पराए, आस्थाएं, रीतियाँ, कुरीतियाँ, विश्वास व अंधविश्वास, खान-पान आदि समय के साथ बदलती रहती हैं। संस्कृति के समवर्धन के किये इसके मूल तत्वों को संरक्षित करने के साथ ही कुरीतियों व अन्ध् विश्वासों को दूर करते रहना आवश्यक है। संस्कृति में भाषा व ध्र्म सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। इन दोनों में भाषा का स्थान गुरुतर है। ध्र्म बदलने के बाद भी संस्कृति के संरक्षित रहने के कई उदाहरण मिल जायेंगे लेकिन भाषा छूटने के बाद संस्कृति के बचे रहने का शायद ही कोई उदाहरण मिल पाए। बंगाली मुसलमानों ने धर्म परिवर्तन के बाद भी अपनी भाषा नहीं बदली। यही कारण है कि उनमें बंगाली संस्कृति अब भी जीवित है। यही बात कुछ हद तक पंजाबी मुसल्वानों के लिए भी कहा जा सकता है। इसीलिए कहा जाता है, ‘भाषा छूटी तो संस्कृति छूटी।’ पलायन के साथ ही शौका अपनी भाषा पीछे छोड़ आये है। अब उनकी संस्कृति भी भूतकाल की बात होने के कगार पर है तो इसमें आश्चर्य ही क्या है।
इसलिए यदि शौका संस्कृति को संरक्षित करना हो तो हमें सबसे पहले उनकी भाषा व बोली को पुनर्जीवित व प्रचलित करना होगा। हमें उन कारकों का विश्लेषण करना होगा जिनकी वजह से शौका भाषा में लिखित साहित्य की रचना नहीं की जा सकी और उनकी बोली प्रचालन से बाहर हो गयी। कुमाउनी का सहोदर होने के कारण शौका भाषा को हिन्दी की उपभाषा कहा जा सकता है। मैं अपनी रचनाओं में इसका कई बार उल्लेख कर चुका हूँ कि यह कैसे बंगाली और नेपाली से मिलती है। कुमाउनी से इसमें जो भिन्नता है उसके मूल में उक्त दोनों भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। मैं तो यहाँ तक कहता रहा हूँ कि यदि बंगाली शब्दों में ओ की जगह अ का उच्चारण किया जाय या शौका बोली में अ की जगह ओ का उच्चारण किया जाय तो इन दो भाषी लोगों को एक दूसरे की भाषा समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। यह मैं अपने कलकत्ता प्रवास के अनुभव के आधार पर दावे के साथ कह सकता हूँ। दुर्भाग्य से अबसे पूर्व राजस्थानी की ओर मेरा ध्यान नहीं गया था। दुर्भाग्य इसलिए कि जोहार के मूल पुरुष धम सिंह रावत के राजस्थान से होने पर भी मैं इस पर गौर नहीं कर सका। इसका एक कारण सम्भवतय यह भी रहा है कि जब मैं 2 वर्ष के लिए जयपुर में था तो मेरा कार्य क्षेत्र मध्य और पूर्व राजस्थान था जहाँ हिन्दी खड़ीबोली का अधिक प्रभाव है जबकि पश्चिम व दक्षिण राजस्थान में शुद्ध राजस्थानी बोली व भाषा का प्रभाव है। यही कारण है कि महान लेखक व साहित्यकार बिजयदान देथा ने जब अपना रचना साहित्य राजस्थानी में लिखने का निर्णय लिया तो उन्होंने जो पहला कार्य किया वह था जयपुर से जोध्पुर जाना और अपने मूल गाँव में रहना ताकि वे मूल राजस्थानी भाषा की आत्मा में रच-बस सकें। उन्होंने राजस्थानी में अनेकानेक उपन्यास, लेख, समालोचनाएँ, संस्मरण आदि और हजारों कहानियां लिखीं है. मुझे पूर्व में उनकी एक-दो रचनाएं पढने का सौभाग्य मिला था. उनके कथानकों की रोचकता और रचना की सरलता व सुन्दरता से मैं अभिभूत हुए बिना नहीं रह पाया। इसलिए उनकी और रचनाएं पढ़ने की तमन्ना मेरे दिल में थी। कोरोना ने मेरी यह तमन्ना पूरी कर दी। इस महामारी से बचने के लिए मैं अपने पुत्र नवीन के आवास ‘मनाकार’, सल्ला, कसारदेवी, अल्मोड़ा आ गया। नवीन के भी बिजयदान देथा का प्रशंसक होने के कारण उसके पुस्तकालय में उनकी कई रचनाएँ उपलब्ध् थीं। उनमें से तीन-चार रचनाएं पढ़ने पर मुझे इस बात का आभास हुआ कि शौका भाषा व बोली राजस्थानी से अत्यधिक प्रभावित है। कई राजस्थानी शब्द, शब्दों का स्पेलिंग व उच्चारण, वाक्यों की संरचना आदि हिन्दी से भिन्न लेकिन हूबहू शौका बोली जैसी है। मुझे पक्का विश्वास है कि जब भी हम शौका बोली को संरक्षित करने का सुनियोजित प्रयाश करेंगे और शौका भाषा में लेखन के लिए उसके ब्याकरण, उच्चारण, स्पेलिंग आदि का मानकीकरण करेंगे तब मूल राजस्थानी भाषा से हमें बहुत मदद मिलेगी।
किसी भी भाषा व संस्कृति को जीवन्त रखने के लिए उसके मुहावरों व लोकोक्तियों का प्रचलन में रहना अति आवश्यक है क्योंकि इनमें उस संस्कृति की आत्मा बसती है। इनमें सम्बन्धित समाज का इतिहास, उसका अनुभव, उसका विस्वास, मान्यताएं, वर्जनाएं आदि का संकलन होता है। इसी प्रकार भाषा के जीवन्त रहने के लिए आवश्यक है उसका सरल व मध्ुर ;कर्णप्रियद्ध होना और उसका व्याकरण की शु(ता की परिध् िमें बोला और लिखा जाना। इसी अभीष्ट के लिए शौका लोग जब अपनी बोली में लिखते थे तो कुमाउनी शब्द और वाक्य रचना का सहारा लेते थे। इसके लिए बाबू राम सिंह के लेखों को पढ़ा जा सकता है। मेरे पिता जी भी मुझे हमेशा इसी तरह की शौका भाषा में पत्रा लिखा करते थे। अपनी बोली के प्रचलन और अपनी भाषा में स्वतंत्रा व उच्च कोटि के लेखन के लिए मूल भाषा का विश्लेषण, ब्याकरण का मानकीकरण, मुहावरों व लोकोक्तियों का संकलन, शब्दों का सरलीकरण आदि के लिए परिचर्चाओं, गोष्ठियों, शोधें आदि को आगे के लिए छोड़ते हुए मैं अभी केवल इस पर चर्चा करना चाहूँगा कि राजस्थानी भाषा में किस तरह हमारी भाषा से साम्यता है और राजस्थानी भाषा कैसे हमारे अभीष्ट में सहायक हो सकती है। जिन साम्यताओं का मैं उल्लेख करूंगा उनको पढ़ने और उन पर मनन करने के लिए यह बात हमेशा याद रखना होगा कि भाषा के सरल और मधुर (;कर्णप्रिय) होने के लिए संयुक्ताक्षरों के प्रयोग में नियंत्रण के साथ-साथ शब्दों के छोटे स्वरूपों का प्रयोग करना वांछनीय है। जैसे सुरेन्द्र दाज्यू और लक्ष्मण बूबू के स्थान पर सुरिदा व लछ्बू लिखना जितना सरल है उतनी ही मिठास है उसको बोलने और सुनने में। इस भूमिका के बाद अब बढ़ते हैं राजस्थानी और शौका संस्कृति और उनकी भाषा के अनेकानेक शब्दों में समानता ओर, साथ ही विचार करते हैं शौका बोली व भाषा को सरल तथा मध्ुुर बनाने के लिए राजस्थानी भाषा की कुछ विशेषताओं को अपनाने की आवश्यकता पर।
दोनों समाजों में समानताएं-
1-परदा प्रथा
2-महिलाओं द्वारा बिनाई वादन
3-हुक्के का प्रचलन
4-सत्तू का सेवन आदि आदि
दोनों भाषाओं में समान रूप से बोले व लिखे जाने वाले शब्द-
राजस्थानी शौका राजस्थानी शौका टिपण्णी
दीठ दीठ अदीठ —– अपनाए जाने योग्य
अदेर अबेर —– —– विपरीत अर्थ
मनचीती मनचितै,मनचैन अचीता —– अपनाने योग्य
कुछ वैसे ही शब्द-
अचैन, अच्यौत
बखत बखत, बखद ठौर ठोर जगह के अर्थ में
लच्छन लच्छन दरसन दरसन
भरम भरम दरद दरद
धरमी धरमी कौर कौर कौरगास के अर्थ में
बरस बरस जतन जतन
जत्ती जदी उनमान उनिजस उनमान अपनाने योग्य
जस तस जसे तसे किचकिच किचकिच
गार गारा, गौरो. लीपना लीपना
लोग बाग लोग बाग मुरकि मुरकि झुमका
चैमास चैमास ढील ढील देरी के अर्थ में
नौकर-चाकर नौकर-चाकर
राजस्थानी भाषा की शौका बोली-भाषा में अपनाए जाने योग्य विशेषताएं व शब्द-
राजस्थानी भाषा में संयुक्ताक्षरों का प्रयोग बहुत कम है। इस के कारण इसमें मिठास व सरलता है। शौका बोली में संयुक्ताक्षरों का अत्यधिक प्रयोग होता है। इससे यह लिखने में कठिन तथा बोलने में कर्णकटु लगता है। राजस्थानी भाषा की मिठास का एक और कारण है उसे उसी रूप में लिखना जिस रूप में उसे बोला जाता है। जैसे श और ष का कम से कम प्रयोग और उसके स्थान पर स का प्रयोग। हमें भी यही करना होगा क्योंकि हमारी बोली में भी स का ही अधिक प्रयोग होता है। यही नहीं ड़ के स्थान पर जिस तरह हम र बोलते हैं उसी तरह उसे लिखना भी होगा। ऐसा न किया जाना भी शौका बोली-भाषा के चलन से बाहर होने का एक प्रमुख कारण है। यही वह कारण है जिसकी वजह से हमारे पूर्वज अपनी भाषा में लिखने के लिए अल्मोड़े की कुमाउनी जैसी शैली का प्रयोग करते थे।
राजस्थानी से अपनाए जाने योग्य कुछ शब्द-
ऐसे अनेकानेक शब्द है। उनमें से कुछ शब्द शौका बोली में प्रयुक्त होते रहे हैं। आवश्यकता है तो केवल उनको चलन में रक्खे रहना। नीचे कुछ उदाहरण मात्र दिए गये हैं-
राजस्थानी शौका हिंदी
दरसन दरसन दर्शन
बरस बरस वर्ष
भरम भरम भ्रम
परियाप्त कापफी पर्याप्त
नितनेम रोजक नियम नित्य का नियम
दीठ दीठ दृष्टि
उछाह उछाल उत्साह
बरसा बारिस वर्षा
दरसाना देखौन दर्शाना
दिसावर दिसावर देश
चंदरमा जोन चन्द्रमा
बिणज ब्योपार वाणिज्य
सरूप समान स्वरूप
पिरास्चित परास्चित प्राश्चित
मानुस मनख मनुष्य
बिरमांड बरमांड ब्रह्माण्ड
बिरछ रूख वृक्ष
आदि आदि
पुनश्चः- हामर बोलि पेंल औले या हामर संस्कृति पेंल बचुल? मुर्गी पेंल औले या आन। ते बतौ ते बतौ हनेरे भे। ‘‘ते ठग में ठग द्वार कु ढग’’ क्वेले त बौटो लैने भे। सुरिदा, लछ्बु और डाक्टर हरू आछ्याल ‘‘किछ ला’’ (Whats App) मा आबन बोलि में लेखी बेर बौट लैन में लैगि रन। आमा, बाबा, दादा, भूली सबे औस्या। ऊनि दाकारै हिटा। लेकिन मलि में मेंल जू लेखी रछुं वीक खयाल कया। यदि यस कलात तमर लेख व बोलि मो धे मिठु हे जौल। फिर चाया हामर बोलि कस के सबनक मूख व कलम में औंछ. आब ढील क्याक छ ला? -गजे पांगती

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