जल विद्युत परियोजना को लेकर सीमावासी मुखर

मुनस्यारी।
चीन सीमा पर जिले की पहली प्रस्तावित बहुप्रतिक्षित जल विद्युत परियोजना को लेकर सीमावासी मुखर हो गए है. इसी के चलते निगम की 120 मेघावाट की रुपसियाबगड़ – सरकारी भेल जल विद्युत परियोजना को वित्तीय स्कीकृति दिए जाने की मांग तेज हो गई है. जिपं सदस्य जगत मर्तोलिया ने आज प्रदेश के मुख्यमंत्री को इस आशय का पत्र भेजकर इस मांग को हवा दे दी है. कहा कि इस वित्तीय वर्ष में सीएम नहीं माने तो चीन सीमा क्षेत्र के लोग आंदोलन करेंगे.
उत्तराखंड जल विद्युत निगम ने इस चीन सीमा पर बनने वाले बहुप्रतिक्षित परियोजना का डीपीआर तैयार कर शासन को भेज दिया है. पिथौरागढ़ जिला चीन सीमा से लगा हुआ है. जिले के व्यास, चौदास, रालम व जोहार क्षेत्र चीन सीमा से लगा हुआ है. चीन सीमा के जोहार क्षेत्र से लगे इस क्षेत्र में प्रस्तावित यह परियोजना चीन सीमा पर भारत की पहली विद्युत परियोजना होगी.
जिपं सदस्य जगत मर्तोलिया ने कहा कि इस परियोजना के बनने के बाद चीन सीमा से लगे लास्पा, रिलकोट, मर्तोली, ल्वां,पांछू, गनघर, मापा, मिलम, बिलजू, बुर्फू, टोला, खिलांच,रालम सहित सेना व अर्द्ध सैनिक बलो की अंतिम चौकियों को भी बिजली मिलने का रास्ता सांफ हो जाएगा. इससे बेरोजगारी कम होगी तथा चीन सीमा क्षेत्र से पलायन भी कम होगा.
मर्तोलिया ने कहा कि चीन सीमा क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भी इस परियोजना का निर्माण किया जाना बेहद जरूरी है. कहा कि राज्य सरकार को इस परियोजना के संचालन से राजस्व मिलेगा.
जिपं सदस्य मर्तोलिया ने कहा हम क्षेत्रवासी इस वित्तीय वर्ष सरकार के फैसले का इंतजार करेंगे, उसके बाद चीन सीमा क्षेत्र के लोग आंदोलन कर सरकारो पर दबाव बनायेंगे.

