जसमलसिंह-मंगलसिंह दरकोट में थी सबसे बड़ी फर्म

डॉ. पंकज उप्रेती
आज बाजार का स्वरूप बदल चुका है, ऑनलाइन कामकाज भी होने लगे हैं। कल्पना कीजिए उस दौर की जब आने-जाने के रास्ते बीहड़ थे और सामान ढुलान के लिये पशुओं का ही सहारा था। उन स्थितियों में दुर्गम क्षेत्र में कोई फर्म चलाना और लाखों की उधारी फंसी होने के बावजूद हंसते हुए झेलना। साथ ही प्रकृति से तालमेल बनाये रखते हुए व्यापार का तिब्बत से लेकर तराई तक सामंजस्य साधारण बात नहीं है। इस तरह के हालातों में जन्म लेने वाले डॉ. कुन्दन सिंह पांगती जी से आज की विशेष बातचीज है। डॉ. पांगती उस पीढ़ी में से हैं जिन्होंने अपनी आँखों से यह व्यापार और व्यवहार देखा है। यह प्रसंग आगे बढ़े इससे पहले पहले इनके बारे में बताते हैं- डॉ.पांगती के दादा हुए चन्द्र सिंह पांगती। चन्द्रसिंह जी रायबहादुर किशन सिंह के साथी थे। चन्द्र सिंह जी तीन भाई थे, जसमल सिंह, चन्द्र सिंह और मंगल सिंह। चन्द्रसिंह पांगती के सुपुत्र हुए बाला सिंह। पिता के निधन के बाद माता श्रीमती हेमा देवी पर बालासिंह की बड़ी जिम्मेदारी थी। उस दौर में घर के इकलौते बालक को देखते हुए जल्द ही इनका विवाह डोटिला की हरकी देवी से हुआ। ;स्व.हरकी देवी पांगती निधन 101 वर्ष की में इसी साल रविवार 26 अप्रैल 2026 को हुआ। (पिघलता हिमालय ने उनकी जीवनी पर काफी जानकारी दी है।) इनका संयुक्त परिवार मिलम दरकोट और भैंसखाल तक माइग्रेशन व्यवस्था में आवत-जावत करता रहा है। मुनस्यारी के दरकोट में जसमलसिंह-मंगल सिंह सबसे बड़ी फर्म हुआ करती थी। बालासिंह-हरकी देवी के पुत्र हुए कुन्दन सिंह, जिनका जन्म जनवरी 1947 में भैंसखाल में हुआ।

कुन्दन सिंह जी अपने बचपन के दिनों और बुजुर्गों को याद करते हुए बताते हैं- ‘भैंसखाल में जन्म के समय उन्हें मन्दिर में दिया गया और फिर उन्हें माता-पिता को सौंपा, क्योंकि इनके जन्म से पहले दो बच्चों के न बचने पर सहमे परिवार ने मन्दिर में सुपुर्द कर भगवान का आशीर्वाद चाहा। बचपन में इनका नाम गिरधर रखा गया। बाद में कुन्दन कहने लगे। इस प्रकार कोई गिरधर तो कोई कुन्दन कहता।’ इनके बाद भाई-बहनों में दमयन्ती (वृजवाल), चन्द्रा (मर्तोलिया), नवराज पांगती, कवीन्द्र पांगती हुए। इस प्रकार संयुक्त परिवार में यह सारे सदस्य भी थे।
बचपन की यादों को आगे बढ़ाते हुए डॉ. कुन्दन बताते हैं कि तिब्बत व्यापार बन्द होने से इसमें लगे लोगों की आर्थिकी खराब होने लगी थी। व्यापारियों की काफी पूंजी तिब्बत में फंसी रह गई। तब दरकोट में परिवार की फर्म ‘जसमलसिंह- मंगलसिंह’ मुख्य केन्द्र होता था। दूर-दराज से सभी लोगों को इसका आसरा था। फर्म के लिये काशीपुर से सुदामा लाल रामआश्रय, हृदयनाराण फर्म से कपड़ा आता था। इसी प्रकार हल्द्वानी की फर्म लालमणि खीमदेव से तम्बाबू सामग्री आती थी। सामान लाने के लिये पशुओं का समूह था। भेड़-बकरी भी दो प्रकार के होते हैं। 