मोक्षदायिनी गंगा को है भगीरथ का इंतजार

डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट/प्रो. पुष्पा नेगी
हिमालय से निकलने वाली सदानीरा, पवित्र सलिला, नदियां सभ्यता, संस्कृति के साथ-साथ करोड़ों लोगों को जीवन देने की अनमोल शक्ति रखती है। गंगा और यमुना, सिंधु, सतलुज, काली, रामगंगा जैसी सदाबहार नदियों को हिमालय प्राणवायु देता है। हिमालय जब तक है, ये नदियां लोगों की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जरूरतें पूरी करती रहेंगी। हिमालय की विशिष्ट संरचना से इन नदियों को उपयुक्त ढलान मिलने के कारण इनके पानी में आॅक्सीजन की मात्रा भी अधिक होती है। देश में अधिकांश पानी की आवश्यकता की आपूर्ति हिमालय से निकलने वाली नदियों से होती है। पेयजल कृषि के अलावा देश में पनबिजली के उत्पादन में हिमालय से प्राप्त होने वाले पानी का बड़ा महत्व है। पानी के अतिरिक्त हिमालय से बेशकीमती वनोपज भी मिलती है। भारत के अनेक विश्व प्रसिद्ध मनोरम पर्यटन स्थल इसकी गोद में बसे है। हिमालय व उसके आस-पास उगने वाले पेड़ों और वहां रहने वाले जीव-जन्तुओं की विविधता, जलवायु, वर्षा, ऊंचाई और मिट्टी के अनुसार बदलती रहती है। हिमालय का अब तक हमने अपनी आवश्यकता से अधिक दोहन किया है यदि यह गैर जरूरी और अवैज्ञानिक सिलसिला अब भी नहीं रूका तो इस मनोवृति से हिमालय को भारी नुकसान पहुंच सकता है। नौ राज्यों में फैले हिमालय का विस्तार देश की 17 प्रतिशत जमीन पर है जिसके 67 प्रतिशत भू-भाग में जंगल है। जल बैंक के नाम से प्रतिष्ठित हिमालय देश के 65 प्रतिशत लोगों की पानी की आपूर्ति करता है और यह उनकी रोजी-रोटी से भी जुड़ा है। विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण हिमालय को देश का मुकुट कहा गया है जो देश की सीमा का रक्षक है। हिमालय हमारे सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग है, इसलिए लोकगीतों से लेकर राष्ट्रगान तक में इसे विशेष महत्व दिया गया है।
हमारे ऋषि-मुनियों ने पर्यावरण संतुलन के सूत्र को दृष्टिगत रखते हुए पाषाण में भी देवत्व देखने का जो मंत्र दिया, उसके कारण देश में प्रकृति को समझने व उससे व्यवहार करने की परम्परायें जन्मी। वेदों में वर्णित नदी, सागर, सूर्य, चंद्र, जल और वायु हमारी आस्था के स्रोत रहे हैं। हमने तो वृक्षों से वरदान मांगना भी अपनी संस्कृति में समाहित कर लिया है। वृक्षों का समय-समय पर पूजन करके हम यश और कीर्ति के अनुगामी बनते है। अथर्ववेद में वृक्षों एवं वनों को संसार के समस्त सुखों का स्रोत कहा गया है। वन, वायु, जल, भूमि, आकाश हमारे लिए प्रकृति के अमूल्य उपहार हैं और मानव ने अपनी संस्कृति व सभ्यता का सर्वप्रथम विकास इन्हीं नदी-घाटियों के इर्द-गिर्द किया है। नदियां हमारे अस्तित्व को बनाये रखने के लिए अमृत तुल्य जल देती हैं, इसलिए ये हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। वायु और जल पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए नितांत आवश्यक हैं इनके बिना जीवन की कल्पना भी नही की जा सकती है।
उत्तराखण्ड में विभिन्न निर्माण कार्य जैसे सड़क, बांध परियोजना, रेलवे लाइन के लिए भूवैज्ञानिक फाॅल्ट लाइन, वनों की कटाई, विस्फोटक के इस्तेमाल, भूस्खलन के जोखिम को नजरअंदाज किया जा रहा है। सैकड़ों पनबिजली परियोजनायें यहां निर्माणाधीन है और कुछ प्र्रस्तावित है, जिनके निर्माण ने पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव के साथ-साथ यहां आपदाओं को बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। श्रीनगर परियोजना का मलवा 2013 की आपदा में पूरे शहर में भर गया, जिससे हजारों घर मलवे में दब गये, आई0 टी0 आई0 आज भी उसकी गवाही दे रहा है। वर्षा का होना प्राकृतिक प्रक्रिया है, किन्तु नदियों के मुहानों पर अनियमित, असुरक्षित और अनियोजित बुनियादी ढांचे का विकास तो मानवजनित है जिसने इन आपदाओं को त्रासदी बनाने का काम किया है। देश में नियमों का बड़े पैमाने पर उल्लंघन किया जाता रहा है जिसमें उत्तराखण्ड भी पीछे नही है। यही कारण है कि आपदाओं से जो क्षति होती है उससे स्पष्ट पता चलता है कि प्रकृति प्रलोभन को कभी भी स्वीकार नही करती। उत्तराखण्ड में राज्य प्रशासन द्वारा 15, 16 और 17 जून, 2013 को भारी बारिश की चेतावनी की अनदेखी का नुकसान तीर्थयात्रियों के साथ-साथ स्थानीय लोगों को भी भुगतना पड़ा था।
वर्तमान में जो प्रकृति से हमें निशुल्क में मिल रहा है यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में उसको भी शुद्धिकरण करके लेना होगा। न हवा शुद्ध, न पानी शुद्ध पूरी प्रकृति ही प्रदूषित होती जा रही है। शहर तो पहले ही प्रदूषण की चपेट में आ चुके थे परन्तु गांव और पहाड़ भी इसकी जद से नही बच पाये हैं। प्रदूषण के कारण धीरे-धीरे जलीय जीव समाप्त होते जा रहे है जो प्रदूषको को निस्तारित करने में महत्पूर्ण योगदान देते हैं। प्रकृति के सफाई करने वाले जीव गिद्ध, चील-कौवे, सियार आदि संकटग्रस्त है जो अब दिखाई देने मुश्किल हो गये हैं। यदि वन धरती को शुद्ध एवं शीतल छाया, हवा प्रदान करते है तो वहां से निकलनी वाली सदावहार नदियां हमें शीतल और निर्मल जल देती है जो जीवन का आधार है यानि जल, थल, नभ हमारे लिए प्रकृति के अमूल्य उपहार है। आज मानव भौतिक रूप से जितना समृद्ध होता जा रहा है सांस्कृतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से उतना ही विपन्न हो रहा है।
अनादिकाल से ही गंगा जीवनदायिनी और मोक्ष दायिनी रही है, भारतीय संस्कृति, सभ्यता और अस्मिता की प्रतीक रही गंगा की अविरल और निर्मल सतत् धारा के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। गंगा को सम्पूर्णता में देखने और समझने की आवश्यकता है, क्योंकि वह केवल धरती की सतह पर ही नही है, वरन् सतत् तौर पर भूमिगत जल धाराओं, बादलों और वायुमण्डल में भी प्रवाहमान है। समुद्र तटीय क्षेत्रों के आसपास ताजे पानी की धाराओं के गठन और नदी का सागर में मिलन, फिर वाष्पीकरण द्वारा बादलों का निर्माण और भारतीय भूखण्ड में मानसून ये सब घटनायें एक दूसरे से अभिन्न तौर पर जुड़ी हैं। इन सब प्रक्रियाओं को समग्रता से समझना होगा। मनुष्य के हस्तक्षेप ने जाने-अनजाने, लोभ-लिप्सा के वशीभूत होकर कई तरीकों से इस पूरे चक्र को नष्ट और बाधित किया हैं, जिसे ईमानदारी से स्वीकारने और समझने की जरूरत है। सम्भवतः ईश्वर ने मनुष्य को सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते प्रकृति का संरक्षक नियुक्त किया, ताकि प्रकृति का संरक्षण और संवर्धन हो सके। यदि हम पीछे मुड़कर देखें तो सच्चाई यह है कि हम विपरीत दिशा यानि विध्वंस और विनाश की ओर जा रहें है।
आजादी के बाद आधुनिक विकास के नाम पर कल-कारखाने खुलने शुरू हुए। कस्बों व नगरों मे रहने वालों की संख्या बढ़ी और इसी अनुपात में कूड़ा-करकट व रासायनिक अपशिष्टों में भी बढोतरी हुई और यह सब गंदगी गंगा में समाहित होने से लगातार गंगा मैली होती चली गई। जबकि उसकी सफाई पर कोई विशेष ध्यान नही दिया गया। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जिन्होंने खुद गंगा की महिमा पर लिखा था “हिमालय और गंगा का नाम आते ही आम भारतीय के मन में उसकी पवित्र और मनोहारी छवि उतर आती है”, परन्तु उनके प्रधानमंत्रित्व काल में भी गंगा कुछ कम प्रदूषित नही हुई। प्रधानमंत्री राजीव गाॅधी के कार्यकाल में गंगा एक्शन प्लान तथा डाॅ0 मनमोहनसिंह सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर इसकी सफाई के नाम पर अरबों रूपये खर्च तो किये, परन्तु गंगा स्वच्छ एवं प्रदूषण मुक्त तो नही हुई परन्तु देश का अरबों रूपये खर्च अवश्य हो गया। भारतवर्ष में समाज, सभ्यता, संस्कृति और अकूत सम्पदा का निर्माण जल-जंगल-जमीन को विस्तार देकर ही हुई है और आज भी इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नही है। धार्मिक अंधविश्वास, स्नान व अस्थि विसर्जन नदियों के प्रदूषण का एक प्रमुख कारण है।
वनों का बेतहाशा विनाश किया जा रहा है वायु, जल प्रदूषण में व्यापक वृद्धि हुई है, भारी भूस्खलन एवं बाढ़ की समस्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। कृषि में कीटनाशकों के व्यापक प्रयोग ने प्राकृतिक संतुलन को अपार क्षति पहुंचाई है, अनेक कीट-पतंगों की प्रजातियां समाप्त हो गई हैं या हो रही है, जिनका प्राकृतिक रूप से परागण करने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। आज स्थिति इतनी विषम हो चुकी है कि परागण को कृत्रिम विधि द्वारा किया जाने लगा है। फूलों का रस चूसने वाले कीट-पतंगे खत्म हो जायेंगे तो परागण की समस्या उत्पन्न हो जायेगी जिससे प्राकृतिक रूप से जंगलों में नई पौधे उत्पन्न नही हो पायेंगी और वृक्षों की कमी के कारण मिटटी का बहाव बढ जायेगा। गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियाँ, जिनको भारतीय संस्कृति में मोक्ष एवं पापों के निवारणकर्ता के रूप में माना गया है और पुराणों में कहा गया है, ”गंगे तव दर्शनात मुक्तिः“। आज सामाजिक मूल्यों और जीवन शैली में इतना अभूतपूर्व परिवर्तन हो गया है कि राजा भागीरथ के पुरखों का कलुष धोने वाली गंगा, शहरों का मलमूत्र व फैक्ट्रियों का कचरा ढोते-ढोते इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि उसका पानी पीने योग्य तो दूर नहाने योग्य तक नहीं रहा। यही नही गंगा अपने उद्गम स्थल से ही प्रदूषित हो चुकी है और सारे उत्तरी भारत को सुख समृद्धि देने वाली गंगा-यमुना का उद्गम स्थल भोगवादी पर्यटन के कारण गंदगी एवं कूड़े कचडे के ढेर से प्रदूषित होकर विपन्नता व नाना प्रकार की बीमारियों की प्रतीक बन गई है। गंगा भारतीय संस्कृति एवं आस्था से जुड़ी हुई है जिसकी सफाई पर खरबों रुपये खर्च किये जाने के बाद भी गंगा जस की तस बनी हुई है।
एक तरफ हम नदियों को देवीस्वरूप मानते है तो दूसरी तरफ उन्हें रात-दिन कूड़े-करकट से भर रहे है। गंगा, गोमती, यमुना कोई भी नदी कितनी ही पूजनीय हो सब गंदगी से कराह रही है, इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। गंगा सफाई का अभियान तभी सफल होगा, जब इससे सीधे लोगों को जोड़ा जाएगा। इस अभियान को आंदोलन बनाना होगा। लोगो को यह बताना होगा कि गंगा मानव जीवन के लिए कितनी उपयोगी है कि इनका अस्तित्व में रहना हमारे लिए अपने अस्तित्व को बचाये रखने जैसा है। इस अभियान की सफलता के लिए सबसे पहला और प्रवाही कदम शहरी और औद्योगिक कचरे को गंगा में गिरने से रोकना होगा। इसके लिए उन प्रमुख शहरों में जो गंगा के किनारे बसे हैं उनसे निकलने वाले नालों के पानी के लिए जल संशोधन संयत्रों की स्थापना करनी होगी। कचरे का रूप परिवर्तित कर उसके उपयोग का विकल्प ढूढना होगा। जल संशोधन के जरिए गंदे पानी को साफ कर फिर उसे सम्बन्धित कम्पनियों के उपयोग लायक बनाना होगा, जिससे गंगा में गिरती रासायनिक गंदगी को रोका जा सके। प्रश्न यहां मात्र गंगा की स्वच्छता का नही बल्कि नदियों की स्वच्छता एवं संरक्षण का है जिससे गंगा एवं अन्य नदियां अविरल एवं अनवरत रूप से बहती रहे। जब तक सभी नदियां प्रदूषण मुक्त एवं संरक्षित नही होगी तब तक गंगा का स्वच्छ एवं संरक्षित होना असम्भव है, क्योंकि गंगा में मिलने वाली छोटी-बड़ी नदियां ही काफी हद तक गंगा को जीवीत रखे हुए है इसलिए यदि गंगा को बचाना है तो उनका संरक्षण, संवर्द्धन किया जाना नितांत आवश्यक है। आज खुद मोक्षदायिनी गंगा भगीरथ के इंतजार में है जो उसे इस गंदगी से मुक्ति दिला सके।
डाॅ. दलीप सिंह बिष्ट-असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान
प्रो. पुष्पा नेगी प्राचार्य
अनुसुइया प्रसाद बहुगुणा राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग

उत्तराखण्ड की संस्कृति को बढ़ा रहे हैैं शमशाद

पि.हि.प्रतिनिधि
पिथौरागढ़ के शमशाद अहमद पिछले बीस सालों से लखनउ में रहकर उत्तराखण्ड की सांस्कृति विरासत को बढ़ा रहे हैं। अपनी चित्रकारी के द्वारा पहाड़ की समृद्ध् संस्कृति को इस कलाकार ने देश के कौने-कौने तक पहंुचाया है। उनका उद्देश्य उत्तराखण्ड में पर्यटन के साथ पर्यटकों को आकर्षित करना है।
शमशाद की पेन्टिंग में ऐपण, छोलिया, कंडाली, वाद्ययन्त्र, आभूषण, हिमालय, परिधान, तीज-त्यौहारों का आकर्षण है। अपने तैलचित्रों में शमशाद बहुत बारीकी से पहाड़ की संस्कृति के दर्शन कराते हैं। देश की जानी-मानी हस्तियों को वह अपने हाथों आकर्षक पेन्टिंग भेंट करते रहे हैं। उनका सन्देश है कि पलायन करने के बजाय अपने गांव से ही अपने हुनर की शुरुआत की जानी चाहिये। आज बहुत से साधन और सहुलितें हैं। साथ ही इनकी परख करने वाले भी।
बचपन से ही पेन्टिंग में रमने वाले शमशाद का 1983 में गोपेश्वर में जन्म हुआ एक वर्ष आयु से पिथौरागढ़ में रहना हुआ। 12 साल तक ठेठ पर्वतीय संस्कृति में रमने के दौरान इनका मन चित्रकारी और संगीत ओर गया। वह बताते हैं कि 1995 में छोलिया नर्तकों की बड़ी पेन्टिंग उन्होंने बनाई जो कापफी चर्चित रही। स्थानीय अखबारों ने उसे प्रमुखता से प्रकाशित कर दिया। बचपन था और मिल रहे सन्देशों से हौंसला बढ़ने लगा। उस समय स्व.गोपाल बाबू गोस्वामी का एक गाना रेडियो में सुना- ‘‘दिन आने जाने रयां, रितु रिमि फरी रया। हम गोबरी कीड़ा जस गोबरी में रया।’’ यह गीत अन्दर तक प्रभावित कर गया कि हमें गोबरी कीड़ा बन कर नहीं रहना है। अपनी जन्मभूमि के लिये कुछ करना है। 1997 में पर्वतीय कला केन्द्र द्वारा छलिया महोत्सव का आयोजन किया गया, इसकी पेंटिंग का कार्य मुझे मिला। हेमराज बिष्ट जी ने सन् 1998 और 1999 में भी मौका दिया। इससे पिथौरागढ़ ने मुझे नई पहचान दी। तभी से मैं एक लाइन लिखने लगा- ‘‘आपण संस्कृति बढ़ा, आपण पच्छाण बना।’’ दुःख इस बात का नहीं था कि पहाड़ छूट रहा, खुशी इस बात की थी कि ये संस्कृति अब बड़े स्तर से उत्तर प्रदेश में शुरु करूंगा। बस तभी से 1995 से शुरु किया उत्तराखण्डी संस्कृति पर कार्य जारी है। मैं उत्तराखण्डी पुराने दौर की पेन्टिंग से युवा पीढ़ी को सन्देश देता हूं कि कहीं भी रहो इसे बढ़ाओ फैलाओ यही हमारी धरोहर है, पहचान है।
मैं पेन्टिंग में रंगवाली-पिछौड़ी पुराने दौर के ही बनाता हूं जब गांव में शुभ कार्य से पहले हाथ से बनती थी। कुदरती रंगाों जैसे पीलेे हल्दी के पानी में रंगी जाती और बाद में गोल हाथ से लाल व मेहरून टिप्पे गोल निशान चवन्नी या अंगूठे से बनाई जाती थी। उस वक्त पिछौड़ी में लचका गोटा या चमकने वाली किनर का इस्तेमाल नहीं होता था। किनारे में हल्की सी बेल व बीच-बीच में स्वास्तिक के निशान व उं लिखा होता, जिसे शुभ माना जाता, वही मेरी सभी पेन्टिंग में दिखेगा। उस वक्त गले का गलोबन्द शनील व वेलवेट के कपड़े पर हाथ से गुंथा हुआ सुनार बनाता था जो अब आध्ुनिक दौर में स्वरूप ही बदल गया है।
पूरी तरह पहाड़ की संस्कृति में रमे शमशाद ने पेन्टिंग की कहीं विधिवत शिक्षा नहीं ली लेकिन जो हुनर उनमें हैं और जो तहजीव उनमें है वह वाकेई प्रेरित करने वाली है।

चीन की बदमाशी और नेपाल के दावे के बाद उठे कदम

कार्यालय प्रतिनिधि
उत्तराखण्ड से लगी अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर चाौकसी बढ़ा दी गई है। चीन की बदमाशी और नेपाल के दावे के बाद भारत की ओर से सीमा पर सख्ती की गई है। चीन तो भरोसे लायक कतई नहीं है इसे पूरी दुनिया जानती है लेकिन नेपाल के साथ भारत के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। ऐसे में सीमा पर रहने वालों को नेपाल के कदम से असहजता बनी हुई है। नेपाल की नेशनल असेम्बली ने देश के राजनीतिक एवं प्रशासनिक नक्शे में भारत के तीन क्षेत्रों को शामिल करने के लिये संविधन संशोध्न विधेयक को पारित किया है। लिपुलेख, कालापानी और लिपिंयाध्ुरा इलाकों पर भी वह दावा कर रह रहा है। भारत और नेपाल के बीच उस समय तनाव पैदा हो गया था जब रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने आठ मई को प्रदेश में लिपुलेख दर्रे को धरचूला से जोड़ने वाली रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 80 किमी लम्बी सड़क का उद्घाटन किया था। नेपाल इस सड़क के उद्घाटन के समय से क्षेत्रा पर अपना दावा कर रहा है जबकि भारत ने स्पष्ट किया है कि यह सड़क पूरी तरह उसके अपने भू-भाग पर स्थित है।
चीन की हरकत के बाद सीमा पर भारतीय जवान सक्रिय हैं। वहीं नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्रा को अपना बताकर नक्शा जारी करने के बाद से सीमा पर गश्त बढ़ा दी गई है। झूलाघाट, जौलजीवी, धारचूला, बनबसा सहित सारे रास्तों पर एसएसबी के जवान चप्पे-चप्पे पर हैं। अन्तर्राष्ट्रीय झूला पुलों की निगरानी के साथ ही महाकाली नदी के किनारे बल बढ़ाया है। नेपाल की कार्रवाई से बुद्धिजीवियों ने नाराजी जताई है। रोटी-बेटी का सम्बन्ध् होने के बावजूद इस प्रकार की फितरत नेपाल में कैसे पनपी इसके पीछे चीन की साजिश की बू को माना जा रहा है। नेपाल के फैसले से सीमा क्षेत्र के लोगों में रोष है क्योंकि नेपाल से हजारों लोगों की रोटी भारत में ही है। साथ ही आम जनता हर प्रकार के दुःख-दर्द में एक-दूसरे के साथ सहभागी हैं। शादी-विवाह, पूजा-पाठ से लेकर रश्मों को साथ-साथ निभाया जाता है। पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड एवं मुख्य केन्द्रीय संरक्षक नृपसिंह नपलच्याल ने नेपाल की एकतरफा कार्रवाई को अचरज भरा बताते हुए कहा कि दोनों राष्ट्रों को मैत्राीपूर्ण वातावरण में वार्ता से विवाद का समाधान निकालना चाहिये। श्री नपलच्याल ने सीमान्त के सभी भारतीय व नेपाली बन्ध्ुओं से अपील की कि वह भड़काउ बयाजबानी न करें।
पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी पर चीन के सम्प्रभुता के दाबे को भारत ने पूरी तरह खारिज किया है और चीन की हरकतों को देखते हुए सीमाओं पर हाईअलर्ट किया है। अकड़ में रहने वाले चीन ने भारत के रुख और उसके उत्पादों के बहिष्कार की बात सुनकर बातचीत में सकारात्मकता दिखाई है। लेकिन वह धोखेबाज के रूप में है। ऐसे में उत्तराखण्ड की अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं पर भी कड़े इन्तजाम कर दिये गये हैं। उल्लेखनीय है कि सन् 1962 मंे चीन द्वारा छल किया गया था। उस युद्ध में उसकी हड़प नीति सबने समझ ली थी। तिब्बत को पूरी तरह अपने कब्जे में करने वाले चीन के कारण तिब्बतियों को परेशान होना पड़ा है। उत्तराखण्ड की सीमान्त घाटियों के व्यापारियों का पूरा कारोबार तिब्बत पर केन्द्रित था और तिब्बती व्यापारियों के साथ उनकी अच्छी मित्रता रही है। चीन की हरकत के बाद तिब्बत व्यापार बन्द हो गया और सीमान्तवासियों के कारोबार भी बदले, पलायन हुआ। तिब्बत से बड़ी संख्या में लोग भारत आ गये।

उत्तराखण्ड में लोकरंग पर आधारित पर्यटन

धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक तहजीब से आकर्षित हो सकेंगे पर्यटक
डाॅ.पंकज उप्रेती
देवभूमि उत्तराखण्ड का धार्मिक पर्यटन यहाँ की आजीविका का बड़ा आधार है, इसमें यदि सांस्कृतिक तहजीब को जोड़ दिया जाए तो पर्यटन का यह ग्राफ ऊँचाईयों को छू सकता है। इस दिशा में कुछ प्रयोग होने भी लगे हैं। विश्व के पर्यटन स्थलों की पहचान वहाँ के लोकरंगों से होती है। लोक का यह रंग सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के साथ होता है। उत्तराखण्ड के पर्यटन में भी ऐसा है परन्तु इस दिशा में अभी काफी कार्य होना है।
      उत्तराखण्ड में पर्यटन के लिये सुरम्भ वादियाँ तो हैं ही, आध्यात्म-योग-संगीत जैसे विषयों को लेकर पहले से यहाँ आवत रही है। ऋषि-मुनियों द्वारा साधना के लिये हिमालय को सबसे प्रिय माना गया है। मध्य हिमालय के पहाड़ इनके पड़ाव रहे हैं और कैलास-मानसरोवर जैसी यात्राएं इनके जीवन का हिस्सा रही हैं। चारधाम यात्रा, पूर्णागिरी दर्शन, महाकाली-पातालभुवनेश्वर में उपस्थिति हो या जागनाथ-बागनाथ को पूजना हो………..देश-दुनिया के लोगों ने स्वीकारा है। ऐसे में क्यांे न सुविधाओं के साथ इन यात्राओं को सरल बना दिया जाए और सुविधाएं जुटाकर पर्यटन को बढ़ावा दें। धार्मिक पर्यटन के साथ सांस्कृतिक तहजीब की जुगलबन्दी से उत्तराखण्ड बहुत विकसित हो सकता है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम और गढ़वाल मण्डल विकास निगम ने होम-स्टे योजना से इस दिशा में एक कदम बढ़ाया है। इस योजना के तहत पलायन से खाली हो चुके गाँवों को पर्यटकों के लिहाज से तैयार किया जा रहा है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम ने कैलास-मानसरोवर यात्रियों को ठहराने के लिये इस प्रकार की तैयारी की, जिसके सुखद परिणाम भी दिखाई दिये हैं। सीमान्त क्षेत्र के खाली हो चुके ग्रामों में लोगों ने अपने पैतृक मकानों को सुधार कर यात्रियों के लिये तैयार किया। इस प्रकार उनकी आमदनी भी बढ़ सकती है। रोजगार होने से एक ओर भागने वाली भीड़ में नियंत्रण लगेगा और खाली होते गाँवों का विकास होगा। होम स्टे की यह योजना मानसरोवर रूट के अतिरिक्त अन्य यात्रा पथों पर भी संचालित की जा सकती है। इससे यात्रियों को नई जानकारियां भी मिलेंगी। इस बीच उत्तराखण्ड सरकार ने धर्मिक तीर्थयात्रा को बढ़ावा देने के लिये ध्यान केन्द्रित किया है। इसके लिये पैदल मार्गों की यात्रा को जीवन्त किया जायेगा। सरकार ने पूर्व के पैदल मार्गों को खोजने का निर्णय लिया है, इससे साहसिक पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। इस खोज के लिये ग्यारह सदस्यीय दल ने सर्वे किया। उत्तराखण्ड पर्यटन विकास परिषद द्वारा नेहरू पर्वतारोहण संस्था, उत्तराखण्ड अन्तरिक्ष केन्द्र तथा वन विभाग के सहयोग से चारधम पैदल मार्ग को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से ग्यारह सदस्यीय दल को एक माह के सर्वेक्षण किया। सर्वेक्षण का उद्देश्य पैदल यात्रा मार्ग के स्थानीय पड़ावों और चट्टियों को पुनर्जीवित करना है। ताकि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके। साथ ही वहाँ की जैव विविध्ता सम्पदा एवं संस्कृति का अभिलेखीकरण भी किया जाएगा। चारधम यात्रा को पैदल मार्ग के रूप में विकसित किये जाने से तीर्थयात्रियों की संख्या में वृद्धि भी होगी। इसके लिये मार्ग मंे हर प्रकार से जरूरी सुविधएं भी सरकार उपलब्ध् कराएगी। इसके लिये इन पैदल मार्गों का प्रचार प्रसार भी किया जायेगा।
    पिघलता हिमालय की रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘सर्वेक्षण दल देहरादून से स्याना चट्टी होते हुए पैदल मार्ग से गया इसके बाद जानकी चट्टी, दरवा पास, डोडीताल, संगमचट्टी और गंगोत्री तक सर्वे किया। इसके बाद दल ने लाटा, बेलक, बूढ़ाकेदार, भैरों चट्टी, घुत्तू पंवाली कांठा, त्रियुगीनारायण और गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ जायेगा। यहाँ से श्वेत पर्वत, कलउफं, मन्दानिया, द्वाराखाल, मार्डंग गंगा, काश्नी खर्क, ग्लेशियर कैम्प होते हुए नीलकंठ बेस से बद्रीनाथ पहँुचा। दल में एनआईएम के प्रधनाचार्य कर्नल बिष्ट के अतिरिक्त वन विभाग के चार प्रशिक्षक, एसडीआरएफ तथा एक भू वैज्ञानिक शामिल थे।’ इसी प्रकार अन्य पैदल मार्गों की खोज कर उन्हें विकसित किया जाए तो रोजगार के नये अवसर बढ़ेेंगे। यह चुनौतीपूर्ण कार्य है परन्तु सरकार और हम सबने मिलकर इसे साकार करना चाहिये।
 