अब लुप्त होते देख रहे हैं अपने ही ताम्र शिल्प को शिल्पी कारीगर

केशव भट्ट
बागेश्वर जिले के खर्कटम्टा गांव में कभी तांबे से बनने वाले बर्तनों की टन्न..टन्न की गूंज दूर घाटियों में सुनाई पड़ती थी, लेकिन वक्त की मार के चलते ये धुने अब कम ही सुनाई देती हैं. हांलाकि, आजादी से पहले की ताम्र शिल्प की इस अद्भुत कला को अब मजबूरी में इस गांव में तीन परिवार आज तक भी संजोए हुए हैं. लेकिन ताम्र शिल्प की उपेक्षा से ये कलाकार बहुत आहत हैं. रही बची कसर कोरोना काल के लॉकडाउन ने पूरी कर दी है.
देवलधार स्टेट के नाम से मशहूर जगह के पास ही है खर्कटम्टा गांव. मित्र जगदीश उपाध्याय ने एक बार बताया कि यहां कुछेक परिवार तांबे के बर्तन बनाने का काम करते हैं. जगदीश ने वहां के शिल्प कारीगर सुंदर लाल का नंबर दिया तो मैंने उनसे बात की. सुंदरजी से बातचीत में पता चला कि अब तो काम काफी कम है, गांव में अब तीन ही परिवार इस काम को करते हैं, उप्पर से लॉकडाउन ने रही बची कसर पूरी कर दी है. फोन में बातें करते हुए वो उदास से महसूस हो रहे थे. मौसम ठीक होने पर मैंने गांव में आने की बात कही. चारेक दिन बाद उन्हें फोन कर आने के बावत् पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी उनका सांथी मजदूरी में गया है दो दिन बाद आएगा तो हमारा आना ठीक रहेगा. दो दिन बाद सुबह उनका फोन आया, ‘साबजी आज आ जाओ.. सांथी आ गया है..’ उस दिन मैंने असमर्थता जताई तो मायूस हो वो बोले कि उनका सांथी सागर आज का अपना काम छोड़कर आया है, तो मैंने उन्हें दोपहर तक गांव पहुंचने का वादा किया. दोएक घंटे में काम निपटाने के बाद खर्कटम्टा गांव का रूख किया. पौड़ीधार से आगे पाटली पहुंचने के बाद सुंदरजी से फोन पर गांव के रास्ते बावत् पूछा और पाटली से खर्कटम्टा गांव की मीठी पैदल चढ़ाई नापनी शुरू कर दी. इस गांव के ग्रामप्रधान मनोज कुमार भी हमारे सांथ हो लिए. खेतों के किनारे के रास्ते में देखा तो धान की फसल खराब हो चुकी थी. एक तो कोविड काल और उप्पर से किसानों की मेहनत में प्रकृति की ये मार.
गांव की गलियों को पार किया तो पेड़ों के झुरमुट में आंगन में चारेक कुर्सियां लगी कुछेक लोगों को इंतजार करते पाया तो अनुमान लगाया कि यही सुंदरजी होंगे. तब तक पसीने से तरबतर हो प्रधानजी भी पहुंच चुके थे. पेड़ों की छांव में चारेक कुर्सियां लगाई गई थी. सुंदरजी और अन्यों से अभिवादन के बाद कुर्सियों में बैठे तो सुंदरजी आंगन के किनारे में बैठने लगे तो उन्हें भी कुर्सी में बैठने की गुजारिश की तो सकुचाते हुए वो कुर्सी में समा गए. तभी एक बालक ट्रै में कोल्ड डिंक के सांथ ही कुछेक गिलास ले आया तो सुंदरजी ने हमसे इसे लेने का आग्रह किया.
अनमना सा हो मैंने उन्हें पानी पीने की ईच्छा जताई तो कुछेक पल उन्होंने हैरान हो नजरों ही नजरों में आपस में बात की और पानी का लोटा ले आए. थोड़ा सा पानी गिलास में डाला तो मैं इंतजार करते रहा कि कब ये गिलास को पूरा भरें. थोड़ा पानी डालने का उनका आशय समझ मैंने लोटा पकड़ा और गिलास भरकर दो बार पानी पी उन्हें आश्वस्त कराया कि मैं भी हाड़—मांस का बना उन्हीं की तरह ही इस धरती का इंसान हूं.
मैं बैठा तो उनके सांथ था लेकिन मन कहीं पीछे चला गया था. बचपन में सिर के बालों की छटनी के बाद पीछे की ओर कुछेक बालों के गुच्छे को छोड़ दिया जाता था, जिसे चुटिया नाम दिया गया. हर बार वो बढ़ते चले जाते तो उस गुच्छे में गांठ लगाने की कोशिश की जाती थी, जो कभी सफल नहीं हो पाती थी. सांथियों के सांथ ही मास्टरजी के लिए यह एक अमोघ अस्त्र होती थी जिसे खींचकर जिंदा मां—बाप के सांथ ही धरती से गायब हो चुके आमा—बूबू के भी साक्षात दर्शन स्कूल में ही हो जाते थे. इस पर दु:खी हो मैं खुद ही चुपचाप उस शैतानी झुरमुट को दराती से काट कर छोटा कर लिया करता था. बाद में चप्पल के सांथ दोएक मुक्के की धमक भी पीठ में पड़ती थी, लेकिन मैं अपनी आदत से बाज नहीं आता था. बचपन में हरएक वो काम करने में मजा आता था जिसके लिए सख्त मनाही होती थी. ये सिलसिला वर्षों तक चलते रहा. एक बार बगावत कर डाली और बमुश्किल इससे मैं मुक्त हुवा तो असीम शांति मिली.
मन के भटकाव से वापस लौटा और मैंने सुंदरजी को समझाया कि, हम पर्वतारोही हैं और पर्वतारोहियों का कोई धर्म—जात—पात नहीं होता, हमारा धर्म तो सिर्फ इंसानियत का ही होता है. मेरी बातों से वो थोड़ा सहज हुए.
सुंदरजी से बातों का दौर चला तो वो अपनी पुरानी यादों में खोते चले गए. परिवार के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि, ‘बेटियों की शांदी हो गई, कुछेक साल पहले एकलौता बेटा भी दुनियां छोड़ उन्हें अकेला कर गया..’
मैंने तांबे के उनके पुश्तैनी ईतिहास के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि, ‘तांबे से बर्तन बनाने का काम तो उनकी पुश्तों में आजादी से पहले से ही होता आ रहा है. पहले तांबे का काम हर घर में होता था. कई बार हम कुछेक सांथी कारीगर गांव—गांव जाकर तांबे के पुराने बर्तनों की भी मरम्मत को चले जाते थे. गांव—घरों में टूटे गागर, तौले हम ठीक कर देते तो उन्हें भी राहत मिलती और नई डिमांड भी मिल जाती थी. हमारी आजीविका भी चलती रहती थी. बाद में धीरे—धीरे युवा पीढ़ी बाहर नौकरी में लगे तो यह काम कम होते चला गया. अब गांव में सिर्फ सागर, नंदन प्रसाद और मुझे मिलाकर तीन परिवार ही इस काम को कर अपनी आजीविका जुटाने में लगे हैं. लॉकडाउन के बाद से अब ये काम भी ठप्प पड़ गया है. अब सभी लोग मजदूरी कर परिवार का भरण—पोषण करने में जुटे पड़े हैं. सरकारें आती—जाती रहती हैं, हां! हमारे काम में मदद करने की बात पर आश्वासन जरूर देती रहती हैं, लेकिन किया किसी ने कुछ भी नहीं. हमारे क्षेत्र के नेता तो विधायक, सांसद भी रहे.. वोट के वक्त इन्हें भाई—भतीजावाद याद आ जाने वाला ठैरा.. जीतने के बाद ये फिर कभी दिखने ही वाले नहीं हुए..’
सुंदरजी ने अपने सांथी सागर को कारखाने में आग जलाने को कहा और हमें लेकर अपने कारखाना भट्टी में गए. भट्टी दहकने लगी तो उन्होंने चिमटे से तांबे के अधबने हुड़के को आग की लौ में तपाना शुरू कर दिया. हुड़का लाल हुवा तो उन्होंने उसे अपने औजारों से कलात्मक ढंग से हुड़के की शक्ल में ढालना शुरू कर दिया. ठंडा करने के बाद उसे जब साफ किया तो तांबे की सुनहरे चमक में वो हुड़का दमक उठा.
मैं उनके काम को देख सोचने लगा, आग में तपने के बाद तांबे को कुशल कारीगरों के हाथ जब लगते हैं तो वो हर रोज की दिनचर्या में काम आने वाले नाना प्रकार के बर्तनों में ढलते चले जाते हैं.
तांबे की प्लेट से किस तरह से नाना प्रकार के बर्तन बनते हैं उन्होंने हमें इस बारे में बताया. उनसे बातों में मालूम हुवा कि, खर्कटम्टा गांव को ताम्र शिल्पियों के गांव के नाम से जाना जाता है. आजादी से पहले खर्कटम्टा समेत जोशीगांव, देवलधार, टम्टयूड़ा, बिलौना आदि गांवों में ताम्र शिल्पी, तांबे से परम्परागत तरीके के उपयोगी बर्तन गागर, तौले, वाटर फिल्टर के सांथ ही पूजा, धार्मिक अनुष्ठान एवं वाद्य यन्त्र, तुरही, रणसिंघी बनाते थे. इस काम में महिलाएं भी उनकी मदद किया करती थी. तब ताम्र शिल्प उनका परम्परागत उद्यम माना जाता था. आजादी के बाद यह उद्यम काफी फैला भी और अपने औजारों को सांथ लेकर शिल्पी भी गांव—गांव जाकर लोगों के तांबे के पुराने बर्तनों की मरम्मत किया करते थे. तांबे व पीतल को जोड़कर बने गंगा जमुनी उत्पाद और पात्रों के विभिन्न हिस्सों को गर्म कर व पीटकर जोड़ने की तकनीक इस शिल्प व शिल्पियों की खासियत होती है. सुंदर लाल के सांथी सागर चन्द्र का कहना था कि अब गिने-चुने कारीगर ही विपरीत परिस्थितियों में भी अपने इस पैतृक व्यवसाय को जीवित रखे हुए हैं. वो बताते हैं कि तांबे से वो गागर, तौला, फिल्टर, परात, सुरई, फौला, वाद्ययंत्र रणसिंह, तुतरी, ढोल, मंदिर की सामग्री व शो-पीस आदि बनाते हैं जो कि अत्यंत शुद्ध माने जाते हैं. हांलाकि घरेलू ताम्र शिल्पियों की आजीविका पर मशीनी प्लांटों में बन रहे सामान से भी असर पड़ा तो है लेकिन अभी भी लोग हाथ से बनाए तांबे के बर्तनों को ही ज्यादा तव्वजो देते हैं.
पुराने दिनों को याद कर सुंदरजी बताते हैं कि, ‘हम तीनों ने बीस साल तक रामनगर में कई बनियों के वहां काम किया. तांबे के बर्तनों की बहुत मांग होती थी. तब नेपाल समेत बड़े महानगरों में भी काफी सामान जाता था. बाद में हम अपने गांव में वापस चले आए. यहां भी हम मिलकर काम करते थे और पचास से साठ हजार रूपयों तक की बिक्री हो जाती थी. अब काम कम हो गया है. नई पीढ़ी का झुकाव मशीनों से बनी चीजों की ओर ज्यादा होने लगा है. जबकि हाथ से बने तांबे के बर्तन काफी मजबूत और शुद्वता लिए होते हैं.’
गौलाआगर में प्राथमिक विद्यालय में अध्यापक के पद पर तैनात खर्कटम्टा क्षेत्र के निवासी अध्यापक संजय कुमार बताते हैं कि, चन्द्रवंशीय राजाओं के जमाने में उनके पूर्वज भी तांबे के सिक्कों को ढ़ालने का काम किया करते थे.
ताम्र व्यवसाय को उसकी पहचान दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने एससीएसटी हब योजना बनाई है ताकि ताम्र शिल्पियों को इसका फायदा मिल सके. इस योजना के तहत हस्तनिर्मित तांबे से बने पूजा पात्रों को चारधाम में बेचे जाने की योजना है. अब ये अलग बात है कि इस योजना से स्थानीय शिल्पियों को रोजगार मिलेगा या फिर ये काम भी मशीनों के हवाले कर दिया जाएगा.
शिल्प कारीगर सुंदर लाल और उनके सांथियों को उनकी शिल्पकला के लिए पूर्व में उत्तराखंड सरकार के सांथ ही उद्योग विभाग से भी सम्मानित तो किया गया लेकिन उसके बाद उनकी किसी ने भी सुध नहीं ली. उम्र के इस पड़ाव में भी वो आजीविका के लिए तांबे में अपना हुनर निखारने में लगे ही रहते हैं. उन्हें बस मलाल इस बात का है कि उनकी ये कला उनके सांथ ही लुप्त होने जा रही है. जबकि वो कई बार विभाग से कह चुके हैं कि वो मुफत में अपनी जमीन देने को तैंयार हैं बशर्तें सरकार यहां शिल्प ट्रैनिंग सेंटर तो खोल दे.

9 सितम्बर हिमालय दिवस- हिमालय बचाओ प्रतिज्ञा

डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट
आधुनिक समय में वैज्ञानिक हिमालय की तमाम अनुकूलताओं का अध्ययन
कर अधिक से अधिक लाभ लेने की खोज में लगे हुए है, परन्तु जब हिमालय की
सुरक्षा का प्रश्न उठता है तो उस पर चिंता अवश्य व्यक्त की जाती है पर इस मुद्दे
को गम्भीरता से नही लिया जाता है। यही कारण है कि ऐवरेस्ट जैसी दुनिया
की सबसे ऊँची पर्वतश्रृंखला भी मानव गतिविधियों का केन्द्र बनी हुई
है। उत्तराखण्ड हिमालय से लेकर हिमाचल, जम्मू-ंकश्मीर तथा पूर्वोतर
हिमालय की विभिन्न पर्वत श्रृंखलाओं को फतेह करने की प्रतिस्पर्धा लगातार
बढ़ती जा रही है। फलस्वरूप, पर्वतारोहियों, सौन्दर्य प्रेमियों, पर्यटकों
द्वारा हिमालय पर्वत श्रृंखला ओं के साथ-साथ धार-खाल, नदी-नाले,
गाड-गदेरे विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक कचरे से पटते जा रही है जो कि
पर्यावरणीय दृष्टि से खतरनाक प्रवृति की ओर संकेत कर रहा है। वनों के
विनाश से हिमालय की अद्भुत संतुलनकारी शक्ति क्षीण होने से जलवायु
में अनेक विघटनकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं।
भूवैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय पर्वत श्रृंखला अभी नवीनतम पर्वत
श्रृंखला है जिसके कारण वह अपनी जगह पर ठीक से स्थिर नहीं हो पाई है।
हिमालय की स्थिर दिखने वाली इन चट्टानों की मोटी-मोटी परतों के
भीतर बड़ी-बड़ी दरारें है, जिनके संधिस्थलों में
भूगर्भिक हलचल के कारण उथल-पुथल होती रहती है। इसी कारण यहां
निरन्तर भूकम्प, भूस्खलन, भूक्षरण एवं बा-सजय जैसी घटनायें होती रहती
है और इनको बढ़ाने में बाह्य कारक जैसे; सड़क एवं बांध निर्माण में
हो रहे विस्फोटों तथा भारी मशीनों का महत्त्वपूर्ण हाथ हैं।
क्योंकि पहले से नाजुक चट्टानों के सन्धिस्थल इन विस्फोटों से
और भी जीर्ण-शीर्ण हो जाते है जो भूकम्प आदि के झटकों को
सहन नही कर पाने के कारण एक बड़ी त्रासदी का कारण बन जाते हैं। एक ओर
जहाँ सभ्यता के साथ-साथ मनुष्य ने विकास के कई महत्त्वपूर्ण आयाम खोज
निकाले है, तो वहीं दूसरी ओर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करके उसने
सारे जैव-मण्डल में पर्यावरण असंतुलन की स्थिति पैदा कर दी है। पर्यावरण
में परिवर्तन के प्रमुख कारण बड़े पैमाने पर हो रहे औद्योगिकीकरण के
लिए वनों का कटान, परिवहन सुविधाओं के विस्तार के लिए सड़कों का
निर्माण, संचार एवं अन्य आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ आबादी में
बेतहाशा वृद्धि ने स्वच्छ पर्यावरण के संरक्षण में कठिनाइयां पैदा कर दी
है। प्राकृतिक रूप से बहने वाली वेगवान नदियों की धारा को मोड़कर
मनुष्य ने अपने विकास और उत्थान की अंधी दौड़ में प्राकृतिक
नियमों के विरूद्ध जो कार्य किये है। उसी का नतीजा है कि कुछ वर्षों से
प्रकृति में ऐसी घटनायें घट रही है जिनका शायद ही किसी को कभी
आभास रहा हो। लेकिन जिस प्रकार से प्रकृति धीरे-धीरे अपना विध्वंसक रूप
धारण कर रही है उससे स्वंय मनुष्य का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है जिसके
लिए वह खुद जिम्मेदार है।
हिमालय हमारी धार्मिक आस्था का आधार ही नही है, वरन् लाखों
प्रजाति के पेड़-पौधों, जड़ी-बूटियों और बहुमूल्य
जीव-जंतुओं का निवास स्थल भी हैं। हिमालय का आज हम जिस प्रकार
दोहन करते जा रहे है उससे हिमालय को भारी नुकसान पहुंच रहा है।
गाँधी जी ने कहा था कि ”यह धरती अपने प्रत्येक निवासी की आवश्यकताओं
को पूरा करने के लिए यथेष्ट साधन उपलब्ध करती है परन्तु व्यक्ति के लालच
की पूर्ति नही कर सकती है।” हिमालय से निकलनी वाली नदियां जीवन के लिए
अमृततुल्य है जिन पर देश की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी का जीवन निर्भर करता
है जो उनकी रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। देश की जलवायु एवं
मौसम को नियंत्रित करने के साथ ही उत्तरी ध्रुव की ओर से आने वाली
तेज एवं ठंड़ी हवाओं से भी हिमालय भारतीय उपमहाद्वीप की रक्षा करता
हैं। हिमालय अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण भारतीय उपमहाद्वीप
के लिए युगों-युगों से एक प्रहरी की भूमिका भी निभाता आ रहा है
जो हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है।
विश्व में भोगवादी व्यवस्था एवं मनुष्य की प्रकृति पर विजय पाने की
प्रतिस्पर्धा ने सम्पूर्ण हिमालयी पर्यावरण को तहस-नहस करके रख दिया है,
जिसके कारण आज प्राकृतिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा का प्रश्न
खड़ा हो गया है। यही नही विभिन्न प्रकार की पादप एवं जीव-जन्तुओं की
प्रजातियां जो लगातार इस जैव-ंउचयमण्ड़ल से लुप्त होती जा रही है, उनके
अस्तित्व को बचाये रखने के चुनौती भी सबके सामने है। विकास नदियों
में बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण, उद्योगों के नाम पर खनन, वन
उपज का शोषण एवं दोहन करके वे चीजें चलन में लाना चाहता है जिनकी
बुनियादी आवश्यकता तो नही है, परन्तु उनके उपभोग के द्वारा अधिक से
अधिक सुख-सुविधायें भोगना चाहता है जिसे विकास की दृष्टिसे प्रगति कहा
जाता है। लेकिन पर्यावरण की दृष्टि से अत्याचार, शोषण एवं विनाश का
प्रतीक है। जिसका दण्ड प्रकृति कभी जानलेवा गर्मी, सर्दियों में अत्यधिक
ठंड, बरसात में अनियंत्रित वर्षा, भूस्खलन, भूक्षरण, बा-सजय, बादल फटना,
हिमालयी सुनामी जैसे प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देती रहती है और यदि
यहीं स्थिति बनी रही तो आगे भी मनुष्य को प्रकृति के कोपभाजन बनने
से कोई नहीं बचा सकता है।
यहां प्रश्न उठता है कि जबसे हमने हिमालय बचाओं प्रतिज्ञा लेनी शुरू
की है तब से हिमालय के संरक्षण में क्या कोई परिवर्तन आया है या नही?
पर्यावरण दिवस के नाम पर प्रतिवर्ष बरसात के मौसम में स्कूल, कालेज,
महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों विधानसभाओं, संसद भवन एवं विभिन्न
सरकारी सस्थाओं में लाखों पेड़ लगाये जाते है जिनको लगाते हुए
खूब फोटो खीची जाती हैं पर इनमें कितने वृक्ष जीवीत हैं इसका किसी
को पता है? यदि वृक्षारोपण के समय लगाये गये पेड़ जीवीत है तो इन
संस्थाओं में गिनती के ही वृक्ष क्यों नजर आते है? और यदि हम उन
वृक्षों को बचा नही पाये हैं तो ऐसे वृक्षारोपण का क्या लाभ है? वन
विभाग भी प्रतिवर्ष वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाकर लाखों वृक्षों को
लगाता/लगवाता है आखिर हर वर्ष इतनी संख्या में वृक्षारोपण की आवश्यकता
क्यों पड़ रही है? क्या यह मात्र खानापूर्ति तो नही है? ऐसे में हिमालय
बचाओं की प्रतिज्ञा भी पर्यावरण दिवस की तरह प्रतिवर्ष प्रतिज्ञा लेने तक ही
सीमित न रह जाय? क्योंकि हिमालय में प्रतिवर्ष दावाग्नि से ही लाखों
पेड़-पौधे, जीव-जन्तु यानि पूरी जैव-विविधता नष्ट होती है जिसको
बचाने का हम कोई उपाय नही ढूंढ पाये है? क्योंकि वैज्ञानिक भी
धरती के बजाय दूसरे ग्रंहों पर जीवन की चिंता में रत है। इसीलिए सूर्य,
चन्द्रमा पर जीवन की खोज करने में तो सफल हो गये है पर धरती पर जीवन को
कैसे बचाया जाय इस पर सोचने का समय ही नही है। भविष्य की चिंता में हम
वर्तमान को खोते जा रहे है जबकि आज अगर सुरक्षित होगा तो कल अपने आप
खुशहाल होगा, परन्तु वास्तव में हम हिमालय के प्रति गम्भीर नही है।
अतः यदि हम हिमालय के वनों को केवल आग से ही बचा पाने में सफल हो
गये ंतो यही हिमालय बचाने की सबसे बड़ी प्रतिज्ञा होगी।
( असिस्टेंट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान,
अ. प्र. बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग)

पर्वतारोही पद्मश्री हुकुम सिंह पांगती

पि.हि.प्रतिनिधि
मुनस्यारी। पर्वतारोही पद्मश्री हुकुम सिंह पांगती को याद किया गया। क्षेत्रवासियों द्वारा स्मृति पार्क में स्थिति उनकी मूर्ति पर पुष्पांजलि दी गई और उनके कार्यों का उल्लेख किया। स्व. हुकुम सिंह के मूर्ति स्थापना दिवस पर आईटीबीपी व विभूति संस्थान द्वारा यह आयोजन किया गया था।
इस अवसर पर आईटीबीपी के मुनस्यारी प्रभारी सुभाष सिंह के नेतृत्व में जवानों ने पुष्पगुच्छ अर्पित किये। लक्ष्मण सिंह पांगती लछबू ने स्व. हुकुम सिंह की जीवन गाथा को सुनाया कि कितनी विपरीत स्थितियों में वह आगे बढ़े। आयोजन में श्रीरामसिंह धर्मशक्तू, हयात सिंह रावत, हरेन्द्र सिंह धर्मशक्तू, उषापति द्विवेदी, तारा पांगती ने विचार रखे। संचालय जगत सिंह मर्तोलिया ने करते हुए कहा कि समाज ने इस शहीद स्थल को अपने हाथ में लेकर नया लुक दिया है। इस मौके पर आईटीबीपी के उप निरीक्षक हीरा सिंह मर्तोलिया, नन्दा धर्मशक्तू, हेमा पांगती, बलवन्त पांगती, नीमा देवी, मथुरा मर्तोलिया, लक्ष्मण धर्मशक्तू, देवेन्द्र धर्मशक्तू , सीता लस्पाल, जानकी मर्तोलिया, हिमांशु सिंह धर्मशक्तू, नीमा पांगती सहित तमाम लोग मोजूद थे।
कोरोना काल में क्षेत्रवासियों द्वारा अति भव्यता के साथ इस कार्यक्रम कांे किया गया। सामाजिक दूरी रखते हुए सर्वप्रथम स्मृति पार्क की साफ-सफाई की। इसके लिये मुनस्यारी ब्वाइज द्वारा समाजसेवियों के सहयोग से इस पार्क को शानदार सजाया गया था।
बताते चलें कि पद्मश्री हुकुम सिंह पांगती की मूर्ति की स्थापना आईटी बीपी के तत्कालीपन डीआईजी मंगल सिंह दानू एवं डीआईजी हीरा सिंह पंचपाल द्वारा की गई थी। रक्षामंत्री बचीसिंह रावत एवं पुष्पा पांगती द्वारा 29 अगस्त 2003 को इसका उद्घाटन किया गया था।
सीमान्त के दरकोट ग्राम में 26 फरवरी 1938 को जन्मे हुकुम सिंह बचपन से ही पर्वतारोही बनने की चाह रखते थे। सीमा पुलिस में भर्ती होने के पश्चात उन्होंने पर्वतारोहण के क्षेत्रा को चुना और वे इसकी बुलन्दियों तक जा पहुंचे। जापान, ताईवान, ईरान और अन्तर्राष्ट्रीय पर्वतीय संघ के सात अभियान संयुक्त रूप से सम्पन्न कराने वाले इस पर्वतारोही ने 28 पर्वतारोहण अभियानों की योजना तैयार की और 14 अभियानों का नेतृत्व भी किया। इस पर्वतारोही को कराकोरम पर्वत श्रृंखला का विशेषज्ञ माना जाता था। सीमा पुलिस में रहते हुए वह कई बार राष्ट्रीय स्कीइंग चैम्पियन भी रहे।
हुकुम सिंह पांगती 1963 में गोरखा राइपफल में कमीशन अधिकारी के रूप मेें चयनित हुए और उन्होंने 1967 से भारत तिब्बत सीमा पुलिस में नौकरी शुरु कर दी। उन्होंने नेहरू पर्वतारोहण संस्था उत्तरकाशी, आर्मी स्कीइंग एवं पर्वतारोहण संस्था गुलगर्म, सोनमर्ग में प्रशिक्षण लिया। आस्ट्रेलिया से एडवांस माउण्टेन गाइड एण्ड रेस्क्यू टेªनिंग भी उन्होंने की थी। पद्मश्री सम्मान से सम्मानित पांगती जी ने वर्ष 1970 में त्रिशूल, मान्चेस्टर नाम्पा, 1985 में माउण्ट सासेर काकड़ी, 1989 में नौ देशों की माउंट नन-कुन, 1990 में ईरान की सबसे बड़ी चोटी माउण्ट देमावंद, 1972 में माउण्ट देववन, 1972 में ही पंचाचूली का नेतृत्व किया। इस अभियान के अलावा वर्ष 1973 में माउण्ट बालकुन, 1974 में माउण्ट शिवलिंग, 1976 में स्काइ त्रिशूल, 1990 में माउण्ट सासेर कांगड़ी, 1991 में माउण्ट कंचनजंगा पूर्वी छोर से, 1992 में एलबर्ट विले ;फ्रांस, इसी वर्ष माउण्ट एवरेस्ट पर फतह पर जा रहे पर्वतरोही दल का नेतृत्व किया।
1988 में इण्डियन माउण्टेनिंग पफाउण्डेशन के द्वारा उन्हें स्वर्ण पदक से अलंकृत किया गया। भारत सरकार ने उनकी उपलब्धियों देखते हुए वर्ष 1992 में पद्मश्री से अलंकृत किया। उ.प्र.सरकार द्वारा के द्वारा भी इस पर्वतारोही को यूपी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनके योगदान को देखते हुए भारतीय शीतकालीन खेल फैडरेशन ने इन्हें अपना सचिव बनाया था।

देवभूमि उत्तराखंड में देवी नंदा सुनंदा का होता गुणगान

भुवन बिष्ट
 इस समय पूरा विश्व वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से त्रस्त है और हर कोई ईश्वर से इस संकट अतिशीघ्र मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रहा है। कोरोना से निबटने के लिए सोशल डिस्टेंसिंंग व अपनी-अपनी सुरक्षा का ध्यान भी हर आमजनमास इस समय अपनाने का प्रयास कर रहा है। अनलाक में कुछ मंदिरों को भी पूजा अर्चना के लिए खोला गया है किन्तु फिर भी सभी कोरोना से बचने के लिए सोशल डिसटेंसिंग, हैंड सैनेटराईज, आदि इसके उपायों को अपना रहे हैं। इस समय मां नंदा सुनंदा की जयकारे के साथ मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती थी किन्तु महामारी कोरोना के कारण अभी लगभग सभी धार्मिक आयोजनों को रोका गया है और कोरोना से बचने के उपायों और नियमों को अपनाकर ही विधि विधान के साथ पूजा अर्चना की जा रही है। कोरोना के कारण सभी अपने अपने घरों से ही अपने आराध्य देवी देवताओं से कोरोना से मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं। देवभूमि में सदैव होता है अटूट आस्था का संगम। देवभूमि उत्तराखण्ड में हो रहे है आजकल मां नंदा सुनंदा के जयकारे । नंदा देवी समूचे उत्तराखण्ड गढ़वाल मंडल और कुमाऊं मंडल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं देवी अल्मोड़ा हो या नैना देवी नैनीताल व कुमांऊ के सभी शहरों व कस्बों में हो रहे है मां नंदा सुनंदा के भक्तिमय वातावरण से समस्त देवभूमि में नंदा देवी महोत्सवों की धूम मची हुई है। नंदा देवी मंदिर परिसर रानीखेत , प्रसिद्ध नंदा देवी मंदिर अल्मोड़ा, नैना देवी नैनीताल , पिथौरागढ़ , गरूड़, बागेश्वर, द्वाराहाट , चौखुटिया, सहित कुमांऊ एंव देवभूमि में सभी स्थानों में मां नंदा सुनंदा की कदली वृक्ष को लाकर स्थापना की जाती है और होता है गुणगान…
देवभूमि की मां नंदा दैण है जाये,
ओ माता सुनंदा तू दैण है जाये,..
              नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं। रूप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है। भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है। नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है। भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं। शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है। शक्ति के रूप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं। मान्यता है कि चंद्रवंशीय राजा के घर नंदा के रूप में देवी प्रकट हुईं. उनके जन्म के कुछ समय बाद ही सुनंदा प्रकट हुईं. इनके संदर्भ में हिमालय में एक मान्यता यह भी है कि राज्यद्रोही षडयंत्रकारियों ने उन्हें कुटिल नीति अपना कर भैंसे से कुचलवा दिया था. भैंसे से बचने के लिए देवी ने कदली वृक्ष में छिपने का प्रयास किया. इसी दौरान एक जंगली बकरे ने केले के पत्ते खाकर उन्हें भैंसे के सामने कर दिया. बाद में वही कन्याएं पुनर्जन्म लेकर नंदा, सुनंदा के रूप में अवतरित हुईं और राजद्रोहियों के विनाश का कारण भी बनीं. एक मूर्ति को नंदा और दूसरी को गौरा देवी की मान्यता प्राप्त है।
              किंवदंती के अनुसार एक मूर्ति हिमालय क्षेत्र की आराध्य देवी पर्वत पुत्री नंदा एवं दूसरी गौरा पार्वती की हैं। इसीलिए प्रतिमाओं को पर्वताकार बनाने का प्रचलन है। माना जाता है कि नंदा का जन्म गढ़वाल की सीमा पर अल्मोड़ा जनपद के ऊंचे नंदगिरि पर्वत पर हुआ था। गढ़वाल के राजा उन्हें अपनी कुलदेवी के रूप में ले आऐ थे, और अपने गढ़ में स्थापित कर लिया था। इधर कुमाऊं में उन दिनों चंदवंशीय राजाओं का राज्य था। 1563 में चंद वंश की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानांतरित की गई। इस दौरान 1673 में चंद राजा कुमाऊं नरेश बाज बहादुर चंद (1638 से 1678) ने गढ़वाल के जूनागढ़ किले पर विजय प्राप्त की और वह विजयस्वरूप मां नंदा की मूर्ति को डोले के साथ कुमाऊं ले आए। कहा जाता है कि इस बीच रास्ते में राजा का काफिला गरुड़ के पास स्थित झालामाली गांव में रात्रि विश्राम के लिए रुका। दूसरी सुबह जब काफिला अल्मोड़ा के लिए चलने लगा तो मां नंदा की मूर्ति आश्चर्यजनक रूप से नहीं हिल पायी, (एक अन्य मान्यता के अनुसार दो भागों में विभक्त हो गई।) इस पर राजा ने मूर्ति के एक हिस्से (अथवा मूर्ति के न हिलने की स्थिति में पूरी मूर्ति को ही) स्थानीय पंडितों के परामर्श से पास ही स्थित भ्रामरी के मंदिर में रख दिया। भ्रामरी कत्यूर वंश में पूज्य देवी थीं, और उनका मंदिर कत्यूरी जमाने के किले यानी कोट में स्थित था। मंदिर में भ्रामरी शिला के रूप में विराजमान थीं। ‘कोट भ्रामरी’ मंदिर में अब भी भ्रामरी की शिला और नंदा देवी की मूर्ति अवस्थित है, यहां नंदा अब ‘कोट की माई’ के नाम से जानी जाती हैं। लोक इतिहास के अनुसार नन्दा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुँमाऊ के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी। ईष्टदेवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी को पार्वती की बहन के रूप में देखा जाता है परन्तु कहीं-कहीं नन्दादेवी को ही पार्वती का रूप माना गया है। नन्दा के अनेक नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी। देवभूमि उत्तराखण्ड में समान रूप से पूजे जाने के कारण मां नंदा सुनंदा को धार्मिक एकता के सूत्र के रूप में देखा गया है। विद्वानों के अनुसार मां नंदा चंद वंशीय राजाओं के साथ संपूर्ण उत्तराखंड की विजय देवी थीं। हालांकि  कुछ विद्वान उन्हें राज्य की कुलदेवी की बजाय शक्तिस्वरूपा माता के रूप में भी मानते हैं।
        देवभूमि के सभी क्षेत्रों में मां नंदा देवी महोत्सवों की धूम मची रहती है और नंदा देवी महोत्सव में विभिन्न प्रतियोगिताओं आदि का भी आयोजन किया जाता है। देवभूमि सदैव ही देवों की तपोभूमि रही है । महोत्सव सदैव ही एकता के सूत्र में हमें बांधते हैं और प्रत्येक आयोजन महोत्सव भी कुछ न कुछ प्रेरणा अवश्य देते हैं । आधुनिक चकाचौंध में तेजी से आ रहे सांस्कृतिक शून्यता की ओर जाते दौर में भी यह महोत्सव न केवल अपनी पहचान कायम रखने में सफल रहे हैं वरन इसने सर्वधर्म संभाव की मिशाल भी पेश की है। पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी यह देता है नंदा देवी महोत्सव।एकता अखण्डता व सांस्कृतिक विरासत की पहचान महोत्सवों को संजोये रखने की आवश्यकता है।वैश्विक महामारी कोरोना के कारण सभी धार्मिक आयोजनों को सीमित कर दिया गया है तो अधिकाशं स्थानों पर कोरोना के सुरक्षा नियमों को अपनाकर ही पूजा अर्चना संपन्न करायी जा रही हैं। सभी जनमानस ईश्वर से वैश्विक महामारी कोरोना से जल्दी से जल्दी मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रहे हैं। शीघ्र ही इस वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से सभी जनमानस को मुक्ति मिल जायेगी और पूरे विश्व में पुनः खुशहाली आ जाये ,सभी जनमानस इसकी कामना कर रहे हैं।
 कुमांऊनी रचना (जय नंदा सुनंदा)
जय जय नंदा सुनंदा,  
                माता दिये वरदान। 
देवभूमि की माता प्यारी, 
                भौते छन महान। 
माता गौरी अवतारा, 
                 सदा माँ कहलायी। 
कदली सेवा में माता, 
                  हांम सब ल्यायी। 
अल्मोड़ा में नंदा देवी, 
                   माता नैना नैनीताला। 
करिं दिये माता आब, 
                जय देवभूमि खुशहाला। 
द्वार ऐंरीं भक्त माता, 
                करणीं सबै ध्यान।… 
जय  नंदा  सुनंदा,
                माता दिये वरदान। 
देवभूमि की माता प्यारी, 
                भौते छन महान।……
चारों ओर आब हैरै, 
                 माता की जयकारा, 
जो साँची मनल आयो,
                 माता सुण छै पुकारा। 
लाज माता हर बात, 
                 आब हामरिं धरिये, 
विनती हे नंदा सुनंदा,
                  यौ सफल करिये। 
भारत समृद्ध हैजो,  
                   गौं घर खुशहाला ।
माँ नंदा सुनंदा कैं, 
                   गुण सबैं गाला। 
मिटै दिये अन्यार माता,  
                   दिये आब ज्ञान। …
जय नंदा सुनंदा, 
                   माता दिये वरदान। 
देवभूमि की माता प्यारी,
                   भौते छन महान…..
                     रचनाकार -भुवन बिष्ट 
                     मौना, रानीखेत (उत्तराखंड )


रायबहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा

हरि ने हरे पिछड़े भूमिहीनों के दर्द
डॉ दुर्गा प्रसाद
अल्मोड़ा: एतिहासिक नगरी में एक सपूत ने जन्म लिया जिसका नाम था हरि प्रसाद टम्टा। उत्तराखंड के सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक रूप से पिछडे़ भूमिहीन शिल्पकारों को संगठित करने, हक-हकूक की लड़ाई लड़ने वाले अल्मोड़ा के रायबहादुर मुंशी हरि प्रसाद टम्टा ने सामाजिक सौहार्द की दिशा दी। असुविधा के उस दौर में अल्मोड़ा में जन सुविधाओं के लिए भी उन्होंने काफी संघर्ष किया। 19वीं शताब्दी के शुरू में समाज हित में संघर्ष करने वालों समाज सुधारकों में मुंशी हरि प्रसाद टम्टा का नाम भी प्रमुखता से शामिल है। वह आजन्म एक निष्काम कर्मयोगी की भांति परोपकार के कार्यो में जुटे रहे।
उन्होंने सामाजिक हितों व हक-हकूकों के लिए संघर्ष करते हुए उत्तराखंड में विभिन्न उप जातियों में बंटे उपेक्षित वर्ग के लोगों को एकजुट किया और उनके स्वाभिमान को जगाने का काम किया। भले ही रूढि़वादिता के कारण समाज में उन्हें कई बार अपमान का सामना करना पड़ा। अपमान की घटनाओं में
सन् 1913 में म्यूनिसिपल बोर्ड अल्मोड़ा में मुंशी हरि प्रसाद टम्टा के मामा कृष्ण टम्टा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए, तो उस दौर में रूढि़वादी विचारों के चलते विरोधी स्वर के जरिये अपमान सहना पडा। इसके अलावा सन् 1911 में जार्ज पंचम की राजनैतिक ताजपोशी पर बद्रेश्वर अल्मोड़ा में सजे जश्न कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित करने पर भी हरि प्रसाद टम्टा व उनके मामा को रूढि़वादिता के चलते अपमान का झेलना पड़ा। सन् 1925 में अल्मोड़ा में कुमाऊं व गढ़वाल के शिल्पकारों के सम्मेलन के दौरान भी नगर में अपमान का सामना करना पड़ा।
ऐसी घटनाओं के बावजूद वह अपने मकसद से डिगे नहीं, बल्कि सहनशील बनकर आगे बढ़े। उनकी सहनशीलता व धैर्य समाज में सामाजिक समरसता का भाव पैदा करता गया। उन्होंने अल्मोड़ा में बिजली, पानी, सडक, शिक्षा व स्वच्छता के लिए भी संघर्ष किया और सच्चे समाज सेवक के रूप में पहचान बनाई। उनके इसी व्यक्तित्व, सहनशीलता व समाज सेवा का परिणाम है कि आज भी उन्हें लोग भूले नहीं। पर्वतीय क्षेत्र में यातायात की व्यवस्था उस दौर में नगण्य थी, उन्होंने यह सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सन् 1920 में हिल मोटर ट्रांसपोर्ट की स्थापना अपने अनुज स्व. लालता प्रसाद के सहयोग से सर्वप्रथम आरंभ की। उनकी जयंती पर हर वर्ग के लोग एकजुट होकर उन्हें याद कर करते हैं। उनसे समाज सेवा की प्रेरणा लेकर सामाजिक समरसता की दिशा में कदम बढ़ाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