80-90 लक्खा थे और 500 से अधिक बकर। लक्खा तो सामान ढोने के लिये लगाए जाते थे और बकर अद्योली में देते थे। बकर ले जाने के लिये रिलकोटी जी, धपवाल जी और एक बसन्तकोट के थे। इसी तरह खच्चरों की देखरेख में धारचूला के श्रीराम कुटियाल और तिंकर के दिलीप सिंह भी थे। कपड़ा इत्यादि बड़ा सामान ढोने के लिये खच्चरों का उपयोग होता था। तिकसैन में पुराना ‘हयात सिंह होटल’ मशहूर हुआ करता था। डॉ.कुन्दन सिंह के पिता बाला सिंह की पधानचारी को आज भी लोग याद करते हैं। दरकोट ग्राम के लम्बे समय तक प्रधान रहे। इसके नाते भी दरकोट में दूर दराज से लोगों का जमावड़ा रहता था।
कुन्दन सिंह कक्षा 5 तक मिलम-दरकोट में पढ़ाई करने वाले बच्चों के दल में रहे हैं। तब इनके शिक्षक बासुदेव जी और बहादुर सिंह लस्पाल थे। कक्षा 5 बोर्ड परीक्षा का सेन्टर कव्वाधार में पड़ा था। मिलम जैसे सीमान्त क्षेत्र का प्राइमरी स्कूल भवन आज भी लोगों की कल्पना से परे हो सकता है। सुन्दर भवन, मुख्य द्वार, चाहरदीवारी, सुन्दर फुलवारी, फुटबाल के तीन मैदान इसमें थे। बैठने के लिये कुर्सियां। गुरुजनों के लिये बड़ी मेज। एकदम दूरस्थ में इतनी साज-सज्जा किस तरह हुई होगी। पांगती जी बताते हैं- तिकसैन का स्कूल तक नमजला में हुआ करता था। नमजला से तिकसैन बच्चों की टोली पेड़ लगाने जाती थी और घिंघारू की झाड़ से बाउण्ड्री लगाते थे। गुरुजनों की देखरेख में कालेज का सारा सामान बच्चों ने ही तिकसैन में ढोया था। छात्रावास में रहकर पढ़ाई करते थे। भोजन व्यवस्था के लिये धन सिंह कुक था। बारी-बारी से लड़के अपने घर से राशन लाते और सभी के लिये भोजन बनता था। इस प्रकार इण्टर विज्ञान का प्रथम वैच कुन्दन सिंह व साथियों का रहा। उस दौर के गुरुजनों में श्री पी.सी. पन्त एवं श्री पूरन चन्द्र पन्त जैसे विद्वान थे जिन्होंने छुट्टियों के दिनों में छात्रों को अपने घर बुलाकर तक पढ़ाया।
बचपन की इन तमाम यादों के साथ कुन्दन सिंह जी ने मेरठ मेडिकल कालेज और इलाहाबाद से पीजी किया। संयोग से टेªनिंग के लिये अल्मोड़ा आना हुआ लेकिन भाग्य में रेलवे की नौकरी थी। भारतीय रेलवे के मेडिकल में इनकी पोस्टिंग हुई। बनारस में सर्वाधिक समय 30 साल ईएनटी विशेषज्ञ के रूप में सेवा करने वाले डॉ. कुन्दन सिंह पांगती चार साल इंचार्ज रहे और अवार्ड भी मिला। दीवान सिंह टोलिया जी की सुपुत्री कुसुम जी के साथ इनका विवाह हुआ (आर.एस. टोलिया जी की बहिन हैं)। डॉ.पांगती की सफलता में श्रीमती कुसुम जी का योगदान बराबर रहा है। इनकी सुपुत्रियां रिचा, रौनी, रुचिरा भी मेडिकल क्षेत्र में योग्य हैं।
डॉ. पांगती बताते हैं- नौकरी के शुरुआती दौर में तब लखनउ से दो कोच चलती थी। टनकपुर तो रेलवे का मुख्य स्टेशन हुआ ही, चकरपुर ससुराल भी। ऐसे में बनारस से रेल का सफर पहाड़ से जोड़े रखने वाला ही था। रेलवे की ओर से मिलिट्री कैम्प का अवसर भी लगातार रहा और इन्हें मेजर पदनाम दिया गया लेकिन चिकित्सक के रूप में इन्होंने हमेशा डाक्टर पदनाम को ही सर्वोपरि रखा और सेवानिवृत्त होने के बाद भी चिकित्सा परामर्श के लिये तत्पर हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *