अपनी अस्मिता को बचाए हुए है द्वाराहाट का स्याल्दे बिखोती कौतिक

उदय किरौला
कुभ मेले की अथाह भीड़ तथा राजनैतिक नेताओं की चुनाव सभाओं की भीड़ को देखते हुए इस बार द्वाराहाट क्षेत्र के लोगों ने भी कोरोना काल में ऐतिहासिक स्याल्दे बिखोती कौतिक की अस्मिता को बचाने का निर्णण लिया। कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए स्याल्दे बिखोती मेला कमेटी तथा नगर पंचायत द्वाराहाट ने केवल पारम्परिक नगाड़ा टीमों को मेले में आने की स्वीकृती दी। मेले में लगने वाले चर्खे आदि तथा बाहरी व्यापारियों को भी मेला कमेटी ने आने की सहमति नहीं दी। इस बार मेले में बाहरी सांस्कृतिक टीमों के साथ ही स्थानीय स्कूलों के बच्चों के भी कार्यक्रम नहीं हुए। परन्तु 13-14 तथा 15 अप्रैल 2021 को यह मेला बहुत ही सादगी के साथ इस बार सम्पन्न हुआ।
जहाँ स्थानीय मेलों का अस्तित्व खतरे में है। वहीं इस वर्ष स्याल्दे बिखोती मेले के पहले दिन 13 अप्रैल की रात 8 गाँवों के लोग अपने गाँव के नगाड़े-छोलिया नृत्य-झोड़े तथा भगनौल गाते हुए मेले में पहुँचें। मेले के दूसरे दिन 14 अप्रैल को नौज्यूला ध्ड़े के 4 गाँवों के लोग मेले में पहुँचे। 15 अप्रैल को मुख्य मेले के दिन गरख धड़े के 10 गाँवों के लोग तथा आल धड़े के 1 गाँव के लोग अपने.अपने गाँव के नगाड़े सहित मेले में पहुँचे। समूचे मेले में 23 गाँ वों के लोग अपने खर्चे पर मेले में नगाड़ों के साथ पहुँचे। एक गाँव से नगाड़ा ले जाने के लिए नगाड़ा और दमुवा बजाने वाले दो कलाकारए रणसिंग बजाने वाला एक कलाकार, ;छोलिया नृत्य वाले दो कलाकार ;निसाण/ध्वजा ले जाने के लिए दो व्यक्तियों सहित 7 कलाकारों की व्यवस्था करने में लगभग दस हजार से 15 हजार रुपए तक का खर्च आता है। जिसे ग्रामीण स्वयं वहन करते हैं। चर्चा होती है कि गाँव से नगाड़ा ले जाने के लिए मेला कमेटी यानी सरकार से पैसा मिलता है इसलिए लोग अपने गाँव का नगाड़ा लाते हैं। इस सन्दर्भ में नगर पंचायत द्वाराहाट के अध्यक्ष मुकुल साह से हुई वार्ता के अनुसार मेले के लिए लगभग एक लाख रुपए शासन से मिलता है जिसका 60 प्रतिशत नगाड़े लाने वाले गाँवों को दिया जाता है। उनके अनुसार मेले में जितने गाँवों के लोग नगाड़े के साथ पहुाँचते हैं उन्हें यह धनराशि बराबर-बराबर बांटी जाती है। यह धनराशि लगभग दो या ढाई हजार के लगभग होती है। यह धनराशि भी सरकार के बजट आने पर ही मिल पाती है। इस प्रकार गाँवों के लोग सरकार के भरोसे पर नहीं अपने संसाधनों से मेले में नगाड़ा ले जाते हैं। गाँव के लोगों का मानना है कि यह धनराशि खर्चे के बतौर मिलने के बजाय सम्मान के तौर पर मिलती तो गाँव वालों का और अधिक उत्साह बढ़ता।
इस मेले में नगाड़ा ले जाने के लिए कुछ गाँव होली की बचत को खर्च करते हैं तो कुछ गाँव अपने गाँव के पफंड से स्याल्दे मेले के लिए खर्च करते हैं। किसी गाँव में मेले में नगाड़ा ले जाने के गाँव के लोग चादर में अपनी श्रद्धा से पैसा जमा करवाते हैं, बांकी जितनी धनराशि और खर्च होती है उसे गाँव के कुछ उत्साही लोग आपस में मिलकर जमा करते हैं। किसी गाँव में नगाड़ा ले जाने के लिए लोग प्रत्येक परिवार से चंदा जमा करते हैं। कुछ गाँव में कुछ सक्षम लोग ही आपस में मिलकर धनराशि जमा करते हैं। किसी गाँव में अभी भी पुराने थोकदार और पधानों के घर से नगाड़ा उठाया जाता है तो किसी गाँव में वर्तमान पंचायती व्यवस्था में निर्वाचित ग्राम पधान नगाड़ा ले जाने की व्यवस्था करते हैं।
अलग-अलग कारणों से गाँवों के लोगों ने अपने पारम्परिक काम छोड़ दिए हैं। इस कारण अब गाँवों में नगाड़ा व रणसिंग बजाने वाले तथा छोलिया नृत्य करने वाले पारम्परिक प्रशिक्षित कलाकार नहीं मिल पाते हैं। दूरस्थ गाँवों से अधिक मानदेय देने पर भी कलाकार नहीं मिल पाते हैं। समय के साथ पारम्परिक व्यवसाय, रीति रिवाज तथा संस्कृति में बदलाव आ रहा है। नगाड़ा बजाने वाले प्रशिक्षित कलाकार न मिलने पर गाँव के पढ़े-लिखे युवा अपने गले में नगाड़ा व दमुवा लेकर अपने गाँव का नगाड़ा स्वयं ले जा रहे हैं। अपनी संस्कृति को बचाने के लिए ये सकारात्मक पक्ष है। नशे की बढ़ती प्रवृत्ति व दूसरे कारणों से युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से दूरी बना रही है। इस नकारात्मक पक्ष पर भी विचार किया जाना जरूरी है। एक गाँव के पधान के अनुसार अब गाँव का जनप्रतिनिधि चयनित ग्राम पधान गाँव का मुखिया है। तमान सरकारी लेन देन उसके माध्यम से होता है। केवल मेले तक ही उनकी पधान चारी रह गई है। उनके अनुसार गाँव के लोग मेले के लिए पैसा भी जमा करते हैं। नगाड़ा बजाने के लिए प्रशिक्षित कलाकार दूसरे गाँव के होते हैं। ये प्रशिक्षित कलाकार मेले की समाप्ति तक अपने काम को पूरी ईमानदारी से करते हैं। परन्तु मेले की समाप्ति पर नगारा आदि गाँव वापस गाँव लाने के लिए लोग तैयार नहीं रहते हैं। पूरी जिम्मेदारी प पधान के हिस्से होती है। ऐसे में स्याल्दे बिखोती में उनके गाँव से पिछले कई वर्षो से नगाड़ा नहीं जा रहा है। परन्तु कई गाँवों में अब चयनित ग्राम पधान के नेतृत्व में नगाड़ा जा रहा है। जहां कई गांवों का नगाड़ा मेले में नहीं जा रहा है। वहीं कई ग्राम पंचायतों में अलग.अलग तोकों से युवा अपने गांव का नगाड़ा ले जा रहे हैं। इस साल स्याल्दे मेले में विद्यापुर गाँव का नगाड़ा 40 साल व गवाड़ गाँव का नगाड़ा 15 साल बाद युवाओं की पहल पर मेले में शामिल हुआ। कहते हैं कि घर में किसी की मृत्यु के बाद एक साल तक बाजा नहीं बजता। बताते हैं कि यहाँ एक गाँव में पधान जी के पिताजी की मृत्यु हो गई। स्याल्दे के दिन ही उनका पीपलपानी थी। पधन जी सुबह जल्दी पीपलपानी के बाद अपने गाँव का नगाड़ा लेकर मेले में गए। ये कहीं न कहीं अपने गाँव की पहचान बनाने व अपनी संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास ही तो है।
आल समूह से इस बार केवल एक गाँव का नगाड़ा शामिल हुआ। बताया गया कि मेला कमेटी से सीधे सम्वाद नहीं होने के कारण कई गाँवों के लोग मेले में शामिल नहीं हुए। एक गाँव के प्रधन के अुनसार समूचे मेले की शोभा विभिन्न गााँवों से आए नगाड़ों के कारण होती है। परन्तु गाँववालों तक मेला कमेटी का सीध्े सम्वाद तक नहीं होता है। लोगों का कहना है कि मेला कमेटी में केवल बाजार के नजदीक के लोगों को शामिल किया गया है। मेले से पहले मेला कमेटी में नगाड़े ले जाने वाले गाँवों के पधान या सभापति को आमंत्रित कर जहाँ मेले में उनकी सक्रिय भागीदारी होगी वहीं सम्वादहीनता भी नहीं होगी।
उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद हमारी सरकारें अपना राजस्व बढ़ाने के लिए स्थान.स्थान पर शराब की दुकानें खोल रही हैं। ये तो सभी जानते हैं। इस बार स्याल्दे मेले में द्वाराहाट में शराब की दुकानें खुली रही। सरकार के राजस्व बढ़ाने के इस अभियान में गांव खोखले होते जा रहे हैं। ऊपर जिन प्रशिक्षित कलाकारों की बात कहीं गई हैं। उनमें से कुछ तो सुबह से ही अपना मनोरंजन पहले ही कर लेते हैं। गाँव परम्परा के अनुसार द्वाराहाट के गाँवों में चैत्र एक गते यानी फूल संक्रांति के दिन से झोड़े प्रारम्भ हो जाते हैं। पूरे चैत्र माह में गांवों में रात को झोड़े होते हैं। गांव के लोक कलाकार विगत एक साल में हुए सामाजिक विसंगतिए प्रेम प्रसंग आदि समसामयिक मुद्दों पर झोड़े तैयार करते हैं। गाँवों से निकलकर मुख्य मेले के दिन ये झोड़े सार्वजनिक हो जाते हैं। ये झोड़े एक गाँव से दूसरे गाँव तथा दूसरे क्षेत्रों तक पहुँचते हैं। प्रेम प्रसंग का कोई झोड़ा एक गाँव से दूसरे गाँव में गाया जाने लगा और उस गाँव में उस प्रेमी और प्रेमिका का कोई रिश्तेदार होता है तब कई बार गाँव में झगड़ा होने की सम्भावना भी बन जाती है। गाँवों में बढ़ती पानी की समस्या, शराब के प्रचलन, जंगलों में आग लगने व कोरोना की वजह से नौकरी जाने पर आधरित ये झोड़ा इस वर्ष मेले में छाया रहा-
गौनूं में हैगे पाणि की पटा,
शराब धकाधए
धुर जंगला आग लागिगो
एसैपूं की चकाचकए
कोरोना त्वीलै नौकरी खाई
नेता ज्यू टकाटक।
द्वाराहाट में राजनैतिक व्यंग्य बतौर झोड़ा भी इस बार गाया गया ‘काईखोई हैरौ खालि बदनाम, नैपाला हैरौ भौए अघिला साला पंदरा पैटा हिटणी ल्यायै भौ’। शराब तथा बन्दर और जंगली जानवरों के आतंक से सम्बन्धित झोड़ों के साथ कई पुराने झोड़े भी सुनने को मिले। गाँव के नगाड़ों के साथ ही गाँव की महिलाएं भी घरों से निकलती है। इस बार बाहर की दुकानें नहीं थी और मीना बाजार भी नहीं लगा। इस कारण इस बार मुख्य मार्ग में कई स्थानों पर गाँव की महिलाओं ने अलग-अलग समूहों में झोड़े गाए। मुख्य मेला स्थल पर भी महिलाओं ने बड़े समूह में झोड़े गाए।
मेले में नौज्यूला, गरख और आल समूह के नगाड़ों के साथ तीन चार समूहों में अलग.अलग गीतों के साथ टोलियां रहती हैं। इन टोलियों में भगनौल गायक बीच-बीच में जोड़ मारते हैं। उस जोड़ के साथ मेले में शामिल लोग नाच करते हुए अलग-अलग गीत गाते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मेले में इन पंक्तियों के लेखक की भागीदारी लगभग हर वर्ष तीन दिन तक हुड़के के साथ रहती है। बड़ी भीड़ के साथ कभी-कभी तो गीत के बोल तक नहीं सुनाई देते हैं। कई समूह में युवाओं को अश्लील गीत गाते हुए भी सुना गया। इनमें से कई तो घुटुक.घाटुक लगाकर मस्त थे। उन्हें किसी गीत से कुछ लेना-देना नहीं था। मेला व्यवस्थित हो इस पर भी मेला कमेटी तथा गाँवों के लोगों का आपस में विचार विमर्श करना चाहिए। मेले में ओड़ा भेंटते समय भी सारे निषाण एक साथ चलें तो लोग उस धड़े के सारे गाँवों की गिनती कर सकें। इधर कई वर्षो से अलग-अलग गाँवों के युवा अति उत्साह में अपने निसाण पहले लेकर अलग हो जाते हैं। इससे नगाड़ों या निसाणों की गिनती तक नहीं हो पाती। इसके लिए मेला समिति को सभी गाँवों के थोकदार पधानों -सभापतियों की एक बैठक जरूर बुलानी चाहिए।
ज्ञातव्य है कि कालान्तर में देश के अन्य शिवालयों व तीर्थो की तरह द्वाराहाट के स्थानीय तीर्थ श्री विभाण्डेश्वर महादेव में भी लोग विषुवत संक्रान्ति यानी बिखौती के दिन स्नान व पूर्जा अर्जन के लिए आते थे। जन श्रुति के अनुसार एक बार बिखोती में द्वाराहाट में हुए एक झगड़े में द्वाराहाट के लोगों ने किसी बाहरी गाँव के थोकदार को मार कर उसका सिर जमीन में गाड़ दिया। वहाँ पर एक पत्थर गाड़ दिया गया। जिसे ‘ओड़ा’ कहा जाता है। तब से स्याल्दे मेले के दिन द्वाराहाट क्षेत्र के लोग नगाड़े, निसाण, छोलिया नृत्य, गीत भगनौल गाते हुए मेले में आते हैं। मेलार्थी उस पत्थर यानी ओड़े के ऊपर लकड़ी मारकर अपनी वीरता व विजय को याद करते हैं। कहा जाता है कि अंग्रेजी शासन काल में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए समूचे क्षेत्र की जनता को आल गरख व नौज्यूला धड़े में बांट दिया गया। तब से तीनों समूहों अपनी बारी के अनुसार ओड़ा भेटने की रस्म अदा करते हैं।
एक किस्सा प्रचलन में है कि दोर्याल ;द्वाराहाट निवासी अपना बैल बेचकर भी स्याल्दे बिखोती मेला जरूर जाता है। परन्तु इलैक्ट्रानिक मीडिया के वर्तमान दौर में बेरोजगारी, महंगाई, शराब के प्रचलन, युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति व मेलों में होती गुण्डागर्दी के कारण अब मेले व दूसरे सार्वजनिक समारोह आयोजित करना अपने आप में एक चुनौती है। इस बार कुम्भ मेले तथा सल्ट विधानसभा चुनाव में पुलिस की तैनाती के कारण पुलिस की समुचित व्यवस्था नहीं थी। उसके बावजूद गाँवों की आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था ने मेले को शान्तिपूर्ण ढंग से सम्पन्न करवाने में मदद की। एक दौर था जब देश प्रदेश में रह रहे प्रवासी इस मेले में छुट्टी लेकर आते थे। परन्तु महंगाईए बेरोजगारी व अन्य कारणों से चाहते हुए भी लोग मेले में नहीं आ पाते हैं। उसके बावजूद जागरूक युवाओं की पहल पर द्वाराहाट का स्याल्दे बिखोती मेला आज भी अपने स्वरूप व अस्मिता को बचाए हुए है।

वैश्विक जलवायु हड़ताल 19 मार्च ( Global Climate Strike 19 March )

जलवायु परिवर्तन के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए यह हड़ताल वैश्विक स्तर पर की जा रही है. इस हड़ताल से हम बताने की कोशिश कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन सच है व जलवायु परिवर्तन का असर अभी से दिख रहा है. पृथ्वी का औसत तापमान अभी से 1.2 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा होने की कगार पर है. और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे पहले अविकसित समाज के लोगों पर पड़ता है.
इसलिए हम चाहते हैं कि ऐसी नीतियाँ बनायी जायें जिनमें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को प्राथमिकता देने के साथ साथ जीवाश्म ईंधन, कोयले के प्रयोग को कम किया जाए. जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम हो. हम ऐसा भविष्य चाहते हैं जिसमें धरती का तापमान मनुष्यों के साथ साथ अन्य पशु पक्षियों के भी रहने लायक हो. लेकिन ऐसे भविष्य के लिए हमें अपनी रोज़मर्रा की कार्यप्रणाली में बदलाव लाना ही होगा, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के स्तर को शून्य करना होगा. इसी उद्देश्य से यह वैश्विक मुहिम चलायी जा रही है, जिससे लोग जलवायु परिवर्तन के संकट के बारे में जागरूक होंगे और फ़िर नीतियों के निर्णयकर्ता भी सही नीतियाँ लाने के लिए प्रेरित होंगे.
इस अभियान की कुछ माँगे हैं कि कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों को मिलने वाली आर्थिक सहायता बन्द हो. नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को प्राथमिकता मिले एवं भविष्य में सारी बिजली सौर और पवन ऊर्जा जैसे केवल नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त हो. जिससे धरती का “औसत तापमान” 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा ना हो. धरती के कई इलाकों में तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस को पहले ही पार कर चुका है, इससे हमें यह पता चला कि जलवायु परिवर्तन पूरी धरती पर एक तरह का प्रभाव नहीं डालता है. यदि किसी स्थान पर तापमान साल दर साल बढ़ रहा है, तो अन्य किसी स्थान पर यह भी सम्भव है कि तापमान साल दर साल गिरता ही जाय. अगर धरती का औसत तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक को जाता है तो, चक्रवात, बाढ़, सूखा पड़ना, आम बातें हो जाएंगी.
एक रिपोर्ट के अनुसार यह पता लगा कि केवल 100 कम्पनियां ही 71% वैश्विक ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार हैं. यदि ऐसी कम्पनियों पर कार्बन टैक्स लगाया जाय, तो यह सम्भव है कि वो अपने उत्सर्जन के स्तर में कमी लायेंगें व जीवाश्म ईंधन के प्रयोग को कम करेंगे. और इस टैक्स से मिली राशि से हम नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को और आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए उपयोग कर सकते हैं.
150 साल पहले ही, करीब 1850 में ही यह पता लगा लिया गया था कि जीवाश्म ईंधन जैसे तेल और कोयला ज़मीन से निकालकर इस्तेमाल करने से जो हानिकारक गैसें उत्सर्जित होती हैं वो धरती पर एक कवच की तरह इकट्ठी होकर सूरज की गरमी को कैद कर लेती हैं, जिससे धरती का तापमान बढ़ता है और यही ग्लोबल वार्मिंग जलवायु परिवर्तन को ईजाद करती है.
इतना शोध होने के बाद भी जीवाश्म ईंधन के उपयोग में बढ़ॊत्तरी देखने को मिल रही है, क्यूँकि इससे हमारी अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है और हमारी कार्यप्रणाली में बदलाव लाना भी मुश्किल है. लेकिन नीतियाँ बनाने वाले लोगों को यह आभास होना ज़रूरी है कि अल्पकालिक आर्थिक लाभ वाली नीतियाँ ही सदियों तक चलने वाले जलवायु परिवर्तन के लिये ज़िम्मेदार हैं.
और यह कहना गलत होगा कि यह जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक कारणों से हो रहा है. आईपीसीसी (IPCC) की रिपोर्ट के अनुसार औद्योगीकरण के बाद से मनुष्यों का ही जलवायु परिवर्तन में सबसे बड़ा योगदान रहा है. हमारा कार्बन फ़ुटप्रिन्ट इस बात की गवाही देता है कि हर एक व्यक्ति अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों का कितना उत्सर्जन करता है. उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति पास ही के किसी स्थान पर जाने के लिये किसी जीवाश्म ईंधन से चलने वाले वाहन का प्रयोग करता है तो उसका कार्बन फ़ुटप्रिन्ट उस व्यक्ति से बहुत ज़्यादा होगा जो कि पैदल ही वह सफ़र तय करता है. इस उदाहरण में कार्बन फ़ुटप्रिन्ट आपके वाहन से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों कि राशि को कहा जाएगा. इससे साबित होता है कि हमारी दैनिक दिनचर्या भी किस हद तक जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देती है.
यदि हम अभी भी जलवायु परिवर्तन को जलवायु संकट के रूप में नहीं देखेंगे और अपनी कार्यप्रणाली में परिवर्तन नहीं लायेंगें तो धरती का तापमान यूँ ही बढ़ता जायेगा. यह ग्रह अन्य प्रजातियों के लिए ही नहीं बल्कि मनुष्य जाति के लिए भी बसने योग्य नहीं रह जाएगा.
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में हम सबको ही एकजुट होने की, लोगों को जागरूक करने की व इसके बारे में और अध्ययन करने की आवश्यकता है क्यूँकि जलवायु परिवर्तन को यदि अभी ही रोका नहीं गया तो आनेवाली पीढ़ी को ही नहीं हमें भी आजीवन पछताना पड़ेगा.
हिमानी मिश्र
हल्द्वानी