      होम-स्टे के साथ ही उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक ढांचे को भी पूरी तहत इससे जोड़ दिया जाना चाहिये। अभी तक संस्कृति के नाम पर छोलिया नर्तकों के साथ यात्रियों को नचा देना और रंगवाली-पिछौड़ा पहनी महिलाओं द्वारा स्वागत करवा देना संस्कृति मान लिया गया है। इससे संस्कृति की मौलिकता नहीं रह जाती। सांस्कृतिक पर्यटन के पूरे स्वरूप में हमारा संगीत, हमारी कला, हमारा रहन-सहन, खानपान सभी है, जो पर्यटकों को लुभायेगा। सीधी सी बात है कि मेहमानों का स्वागत सड़क में नाचकर करने के बजाय घर बुलाकर किया जाए। रंगोली-पिछौड़ा हमारे धार्मिक अनुष्ठानों में पहना जाता है। इसका प्रदर्शन हर मौके पर शोभा नहीं देता है। आजकल तमाम नृत्यगीतों से लेकर सड़कों पर निकलने वाले जुलूस में इसे पहन कर पर्वतीय संस्कृति का उत्थान मान लिया गया है। इसी प्रकार पहाड़ के अन्य समुदायों द्वारा भी उनके जो परम्परागत वस्त्राभूषण हैं, उनकी शोभा स्थान विशेष पर दिखाई देती है। मिलावट के इस दौर में जिस प्रकार का प्रस्तुतिकरण किया जाने लगा है वह हमें हमारी संस्कृति से बहुत दूर कर देगा, इसलिये जागरुकता जरूरी है। लोक की इन तमाम परम्पराओं से अनभिज्ञ लोग निर्माता-निर्देशक बनकर फिल्म रूप में भी समाज के सामने अजीबोगरीब परोस रहे हैं। जिसका प्रभाव नई पीढ़ी में होने लगा है। नई पीढ़ी जो कुछ देख रही है, उसे  अपनी संस्कृति मानकर उसी रंग में ढल रही है।

केशवदत्त अवस्थी अग्रणीय शिक्षकों में रहे हैं



अस्कोट राजा के दीवान परिवार से सम्बन्ध्
स्व. केशवदत्त अवस्थी अस्कोट गर्खा के उन बुद्धिजीवियों में रहे हैं जिन्होंने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिये अपने को समर्पित किया। इनका सम्बन्ध् अस्कोट राजा के दीवान अवस्थी परिवार से है। इनके पिता मोतीराम अवस्थी राजा के दीवान थे। इसी परम्परा में इनके बड़े भाई भी पदवी संभाले हुए रहे। केशवदत्त बचपन से ही बिलक्षण प्रतिभा के थे और शिक्षा में विशेष रुचि के कारण इन्हें उसी प्रकार की सुविधा दी गई।
   केशवदत्त जी का जन्म अस्कोट गर्खा इलाके के नरेत ग्राम में सन् 1902 को हुआ था। इनके पिता स्व. मोतीराम अवस्थी व माता स्व. श्रीमती हंसा अवस्थी थे। बाल्यकाल से ही प्रखर बुद्धि के केशव ने मिडिल की परीक्षा जूनियर हाईस्कूल बजेटी में प्राप्त की। हाईस्कूल व इण्टर की परीक्षा रैमजे इण्टर कालेज अल्मोड़ा से पूर्ण की। स्नाकत की पढ़ाई 1927 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। पढ़ाई के साथ-साथ बेहतर खिलाड़ी केशवदत्त जी मेरठ यूनिवर्सिटी की फुटबाल टीम का नेतृत्व किया। इनके बड़े भाई हरिबल्लभ अवस्थी अस्कोट राजा के दीवान थे।

   केशवदत्त अवस्थी ने स्नातक उत्तीर्ण करने के बार काशीपुर के एक विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक नियुक्त हो गये। एक वर्ष बाद इनका स्थानान्तरण लोहाली ;नैनीताल में हो गया। उसके बाद भाॅतड़ ;थल, दशाईथल में रहे। गंगोलीहाट के जाह्नदेवी नौले के पास इन्होंने संस्कृत पाठशाला की स्थापना की। बाद में गर्खा जनता कालेज के प्रथम प्रधानाध्यापक बने। अवस्थी जी गणित, अंग्रेजी, संस्कृत, इतिहास, उर्दू के प्रकाण्ड विद्वान थे।
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इनके इतिहास के गुरु सी.आर.गोरखपुरी व ईश्वरी प्रसाद थे। एक बार नारायण नगर ;डीडीहाट में नारायण स्वामी ने इन्हें अपने विद्यालय में आने का प्रस्ताव किया लेकिन स्वतंत्रात प्रकृति के केशवदत्त जी ने जाने से मना कर दिया। सन् 1942 में  अंग्रेज पता लगाते हुए इनके ग्राम नरेत पहँुचे और पूछा- यहाँ कौन व्यक्ति ग्रेजुएट करके आया है। जानकारी मिलने पर कि केशवदत्त ग्रेजुएट हैं उन्हें प्रस्ताव दिया गया कि अंग्रेजी सेना में सीध्े लेफ्रिटनेंट बनाया जायेगा लेकिन अवस्थी जी ने अंग्रेजों के साथ जाने से मना कर दिया। उन्होंने आजीवन शिक्षण कार्य को ही अपनाया।
    सेवानिवृत्ति के बाद नेपाल सरकार ने उन्हें अपने बुलावा भेजा और वह दो वर्ष नेपाल के थाराकोट में प्रधानाध्यापक रहे। इनके प्रमुख शिष्यों में मोती लाल चैधरी, वंशीलाल विश्वकर्मा, फकीर दत्त ओझा, महिपाल सिंह भैसोड़ा, कृपाल सिंह भैसोड़ा, भुवनचन्द्र गुणवन्त आदि रहे। इनके दो पुत्र थे। बड़े पुत्र स्व. गोविन्द बल्लभ अवस्थी एमईएस पिथौरागढ़ में एसडीओ के पद पर रहे तथा छोटे पुत्र जगदीश चन्द्र अवस्थी काॅपरेटिव बैंक से सेवानिवृत्त हो गए हैं। अवस्थी जी का का 13 जून 1979 को अपने पैतृक निवास नरेत में निधन हुआ। इनके तीन पौते हैं- सी.एम.अवस्थी डहरिया हल्द्वानी, प्रदीप अवस्थी विवेकानन्द इण्टर कालेज पिथौरागढ़, दिनेश अवस्थी मीडिया से जुड़े हैं। स्व.अवस्थी के भतीजे ध्रणीध्र जी लखनउ विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग में रीडर थे और छोटे भाई आनन्दमोहन नाॅर्थ जोन देहरादून ओएनजीसी में जनरल मैनेजर से सेवानिवृत्त हुए।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि अवस्थी परिवार की शाखाएं तमाम जगह फैल चुकी हैं लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े भाई बन्ध्ु परम्पराओं को बरकरार रखे हुए हैं

यौगिक क्रियाओं से कोरोना का बचाव

डाॅ.दीपिका जोशी
कोरोना वायरस कई प्रकार के विषाणुओं का एक समूह है जो स्तनधरियों और पक्षियों में रोग उत्पन्न करता है। यह आर.एन.ए. वायरस होता हैं। इनके कारण मानव में श्वसन तंत्रा संक्रमण पैदा हो सकता है। जिसकी गहनता हल्की सर्दी जुकाम से लेकर अति गम्भरी जैसे मृत्यु तक हो सकती है। गाय और सुअर में इनके कारण अतिसार हो सकता है जबकि इनके कारण मुर्गियों में श्वास तंत्र के रोग उत्पन्न हो सकते हैं। इनकी रोकथाम के लिये कोई टीका ;वैक्सीन या विषाणुरोध्ी अभी उपलब्ध् नहीं है और उपचार के लिए प्राणी की प्रतिरक्षा प्रणाली निर्भर करती है। अभी तक रोग लक्षणों का उपाचार किया जा रहा है ताकि संक्रमण से लड़ते हुए शरीर की शक्ति बनी रहे। अभी तक इस वायरस से विश्व में दस लाख 26 हजार से ज्यादा व्यक्ति प्रभावित हुए हैं तथा 54 हजार से अधिक मृत्यु हो चुकी हैं। जिसमें भारत में 2567 लोग प्रभावित हैं तथा 70 ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। योग तथा आयुर्वेद के ज्ञान के कारण विकसित देशों की तुलना में भारत की मृत्यु दर तथा कोरोना का प्रभाव कम है।
योग भारत में प्रचलित एक आध्यात्मिक प्रक्रिया को कहते हैं, जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का काम होता है। पहली बार 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष 22 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी है।
योग चिकित्सा एक प्राचीन पद्धति है। यह सरल और सर्वसुलभी है। वर्तमान समय में कोई भी योग से अनभिज्ञ नहीं है। इससे हम स्वयं और अपने परिवार की चिकित्सा कर सकते हैं। इसमें मन व शरीर भी स्वस्थ्य होता है। योग चिकित्सामें अनुशासन का पालन किया जाता है जिससे मनुष्य में अनुशासन व संयम का विकास होता है।
आध्ुनिक चिकित्सा दमनकारी दिकित्सा है जो शरीर में उभरने वाले विकारों को दबाती है। जबकि योग चिकित्सा रोग के लक्षणों को ही नहीं बल्कि रोग का ही समूल नाश करती है। वर्तमान में हम सभी कोरोना कोविड-19 जैसी महामारी से जूझ रहे हैं। इससे बचाव के लिए कुछ यौगिक क्रियाएं उपयोगी हैं। यौगिक क्रियाओं से हमारी रोग प्रतिरोध्क क्षमता बढ़ती है। साथ ही वायरस से बचने के लिए हमें अपने श्वसन तंत्रा को भी मजबूत व स्वस्थ्य बनान होगा। वर्तमान परिस्थिति में व्यक्ति को साधरण फ्रलू ;जुकाम, खांसी आदिद्ध में दवा खाने व अस्पताल जाने से बचना चाहिये ओर अपनी दिनचर्या में यौगिक क्रियाओं को शामिल करके स्वयं व अपने परिवार की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना चाहिये।
हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका के लए प्राणवायु आवश्यक है। श्वसन क्रिया दो पूर्णतः भिन्न-भिन्न क्रियाओं श्वास और प्रश्वास का सम्मिलित रूप है। जिस क्रिया के द्वारा श्वसन को अन्दर लिया जाता है उसे श्वास करते हैं और जिस क्रिया से त्याज्य गैसों को बाहर निकाला जाता है उसे प्रश्वास कहा जाता है।
कोरोना से बचाव के लिये मुख्य यौगिक क्रियाएं-
क. आसन- 1. सूर्य नमस्कार , 2. भुजंगासन, 3. उष्ट्राासन, 4. सर्पासन, 5. धनुरासन, 6. मार्जरी आसन, 7. शशांकासन, 8. गोमुखासन, 9. कमरासन।
ख. प्राणायाम- 1. सूर्यभेदी, 2. भस्त्रिाका, 3. नाड़ी शोध्न, 4. भ्रामरी, 5. उज्जायी।
ग. बन्ध्- 1. जालन्ध्र बन्ध्
च. मुद्रा- 1. खेचरी मुद्रा, 2. हृदय मुद्रा, 3. तड़ागी मुद्रा
छ. षटकर्म- 1. नेति, 2. वमन
ज. हवन
झ. ध्यान- उ स्तवन, गायत्राी मंत्र व महामृत्युंजय मंत्रा उच्चारण
प्राकृतिक चिकित्सा- प्रातःकाल ध्ूप का सेवन अति आवश्यक है। गुनगुने पानी का ही सेवन करें। सप्ताह में एक दिन पूरे शरीर की गीली लपट व भाप स्नान, पीठ व पैरों की सिकाई करनी चाहिये। लाल रंग के तेल से पीठ व छाती की मालिश करें व फेशियल स्टीम प्रतिदिन लें। कटि स्नान, पाद स्नान एवं एनिमा लें। छाती पर सरसों के तेल की मालिश करनी चाहिये।

COVID-19 खतरे में न डालें किसी को

कोरोना वायरस से पूरी दुनिया खतरे में है। मानव जाति पर तेजी से फैल रहे इस संक्रमण का सबसे ज्यादा प्रभाव अमेरिका में हो चुका है। स्पेन, प्फांस, इंग्लैण्ड, जर्मन सहित तमाम देशों में सुविधाएं होने के बावजूद कोरोना का कहर बढ़ता जा रहा है। चीन को तो पूरे विश्व में संदिग्ध् देश के रूप में देखा जाने लगा है क्यांेकि यहीं से कोरोना की शुरुआत हुई थी। इसके अलावा पाकिस्तान जैसे आतंक को पनाह देने वाले देश में भी कोरोना का असर है परन्तु वहाँ के प्रधानमंत्री इमरान खान का अड़ियल रुख आम जन के हित को नहीं नहीं देख रहा है। अपने देश की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार व प्रशासन मुस्तैद है लेकिन कतिपय लोगों को लापरवाही के कारण सख्ती करनी पड़ रही है।
यदि इसी प्रकार सभी देशों की स्थितियों पर विचार करने लगें तो कुछ न कुछ वाद-विवाद मिल जायेंगे लेकिन यह समय वाद-विवाद को छोड़ एक ऐसे वायरस से लड़ने का है जो मानव समाज के लिये मौत बनकर फैल रहा है। इस दिशा में दुनिया के देशों ने एक-दूसरे की मदद भी की है और अपने अपने देशों में जूझ रहे हैं। हालात जब इतने खतरनाक हैं तो प्रत्येक आम नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह अपनी सरकार को ही न ताके बल्कि बचाव के लिये उपाय करे। भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश व दुनिया के गरीब देशों के सामने समस्या बहुत विकट है क्योंकि स्थिति से निपटने के लिये लाॅकडाउन में गरीबों को परेशानी उठानी पड़ रही है। हमारे आस-पास ही लाॅकडाउन में पुलिस द्वारा की जा रही निगरानी, फैक्ट्रियों के बन्द होने, यातायात के थम जाने, कफ्रर्यू की स्थिति में मजदूरों/श्रमिकों को भूखा मरने की नौबत आ गई है। ऐसे में कुछ लोगों ने इनकी सहायता के लिये हाथ भी बढ़ाकर पुण्य किया है।
किसी भी सरकार या प्रशासन की नीयत अपनी जनता को परेशान करने की नहीं है लेकिन कोरोना के फैलते संक्रमण को रोकने के लिये सख्ती करनी मजबूरी है। यह संक्रमण जितनी तेजी से फैल रहा है उसमें यदि थोड़ा भी चूक होती है तो मौतों की बारात बन जायेगी। इस भयानक स्थिति को रोकने के लिये ही शासन-प्रशासन को न चाह कर भी सख्त होना पड़ रहा है। इसलिये हम सभी का कर्तव्य होता है कि किसी को खतरे में न डालें। अपने और अपने परिवार, अपने मित्रों, अपने पड़ौस, अपने गाँव, अपने जिले, अपने प्रदेश, अपने देश को मौत के मुंह से बचाने में सहयोगी बनें।