हिमालयी संस्कृति का परिचय- बारापटिया समाज की संस्कृति

पुस्तक समीक्षा
डा.पंकज उप्रेती
हिमालय संस्कृतियों का जनक है और आज भी इसकी आदि संस्कृति उपस्थित है। समय के साथ बहुत कुछ बदला है लेकिन बीज हमेशा अंकुरित होते हैं। हिमालयी संस्कृतियों में जोहार घाटी के जेष्ठरा बारापटिया समाज की संस्कृति भी इस प्रकार की पुरातन संस्कृति है। कभी गोरी नदी के दोनों ओर इस समाज का काफी जमजमाव था। इन्हीं का एक गाँव है- बोथी। बोथी के बोथियालों को जेष्ठरा यानी ज्येष्ठ/सयाना/बड़ा माना जाता है। जैसा कि सभी समाजों में प्रचलित है कि ज्येष्ठ को अधिक अधिकार दिये जाते हैं और उसकी जिम्मेदारी भी ज्यादा होती है। वही स्थिति बारापटिया ज्येष्ठराओं की भी रही है।
अपने समाज को आगे बढ़ाना, उसे सुरक्षित रखना ज्येष्ठ यानी बड़े का धर्म भी है। अपने इसी धर्म के पालन के लिये इस समाज के बुजुर्गों ने जब जोहार घाटी में कदम रखा तो यह जनशून्य स्थान उन्हें अनुकूल लगा। घोर जंगल और जंगली जानवरों के बीच हिमालय के कई रंग उन्होंने निहारे और तय कर लिया कि यहीं अपने घरौंध्े बनायेंगे। बस, फिर क्या था। कृषि योग्य भूमि को तराश कर खेतीबाड़ी की जाने लगी, पशुपालन किया जाने लगा। शान्तिप्रिय और आस्थावान लोग कैलास मानसरोवर के दर्शन को भी जाने लगे। व्यापार के सिलसिले में तिब्बत में भी इनकी यात्राएं होती थीं। इस प्रकार बारपटिया संस्कृति फैलती चली गई। यहीं से शुरू हुआ है ‘बारह पाट का घाघरा’ वाला किस्सा। याने इनके परम्परागत वस्त्राभूषण इतने भारी और रौबदार होते थे कि हर किसी के बस की बात नहीं। इस क्षेत्र के पुरुष बारह पाट का उफनी लमकोट बखुला और सिर में बारह हाथ लम्बी पगड़ी पहनते थे। महिलाएं बारह पाट घाघरा आघरा और सिर में सफेद खौंपी पहनती थी। जोहार-गोरीफाट के विभिन्न बाहर पट्टियों में सदियों से ज्येष्ठरा लोग बसे हुए थे। तेहरवीं-चैदहवीं सदी में इनका बड़ा व्यापारिक काम था। ज्येष्ठराओं में धील्ली गोल्फाल और हरपू बनिया बड़े व्यापारी बताये जाते हैं। किन्तु उच्च हिमालयी परिस्थितियों एवं तिब्बत क्षेत्र में लूटपाट की वहज से ज्येष्ठराओं ने व्यापार की अपेक्षा जमीदारी का कार्य अपना लिया। पुरातन संस्कृति के वाहक इन लोगों द्वारा दुर्गमता का वह स्वाद चखा गया जो इन्हें विपरीत स्थितियों में भी हौंसला देता है। आज भले ही समाज का फैलाव पहाड़ से मैदान तक हो चुका है और गाँव से शहर बनने की होड़ है लेकिन किसी भी समाज की जड़ें उसके मूल में होती हैं। उसका यह मूल उसका गाँव, उसकी संस्कृति है।
दुर्गा सिंह बोथियाल बारपटिया समाज के उन अनुभवी व बुद्धिजीवियोें में से हैं जिन्होंने वर्तमान के हालात और अवसरों को जानते हुए ‘‘बोथी’’ के बहाने अपनी संस्कृति को उजागर किया है। सीमान्त की दुर्गम स्थितियों से तपकर निकले दुर्गा सिंह जी बैंकिंग सेवा में रहे हैं लेकिन उनके लिखने-पढ़ने और समाज के लिये सजगता का भाव हिमालयी संस्कृति के एक हिस्से का परिचय करवा रहा है। ‘बोथी’ के बहाने यह यह एक दस्तावेज होगा। श्री दुर्गा सिंह जी के लेखन में ठैठ ग्रामीण परिवेश के शब्दों का आना स्वाभाविक है, जिससे इसकी संस्कृति और सांस्कृतिक झांकी को समझना आसान हो जाता है। वह अपने बचपन के जिये हुए को इस पुस्तक की भूमिका में धाराप्रवाह लिखते हैं और अपने बुजुर्गों को याद करते हैं। बोथी में बसासत की कहानी इतनी रोमांचक और सच्ची है कि वह पुरातन समाज के सच्चे रिश्तों को उजागर करती है। बोथियाल द्वारा लोहार को किसी सुरक्षित और उन्नत स्थान की खोज के लिये भेजने पर लोहार ठीक उसी प्रकार अपने गुसांई के लिये निकल पड़ता है जैसे भगवान राम जी के आदेश पर हनुमान निकल पड़ते थे। हनुमान की सी सेवा और भक्ति हम बोथी के लोहार की भी देखते हैं।
इस पुस्तक में ‘पारिवारिक वृक्ष’ के रूप में श्री दुर्गा सिंह जी ने बुजुर्गों से लेकर वर्तमान पीढ़ी तक जिस प्रकार उल्लेख कर दिया है वह आने वाली पीढ़ियों के लिये महत्वूपर्ण होगा। साथ ही ‘लोहार’ परिवार की भूमिका को उन्होंने बहुत आदर के साथ बताया है। उनकी भी पीढ़ियों का उल्लेख इसमें है, जो सीमान्त क्षेत्र के उन लोगों के बारे में जानकारी दे रहा है अपने हुनर के अलावा अपनी परम्परा को बनाये रखने में निरन्तर रहे हैं।
श्री बोथियाल जी ने अपने बचपन के खेलों और ग्रामीण परिवेश का वर्णन करने के साथ ही बोथियालों के बारे में बताया है कि या तो वे महर लोगों में से हैं या कुथलिया बोरा। क्योंकि इनके पास इस प्रकार के प्रमाण मिले हैं और उन्होंने स्वयं भी देखा है। यह सब शोधार्थियों के लिये भी शोध् का विषय हो सकते हैं। इतना जरूर है कि महर और कुथलिया बोरा दोनों कुछ दूरी पर आज भी हैं। रा.स्ना.महाविद्यालय पिथौरागढ़ के संगीत विभाग में रहते हुए मैंने स्वयं कुमौड़ सहित महरों की शानदार परम्पराओं को देखा है। इसी प्रकार रा.स्ना.महाविद्यालय बेरीनाग के संगीत विभाग में रहते हुए कुथलिया बोरा संस्कृति को नजदीक से देखा। गंगोलीहाट के बौराणी क्षेत्र में भांग की पौध से चीजें बनाने की वही संस्कृति रही है जिसका उल्लेख श्री बोथियाल जी कर रहे हैं। यह इतना विशद विषय है कि इस पर अध्ययन जरूरी है।
फिलहाल, बोथी को लेकर हिमालय की जिस संस्कृति का यह दस्तावेज है, वह सिर्फ एक गाँव का नहीं बल्कि पूरे समाज का है। इस प्रकार के अध्ययन से उन भूली-विसरी जानकारियांे के बारे में पता चलता है जिसकी बहुत से लोग केवल कल्पना मात्रा करते होंगे। दुर्गा सिंह बोथियाल जी के सद्प्रयासों का लाभ समाज को होगा इन्हीं कामनाओं के साथ।
-डाॅ. पंकज उप्रेती

पाटी विकासखण्ड में पर्यटन की अपार संभावनाएं

सूरज लडवाल
चम्पावत – जिला अंतर्गत पाटी विकासखण्ड में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं । लेकिन सरकार द्वारा अब तक विकासखण्ड के कई पर्यटन संभावित क्षेत्रों में कोई भी सकारात्मक पहल नहीं की गई है । जिससे खुद की अलग पहचान बनाने की संभावनाओं वाला ये क्षेत्र लगातार पिछड़ता जा रहा है । गातव्य हो कि ब्लॉक मुख्यालय से 15 किलोमीटर की दूरी पर कूँण गाँव में बाँज के जंगलों से घिरी पहाड़ी में स्थित जैचम निर्मांसी का मन्दिर स्वयं में एक पर्यटक स्थल है । जिसे मन्दिर में बीते दशकों से रह रहे महात्मा ने एक रमणीक स्थल बनाने में मुख्य व अहम योगदान दिया है । बताते चलें कि चोटी पर स्थित इस मन्दिर से आस – पास का समूचा क्षेत्र दिखाई देता है । शाम के वक्त मन्दिर से आसपास की पहाड़ियों का दिखाई देने वाला अनूठा नजारा मन को शान्ति प्रदान करने वाला तो होता ही है इसके अलावा मंद हवाओं के बीच प्रकृति की गोद में बैठकर इन नजारों को देखना सांसारिक थकान को भी दूर करता है । और आसपास के इलाके से इस पहाड़ी का अनूठा दृश्य देखने को मिलता है । यह क्षेत्र सुबह हल्के कोहरे से ढका रहता है , तो दोपहर में साफ मौसम के साथ पहाड़ी के ऊपर बादल मंडराते नजर आते हैं । और सूर्य ढलने के बाद शाम के वक्त अगर कोई इस दृश्य को देखता है तो फोटोग्राफी करने से खुद को नहीं रोक पाता है । शाम के वक्त आसमान में हल्की लालिमा लिए बादलों का जमावड़ा पहाड़ी को और भी खूबसूरत बना देता है । और ये लालिमा सूर्य ढलने के काफी देर रात होने तक दिखाई देती है । इसके साथ – साथ पास में ही कणकश्वेर त्रिवेणी के समीप रौलमेल में देवदार वनी के बीच स्थित शिव मन्दिर पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है । लेकिन सरकार की उदासीनता के चलते इन ऐतिहासिक , पौराणिक व सुरम्य स्थानों पर विकासकार्य ठप नजर आ रहे हैं । इन पर्यटन संभावित स्थानों में विकास के नाम पर जनप्रतिनिधि सिर्फ चुनावों में नजर आते हैं । जानकारों के मुताबिक अगर सरकार इन स्थानों पर पर्यटन को विकसित करने के लिए कदम उठाती है तो ये स्थान बहुत जल्दी बेहतरीन पर्यटन स्थलों की सूची में शुमार हो जायेंगे ।
( सूर्य ढलने के बाद दिखाई देने वाला जैचम पहाड़ी का मनोरम दृश्य – छाया व विवरण सूरज लडवाल )

युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं उद्द्यान अधिकारी

युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं उद्द्यान अधिकारी

सूरज लडवाल
चम्पावत – जिला अन्तर्गत पाटी ब्लॉक के देवीधुरा उद्द्यान विभाग में कार्यरत उद्द्यान अधिकारी प्रदीप पचौली क्षेत्र के युवाओं को खेती के प्रति आकर्षित कर रहे हैं । जहाँ एक ओर क्षेत्रीय लोग जंगली जानवरों से परेशान होकर कृषि से मुँह मोड़ते नजर आ रहे हैं तो दूसरी ओर प्रदीप पचौली आलू , अरबी , पिनालू , बैंगन , शिमला , टमाटर , फूलों की खेती व बागवानी कर रहे हैं । और सोसल मीडिया के माध्यम से जानकारी व फ़ोटो शेयर कर लोगों को खेती और बागवानी करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं । तमाम लोग पचौली की खेती के प्रति लगन की सराहना कर रहे हैं । औऱ क्षेत्र के तमाम लोग उनके मार्गदर्शन में खेती औऱ बागवानी भी करने लगे हैं । उद्द्यान अधिकारी से जानकारियां और मार्गदर्शन लेते हुए अनेक क्षेत्रीय लोगों ने कृषि औऱ बागवानी को अपनी आमदनी का जरिया बना लिया है । बताते चलें कि प्रदीप पचौली की जानकारियां साझा करने की इस आदत के चलते क्षेत्रीय लोग उनके ऑफिस जाकर उनसे जानकारी प्राप्त करने लगे हैं । कई बार तो उन्हें ऑफिस जाते समय किसानों को जानकारी देते हुए भी देखा गया है । बीच रास्ते में गाड़ी से उतरकर किसानों को जानकारी देने की यह आदत उनकी कार्यप्रणाली में चार चाँद लगाती है । बातचीत के दौरान प्रदीप पचौली ने कहा अगर हम खेती करेंगे तो खेती को जंगली जानवर खाएँगे ही । इसका मतलब ये नहीं कि गिरने के डर से चलना ही छोड़ दिया जाय । हाँ बस हमें अगली बार थोड़ा संभलकर चलने की आदत डालनी होगी । हाल ही में उनके द्वारा सोसल मीडिया में अरबी की खेती की फ़ोटो के साथ शेयर की गई पंक्तियाँ खूब सराही जा रही हैं । जिसमें उन्होंने खेती करने के साथ – साथ उसकी रखवाली पर भी जोर दिया गया है ।

घरै की लौकी घरै क आलू
घरै क आद ( अदरक ) और घर क पिनालू
के बानर खाल , के सुगर पचाल,
जी बचलो उ हमार काम आलो l
क़े न हुन क़े न हुन कै बैर
इन गड़ (खेत ) भीड़ि बठे ,
तरीके ले करला त बहुत कुछ है जालो
थोड़ तुम पौर (रखवाली ) करा
थोड़ भगवान सहयोग कराल l

इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने खेती की रखवाली और खेती से जुड़े रहने की बात कही है । जो आधुनिक पीढ़ी के लिए काफी प्रेरणादायी है । प्रवासी लोगों को उनने खेती और बागवानी के प्रति जागरूक करते हुए लाभप्रद योजनाओं व जानकारियों के लिए संपर्क करने की बात भी कही ।

राम अनन्त हैं—पार्टी का बनाकर नहीं देखा जाना चाहिये। वह सबके हैं।

गीता उप्रेती
अयोध्या में 5 अगस्त 2020 को राम मन्दिर भूमि पूजन के बाद से अभी तक वही चर्चा है। चर्चा हो भी क्यों ना, राम अनन्त हैं। हाँ, राम को किसी पार्टी का बनाकर नहीं देखा जाना चाहिये। राम सनातन धर्म की परम्परा हैं। वह सबके हैं। लेकिन भूमि पूजन के बाद जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं इसे चुनाव के रंग में रंगने का खेल शुरु होने लगा है। उत्तराखण्ड में 2022 में विधानसभा चुनाव भी होंगे, ऐसे में मन्दिर काज में अपने को अगुवा सिद्ध करने के लिये नेतागण जुटने लगे हैं। एक-दूसरे को खिजाना मर्यादा के विपरीत होगा। इसे चुनाव चर्चा बनाना भी ठीक नहीं। राम काम में जुटना भारतीय संस्कृति का प्रतीक हो सकता है लेकिन जिस प्रकार से ‘सड़क-ताण्डव’ होने लगे हैं वह रुक जाने चाहिये।
रामजन्म भूमि पूजन कार्यक्रम ऐतिहासिक रहा। प्रधानमंत्री मोदी और यूपी के मुख्य मंत्री आदित्य योगी के साथ यह पूरा आयोजन ऐसा संयोग है जो सदियों बाद बना, इसलिये भी लोग उमंगित हैं। आम जनता की उमंगों के बीच अच्छी बात है कि सभी पाटियों के लोगों ने भागीदारी की। सीध्ी सी बात है जब हम रामलीला, होली, दीपावली बड़े त्यौहार साथ-साथ करते हैं तो भारतवर्ष के इस बड़े आयोजन को भी मिलकर ही करना था। हाँ, संयोग से जो सत्ता में है वह अगुवाई करेगा। ऐसा ही हुआ भी। पूरा आयोजन भव्य हो गया लेकिन बात को उघाड़ कर अर्थ-अनर्थ करने वाले सक्रिय हैं। ऐसे में पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं को भी स्पष्ट शब्दों में कहना चाहिये कि इसे किसी धारा का नहीं बनाया जाए क्योंकि सारी धाराएं ‘राम’ के लिये ही हैं।
पूरे देश की तरह उत्तराखण्ड में भी लोगों ने भूमि पूजन के दिन खूब खुशियाँ मनाईं। दिनभर पाठ किये, भजन-कीर्तन हुए, झांकी निकाली, ध्वज वितरण किया, मिष्ठान बांटा, सायंकाल दीप जलाए और आतिशबाजी की। वैसे भी देवभूमि आस्था का केन्द्र है। भूमि पूजन कार्यक्रम को लेकर प्रमुख सन्त यहाँ से अयोध्या गये। मन्दिर निर्माण के लिये चाँदी की ईंटें भी भेजी गईं। पहाड़ से लेकर मैदान तक आम जनता का जश्न उनकी आस्था थी लेकिन राजनीति के कुचक्र में फंसे मर्यादा भूल न करें। अयोध्या आस्था के अलावा वोटों का मीटर भी रहा था। अयोध्या में मन्दिर के नाम पर सारी पार्टियाँ कूदती रही हैं और वर्तमान तो भाजपा का है। मन्दिर के इस काज में भी इस पार्टी को ही बढ़त मिली है। इसके बाद कांग्रेस ने यह बताया कि ताला खुलवाने से लेकर मन्दिर का रास्ता प्रशस्त करने में प्रधन मंत्री स्व. राजीव गांध्ी का योगदान रहा था। आस्था का उबाल देखते हुए सभी बड़े नेताओं ने राम नाम का जाप किया है।
एक बात और- भाजपा से घृणा करने वाले, मोदी से नफरत करने वाले, तथाकथित कामरेड, नास्तिक बनने का दिखावा करने वालों ने इस पूरे आयोजन के दौरान और आज तक भी चुप्पी कर ली। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि यदि कोई कुछ बोलता है तो उसे उत्पीड़ित किया जायेगा। जबकि सच्चाई यह है कि किसी न किसी रूप में सभी जुड़े हुए थे। जबकि शीतल हृदय लोगों ने बेबाक टिप्पणी कर विरोध् भी किया। विरोध् इस बात का कि राम को किसी एक का मत कहो। यही सत्य भी है कि राम अनन्त हैं, उनकी महिमा अनन्त है।