यह पहचान मिटने न दो

डाॅ.पंकज उप्रेती
पिघलता हिमालय के संस्थापक सम्पादक अपने पिता स्व. आनन्द बल्लभ उप्रेती की पुण्यतिथि पर पिछले सालों की तरह इस बार भी आपस में मिलने-बैठने का यह यह अवसर बनाया है। उनकी अष्टम पुण्यतिथि 22 फरवरी 2021 के आयोजन के लिये इस बार का विषय ‘दानवीरांगना लला जसुसी शौक्याणी’ है। वैसे भी हम लोग हिमालय को लेकर हमेशा बातें करते रहते हैं। इस अवसर पर पिघलता हिमालय के संस्थापक चाचा स्व.दुर्गासिंह मर्तोलिया जी का स्मरण भी बना रहता है। पिता और मर्तोलिया जी ने 1978 में जिस मिशन को शुरु किया था, उसी के अनुरूप हम आज 43 साल बाद तक उसे अनवरत बनाए हुए हैं। साथ ही अपनी पूज्य माता और पिघलता हिमालय की सम्पादक रही स्व.कमला उप्रेती के त्याग को याद करते हुए किसी भी आयोजन का साहस कर पाते हैं।
जब-जब हिमालय की बात चलती है मेरे मस्तिष्क में हिमालयी संस्कृति के बहुत से रंग बादलों की तरह उमड़ने लगते हैं, इसके गीत-संगीत, कला-विज्ञान सबकुछ आंखों के सामने होता हैं। हालांकि वर्तमान की उच्छृंखलता ने पहाड़ों को भी दूषित करने की शुरुआत कर दी है। खैर, जो कुछ भी हमारी विरासत बहुत भरी हुई है। जिस काज में ईमानदारी हो, वह हमेशा स्मरण में रहते हैं। हिमालय की तमाम संस्कृतियों की पवित्रता अपनी जगह है, आपाधपी में चाहे कोई कैसा ही चित्रा बनाने लगे पर हिमालय का अपना चित्र है। वह पल-पल रंग बदलता है पर अडिग रहता है, जीवन देता है।
हिमालय की इस गोद में ही लला जसुली देवी हुईं। आश्चर्य होता है कि जिस देवी ने चार सैकड़ों धर्मशालाएं बनवाकर समाज को उपहार में दीं, उसकी ध्रोहरों को हम अपने सामने खण्डहर होता देख रहे हैं। कई में कब्जा हो चुका है और कई का नामोनिशान तक मिटा दिया गया है। यह निशानियाँ किसी एक परिवार की या एक समाज की नहीं बल्कि हम सबकी पवित्रा धरोहरें हैं। लला जसुली शौक्याणी ने तो हिमालय के अनुरूप अपना धर्म निभाया। हिमालय हमेशा से दाता है और फिर भी अडिग है।
मैंने बचपन से अनगिनत किस्से- कहानियाँ अपने माता-पिता से सुने और हिमालयी संस्कृति के उत्साह को देखा। ‘पिघलता हिमालय’ के रूप में हमारे परिवार का जितना व्यापक सम्पर्क सीमान्त घाटियों में चारों ओर है, उसके लिये में मैं अपने को धन्य मानता हूँ क्योंकि जिस हिमालय में तप के लिये रिषिमुनि रमते रहे हैं, जो शिव की तपस्थली है उसके वासियों से हम जुड़े हैं। अपनी सैकड़ों और मीलों लम्बी यात्राओं में मैने भी कई धर्मशालाएं चारों ओर देखी हैं। आश्चर्य होता था कि दुर्गम स्थानों में कितने मोह के साथ इन्हें निर्मित किया गया था। अपने स्वभाव के अनुरूप इन पवित्र धरोहरों को देख मेरी अश्रुधारा बह जाती है। किस नीयत और किस उदारता के साथ इनका निर्माण करवाया गया था और आज इनको मलवे का ढेर सा मानकर बिसरा दिया गया है। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में संगीत विभागाध्यक्ष के रूप में रहते हुए जब भी अवसर मिलता मैं नाग मन्दिर के पुराने अवशेष ;जो महाविद्यालय परिसर के उपर एक टीले में झाड़ियों से घिरा है, लला जसुली की धर्मशाला ;जो थाने के पास झाड़ियों से घिरी है, देखने जरूर जाता। अनगिनत बार इनके पास जाकर देखा और फिर कहीं कल्पनाओं में खो जाता कि अहा, कैसे बनाये हैं। इसके अलावा अन्य स्थानों में भी इस प्रकार की धरोहरों को देखा है। देखा ही नहीं, उपेक्षित बने हुए इन धर्मार्थ सरायों के भीतर जाकर भी देखा कि कितने जतन से इन्हें बनाया गया था और आज इन्हें उजाड़ने वाले ताक में बैठे हैं। चूंकि सीमान्त की घाटियों में आना-जाना रहा है तो जसुली आमा के बारे में भी बेहद जिज्ञासी थी और मेरे अनगिनत मित्र जो रं समुदाय हैं, वह जानकारी देते रहे। धरमघर के समाजसेवी शौका गंगा सिंह पांगती अक्सर फली सिंह दताल साहब के बारे में बताते रहते थे। लला जसुली के वंशज फली सिंह जी हमारे पिघलता हिमालय के संस्थापक भी हैं। अपनी बंश परम्परा अनुसार इनकी उदारदा और सच्चाई हर किसी को प्रभावित करती है। अपने पूज्य पिता की स्मृति में होने वाले आयोजन में इन्हें भी सम्मानित करने का गौरव मिला। उस अवसर पर श्री दताल द्वारा जिस प्रकार से अपनी पीड़ा को प्रकट किया गया वह हम सबकी पीड़ा थी। लला जसुली के त्याग और तपस्या को पहली बार खुले मंच से उन्होंने इतनी भावुकता से बताया कि उपस्थित गणमान्य जन चकित थे। उस अवसर पर विद्वान प्रोफेसरों ने इस विषय को महत्वपूर्ण बताया और शोध् छात्रों को भी नई जानकारियां मिलीं। मुझे तब भी आश्चर्य हुआ कि जिस दान वीरांगना का इतना बड़ा योगदान समाज में रहा है और उसकी सातवीं पीढ़ी आज भी उन ध्रोहरों को बचाने की गुहार लगा रही है, उसके बारे में अधिकांश को पता ही नहीं है। हमने उसी दिन तय कर लिया था कि इस प्रकरण पर अब चुप नहीं बैठेंगे और ‘पिघलता हिमालय’ बराबर इस प्रकरण पर लोगों का ध्यान आकृष्ट करता रहा है। खुशी होती है कि हमारे प्रशासन ने भी इस दिशा में कदम उठाए हैं। साथ ही जागरुक जन हमारे इस अभियान में साथ हैं। यह हम सबका पुनीत कर्तव्य भी है। भाई, यह पहचान मिटने न दो………..

महा दानवीरांगना समाजसेविका आमा/लला जसुली की गाथा

नरेन्द्र सिंह दताल
ब्रिटिश शासन काल 19वीं शताब्दी में एक महा दानवीरांगना, महान समाज सेविका उत्तराखण्ड के सुन्दरतम हिम पर्वत श्रृंखला ‘न्यौला पंचाचूली’ ;पाँच पाण्डव हिम शिखर के ठीक सामने बसा ग्राम दाँतु, परगना- दारमा ;दारमा घाटी में रहती थी, जिनका नाम श्रीमती जसुली देवी दताल रंस्या ;भोटस्या था। उत्तराखण्डी लोग और पड़ोसी नेपाल देश जन आमा ;लला जसुली देवी को शौक्याणी, भोटस्या, रंस्या के नाम से सम्बोधित कर याद करते हैं। इस महा दानी महिला का जन्म हिमशिखरों से घिरी अतुल्य प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण ग्राम दांतु के दानजन पट्टी के नूमराठ/ नूमजन राठ में हुआ था। बचपन से ही लला जसुली देवी विलक्षण प्रतिभा की धनी थी। उन्होंने किशोरावस्था में समाज में फैली कुरीतियों-बुराइयों को दूर करने हेतु धर्मिक अनुष्ठान और सामाजिक कार्य को सम्पन्न करवाने में समाज सेविका की महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। इस तेजवान ओजस्वी कन्या का विवाह दांतू के ही यानजन-पट्टी के जंगबो राठ के जंगबु सिंह दताल जी से हुआ, वे दारमा घाटी के धन-वैभव से सम्पन्न और सबसे प्रतिष्ठित परिवार से थे। विवाह के पश्चात उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, उनके पुत्र का नाम जसुबा सिंह दताल था। पुत्र जसुबा के बाल्यकाल में ही पति की मृत्यु हो गई। अपने प्रेम को भावपूर्ण विदाई देने के लिए मृत्यु संस्कार ;ग्वन संस्कार के अन्तिम तेरहवें दिन ग्वन दमे बाजे के साथ-साथ निंगाल की चटाई पर बिछे दन कालीन चलकर संगम की ओर निकले लला जसुली ने अपने साथ लाये ग्वन चढ़ावा खाद्य पदार्थ, अन्य सामग्रियों और परातों ;बड़ा थाल में भरकर लाई गई बहुमूल्य सोने चाँदी के रत्नों को ‘न्यौला नदी और ललन्ती जल स्रोत’ ;मीठा जल स्रोत के संगम में गंगा दान किया। ;यह प्रथा उन दिनों सभी भोंटजन अपने प्रिय सदस्य की मृत्यु होने पर अपनी स्थिति के अनुसार गंगादान करते थे, दशकों पहले भी गंगादान को महापुण्य माना जाता थ। यह प्रथा एक प्रकार से अपने प्रेम के प्रति स्नेह, प्रेमभाव और समर्पण का प्रतीक माना जाता था/है।
पति की मृत्यु के बाद पुत्र ही एकमात्र सहारा था, जैसे-जैसे लला जसुली जी का जीवन कुछ सामान्य हो रहा था, उनके इकलौता पुत्र जसुबा का भी अविवाहित युवावस्था में न्यौला नदी के निकट च्यौवर्जी खंम रे ;खेत पर दो ग्रामों के युवाओं के मध्य द्विपक्षीय संघर्ष में मृत्यु हो गई। पुत्र की मृत्यु हो जाने से इस एकमात्र सहारे का भी छिन जाना, उनके जीवन अन्धकाररमय बनाने वाली घटना थी। फिर भी पति की ग्वन संस्कार की तरह प्रिय पुत्र का भी मृत्यु संस्कार के अन्तिम तेरहवें दिन भावपूर्ण विदाई देने हेतु ग्वन दमे बाजे के साथ-साथ निगाल की चटाई बिछे दन-कालीन पर चलते हुए न्यौला नदी और ललैन्ती जल स्रोत ;मीठा जल स्रोत के संगम में अपने साथ लाए ग्वन चढ़ावा खाद्य पदार्थ, अन्य सामग्रियों और बड़ी ताँबे की थाल ;ताँबे की परात में भरकर लाई गई बहुमूल्य सोने चाँदी के रत्नों को भी गंगा दान कर रही थी। उन दिनों कुमाउँ कमिश्नर सर हैनरी रैमजे जी अपने अपने अधिकारियों के साथ दारमा घाटी के निरीक्षण और वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों का सर्वेक्षण करने के लिये ग्राम दुग्तू में ठहरे हुए थे। वे इस भोट रं ग्वन संस्कार की भव्यता को देखकर दंग रह गए। ग्राम जनों के माध्यम से इस दुःखद घटना की सम्पूर्ण जानकारी ली और लला जसुली देवी जी से मिले। आपस में विस्तार से विचार-विमर्श किया। साथ ही लला ;अमा जी को समाज सेवा-जन सेवा में शासन-प्रशासन को आर्थिक सहयोग देने के लिये प्रेरित किया और कहा कि आप जनसेवा-समाजसेवा से ही अपने दुःखों को कम कर सकती हैं तथा आपके व्यर्थ हो रहे धन-दौलत का सदुपयोग सामाजिक जन सेवा कार्यों-समाज हित में हो सकता है। कमिश्नर रैमजे जी ने समाज सेवा पर अपनी बात रखते हुए कहा सर्वप्रथम क्यों न जितना हो सके उतना धन पहाड़ की जटिल-दुर्गम पैदल यात्रा की परिस्थिति को कुछ हद तक सुगम बनाने के लिए पैदल राहगीरों और आम जनों के लिए जगह-जगह पड़ाव घर, धर्मशाला बनवाई जाएं, साथ ही अन्य सामाजिक जन सेवा कार्य करवाया जाए। इस पर लला जसुली देवी जी ने भी अपनी बात रखते हुए कहा- प्राचीन आदि कैलास मानसरोवर मार्ग, उत्तराखण्ड चारधम तीर्थयात्रा मार्गों पर सभी पैदल आम राहगिरों और जहां-जहां रं जन, रंगपा, शौका और प्राचीन भोंट क्षेत्र जनों की भेड़-बकरियां, विनिमय सामग्री व्यापार के लिए जाया-आया करते हैं, इन मार्गों का सर्वप्रथम चयन कर जितना हो सके उतना पर्याप्त मात्रा में धर्मार्थ धर्मशाला, पड़ाव घर बनवाये जायें। बांकी बचे धन दौलत का प्रयोग दुर्गम पैदल मार्गों पर चलने वाले राहगीर जन मानस के लिए भी पड़ाव घर, धर्मशाला , सराय और अन्य सामाजिक समाज सेवा कार्य करवाने हेतु सरकार से निवेदन किया। कमिश्नर रैमजे ने लला जसुली देवी के इस मौखिक प्रस्ताव को स्वीकार किया। लला जसुली देवी ने सामान्य आवश्यकता से अधिक सम्पूर्ण संचित धन -दौलत, बहुमूल्य सोने चांदी के रत्नों और कुछ आभूषणों के साथ-साथ अपने संचित खाद्य भण्डारों के खाद्य पदार्थ को भी इस नेक सामाजिक जन सेवा कार्य को करवाने के लिए सर रैमजे हैनरी को सौंप दिया। लला जसुली देवी इकलौते पुत्र को भावपूर्ण विदाई देने के बाद एकदम अकेला महसूस करने लगी। वह प्रकृति के इस शाश्वत नियम को अच्छी तरह समझ गईं कि ध्न-दौलत और पारिवारिक सुख का सामंजस्य होना सम्भव नहीं तथा मृत्यु ही जीवन का अन्तिम सत्य मानते हुए बाद में लला जसुली देवी जी ने अपने ग्राम निवासी श्री किती सिंह दताल ;श्री कुठिया सिंह जी के नवयुवक पुत्र सेनु सिंह दताल जी को अविवाहित अवस्था में ही सामाजिक धार्मिक अनुष्ठान के साथ अपना दत्तक पुत्र बनाया और बाद में लला जसुली ने अपने ‘वारिस-उत्तराधिकारी पुत्र’ सेनु सिंह दताल जी का विवाह ग्राम दांतू, राठ-नूमजन के ही सम्पन्न-धन-वैभव शाली प्रतिष्ठित परिवार की पुत्राी ‘नी- लासंग वाली लला’ से करवाया, जिनके घर में लगभग ढाई-ढाई किलो का स्वर्णमय सूर्य रजतमय चांद देव चित्र चिह्नि गोलाकार स्वरूप स्वस्तिक प्रतीक ;चिह्न स्थापित था। इसी कारण हम लला जसुली देवी जी के पुत्रवध्ू को ‘नी-लासंग लला ;सूर्य चाँद आमा भी कहते हैं। कुमाउँ कमिश्नर सर हैनरी रैमजे जी ;सोशियल किंग आॅफ कुमाउँ ने अपनी ईमानदार-कर्तव्यनिष्ठ वचन का परिचय देते हुए, शीघ्र ही विस्तृत पैमाने पर धर्मशालाओं का निर्माण और अन्य सामाजिक सेवा कार्यों को प्रारम्भ करवा कर उत्तराखण्ड, नेपाल और पश्चिम तिब्बत सीमान्त क्षेत्रों में लगभग 400 लला;आमा श्रीमती जसुली देवी जी, ‘रं ध्रोहरित धर्मार्थ ध्र्मशालाओं’ का निर्माण करवाया। यह रं ध्रोहरित धर्मार्थ धर्मशालाएं ‘दिन आराम और रात्रि विश्राम’ हेतु दो से बारह कक्षों ;कमरों तक की धर्मार्थ धर्मशालाएं निर्मित करवायी गयी थीं/हैं। साथ ही इन धर्मशालाओं के आस-पास ही नमीयुक्त भू-भाग पर खुदवाई कर नौलों धारों का निर्माण समाज के हित में करवाया। जनहित-समाजहित की भलाई के लिए लला जसुली देवी जी ने सर रैमजे के माध््यम से ये नेक सामाजिक समाज सेवा कार्य लला जसुली देवी जी की इस विराट उदारता व परोपकार के कारण उन्हें आज भी याद करते हैं/करते रहेंगे। लगभग 400 धर्मार्थ धर्मशालाओं और लगभग 150 नौलों ; धारों का निर्माण तथा अन्य सामाजिक सेवा-जनसेवा कार्य करवाकर नारी हृदय की उदारता को उजागर करते हुए रं जन, शौका जन, रंकपा जन, प्राचीन भोंट देश जनों की ही नहीं बल्कि समस्त नारी जगत को गौरवान्वित किया है। इतने सारे व्यापक स्तर पर धर्मशाला, पड़ाव घर, सराय और नौला ; धारों का निर्माण और अन्य सामाजिक कार्यों को करवाने के लिए सामान्य आवश्यकता से अधिक सम्पूर्ण संचित धन-दौलत, बहुमूल्य सोने चाँदी के रत्नों, कुछ आभूषणों के साथ संचित खाद्य भण्डारों का महादान करना, उसकी महा दानवीरता, महान समाज सेविका की भावना को झलकाता है। ऐसी महा दानवीरांगना, महान समाज सेविका रंस्या भोंट महिला स्व. लला ;आमा श्रीमती जसुली देवी दताल ने जो अमिट छाप छोड़ी, उनको हम सभी रं मं जन, प्राचीन भोट देश जनों, उत्तराखण्ड वासियों की आरेस से कोटि-कोटि नमन।

गुप्तेश्वर धाम हनुमान मन्दिर के सन्त रिषिकेश गिरी

गुप्तेश्वर में जिन्होेंने अनुशासन कायम कर युवाओं को राह दिखाई

बेरीनाग/गणाई। वर्ष 2020 की विदाई पर गुप्तेश्वर धाम हनुमान मन्दिर के सन्त 101 वर्षीय रिषिकेश गिरी महाराज ने अपना शरीर त्याग दिया। बेरीनाग-अल्मोड़ा मुख्यमार्ग पर बेरीनाग से दस किमी दूरी पर गोदीगाड़ नामक स्थान है। नीम करौली महाराज के परम शिष्य रिषिकेश ने यहाँ अनुमान मन्दिर स्थापित कर जिस प्रकार से अनुशासन बनाया और युवाओं को राह दिखाई, वह हमेशा याद किये जायेंगे।
नीम करौली महाराज की सेवा में बचपन से ही समर्पित गुप्तेश्वर;गोदीगाड़ के इस सन्त ने अपने गुरु आदेश पर अल्मोडा बेरीनाग मार्ग के पास पहाड़ी पर गोदीगाड़ बांसपटान के पास दिव्य मन्दिर की स्थापना करवाई और आसपास समाज को जोड़कर इसके प्रबन्धन की व्यवस्था की। मन्दिर के सौन्दर्यीकरण सहित इसके रख-रखाव का प्रबन्ध् करवाया। यहाँ अनुशासन बनाये रखने के लिये उन्होंने सख्त कदम उठाये ताकि अराजक तत्व मन्दिर को पिकनिक का केन्द्र न बना सकें। उनकी सेवा में जुटे भक्तों ने भी इस परम्परा में पूरा योगदान दिया जो बना हुआ है। मन्दिर में पूजा पाठ के लिये गणाई से उपाध्याय पुजारी को भी तैनात करने के साथ ही भोजन प्रसाद की नियमित व्यवस्था बनाई। इस मन्दिर में आने वाले श्रद्धालुओं को बाबा स्वयं अपने हाथों प्रसाद बांटते, भोजन कक्ष में प्रसाद वितरण होता। इतनी दिव्य और भव्य व्यवस्था को पहाड़ में स्थापित करना चुनौती था लेकिन रिषिकेश गिरी महाराज ने बिना किसी के सामने हाथ फैलाते हुए यह सब किया। उन्हें हनुमान की अराधना पर विश्वास था और कहते थे- ‘‘पथभ्रष्ट समाज को सुधरने के लिये उपाय करने चाहिये। जो अनुशासन तोड़ता है उसे स्वयं दण्ड का भागीदार बनना पड़ता है।’’ गुप्तेश्वर मन्दिर की दिव्यता के दर्शन के लिये दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और अपनी श्रद्धा से सहयोग भी करते हैं।
अपनी गद्दी में बैठे रिषिकेश गिरी महाराज आने वाले श्रद्धालुओं को प्रेमभाव से देखते और जरूरत पड़ने पर डांटते भी थे। वह कहते- ‘‘आजकल के पड़े-लिखे से हम अनपढ़ अच्छे हैं। क्या होता है इन डिग्रियों का, जब हम अपने समाज में व्यर्थ बने हुए हैं। मास्टर पढ़ाते नहीं, बच्चे पढ़ते नहीं। इन्हें सुधरना चाहिये।’’
उनकी प्रत्येक बात में कोई रहस्य होता था और मेहनती लोगों वह सराहना भी करते।
बेरीनाग, गंगोलीहाट, राममन्दिर/बौराण गणाई आस-पास के तमाम ग्रामवासी माहाराज के दर्शनों को आया करते थे। इसके अलावा मन्दिर के समीप के ग्रामों का तो यह केन्द्र ही बन चुका है। अब जबकि सच्चे, सरल, हनुमान भक्त रिषिकेश गिरी महाराज अपनी देह त्याग चुके हैं गुप्तेश्वर मन्दिर की व्यवस्था को यथावत बनाये रखने का दायित्व ग्राम वासियों का है। महाराज जी की स्मृतियाँ उनके प्रत्येक जानने वाले के स्मरण हैं। साथ ही गुप्तेश्वर मन्दिर व उनके द्वारा किये गये कार्यों के कारण भी वह सदा याद किये जायेेंगे।

कपकोट से अल्मोड़ा पैदल जाते थे पढ़ाई के लिये


श्रीमती कौशल्या सिंह से बातचीज
कपकोट से अल्मोड़ा पैदल जाते थे पढ़ाई के लिये
–व्यापार के सिलसिले में गरुड़ में बसे शौका
–कपकोट की उन्नति में भाई प्रेमसिंह  धर्मशक्तू हमेशा सक्रिय रहे
–चमोली में सयाना परिवार का बहुत सम्मान रहा है
डाॅ.पंकज उप्रेती
पहाड़ की मातृशक्ति हर क्षेत्रा में अग्रणीय रही है। पर्वतीय अर्थव्यवस्था की रीड़ के रूप में महिलाओं की अग्रणीय भूमिका को सब जानते हैं लेकिन विपरीत स्थिति में भी शिक्षा-चिकित्सा-बैंकिंग-संचार- सुरक्षा बल-व्यापार-खेल में हाथ आजमाने वाली महिलाएं अपनी निपुणता के लिये पहचान रखती हैं। इन दक्ष महिलाओं की बात ही कुछ और है। ऐसी ही सपफल महिलाओं में श्रीमती कौशल्या देवी हैं।
    जोहार के व्यापारी परिवार में हरीश सिंह धर्मशक्तू ने व्यापार के सिलसिले में कपकोट-भराड़ी में डेरा डाला था। इनके पुत्र प्रेम सिंह धर्मशक्तू हुए, जिनका कुछ समय पूर्व निधन हो चुका है। प्रेमसिंह  जी भराड़ी में रहते हुए जोहार के विकास के लिये चिन्ता करते थे और हमेशा भराड़ी से शामा होते हुए यातायात की वकालत करते रहे। हरीश सिंह जी की पुत्रियों में भागीरथी टोलिया पत्नी जगत सिंह टोलिया ;हल्द्वानी, कौशल्या देवी पत्नी एच.एस.सिंह ;बरेली हैं।
    कूर्मांचल नगर बरेली में रहने वाली कौशल्या देवी का अधिकांश समय गढ़वाल और फिर बरेली में बीता लेकिन अतीत  की झलकियाँ उनकी स्मृतियों में बनी हैं।  वह बताती हैं कि व्यापार के सिलसिले में उनके पिता ने गरुड़ में दुकान की। वहीं मेरा जन्म हुआ और पढ़ाई कपकोट में हुई। तब कपकोट हाईस्कूल में उतरौड़ी के हीराबल्लभ पाण्डे जी प्रधानाचार्य और शामा के बलवन्त सिंह जी उप प्रधानाचार्य
थे। इसके बाद इण्टर व स्नातक शिक्षा के लिये अल्मोड़ा का रुख किया। श्रीमती कौशल्या बताती हैं कि पढ़ाई के लिये कपकोट से पैदल यात्रा अल्मोड़ा के लिये करनी होती थी। अल्मोड़ा में किराये के मकान में रहकर पढ़ाई की और फिर लखनउ के सिल्वर जुवली हैल्थ स्कूल से ट्रेनिंग की। लखनउ का हैल्थ स्कूल अब परिवार नियोजन का निदेशालय है। सन् 1960 में जब पौड़ी जिले से चमोली जिला बनाया गया, उसी समय चमोली में पोस्टिंग हुई। चमोली में सयाना परिवार का बहुत सम्मान रहा है। जमन सिंह सयाना जी के पास कमरे की ढूंढ करते हुए पहँुची थी तो उन्होंने बहुत मदद की। इसके बाद जौनपुर, बाराबंकी, फैजाबाद में जाना हुआ। चैाधरी चरण सिंह की सरकार के जमाने में जब हैल्थ वर्करों की पढ़ाई की ओर ध्यान देना छोड़ हमें नौकरी से निकाला जा रहा था, बड़ा आन्दोलन हुआ। सरकार ने आदेश निकाला कि इन कर्मचारियों को वेतन के लिये अन्य स्थानों पर समायोजित किया जाए। फिर मुझे टीबी क्लीनिक में नियुक्ति मिल गई। इसके लिये मेडिकल कालेज लखनउ में ट्रेनिंग करनी पड़ी। पटना और पूना में भी कोर्स करने का बेहतर अनुभव हुआ। तब से लगातार एएनएम, जेएनएम, हैल्थ वर्करों को पढ़ाने के कार्य में लगातार व्यवस्तता रही। फैजाबाद, देवरिया के बाद बरेली में तैनाती मिली। 1997 में सेवानिवृत्ति के बाद भी कौशल्या जी के अनुभवों का लाभ लेने के लिये शिक्षण संस्थानों में उन्हें लगातार बुलाया जाता रहा है।  हैल्थबर्करों को शिक्षण के लिये उनकी सक्रियता आज तक भी है। पैरामेडिकल के क्षेत्र में उनके कई होनहार शागिर्द हैं।
    कौशल्या जी की यादों में आज भी उनके हिस्से का पहाड़ जिन्दा है। वह कहती हैं कि व्यापार के सिलसिले में गरुड़ में शौका व्यापारी बसे और मेहनती बच्चों ने कठिन दौर में भी शिक्षा से जुड़कर अपने रास्ते तलाशे।

चेतनाशून्यता की स्थिति है

काशीसिंह ऐरी से बातचीत
कार्यालय प्रतिनिधि
उत्तराखण्ड क्रान्तिदल के शीर्ष नेता काशीसिंह ऐरी का कहना है, ‘राष्ट्रीय पार्टियों ने पहाड़ की जनता को मून सा दिया है, यह चिन्ता है। इन पार्टियों का ने आम जनता की आँखों में धूल झौंकी है जिसे समझना होगा। आज चेतनाशून्यता की स्थिति है। युवाओं को बरगलाया जा रहा है और प्रलोभन में फंसाया जा रहा है।’
श्री ऐरी आगे कहते हैं कि आज उत्तराखण्ड की स्थिति को सबको समझना चाहिये। पहले विकास की योजनाएं बनती थी लेकिन पहाड़ नहीं चढ़ पाती थी। इसीलिए उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना की गई थी ताकि छोटे राज्य में विकास हो, युवाओं का रोजगार मिले, यहाँ की समस्याओं की सुनवाई हो। लेकिन राज्य बनने के बाद से सब उल्टा होने लगा है। उल्टे-पुल्टे कार्यों पर लगाम नहीं है। यदि किसी को टोका जाता है तो वह किसी न किसी सम्बन्ध्-सम्पर्क से अपना बचाव कर लेता है। सम्वेदन शीलता नहीं रह गई है कि जनता क्या कहेगी। यह जानते हैं उनकी मनमानी पर कोई कुछ नहीं कहने वाला है। चाहे जो कुछ कर लो, जनता इन्हें वोट दे देगी। उपर से नीचे तक भ्रष्टाचारियों की चैन बनी हुई है। तमाम योजनाओं में घपले उजागर भी हुए है लेकिन सबकुछ दबा दिया जाता है। इनकी ओर से जनता को सुविधा मिले या न मिले, विकास हो या न हो, वोट मिल जायेगा। इन्होंने जनता को मून लिया है। चेतनाशून्यता की यह स्थिति खतरनाक है। उत्तराखण्ड किधर जा रहा है, राज्य कितने कर्ज में डूब गया है, विकास योजनाएं किस तरह से धरातल में नहीं उतर रही हैं, करोड़ों के भ्रष्टाचार के मामले उजागर होकर भी लीपापोती में हैं, इन्हें कोई पफर्क नहीं पड़ता। ये सब मौज में हैं और जनता को भ्रमित कर राज कर रहे हैं।
उत्तराखण्ड राज्य बनाने के पीछे रोजगार की बात, विकास की बात के अलावा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना चाहते थे। सपना था हमारा राज्य बनेगा तो शिकायतों की सुनवाई होगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा परन्तु यहाँ तो कोई सुनने वाला ही नहीं है। मंत्री ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। सन्निर्माण श्रमिक बोर्ड में ही करोड़ों का घपला है, जाँच की लीपापोती होती रहती है। घपला करने वाले ही जाँच करने वाले हो जाएंगे तो क्या उम्मीद की जा सकती है। इस बेहाल राज्य को सुधार के लिये सबने जगना होगा।