कार्यालय प्रतिनिधि
कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव ही इस समय सबकी प्राथमिकमता है। इसे लेकर किसी भी तरह की लापरवाही मौत है। इस संक्रमण ने पूरी दुनिया को वर्षों पीछे धकेलते हुए सोचने पर मजबूर कर दिया है कि प्रकृति का सच क्या है। विश्व के कई देशों की तरह भारत में भी लाॅकडाउन के बाद सन्नाटा और अपनों के बीच रहने की होड़, भूख की लड़ाई, भय बना हुआ है। खतरनाक हालातों में घिरा मजदूर वर्ग और शहरों में जैसे-तैसे दिन गुजार रहे लोग अपने गाँव-घर जाने के लिये परेशान हैं। विदेशों से भी कई भारतीयों को सरकार स्वदेश ला चुकी है।
कोरोना वायरस से पूरी दुनिया घिरी है। चीन से शुरु हुए इस रोग ने दुनिया के देशों को अपने चपेट में ले रखा है। इससे सबसे ज्यादा मौतें इटली में हुई हैं। दुनियाभर के डाक्टर, वैज्ञानिक करोना से बचाव के लिये खोज में जुटे हैं और टीके बनाने की तैयारी की जा रही है जो इससे बचाव करे। लेकिन यदि ऐसा टीका बन भी जाता है तो सालभर का समय तो लग ही जायेगा। ऐसे में प्रत्येक आम जन की सूझबूझ व समझदारी ही समाज को बचा सकती है। भारत में भी इस महामारी से बचाव के लिये कदम उठाये गये हैं। सरकार की अपील के बाद भी लापरवाह बने लोगों को सख्ती के साथ रोका गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद 25 मार्च से देश को लाॅकडाउन कर दिया गया। इससे पहले पहले जनता कफ्रर्यू पिफर अघोषित कफ्रर्यू लगाया गया। छूट पर लापरवाही करने वालों के कारण राज्यों में सख्ती के साथ कफ्रर्यू लगाया गया ताकि कोरोना जैसी घातक महामारी को रोका जा सके। आश्चर्य हो रहा है कि जब दुनियाभर में इस महामारी से हाहाकार मच चुका है, हमारे यहाँ कुछ लोग अड़ियलपना करते रहे। अपने घर से बाहर निकलने को बेताब ऐसे लोगों को पुलिस के डण्डे से हटाया गया। इसके अलावा सोशल मीडिया पर हँसी-मजाक, गीत-संगीत के अलावा सरकार के कदमों पर नुख्ता निकालने वाले शुरुआत में नहीं मान रहे थे लेकिन कोरोना के कहर से सब जान चुके हैं कि यदि किसी भी प्रकार की लापरवाही हुई तो मोहल्ले के मोहल्ले मरघट बन जायेंगे। इसी खतरे को देखते हुए दिल्ली सहित पूरे देश के मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च में सामुहिक प्रार्थना-पूठा-अजान जैसे कार्यक्रम स्थगित कर तय हुआ कि अपने घरों पर ही रहकर पूठा-पाठ करें। संकट की इस घड़ी में लाॅकडाउन से किसी भी कर्मचारी का वेतन न काटने का निर्देश प्रधानमंत्री ने दिया है और अपील की कि लोग अपने परिवार को घर पर ही रहकर खतरे से बचाएं।
कोरोना के संक्रमण का प्रकोप रोकने के लिये भारत सरकार और प्रदेश की सरकारें जुटी हुई हैं। पुलिस, प्रशाासन, बैंक की ड्यूटी के अलावा चिकित्सक और स्वच्छकों द्वारा किये जा रहे कार्यों की जितनी सराहना की जाए कम है। खतरे में रहकर इन लोगों द्वारा जो सेवा की जा रही है वह इस लड़ाई के असल हीरो हैं। कुछ समाजसेवियों द्वारा भी असहाय व परेशान लोगों की सेवा के लिये हाथ बढ़ाया गया है।
कोरोना संक्रमण की भयावह स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय पर दूसरी बार देश को सम्बोधित करते हुए जब 21 दिन के लाॅकडाउन की घोषणा की, उनकी बातों में देश व दुनिया को बचाने का दर्द था। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान के हर नागरिक को बचाने के लिए घरों से बाहर निकलने पर बापंदी लगाई जायेगी। ये एक तरह से कफ्रर्यू ही है। लाॅकडाउन की कीमत देश को उठानी पड़ेगी। लेकिन आपके परिवार को बचाना, आपके जीवन को बचाना, इस समय मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। इस समय देश में जो जहाँ हैं, वहीं रहें। अभी 21 दिन का लाॅकडाउन है। अगर ये 21 दिन नहीं संभले तो हमारा देश 21 वर्ष पीछे चला जायेगा। प्रधानमंत्री के सम्बोधन का जबर्दस्त प्रभाव हुआ और सभी लोग लाॅक डाउन के लिये तैयार हो गए। कोरोना की महामारी को रोकने के लिये यही एक तरीका है कि इस वायरस की चैन को तोड़ा जाए ताकि यह न फैले। केन्द्र द्वारा कोरोना वायरस के कहर से निपटने के लिये 15,000 करोड़ रुपए के फंड का प्रावधान किया है। वर्तमान संकट को देखते हुए बड़े पिफल्मी कलाकारों, उद्योगपतियों, समाजसेवियों ने अपनी तिजोरी खोल दी। इसमें स्वामी रामदेव ने 800 करोड़ देने की घोषणा के साथ सन्देश दिया। फिल्मी कलाकार अक्षय कुमार ने 25 करोड़ रुपये, क्रिकेटर सचिन तंदेलुकर ने 50 लाख दिये। अजीम प्रेम जी फांउडेशन ने बड़ी राशि देकर सहायता की है।
उत्तराखण्ड में भी प्रदेश की सीमाएं सील करते हुए कफ्रूर्य लगाया गया है ताकि कोरोना वायरस की लड़ाई को लड़ा जा सके। मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने सभी प्रदेश वासियों से सहयोगी बनने को कहा है। मुख्यमंत्री ने जनता से प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सम्पूर्ण लाॅकडाउन के आह्वान में पूरा सहयोग देने की अपील की। उन्होंने कहा कि जब भी देश पर और मानवता पर संकट आया है, हम सभी की एकजुटता से संकट को दूर करने में कामयाब हुए हैं। लाॅकडाउन को कारगरबनाने के लिये प्रदेश में टास्क पफोर्स गठित की गई है। साथ ही अति आवश्यक सेवाओं में लगे वाहनों के लिये पास जारी किये गये हैं।
पुलिस महानिदेश अपराध् एवं कानून व्यवस्था अशोक कुमार ने बताया कि प्रदेश में लाॅकडाउन के दौरान कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये 6000 पुलिस कर्मी और 20 कम्पनी पीएसी तैनात हैं। प्रदेश को 102 जोन और 500 सेक्टर में बांटा गया है।
इस बीच देहरादून सचिवालय में प्रदेश कैबिनेट की बैठक में महत्वपूर्ण फैसले लिये गये। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक में मंत्राी सतपाल महाराज, यशपाल आर्य, मदन कौशिक, डाॅ.हरक सिंह रावत, सुबोध् उनियाल और अरविन्द पाण्डे मौजूद थे। प्रदेश सरकार के शासकीय प्रवक्ता मदन कौशिक ने सचिवालय मीडिया सेंटर में कोरोना वायरस ;कोविड 19 से बचाव को लेकर प्रदेश सरकार के फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कालेजों देहरादून, हल्द्वानी, श्रीनगर और अल्मोड़ा मेडिकल कालेज को मुख्य रूप से कोरोना रोगियों के उपचार के लिये आरक्षित रखा जाएगा। शेष विभागों को अन्य हास्पिटल में शिफ्रट किया जाएगा। कैबेटिन के फैसलों पर अमल करते हुए शासन ने निर्देश जारी कर दिये हैं। इसके तहत बड़े निजी अस्पतालों से कहा गया है कि वे 25 फीसदी बेड कोरोना रोगियोें के लिये रखें। इसके अलावा आईआईपी देहरादून और एम्स ट्टषिकेश में केविड-19 की जाँच हेतु इजाजत दी गई है। श्रीनगर, हल्द्वानी, दून मेडिकल कालेजों के विभाग अध्यक्ष तीन महीने के लिये डाक्टर भर्ती कर सकते हैं। जिलाधिकारी भी अपने जिलों के अस्पतालों में तीन माह के लिये डाक्टर भर्ती कर सकते हैं। स्वास्थ्य विभाग में सृजित 958 रिक्त पदों के सापेक्ष 479 सर्जन को 11 माह के रखने की अनुमति, असंगठित मजदूर जरूरतमन्द जनता की तात्कालिक मदद के लिये चार जनपदों के जिलाधिकारियों को तीन व अन्य को दो करोड़ रुपये का फंड, गेहूं किा खरीद मूल्य बढ़ाकर कर 1925 रुपये प्रति क्विंटल से अब 1945 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है।
कोरोना से बचाव की यह लड़ाई लम्बी है, सभी ने सावधान रहना होगा।

कोरोना का भस्मासुर

पिघलता हिमालय

कोरोना वायरस ने पूरे विश्व में हड़कम्प मचा दिया है। चीन से शुरु होकर अमेरिका व ईरान में सैकड़ों लोगों की मौत के बाद दक्षिण-पूर्वी एशिया में सैकड़ों मामले सामने हैं। थाइलैंड, भारत, इंडोनेशिया, श्रीलंका, मालदीव, बंग्लादेश, नेपाल, भूटान सहित चारों ओर यह वायरस फैला है। कोरोना महामारी से निपटने के लिये विश्व के देशों ने हाथ-पैर मारने शुरु कर दिये हैं और अपने नागरिकों से घर में सिमट कर रहने को कहा है ताकि वायरस फैलने से बचा जा सके।
कोरोना वायरस के बारे में विशेषज्ञ जुटे हुए हैं और इसकी रोकथाम के लिये जितना ज्यादा हो सकता है किया जा रहा है। लेकिन यह तो जान ही लेना चाहिये कि कोरोना का भस्मासुर क्या है? दरअसल दुनियाभर की तेज रफ्रतार में यह भुला दिया गया है कि प्रकृति के अपने नियम हैं। नियम विरुद्ध आचरण और मनमानी का परिणाम ही कोरोना है। चीन जैसे शक्तिशाली देश को ही सबसे पहले कोरोना ने निवाला बनाया। अपने विकास के लिये दूसरे के विनाश का रास्ता चुनने वाले व्यक्ति और देश यह कतई नहीं जानते हैं कि कोई भी वरदान तब विनाश बन जाता है जब उसका दुरुपयोग किया जाने लगे। कोरोना वायरस भी इसी प्रकार का भस्मासुर है। इसका नाच इतना ताण्डव मचा चुका है कि दुनिया के देशों में हाहाकार मचा है। इन्तजार है शिव रूप में कोई इसे नचाए और भस्म कर दे।
शिव और भस्मासुर की कथा को जानने वाले बातों को आसानी से समझ सकते हैं। भस्मासुर नामक दैत्य ने शिव को प्रसन्न कर ऐसा वरदान मांगा कि वह जिसके सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जायेगा। वरदान मिलने के बाद भस्मासुर शिव को ही भस्म करने दौड़ पड़ा था। परेशान शिव ने बचने के लिये मोहनी रूप धर नृत्य किया और भस्मासुर भी नाचने लगा। नाचते नाचते उसने अपना हाथ अपने ही सिर पर रख दिया और भस्म हो गया था। ऐसा ही कुछ कोरोना भी है। चीन ने जो प्रयोग अपने वहाँ किये, उसे पता नहीं था कि वह उसे ही भस्म करने वाला है। कोराना ही क्या, ऐसे न जाने कितने वायरस दुनिया में फैल चुके हैं जो भविष्य में भी परीक्षा बनकर सामने होंगे। इसलिये जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने और अपने परिवार को संभाले। हमारे संस्कार, हमारे नियम-ध्र्म, हमारी मान्यताएं कोरी बकवास नहीं हैं। इनके साथ ही विज्ञान को जानना भी जरूरी है। अपने को अनुशासन में रखने से अपने समाज और अपने देश को सुरक्षित किया जा सकता है। कोराना ने पूरी दुनिया में यह सन्देश दे डाला है कि यदि महामारी पफैली तो सबकुछ मिट्टी में मिलते देर नहीं लगेगी।

ठहर सा गया है जन-जीवन

कार्यालय प्रतिनिधि
कोरोना वायरस से बचाव के लिये सारे उपायों के साथ उत्तराखण्ड भी अलर्ट है। पूरा मार्च का महीना कोरोना कफ्रर्यू से घिरा रहने के बाद अब अप्रैल भी सामान्य नहीं है। सुरक्षा इन्तजामों का जाल शासन प्रशासन ने बिछाया है लेकिन वह भी उतना ही कर सकते हैं जितना उसके पास है। ऐसे में सभी ने जागरुकता दिखानी है। कोरोना के भय से सबकुछ ठहर सा गया और इससे सारी व्यवस्थाएं चरमरा चुकी हैं। स्कूल-कालेज प्रतियोगिता-परीक्षा सभी प्रभावित हैं। नव संवत्सर ‘प्रमादी’ का स्वागत भी सादा ही रहा। इस अवसर पर होने वाले जलसे-जुलूस स्थगित रहे। प्रसिद्ध मन्दिरों व मेलों में रोक का असर भी रहा। प्रदेश में होने वाली धर्मिक यात्राएं भी प्रभाव में हैं। ऐसे में ग्रीष्मकालीन पर्यटन को भी सन्देह से देखा जा रहा है। पर्यटन के मौसम में छुटपुट कारोबार कर रोटी जुटाने वाले ताक रहे हैं कि स्थिति ठीक हो और यात्राी पहाड़ आएं लेकिन अधिकांश बुकिंग रद्द होने से मायूस हैं।
देशभर में फैले कोरोना वायरस के संक्रामित लोगों तादाद बढ़ती जा रही है। पचास से ज्यादा लोगों के सैंपल लेकर हल्द्वानी भेजे गये हैं। पन्तनगर एयरपोर्ट में तैनात स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा थर्मल स्कैनिंग की जा रही है। पन्तनगर विश्वविद्यालय के शैक्षणिक डेयरी फार्म द्वारा परिसर में दूध् बांटने के लिये लगाए लगाए गए कैंनों ;दूध् के बर्तनद्ध में अब टोटियांे की सहायता से दूध् दिया जा रहा है। पहले यह दूध् बर्तन का ढक्कन खोल कर खुले में दिया जाता था।
संक्रमण से बचाव के लिये सबसे पहले प्रदेश का सुप्रसिद्ध पूर्णागिरी मेले पर प्रतिबन्ध् लगाया गया। इसके बाद अन्य मेले, मन्दिरों में रोक लगा दी गई। मन्दिर समितियों ने भी इसमें योगदान दिया है। धर्मिक आयोजनों को भी सीमित किया गया है। धर्मिक नगरी हरिद्वार में इन दिनों जहाँ हजारों श्रद्धालु पहँुचते थे, सन्नाटा पसरा हुआ है। यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों पर नजर रखी जा रही है। हैड़ाखान मन्दिर में इटली समेत अन्य देशों के विदेशी पर्यटकों को मन्दिर से हटा दिया गया है। कोरोना का व्यावसायिक कार्यों में तो जबर्दस्त प्रभाव पड़ा है। स्थितियों को देखते हुए होटल व्यावसायियों ने सहयोग किया है। नैनीतात, मसूरी सहित पर्यटक स्थलों पर होटल, रिजाॅर्ट बन्द कर लोगों को जागरुक किया है। मुक्तेश्वर, भीमताल, रामनगर, मुनस्यारी सभी जगत पर्यटकों की बुकिंग न होने से सन्नाटा है।
राजनीतिक पार्टियों ने भी अपने कार्यक्रमों को परिवर्तित कर दिया है। भाजपा ने अपनी बैठकों व प्रस्ताविक कार्यक्रमों को रद्द कर दिया है। आम आदमी पार्टी का सदस्यता अभियान आॅनलाइन है लेकिन इसने भी अपने सम्पर्क अभियान को रोका है। कांग्रेस द्वारा भी अपने कार्यक्रमों को बदल दिया गया है। सभी ने मिलकर कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव की अपील की है। मंत्रिमण्डल की बैठक के बाद जन प्रतिनिध्यिों को सभाओं, जनता दरबार कार्यक्रम रद्द करने को कहा गया।
कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए सरकार ने स्टेडियम, कालेज और गेस्ट हाउसों को क्वारंटीन सेन्टर बनाया है। अस्थायी अस्पताल की तैयारियां भी हो चुकी हैं। किसी भी स्थिति से निपटने के लिये सरकार ने रेडअलर्ट जारी किया है। सेना ने भी कोरोना के कहर से बचने की तैयारी की है। छुट्टी पर गए जवानों की वापसी पर पिफलहाल रोक लगा दी है। जो लोग छुट्टी काटकर वापस आए हैं, उन्हें 14 दिन क्वारंटीन पर रखा जा रहा है।
कोरोना वायरस के बचाव के लिये हाईकोट की ओर से तय किया गया है कि 15 अप्रैल तक केवल अति आवश्यक मुकदमों की ही सुनवाई होगी। निर्देश के अनुसार हाईकोर्ट में केवल मृत्युदण्ड, बन्दी प्रत्यक्षीकरण सुरक्षा, सम्पत्ति ध्वस्तीकरण, जमानत प्रार्थना पत्रा ही सुनवाई होगी। उपरोक्त में मृत्युदण्ड के अलावा अन्य त्वरित मामलों की सुनवाई के लिये अधिवक्ताओं को मामले की अर्जेंसी का कारण बताना होगा।
इस प्रकार जन-जीवन ठहर सा गया है लेकिन यह सब करना भी जरूरी है ताकि किसी प्रकार का नुकसान न हो। इसमें सभी को सहयोग देना है।

करोड़ों भक्तों की आस्था का प्रतीक है पूर्णागिरी दरबार


डाॅ.पंकज उप्रेती

हिमालय के उत्तरपूर्व में नेपाल सीमान्त पर समुद्रतल से लगभग तीन हजार फीट की ऊँची अन्नपूर्णा की चोटी पर स्थित है करोड़ों भक्तो की आस्था का प्रतीक पूर्णाेिगरी दरबार। उत्तर भारत के इस प्रसिद्ध मेले में इन दिनों भारी भीड़ जुटी हुई है। मान्यता के अनुसार पूर्णागिरी दर्शन करने वाले सीमा पार नेपाल ब्रह्मदेव में सि(बाबा मन्दिर के दर्शन भी जरूर करते हैं। नाचते-झूमते भक्तों के जत्थों को इन दिनों टनकपुर से लेकर मन्दिर तक देखा जा सकता है। मेले का यह क्रम पूरी ग्रीष्म रितु तक चलेगा। जिसमें लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामना लिये पहँुचते हैं।
चैत्र मास की प्रतिपदा से लेकर बैसाख के अन्त तक दूर-दूर से आने वाले नर-नारियों का जमघट यहाँ प्रतिवर्ष लगता है। पूर्णागिरी माई की जय, पहाड़ वाली माई की जय, शेरावाली की जय, सच्चे दरवार की जय इत्यादि नारे लगाते हुए यात्री दल मीलों पैदल चलकर पूर्णागिरी मन्दिर दरबार पहँुचते हैं। आरोग्य, गृहस्थ, सुख सन्तान, ऐश्वर्य तथा दर्शन की लालसा लिये यात्रियों की मान्यता है कि उनकी यात्रा से मनोवांछित इच्छाएं पूर्ण होगी। दुर्गा-सप्तष्ती में देवी की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा गया है- ‘‘जो सिंह की पीठ पर विराजमान है। जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है जो मरकत मणि के समान कान्तिवाली अपने चारों भुजाओं मे शंख, चक्र, धनुष वाण धरण करती है व तीन नेत्रों से सुशोभित होती है। जिनके भिन्न-भिन्न अंग बंध्े हुए बाजूबन्द, कंकण, हार, खनखनाती हुई करघनी व नूपुरों से सुशोभित हैं। जिनके कानों में रत्न जड़ित, कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। वे भगवती हमारी दुर्गति दूर करने वाली है।’’
पूर्णागिरी नाम क्यों पड़ा, इस बारे में कहा जाता है कि प्राचीन काल में दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती द्वारा स्वयं को भस्म कर देने पर क्रुद्ध शिवजी जब सती की क्षत-विक्षत देह को आकाश मार्ग से ले चले तब मार्ग में लगभग 51 स्थलों पर देवी सती के अंग गिरे। पूर्णागिरी शिखर पर देवी का नाभि अंग गिरने से यह शिखर एक पुनीत स्थल माना जाने लगा। देवी के मन्दिर के बीच में एक बाॅबी/सुराख है। वह सती की नाभि ही है जिसका निचला छोर शारदा नदी तक गया है। कहा जाता है कि कालान्तर में काठियाबाड़, गुजरात निवासी श्री चन्द्र तिवारी सम्वत् 1621 मे यवनों के अत्याचार से पीड़ित हो कुमायूं के चन्द्रवंशी राजा ज्ञानचंद के दरबार पहँुचे। इस प्राीचन देवी-स्थल की महिमा व स्वप्न में देवी का आदेश होने पर ब्रह्मकुण्ड/बोम के निकट स्नान कर सम्वत् 1632 में माँ पूर्णागिरी की मूर्ति की स्थापना की। इस प्राचीन मन्दिर का पूजा कार्य बाद में तिवारी और बल्हेड़िया वंश के लोगों ने परस्पर बांट लिया। खिलपति में अखिलतारिणी मन्दिर, उग्रतारा व बाराही मन्दिरों की स्थापना का श्रेय भी श्री चन्द्र तिवारी को है।
ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार अन्नपूर्णा शिखर के निकट सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी में, जो शारदा नदी के दूसरी ओर स्थित थी, एक विशाल यज्ञ आयोजित किया था जिसमें सभी देवताओं सहित भगवान शिव-पार्वती भी पधारे थे। निकटवर्ती पर्वत श्रेणियों की रमणीक दृृृश्यावली ने देवी पार्वती का मन मोह लिया और उन्होंने शिव से वहीं निवास करने की आज्ञा मांगी तभी से ब्रह्माजी की प्राचीन यज्ञ स्थली ब्रह्मदेव मण्डी तथा देवी पार्वती का वास स्थल पूर्णागिरी के नाम से विख्यात हुआ।
शारदा नदी के बायें तट पर बरमदेव/बूम के ठीक सामने सि(नाथ का प्राचीन मन्दिर एवं पूर्णागिरी मन्दिर के ठीक नीेचे देवी के चरण-स्थलों पर बना मन्दिर मार्ग की जटिलता के कारण प्रायः भक्तों की पहंँुच से बाहर ही हैं चैत्र मास में शारदा नदी में नावें डालकर बूम से ठाकुर जी की सवारी असली सिद्ध बाबा मन्दिर तक जाती व पूजन आदि कर वापस लौट आती है। सिद्धबाबा एक सिद्ध सन्त व देवी के अनन्य उपासक थे जिस पर पूर्णागिरी माता की विशेष कृपा थी। शक्ति स्वरूपा देवी भगवती ही उनकी इष्ट थी। दिन रात खड़े रहकर सच्चे मन से देवी की अराधना कर उन्हें सम्पूर्ण सिद्धियां व देवी से प्राप्त साक्षात्कार व संभाषण शक्ति प्राप्त हो चुकी थी। किवदन्ती है कि देवी उपासक बाबा सदानन्द व सिद्धमणि पर्वत पर तपस्या रत बाबा सिद्धनाथ में परिचय होने पर देवी की महिमा व चमत्कारों को सुन सिद्धनाथ देवी दर्शन को अष्टमी की महारात्रि को सिंह की चिन्ता किए बिना अन्नपूर्णा शिखर की ओर चल दिये। एकान्त-विश्राम के इन क्षणों में पर पुरुष का आभास पाकर देवी क्रोधित हुए बिना न रह सकी और अपने इस भक्त को दो टुकड़ों में खण्डित कर शिखर से उछाल दिया। जिसका एक भाग शारदा नदी के पार नेपाल राज्य में व दूसरा भारत में बनखण्डी स्थान पर गिरा। देवी के इस कृत्य पर नेपथ्य आत्र्तनाद गूंज उठा- ‘‘देवी! क्या तुम्हारे भक्तों की यही दुर्गति होती है।’ देवी ने अपने भक्त सि द्ध नाथ को दर्शन दिये और आशीर्वाद देकर अन्र्तध्यान हो गई। बाबा लम्बे समय तक देवी-चरणों में सेवारत रहकर देवीधम सिधारे। अन्नपूर्णा शिखर के सामने नेपाल राष्ट्र में बाबा सि द्ध नाथ का प्राचीन मन्दिर व समाधि आस्थावानों के लिये श्र द्ध का केन्द्र है।
यात्रा की कठिन चढ़ाई-
माँ पूर्णागिरी के पुनीत स्थल की यात्रा कठिन चढ़ाई वाली है। देश-विदेश से यात्राीगण टनकपुर भाबर मण्डी में रात्रि विश्राम करते हैं। पैदल आने वाले जत्थे व वाहनों, रेल यात्रा द्वारा पहँुचे यात्राी टनकपुर से ठूलीगाड़ नामक स्थान पर पहँुचते हैं। प्राचीन ब्रह्मदेव मण्डी, महावली भीम द्वारा रोपित चीड़ वृक्ष, पाण्डव रसोई तथा उनकी उत्तराखण्ड यात्रा के पड़ाव स्थल इसी के समीप हैं। ठूलीगाड़ में प्रथम पड़ाव के साथ ही लगभग 5 किमी. की पथरीली पहाड़ की चढ़ाई पूरी करनी होती है। इस मार्ग पर बासी की चढ़ाई पूरी कर हनुमान चट्टी, ढलान पर लादी खोलाा, हल्की चढ़ाई पूरी कर पानी की टंकी व पर्यटक आवास दिखाई देता है। कुछ और चलने के बाद भैरोंचट्टी, पुरानी बाँवली व टुन्नास, काली मन्दिर, झूठा मन्दिर के बाद माता का दरबार मिलता है।
मान्यता है कि पहाड़ वाली माई की कृपा अबोध् बालकों, अशक्त महिलाओं तथा वृ(जनों को अपनी शरण में खींच लेती है।
टुन्नास से पवित्रा होकर यात्राीगण काली मन्दिर से आगे लगभग एक किमी की दुर्गम चढ़ाई, जो अब सीढ़ियाँ बनने तथा लोहे के पाइप लगने से सुगम हो गई है, प्रारम्भ करते हैं। इस मार्ग में झूठा मन्दिर, काली मन्दिर इत्यादि के दर्शन के साथ ही नैसर्गिक शोभा को निहारते यात्राी माता के नारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। सामने की पर्वत श्रृंखला में मित्रा राष्ट्र नेपाल की सीमा पर देवी के अनन्य उपासक सि द्ध बाबा के प्राचीन मन्दिर के दर्शन भी यात्राी जरूर करते हैं। इसके बिना यह यात्रा अपूर्ण मानी जाती है।
टुन्नास बनाम इन्द्रभवन-
देवराज इन्द्र द्वारा गौतम ट्टषि की पत्नी अहिल्या से छलपूर्वक मिलने की कथा सर्वविदित है। कुपित ट्टषि के शाप से मुक्ति पाने के लिये भगवान शिव के परामर्श से इन्द्र ने जिस स्थान पर यज्ञ किया वही प्राचीन स्थल इन्द्रभवन या टुन्नास के नाम से जाना जाता है। जो इस मनोहारी यात्रा का मुख्य पड़ाव है। यात्राीगण आते-जाते समय यहीं विश्राम करते है। व बालकों का मुण्डन, पूजा-पाठ व हवन आदि कराते हैं।
झूठे मन्दिर की कहानी-
वर्षों पहले एक सम्पन्न दम्पत्ति सन्तान की कामना लेकर माँ के दरबार में पधरा और सन्तान प्राप्ति पर देवी को सोने का मन्दिर चढ़ाने का वचन दिया। मनोकामना पूर्ण होने पर सेठ ने तांबे का मन्दिर बना उपर से सोने का पानी चढ़वा दिया। कई किमी से बनवाकर लाया गया यह मन्दिर सच्चे दरबार तक नहीं आ सकता और लाख प्रयत्न पर भी नहीं उठा। देवी ने सेठ की भेंट अस्वीकार कर दी, जिसे आज भी झूठे मन्दिर के रूप में जाना जाता है। टुन्नास के निकट रखा यह मन्दिर सच्चे दरबार की महिमा का बखान कर रहा है।
काली मन्दिर व भैरों बाबा-
झूठे मन्दिर से कुछ आगे चलकर काली देवी तथा भैरों बाबा का प्राचीन स्थल है। इसकी स्थापना कूर्मांचल नरेश राजा ज्ञानचन्द के विद्वान दरबारी पण्डित श्री चन्द्र त्रिपाठी ने की थी। राजा ने पण्डित को 6 गाँव उपहार में दिये थे। आज भी इन बिल्हा गाँव के निवासी बल्हेड़िया तथा तिराही गाँव के निवासी त्रिपाठी कहलाते हैं। मन्दिर का समस्त पूजा-कार्य इनके द्वारा किया जाता है। भैरों चट्टी पर देवी के अनन्य उपासक महाकाल भैंरो का प्राचीन स्थल व काली मन्दिर के निकट देवी के काली का रौद्र रूप धरण कर तूर्णा राक्षस का वध् स्थल भी है।
सिद्ध बाबा की समाधि-
एक दिन जब रात्रि में देवी सिंह की सवारी पर निकली तो निर्जन स्थल पर किसी पुरुष की उपस्थिति का आभास पाकर शेर ने गर्जना की और देवी ने समाधिस्थ बाबा सिद्ध मणि के दो टुकड़े कर पफंेक दिये। एक तो नीचे जाकर बनखण्डी नामक स्थान पर गिरा जहाँ आज भी मेला लगता है, दूसरा टुकड़ा सामने पहाड़ पर जाकर गिरा जहाँ समाधि स्थल सिद्ध बाबा का प्राचीन मन्दिर विद्यमान है। देवी के वरदान के कारण ही सिद्ध बाबा के दर्शन किये बिना पूर्णागिरी की यात्रा अपूर्ण समझी जाती है। इस कारण यात्राीगण देवी के दर्शन के बाद सिद्ध बाबा के दर्शन करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते हैं।
माँ का दरबार-
चट्टान के उपर-नीचे रास्ते पार कर उँची चोटी पर पूर्णागिरी माता का दरावार है। जिसकी प्रधन शक्ति पीठों में गणना की जाती है। चबूतने पर नाभि, त्रिशूल व मूर्ति आदि चिन्ह हैं, जिसकी पूजा की जाती है। मन्दिर के पाश्र्व भाग में अति प्राचीन पत्रा, पुष्प फल रहित सूखा वृक्ष है। जिस पर अनेकों घंटियाँ व ध्वज पताकायें बंध्ी हैं और पास में त्रिशूल गढ़े हैं। नाभि स्थल ढका है।