उत्तराखण्ड के परिदृश्य में खत्तों की खेती

हिमाँशु कफल्टिया
खत्ते, गोठ अथवा झाले उत्तराखण्ड के परिदृश्य में समय-समय पर चर्चाओं में आते रहते हैं। कभी वन भूमि पर अवैध् कब्जे के तौर पर तो कभी वन उपज की तस्करी या फिर खुद को राजस्व ग्राम घोषित करने हेतु आन्दोलन। ये खत्ते समाचार पत्रों का हिस्सा बने ही रहते हैं। खत्ते जिन्हें गोठ अथवा झाले के नाम से भी जाना जाता है वह वन ग्राम हैं जो वन भूमि पर बसे हैं एवं सरकार की नजरों में अवैध् कब्जे हैं। बिन्दुखत्ता, गैण्डीखत्ता, छीनीगोठ गढ़ीगोठ, भैंसाझाला कुछ उदारहण हैं। इन गाँवों में वन गुज्जरों के अलावा कई अन्य लोग जो मुख्यतः पहाड़ के लोग हैं निवास करते हैं।
खत्तों का अपना एक इतिहास रहा है। राज्य की तराई-भाबर काफी उपजाउ भूमि है परन्तु यहाँ गर्मी और उमस भरा मौसम, खतरनाक जंगली जानवर, मच्छर जनित मलेरिया एवं अन्य बीमारियों के कारण यह क्षेत्रा कभी भी पहाड़ी लोगोें द्वारा रहने योग्य नहीं माना गया। कत्यूरों, चन्दों व गढ़वाल के पवारों के शासन काल में भी यहाँ बसावटें म ही थी। थारू एवं बुक्सा जनजाति ही यहाँ के स्थाई निवासी थे तथा पहाड़ से लोग केवल शीत ट्टतु में ही कड़ाके की ठण्ड से बचने एवं जानवरों के लिए चारागाह ढूंढने आते थे।
जिन स्थानों पर पहाड़ के लोग शीत ट्टतु में अपने जानवरों समेत डेरा डालते थे उसे खत्ता/गोठ अथवा झाला के नाम से जाना गया।
अंग्रेजी हुकूमत ने तराई-भाबर की उपजाउ जमीन के महत्व को समझा व यह माना कि यह क्षेत्रा राजस्व वृद्धि जो कि उनका एकमात्र ध्येय था, हेतु उपयोगी सिद्ध हो सकता है। एक ओर अंग्रेजी शासन द्वारा इस क्षेत्रा में कृषि विकास हेतु नहरों, मार्गों एवं बांधें का निर्माण किया वहीं उनके द्वारा पहाड़ के लोगों को इन क्षेत्रा में स्थाई तौर पर बसाने के लिए भी प्रोत्साहित किया लेकिन उनकी ये कोशिशें कम ही रंग लाई तथा पहाड़ के लोगों का अस्थाई तौर पर आना-जाना बना रहा।
स्वतंत्रता के पश्चात पं. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में एक बार फिर पहाड़ के लोगों को यहाँ स्थाई तौर पर बसाने हेतु आमंत्रित किया गया। अब परिस्थितियाँ भी बदलने लगी, जहाँ एक ओर क्षेत्रा का तेजी से विकास हो रहा था वहीं भारत-पाकिस्तान के विभाजन के पश्चात बड़ी संख्या में सिक्ख समुदाय के लोगों द्वारा विपरीत परिस्थितियांे के मध्य मेहनत कर इस उपजाउफ जमीन को तरासा। पन्तनगर में कृषि विश्वविद्यालय, तराई बीज कार्पोरेशन की स्थापना और अवस्थापना जैसे विकास के लिये उठाये गये कदमों ने इस क्षेत्रा को भारत की हरित क्रान्ति का जनक बना दिया।
बदली हुई परिस्थितियों में धीरे-धीरे पहाड़ के लोगों ने खत्तोे में स्थाई तौर पर निवास करना शुरु किया। पहले कुछ परिवार बसे और शनैः-शनै- खत्तों की बसावटें बढ़ती चली गई। जहाँ पहले पहाड़ एक आकर्षण था वहीं अब विकास की बदली हवा ने मैदान को आकर्षण बना दिया। खत्ते सस्ती जमीन और अपने लोगोें की जगह माने गये और अधिक से अधिक लोग यहाँ बसते चले गये।
खत्ते सरकारों/राज्यों के लिए राजस्व का स्रोत भी बने रहे। चन्द शसकों के समय चरवाहों से राजस्व लिया जाता था। रुहेलों व अंग्रेजों द्वारा भी लगान लिया गया। आजादी के पश्चात भी राजस्व जिसे चराई कहा जाता था, की वसूली जारी रही।
इस बीच परिदृश्य फिर र बदलने लगा। 1970 के दशक और उसके पश्चात वन एवं पर्यावरण कानूनों में बड़ा परिवर्तन आया। अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कड़े वन एवं पर्यावरण संध्यिों व कानून बनाये गये। इस बीच संरक्षित वनों व आरक्षित वनों में भी वृद्धि हुई। तराई-भाबर में कार्बेट राष्ट्रीय पार्क, कार्बेट बाघ रिजर्व, राजाजी, नन्धैर अभ्यारण इत्यादि बनाये गये और अधिकतर खत्ते/गोठ/झाले इनकी सीमाओं में आ गये। आज भी खत्ते/गोठों में रहने वाले परिवारों के पास उस समय की चराई;लगान की रसीदें व खसरे मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि दशकों तक राजस्व दिये जाने के बाद इन खत्तों को संरक्षित वन अथवा आरक्षित क्षेत्रा घोषित किया गया। जिन लोगोें ने सदियों से बड़ी मशक्कत के पश्चात इन क्षेत्रों को बसाया था, अचानक से उनके निवास स्थान अवैध् कब्जे की श्रेणी में आ गये और यहीं से शुरु हुआ खत्ते में रहने वालों का संघर्ष।
आज इन खत्तांे/गोठों में कई परिवार निवास करते हैं। उन्होंने दशकों की मेहनत से पक्के मकान बना लिये हैं तथा कई पीढ़ियों से यहाँ खेती करते आ रहे हैं। सरकार द्वारा भी कुछ सुविधयें जैसे बिजली, स्वास्थ्य मुहैया कराई गई हैं। कुछ खत्ते जैसे बिन्दुखत्ता तो शहर का रूप ले चुके हैं और यहाँ के लोग खुद को राजस्व ग्राम अथवा नगरीय क्षेत्रा घोषित करने के लिए आन्दोलनरत हैं।
खत्ते सरकारों के लिए एक चुनौती भी बन रहे हैं। जहाँ एक ओर ये वन भूमि पर अवैध् कब्जे हैं वहीं यहाँ वन उपज की अवैध् तस्करी, वन्यजीव अपराध्, अवैध् लकड़ी कटान जैसी चुनौतियाँ बनी रहती हैं। पिछले दशकों में तो कुछ खत्ते नक्सली गतिविधियों के लिए भी समाचारों में रहे।
खत्तों का एक मानवीय पहलू भी है। यहाँ के निवासी आज स्वयं को ठगा महसूस करते हैं। दशकों तक सरकार द्वारा प्रोत्साहित किये जाने के पश्चात इनके पूर्वज यहाँ बसे थे। दशकों तक इनके द्वारा चराई;राजस्व भी दिया गया। पीढ़ियों की मेहनत लग गई घर बनाने व खेती योग्य जमीन तैयार करने में, परन्तु इनकी पहचान आज भी अवैध् है। अवैध् कब्जों में आने के कारण इन क्षेत्रों में न तो अवस्थापना विकास हो पाता है और न ही सरकारी योजनाओं का सही से क्रियान्वयन। फलस्वरूप मनरेगा, विधायक या सांसद निधि का व्यय इन क्षेत्रों में नहीं हो पाता और यह क्षेत्र पिछड़े रह जाते हैं। गरीबी व पिछड़ेपन ने भी इन खत्तों को अपनी जकड़ में बनाये रखा है तथा यहाँ के निवासी अपना घरबार व आजीविका खोने के डर से भयभीत रहते हैं। अवैध् कब्जों की श्रेणी में आने वाले ये निवास स्थान अपने भविष्य एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए चिन्तारत हैं।
हमें खत्तों के मानवीय पहलुओं को समझना होगा। यहाँ के मुद्दे अलग हैं। पर्यावरण एवं वनों के स्तर पर एक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सोच आवश्यक है परन्तु खत्तों/गोठों/झालों को स्थानीय नजरिये से देखना होगा। इनके निवासी हमारे अपने लोग हैं। पिछड़े व गरीब इन गाँवों के बारे में बुद्धिजीवी वर्ग, प्रशासन को गहन चिन्तन की आवश्यकता है ताकि इस विषय को समय रहते सुुलझा लिया जाये।
लेखक- उपजिलाधिकारी पूर्णागिरी, टनकपुर जनपद चम्पावत। टनकपुर भाबर भी खत्तों से घिरा क्षेत्र है। हिमाँशु कफल्टिया हिमाँशु कफल्टिया
खत्ते, गोठ अथवा झाले उत्तराखण्ड के परिदृश्य में समय-समय पर चर्चाओं में आते रहते हैं। कभी वन भूमि पर अवैध् कब्जे के तौर पर तो कभी वन उपज की तस्करी या फिर खुद को राजस्व ग्राम घोषित करने हेतु आन्दोलन। ये खत्ते समाचार पत्रों का हिस्सा बने ही रहते हैं। खत्ते जिन्हें गोठ अथवा झाले के नाम से भी जाना जाता है वह वन ग्राम हैं जो वन भूमि पर बसे हैं एवं सरकार की नजरों में अवैध् कब्जे हैं। बिन्दुखत्ता, गैण्डीखत्ता, छीनीगोठ गढ़ीगोठ, भैंसाझाला कुछ उदारहण हैं। इन गाँवों में वन गुज्जरों के अलावा कई अन्य लोग जो मुख्यतः पहाड़ के लोग हैं निवास करते हैं।
खत्तों का अपना एक इतिहास रहा है। राज्य की तराई-भाबर कापफी उपजाउ भूमि है परन्तु यहाँ गर्मी और उमस भरा मौसम, खतरनाक जंगली जानवर, मच्छर जनित मलेरिया एवं अन्य बीमारियों के कारण यह क्षेत्रा कभी भी पहाड़ी लोगोें द्वारा रहने योग्य नहीं माना गया। कत्यूरों, चन्दों व गढ़वाल के पवारों के शासन काल में भी यहाँ बसावटें म ही थी। थारू एवं बुक्सा जनजाति ही यहाँ के स्थाई निवासी थे तथा पहाड़ से लोग केवल शीत ट्टतु में ही कड़ाके की ठण्ड से बचने एवं जानवरों के लिए चारागाह ढूंढने आते थे।
जिन स्थानों पर पहाड़ के लोग शीत ट्टतु में अपने जानवरों समेत डेरा डालते थे उसे खत्ता/गोठ अथवा झाला के नाम से जाना गया।
अंग्रेजी हुकूमत ने तराई-भाबर की उपजाउ जमीन के महत्व को समझा व यह माना कि यह क्षेत्रा राजस्व वृद्धि जो कि उनका एकमात्र ध्येय था, हेतु उपयोगी सिद्ध हो सकता है। एक ओर अंग्रेजी शासन द्वारा इस क्षेत्रा में कृषि विकास हेतु नहरों, मार्गों एवं बांधें का निर्माण किया वहीं उनके द्वारा पहाड़ के लोगों को इन क्षेत्रा में स्थाई तौर पर बसाने के लिए भी प्रोत्साहित किया लेकिन उनकी ये कोशिशें कम ही रंग लाई तथा पहाड़ के लोगों का अस्थाई तौर पर आना-जाना बना रहा।
स्वतंत्रता के पश्चात पं. गोविन्द बल्लभ पन्त के नेतृत्व में एक बार फिर पहाड़ के लोगों को यहाँ स्थाई तौर पर बसाने हेतु आमंत्रित किया गया। अब परिस्थितियाँ भी बदलने लगी, जहाँ एक ओर क्षेत्र का तेजी से विकास हो रहा था वहीं भारत-पाकिस्तान के विभाजन के पश्चात बड़ी संख्या में सिक्ख समुदाय के लोगों द्वारा विपरीत परिस्थितियांे के मध्य मेहनत कर इस उपजाउफ जमीन को तरासा। पन्तनगर में कृषि विश्वविद्यालय, तराई बीज कार्पोरेशन की स्थापना और अवस्थापना जैसे विकास के लिये उठाये गये कदमों ने इस क्षेत्रा को भारत की हरित क्रान्ति का जनक बना दिया।
बदली हुई परिस्थितियों में धीरे-धीरे पहाड़ के लोगों ने खत्तोे में स्थाई तौर पर निवास करना शुरु किया। पहले कुछ परिवार बसे और शनैः-शनै- खत्तों की बसावटें बढ़ती चली गई। जहाँ पहले पहाड़ एक आकर्षण था वहीं अब विकास की बदली हवा ने मैदान को आकर्षण बना दिया। खत्ते सस्ती जमीन और अपने लोगोें की जगह माने गये और अधिक से अधिक लोग यहाँ बसते चले गये।
खत्ते सरकारों/राज्यों के लिए राजस्व का स्रोत भी बने रहे। चन्द शसकों के समय चरवाहों से राजस्व लिया जाता था। रुहेलों व अंग्रेजों द्वारा भी लगान लिया गया। आजादी के पश्चात भी राजस्व जिसे चराई कहा जाता था, की वसूली जारी रही।
इस बीच परिदृश्य फिर र बदलने लगा। 1970 के दशक और उसके पश्चात वन एवं पर्यावरण कानूनों में बड़ा परिवर्तन आया। अन्तर्राष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कड़े वन एवं पर्यावरण संधियों व कानून बनाये गये। इस बीच संरक्षित वनों व आरक्षित वनों में भी वृद्धि हुई। तराई-भाबर में कार्बेट राष्ट्रीय पार्क, कार्बेट बाघ रिजर्व, राजाजी, नन्धैर अभ्यारण इत्यादि बनाये गये और अधिकतर खत्ते/गोठ/झाले इनकी सीमाओं में आ गये। आज भी खत्ते/गोठों में रहने वाले परिवारों के पास उस समय की चराई;लगान की रसीदें व खसरे मौजूद हैं जो दिखाते हैं कि दशकों तक राजस्व दिये जाने के बाद इन खत्तों को संरक्षित वन अथवा आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। जिन लोगोें ने सदियों से बड़ी मशक्कत के पश्चात इन क्षेत्रों को बसाया था, अचानक से उनके निवास स्थान अवैध् कब्जे की श्रेणी में आ गये और यहीं से शुरु हुआ खत्ते में रहने वालों का संघर्ष।
आज इन खत्तांे/गोठों में कई परिवार निवास करते हैं। उन्होंने दशकों की मेहनत से पक्के मकान बना लिये हैं तथा कई पीढ़ियों से यहाँ खेती करते आ रहे हैं। सरकार द्वारा भी कुछ सुविधयें जैसे बिजली, स्वास्थ्य मुहैया कराई गई हैं। कुछ खत्ते जैसे बिन्दुखत्ता तो शहर का रूप ले चुके हैं और यहाँ के लोग खुद को राजस्व ग्राम अथवा नगरीय क्षेत्रा घोषित करने के लिए आन्दोलनरत हैं।
खत्ते सरकारों के लिए एक चुनौती भी बन रहे हैं। जहाँ एक ओर ये वन भूमि पर अवैध् कब्जे हैं वहीं यहाँ वन उपज की अवैध् तस्करी, वन्यजीव अपराध्, अवैध् लकड़ी कटान जैसी चुनौतियाँ बनी रहती हैं। पिछले दशकों में तो कुछ खत्ते नक्सली गतिविधियों के लिए भी समाचारों में रहे।
खत्तों का एक मानवीय पहलू भी है। यहाँ के निवासी आज स्वयं को ठगा महसूस करते हैं। दशकों तक सरकार द्वारा प्रोत्साहित किये जाने के पश्चात इनके पूर्वज यहाँ बसे थे। दशकों तक इनके द्वारा चराई;राजस्व भी दिया गया। पीढ़ियों की मेहनत लग गई घर बनाने व खेती योग्य जमीन तैयार करने में, परन्तु इनकी पहचान आज भी अवैध् है। अवैध् कब्जों में आने के कारण इन क्षेत्रों में न तो अवस्थापना विकास हो पाता है और न ही सरकारी योजनाओं का सही से क्रियान्वयन। फलस्वरूप मनरेगा, विधायक या सांसद निधि का व्यय इन क्षेत्रों में नहीं हो पाता और यह क्षेत्र पिछड़े रह जाते हैं। गरीबी व पिछड़ेपन ने भी इन खत्तों को अपनी जकड़ में बनाये रखा है तथा यहाँ के निवासी अपना घरबार व आजीविका खोने के डर से भयभीत रहते हैं। अवैध् कब्जों की श्रेणी में आने वाले ये निवास स्थान अपने भविष्य एवं आने वाली पीढ़ियों के लिए चिन्तारत हैं।
हमें खत्तों के मानवीय पहलुओं को समझना होगा। यहाँ के मुद्दे अलग हैं। पर्यावरण एवं वनों के स्तर पर एक राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सोच आवश्यक है परन्तु खत्तों/गोठों/झालों को स्थानीय नजरिये से देखना होगा। इनके निवासी हमारे अपने लोग हैं। पिछड़े व गरीब इन गाँवों के बारे में बुद्धिजीवी वर्ग, प्रशासन को गहन चिन्तन की आवश्यकता है ताकि इस विषय को समय रहते सुुलझा लिया जाये।
लेखक- उपजिलाधिकारी पूर्णागिरी, टनकपुर जनपद चम्पावत।
टनकपुर भाबर भी खत्तों से घिरा क्षेत्र है।

सच्चे मन की हर मनोकामना पूरी करती है माँ झूलादेवी

भुवन बिष्ट
इस समय पूरा विश्व वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से त्रास्त है और हर कोई ईश्वर से इस संकट अतिशीघ्र मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रहा है। कोरोना से निबटने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग व मास्क पहनकर अपनी-अपनी सुरक्षा का ध्यान भी हर आमजनमास इस समय अपनाने का प्रयास कर रहा है। अनलाक में कुछ मन्दिरों को भी पूजा अर्चना के लिए खोला गया है किन्तु फिर भी सभी कोरोना से बचने के लिए सोशल डिसटेंसिंग, हैंड सैनेटराईज, मास्क दो गज की दूरी आदि इसके उपायों को अपना रहे हैं। देवभूमि उत्तराखण्ड सदैव ही देवों की तपोभूमि रहा है, इस कारण यह अटूट एवं अगाध् आस्था का केन्द्र भी रहा है। नवरात्रों में मन्दिरों में चहल पहल एवं भीड़ बढ़ जाती है। भले ही इस बार कोरोना महामारी ने नवरात्र आयोजनों पर भी अपनी मार से सभी को परेशान किया है किन्तु आस्था सभी के मन कूट कूट कर भरी है और सच्चे मन से हर भक्त अपने आराध्य देवी देवताओं की आराध्ना करके इस संकट से मुक्ति की प्रार्थना कर रहे हैं। देवभूमि उत्तराखण्ड के रानीखेत के आसपास झूलादेवी, कालिका, मनकामेश्वर, पंचेश्वर, हैड़ाखान, शिव आदि मन्दिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। इनमें एक प्रमुख स्थान माँ झूला देवी का है। माँ झूलादेवी पर भक्तों की अगाध् आस्था है। रानीखेत नगर से चैबटिया मार्ग पर रानीखेत से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है भव्य माँ झूलादेवी का मन्दिर। यह देवदार एवं बुरांश के वनों के मध्य स्थित है। मान्यता है कि सच्चे मन से जो भी इस दरबार में आता है उसकी हर मुराद माँ झूलादेवी पूरा करती है। झूलादेवी को माँ सिंहसवारी, दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है लगभग आठवीं सदी में यह स्थान सुनसान चरागाह था। इस मन्दिर का निर्माण जंगली जानवरों से रक्षा के उद्देश्य को लेकर किया गया था। रानीखेत नगर से लगभग आठ किलोमीटर दूर शान्त एवं एकान्त रमणीक स्थल पर झूलादेवी मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि यह स्थान चैबटिया, पन्याली, पिलखोली, जैनोली, उपराड़ी, एवं आसपास के ग्रामीणों के जानवरों का चरागाह था, और आसपास का क्षेत्र घनघोर वनों से घिरा हुआ था। इस कारण खंूखार वन्य जीव आए दिन ग्रामीणों के मवेशियों को शिकार बना लेते थे। इससे चरवाहे एवं आसपास के ग्रामीण अत्यधिक दुःखी हो गये थे । एक दिन रात्राी में एक चरवाहे को माँ शेरोवाली ने दर्शन दिये और कहा कि चारागाह के पास की जमीन में माता की एक मूर्ति दबी हुई है, उसे निकालकर तुम मेरा मन्दिर बनाओ। चरवाहे ने सपने में माता के बताये के अनुसार ही चारागाह से मूर्ति निकालकर माता का मन्दिर उस स्थान पर बना दिया। इसके बाद वन्य जीव ग्रामीणों के मवेशियों का शिकार नहीं करते थे । माँ झूलादेवी पर पर लोगों की अटूट आस्था का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां पर केवल नवरात्रों में ही नहीं अपितु पूरे वर्ष भर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है, क्योंकि माँ झूलादेवी सबकी मनोकामना पूरी करती है। मन्दिर के चारों तरफ टंगी छोटी बड़ी सैकड़ो घण्टियां भक्तों के अगाध् आस्था के गवाह हैं । श्रावण मास में व चैत्रा की नवरात्रों में श्रद्धालु सुबह से पूजा अर्चना के लिए झूलादेवी के दरबार में पहुँच जाते हैं। रमणीय एवं एकान्त स्थल पर स्थित झूलादेवी के मन्दिर में आने पर मन को एक शान्ति प्राप्ति होती है। झूलादेवी के मन्दिर में मनोकामनाऐं पूरी होने पर श्रद्धालु घण्टियाँ चढ़ाते हैं। झूलादेवी का मन्दिर भव्य एवं आकर्षक है मन्दिर के बाहर माँ की सवारी सिंह ;शेरद्ध की बड़ी प्रतिमा बनी हुई है, मन्दिर के चारों ओर घण्टियाँ सजी हुई हैं।
वैश्विक महामारी कोरोना के कारण सभी धर्मिक आयोजनों को सीमित कर दिया गया है तो अधिकांश स्थानों पर कोरोना के सुरक्षा नियमों को अपनाकर ही पूजा अर्चना सम्पन्न करायी जा रही हैं। सभी जनमानस ईश्वर से वैश्विक महामारी कोरोना से जल्दी से जल्दी मुक्ति दिलाने की प्रार्थना कर रहे हैं। शीघ्र ही इस वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से सभी जनमानस को मुक्ति मिल जायेगी और पूरे विश्व में पुनः खुशहाली आ जाये, सभी जनमानस इसकी कामना कर रहे हैं।

देवेन्द्रा ज्योति चेरिटेबल ट्रस्ट के रूप में उनका सहयोग हमेशा याद किया जायेगा

स्मृतियां शेष:
डाॅ.पंकज उप्रेती
10 अक्टूबर 2020 को सायं 3 बजे श्रीमती देविन्द्रा (देवेन्द्रा) रावत का निधन हो गया। उनके साथ ही श्री एवं श्रीमती रावत की भरपूर सहयोग की कहानी यादें छोड़ गई है। 91 वर्षीय सबकी आंटी के रूप में पहचान रखने वाली श्रीमती देवेन्द्रा बलवन्त कालोनी, दोनहरिया, हल्द्वानी में निवास करती थीं। जीवन के उत्तराद्र्ध में भी वही बचपन सी उमंग और बहिनों का आपसी लाड़-प्यार सबकी जुवां पर था। इनकी कोशिश रहती है कि हर गतिविधियों में भागीदारी करूँ। उम्र के इस पड़ाव में भी, वह सभी आयोजनों में खुशी से सम्मिलित होती ताकि सबसे भेंटघाट हो सके। इधर-उधर सबकी कुशल पूछती थीं।
उनके निधन के समय ईष्ट-मित्रों का तांता लगा और चित्राशिला घाट, रानीबाग में उन्हें अन्तिम विदाई दी गई। अल्मोड़ा से आकर भतीजे दिग्विजय सिंह रावत ने अन्तिम संस्कार की क्रियाएं कीं। दिग्विजय ‘दीपू’ सामाजिक सरोकारों से जुड़े और रावत परिवार के समझदार व सहनशील युवाओं में से हैं।
बात करते हैं ‘ज्योति-देवेन्द्रा’ की। इस दम्पत्ति का अपने समाज के प्रति अटूट विश्वास था और सहयोग की भावना इनमें थी। कमाण्डर ज्योति सिंह रावत उच्च पदों पर रहते हुए भी सहज-सरल व्यक्ति थे। पारिवारिक विरासत का जो संस्कार उनमें था, वह तो था ही लेकिन स्वयं के बूते भी उन्होंने बहुत कुछ जोड़ा। उनके असमय निधन से श्रीमती देवेन्द्रा जी अकेले रह गईं और अपने इष्ट-मित्रों के साथ हल्द्वानी में रहने लगीं। बलवन्त कालोनी में श्री दुर्गा सिंह रावत और उनके परिवार के साथ देवेन्द्रा जी का समय व्यतीत हो रहा था। डाॅ.एन.एस.पांगती सहित उनके सभी पारिवारिक जन सुधबुध लेते रहते थे। और उन्हें कभी अकेलेपन का अहसास नहीं होने दिया।
अपनों के बीच देविन्द्रा (देवेन्द्रा) सुख थीं। माघ की खिचड़ी, होली मिलन से लेकर जोहार महोत्सव तक के हर कार्यक्रम की दर्शकदीर्घा में उनकी उपस्थिति होती। ध्नबल जैसा कोई अहंकार उनमें कभी नहीं रहा। उनके संस्कार उन्हें रौबदार बनाए रहे। तभी वह कहीं भी अपने सहयोग में पीछे नहीं हटती। पिघलता हिमालय की आजीवन सदस्य होने के बावजूद वह हमेशा इसकी चिन्ता करती थी कि किन स्थितियों में यह प्रकाशित होता है और सभी को इससे जोड़ती। ज्योति-देवेन्द्रा दम्पत्ति ने महरौली दिल्ली में भी कापफी सम्पत्ति जोड़ी थी लेकिन सबकुछ सौदा कर समय के साथ इन्हें सिमटना पड़ा। ‘देवेन्द्रा ज्योति चेरिटेबल ट्रस्ट’ के रूप में गठित समिति द्वारा नेक कार्यों के लिये निर्णय लिये जाने लगे। मुनस्यारी, अल्मोड़ा, हल्द्वानी सहित तमाम संस्थाओं में इनका योगदान याद रहेगा।
अब जबकि कमाण्डर ज्योतिसिंह व श्रीमती देवेन्द्रा हमारे बीच नहीं हैं, उनकी यादों को सजोने के लिये शुभचिन्तकों को बेहतर करना होगा। इनकी जीवनी हमें त्याग करना सिखाती है। स्व. देवेन्द्रा रावत को पिघलता हिमालय परिवार की श्रद्धांजजि।